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राज्य प्रशासन में सोशल मीडिया का प्रयोग कहीं आगे, कहीं फिसड्डी

December 1, 2017

पारदर्शी प्रशासन के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर जोर दे सरकार

भुवन कुमार/पटना/  पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया न केवल भारत बल्कि वैश्विक स्तर पर गेम चेंजर की तरह काम किया है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सोशल मीडिया केवल फोटो, वीडियो, जानकारियों को आपस में साझा करने तक सीमित नहीं होकर सामाजिक बुराइयों से लड़ने का भी औजार साबित हुआ है। दूसरे शब्दों में, सामाजिक जागरूकता के विस्तार में इस नवीन माध्यम का कोई सानी नहीं है। विगत कुछ सालों में विश्व के विभिन्न हिस्सों में हुए जनक्रांतियों में सोशल मीडिया की केंद्रीय भूमिका रही है। भारत में ही अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई पहल को सोशल मीडिया ने बड़ा मंच उपलब्ध कराया।

सोशल मीडिया की बढ़ती स्वीकारोक्ति तथा जनता विशेष तौर पर युवा वर्गों तक इसकी आसान पहुंच के कारण ही  केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों द्वारा इस नवीन माध्यम का उपयोग प्रभावी तौर पर किया जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा जनकल्याणकारी योजनाओं, पहलकारी कदमों और नवाचारों को लोगों तक पहुंचाने के साथ ही  डिजिटल गवर्नेस को बढ़ावा देने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहने वाले नेता हैं।

लेकिन केंद्र सरकार द्वारा सोशल मीडिया के प्रभावी प्रयोग के विपरीत बिहार सरकार के विभिन्न विभागों व राज्य के जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन सोशल मीडिया के प्रयोग को लेकर उतने मुखर नहीं दिखते। हालांकि, प्रधानमंत्री व केंद्रीय मंत्रियों के तरह ही राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व अन्य कई मंत्री भी अपने-अपने स्तर पर इस माध्यम का वृहत पैमाने पर प्रयोग कर रहे हैं लेकिन राज्य में डिजिटल गवर्नेंस को लेकर जितना उत्साह दिखना चाहिए, वैसा प्रतीत नहीं हो रहा है।

प्रशासन में सोशल मीडिया की उपयोगिता के संबंध में देश के कई हिस्सों से सकारात्मक खबरें सामने आती रहती हैं। यहां तक कि बिहार में भी सोशल मीडिया भ्रष्टाचार को कम करने का सशक्त माध्यम बन कर उभरा है। राज्य सरकार या जिला प्रशासन द्वारा सोशल मीडिया के प्रभावी प्रयोग क्यों उपयोगी है इसे हाल ही में पटना के एक महत्वपूर्ण समाचारपत्र में दिनांक 25 नवंबर, 2017 को प्रकाशित एक रिपोर्ट से समझा जाना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, खबर-सीमांचल फेसबुक-वाट्सपग्रुप ग्रुप के पहल पर किशनगंज तथा अररिया जिले में बाढ़ पीडितों को मुआवजे देने के बदले कमीशन लेने का मामला प्रकाश में आया, जिस पर स्थानीय जिला प्रशासन द्वारा कड़े कदम उठाए गए। खबर सीमांचल के 2 लाख 14 हजार से अधिक सदस्य वाले फेसबुक-वाट्सअपग्रुप पर के प्रयासों का ही नतीजा है कि स्थानीय प्रशासन द्वारा भ्रष्टाचार के इस उद्भेन पर नोटिस लेते हुए जिला प्रशासन ने कोचाधान में नोटिस जारी किया कि ऐसे लोग जो अयोग्य हैं और उन्होंने बाढ़ राहत का मुआवजा ले लिया है, वे 4 नवंबर तक नाजिर के पास मुआवजा की राशि जमा कराएं, वरना दोषी के खिलाफ कार्रवाई होगी। इसका नतीजा यह निकला कि करीब 292 लोगों ने मुआवजे की कुल 17 लाख 52 हजार की राशि नाजीर के पास वापस की है। यह सिलसिला अभी भी जारी है। भ्रष्टाचार उपशमन में सोशल मीडिया के प्रभाव का इससे बढ़िया उदाहरण शायद ही मिले।

लेकिन राज्य प्रशासन में सोशल मीडिया के प्रयोग पर एक नजर डालें और सोशल मीडिया का सर्वाधिक लोकप्रिय विकल्प फेसबुक की बात करें तो पाते हैं कि तो आधे से अधिक जिला प्रशासन फेसबुक का प्रयोग नहीं करते हैं और जिस जिला प्रशासन द्वारा फेसबुक का प्रयोग किया भी जा रहा है उसमें अधिकांश सक्रिय नहीं हैं। जहां तक जिला प्रशासन द्वारा फेसबुक के प्रभावी प्रयोग का मामला है उसमें गया, पटना, नालंदा, सारण, बांका, गोपालगंज, मधुबनी, सीतामढ़ी, सिवान, सुपौल और पश्चिमी चंपारण अग्रणी है। इन जिलों में जिला प्रशासन द्वारा किए गए कार्यों को फोटो, वीडियों और प्रेस कतरनों को नियमित तौर पर पोस्ट किया जाता है। 

बांका जिला प्रशासन एकमात्र जिला है जहां प्रशासनिक कार्यों के अतिरिक्त तीन विभागों एमडीएम, सप्लाई, और आईसीडीएस का अलग-अलग फेसबुक पेज है और सभी अपडेटेड हैं। वहीं, गया जिला प्रशासन की एक खासियत यह है कि यहां पाठकों के कमेंट पर पेज एडमिन द्वारा रिप्लाय भी दिया जाता है तथा किसी पाठक के शिकायत व सुझाव को संज्ञान में भी लिया जाता है। गौरतलब है कि दो वर्ष पूर्व बक्सर जिला प्रशासन द्वारा स्वीप कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए भी “बक्सर ब्लूम” नाम से फेसबुक पेज बनाया गया था, जिसे कम समय में ही काफी लोकप्रियता मिली थी। माइक्रोब्लॉगिंग ट्विटर के प्रयोग का प्रयास भी कुछेक जिलों जैसे सारण, लखीसराय द्वारा किया गया लेकिन उसमें भी नियमित तौर पर सूचनाओं को ट्विट नहीं किया जाता है। सारण एकमात्र जिला प्रशासन है जिसके ट्विटर अकाउंट के साथ ही यू-ट्यूब चैनल भी है लेकिन प्रशासन के ट्विटर हैंडल से अभी तक कोई भी सूचना ट्वीट नहीं किया गया है। यू-ट्यूब वीडियो अपलोड करने के मामले में भी यह उतना सक्रिय नहीं है। लखीसराय जिला प्रशासन द्वारा भी ट्वीटर हैंडल बनाया जरूर गया है लेकिन अंतिम बार इसका इसका उपयोग जुलाई, 2017 में किया गया तथा यहां केवल 3 ट्विट्स किए गए हैं।

राज्य सरकार के विभागों में भी सोशल मीडिया को लेकर उतना उत्साह नहीं प्रतीत होता है। आंकड़ों पर गौर करें तो सामान्य प्रशासन विभाग के फेसबुक पेज पर अंतिम बार 1 सितंबर, 2016 को पोस्ट किया गया था। इसी तरह सहकारिता विभाग पेज भी अपडेटेड नहीं है। मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग का भी कमोबेश यही हाल है। इस विभाग को फेसबुक पेज के अलावा यू-टूयब चैनल भी है लेकिन अर्से से कोई वीडियो शेयर नहीं किया गया है। तब जब कि राज्य में शराबबंदी को लेकर एक मुहिम छेड़ी हुई है सोशल मीडिया का प्रयोग बड़े पैमाने पर कर युवाओं को इस सामाजिक बुराई को लेकर जागरूक किया जाना चाहिए था। इस मामले में पर्यावरण एवं वन विभाग इस रूप में अलग है कि इस विभाग द्वारा सूचना साझा करने के नवीनतम माध्यम एप उपयोग में लाया गया है तथा दो एप्स “ई-फॉरेस्ट” तथा “वानिकी जिज्ञासा” विभाग के वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। समाज कल्याण विभाग द्वारा भी एक एप उपलब्ध कराया गया है। गृह विभाग के अधीन बिहार पुलिस का फेसबुक पेज निश्चित तौर पर अपडेटेड है। बिहार पुलिस का अपना एक ट्विटर हैंडल भी है जहां से लगातार सूचना संप्रेषित किया जा रहा है।

हालांकि, जिला प्रशासन व राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के विपरीत राज्य के मुख्यमंत्री कार्यालय का फेसबुक पेज पर लगातार पोस्ट किए जाते हैं तथा सरकार के पहलकारी कदमों को इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से जनता तक पहुंचाया जाता है। जहां तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फेसबुक पेज का सवाल है तो उनके फेसबुक पेज के आंकड़े बताते हैं कि मुख्यमंत्री सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय है। मुख्यमंत्री का फेसबुक पेज के अलावा ट्विटर हैंडल भी है जिसे लाखों लोगों द्वारा फॉलो किया जाता है। इसी प्रकार बिहार के उप-मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री भी सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

गौरतलब है कि राज्य में स्वच्छता अभियान को लेकर चलाए जा रहे अभियान के तहत ग्रामीण विभाग द्वारा लोहिया स्वच्छ बिहार नाम से अप्रैल 2017 में ट्विटर हैंडल बनाया गया जिससे अब तक 1124 ट्वीट्स किए गए हैं तथा यह लगातार सक्रिय है। इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से राज्य के विभिन्न जिलों में दिन प्रतिदिन होने वाले स्वच्छता के प्रयासों को सामने लाया जाता है। राज्य के प्रशासकों के व्यक्तिगत प्रयासों को देखें तो विभिन्न जिलों के पुलिस अधीक्षकों द्वारा व्यक्तिगत फेसबुक पेज का उपयोग किया जा रहा है जिसमें पूर्वी चंपारण व पूर्णियां के वर्तमान पुलिस अधीक्षक तथा भागलपुर के डीआईजी का नाम अग्रणी है। ट्विटर प्रयोग के मामले में गोपालगंज के जिलाधिकारी भी काफी सक्रिय हैं।

ज्ञात हो कि बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री श्री तेजस्वी यादव द्वारा भी सोशल मीडिया विशेष तौर पर वाट्सअप मैसेजिंग सिस्टम का प्रयोग कर राज्य में सड़क उन्नयन का प्रयास किया गया था। इसी प्रकार बिहार पुलिस ने भी पुलिस प्रशासन के अंतर्गत संचार के त्वरित पहुंच को बढ़ावा देने के लिए सोशल साइट्स के प्रयोग को बड़े पैमाने पर अपनाने का फैसला किया था। 

गौरतलब है कि गया, नालंदा और पटना जिला प्रशासन प्रशासनिक क्षमता में विस्तार के मद्देनजर लगातर नवीन तकनीकों का प्रयोग कर रहे हैं तथा इस क्रम में एप्स का सहारा ले रहे हैं। पटना जिला प्रशासन ने छठ के दौरान प्रभावी व्यवस्था बनाए रखने के लिए जहां “छठ पूजा पटना” एप का सहारा लिया वहीं गया जिला प्रशासन वहां आने वाले पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए “पिंडदान गया”, “बोधगया गाइड” जैसे एप्स का सहारा ले रहे हैं। नालंदा जिला प्रशासन द्वारा जहां “हमारा राजगीर” नामक एप का प्रयोग किया जा रहा है वहीं बांका जिला प्रशासन द्वारा शैक्षणिक विकास के लिए “बांका उन्नयन” एप का सहारा लिया जा रहा है। हाल ही में पटना नगर निगम द्वारा स्वच्छता एप लॉंच किया गया है जिसका मूल उद्येश्य स्वच्छ शहरों के लिए भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे सर्वे अभियान में अधिकाधिक लोगों की भागीदारी हो सके। पर्यटन विभाग का “बिहार टूरिज्म” एप से भी राज्य में पर्यटन स्थल के बारे में सूचना उपलब्ध कराई जा रही है।

ऐसे में जब राज्य के ही कई जिले लगातार संचार के नवीन तकनीक का प्रयोग कर प्रशासन को स्मार्ट बनाने की पहल कर रहा है अन्य जिला प्रशासन को भी चाहिए कि प्रशासन में सोशल मीडिया का समावेश करे। राज्य प्रशासन को स्वीकारना होगा कि समकालीन समाज संचार-क्रांति और उसके विभिन्न आयामों का बड़ा उपभोक्ता है ऐसे में सोशल मीडया के उपयोग को बढ़ावा देकर न सिर्फ राज्य सरकार द्वारा संचालित जनकल्याणकारी योजनाओं तथा विभिन्न पहलों को आम जनता तक ले जाया जा सकता है बल्कि जनता के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक चुनौतियों के संबंध में फीडबैक प्राप्त कर सकता है। हाल ही में सामाजिक बुराई दहेज प्रथा के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा जो मुहिम छेड़ी गई है उसे युवाओं तक पहुंचाने के लिए फेसबुक एक बेहतर माध्यम हो सकता है जहां सकारात्मक संदेश से युक्त पोस्ट व वीडियो अपलोड कर लोगों विशेष तौर पर युवक-युवतियों को जागरूक किया जा सकता है।

आज सोशल साइटें आधुनिक जीवन का अपरिहार्य अंग है क्योंकि यह न सिर्फ मुक्त संवाद का मंच है अपितु यह प्रमाणिकता व ईमानदारी को बढ़ावा देने का भी बेहतरीन माध्यम है। पुनः यह बहुपक्षीय संचार का भी अवसर प्रदान करता है। प्रशासन के लिए यह इस रूप में लाभकारी है कि इसके माध्यम से प्रशासन की उपलब्धियों व सूचनाओं को आम लोगों तक पहुंचाया तो जा ही सकता है बल्कि आम जनता से भी त्वरित फीडबैक प्राप्त किया जा सकता है।

भारतीय सूचना सेवा के भुवन कुमार पीआईबी, पटना में सहायक सूचना अधिकारी हैं।  

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