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राजेन्द्र यादव के निधन पर फेसबुक पर श्रद्धांजलि में दो शब्द

October 31, 2013

(हिन्दी के प्रख्यात लेखक और चर्चित साहित्यिक पत्रिका" हंस” के संपादक राजेन्द्र यादव के निधन पर फेसबुक पर श्रद्धांजलि अर्पित किए गए। उनके प्रति दो शब्दों  से फेसबुक पटा हुआ है .....फेसबुक से ....कुछ संकलन –संपादक )

*राजेंद्र यादव -एक 'पब्लिक इंटलेक्चुअल' का दृश्य ओझल होना .

वीरेंद्र यादव(चर्चित आलोचक)/राजेंद्र  यादव का अवसान समूचे हिन्दी साहित्य संसार केलिए सचमुच स्तब्धकारी है.उन्होंने पिछले कई दशकों के दौरान  हिन्दी साहित्यिक  परिदृश्य में जिस  हस्तक्षेपकारी भूमिका कानिर्वाह किया  वह युगान्तरकारी है .स्त्री,दलित .अल्पसंख्यक और हाशिये के वृहत्तर समाज को केन्द्रीयता प्रदान करते हुए उन्होंने जिस तरह साहित्य को जनतांत्रिक बनायावह उनका विरल और मौलिक योगदान है . 1986 में प्रेमचंद जयन्ती के अवसर पर राजेंद्र यादव द्वारा‘हंस’ मासिक के प्रकाशन की शुरुवात ने  जिसतरह समूचे हिन्दी साहित्य को नए विचारों ,विमर्शों और बहसों से समृद्ध किया वहसचमुच ऐतिहासिक  है .आजाद भारत में यहप्रेमचंद द्वारा संस्थापित पत्रिका ‘हंस’ का पुनर्प्रकाशन ही नहीं था बल्कि यह प्रेमचंद के साहित्यिक सरोकारों की भी बदलेसामाजिक सन्दर्भों में वापसी थी

        यह मात्र संयोग नहीं है कि जिन दिनोंउत्तर भारत की  हिन्दी पट्टी की राजनीतिमें हाशिये के समाज का हस्तक्षेप बढ़ा उन्ही दिनों हिन्दी साहित्य में भी दलित और स्त्री विमर्श ने अपनी केन्द्रीयता दर्जकराई . यह करते हुए राजेंद्र यादव ने  स्वयं का भी जिस तरह व्यक्तित्वांतरण किया वह भीकम महत्वपूर्ण नहीं है .कारण यह कि जिस शहरी संपन्न  मध्यवर्गीय परिवार में राजेंद्र यादव जन्में (२८अगस्त ,१९२९) और पले बढे थे उसमें हाशिये के समाज के जीवन और सरोकारों की गुन्जाइशप्रायः कम ही थी . उनके  पहले उपन्यास ‘सारा आकाश’ का शहरी पृष्ठभूमि की युवामानसिकता पर केन्द्रित होना उनके अपने परिवेश और वातावरण के अनुकूल ही था . यह भीउल्लेखनीय  है कि बीस वर्ष की युवावस्थामें लिखे गए  छ दशकों पूर्व प्रकाशित उनके  इस उपन्यास ने उन्हें सर्वाधिक  ख्यातिऔर लोकप्रियता प्रदान की .यद्यपि स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज के जिस व्यापक फलकपर उनका उपन्यास ‘उखड़े हुए लोग’  केन्द्रित है ,वह कई अर्थों में अधिकमहत्वपूर्ण है .’कुलटा’, ‘अनदेखे अनजान पुल’, ‘मंत्रविद्ध’ और ‘एक था शैलेन्द्र’ भी उनके खासे चर्चित उपन्यास रहे हैं ,लेकिन मन्नू भंडारी के साथ लिखा गयाउनका उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ अपने अभिनव प्रयोग के कारण विशेष रूप से चर्चित हुआ.

       राजेंद्र यादव की ख्याति मोहन राकेश और कमलेश्वरके साथ नयी कहानी की त्रिमूर्ति के रूप में काफी पहले हो गयी थी और   ‘एक दुनिया समान्तर’ जैसे संकलन का संपादन वउसकी विस्तृत भूमिका लिखकर उन्होंने नयी कहानी को नयी वैचारिकी से लैस किया था.आजादी के बाद के शहरी समाज ,परिवार और स्त्री पुरुष संबंधों को उन्होंने अपनीकहानियों द्वारा नए परिप्रेक्ष्य भी प्रदान किये थे . ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’ ,‘छोटे छोटे ताजमहल’ , ‘टूटना’, ‘ढोल’ , ‘अपने पार’ ‘वहां तक पहुँचने की दौड़’‘किनारेसे किनारे तक’ , ‘चौखटे’ आदि संग्रहों की कहानियां उनके कथात्मक सरोकारों केसाक्ष्य हैं .लेकिन अपने इस समूचे लेखन को मध्यवर्गीय सरोकारों का लेखन करार देकरजिस तरह उन्होंने इसे एक अर्थ में ख़ारिज किया वह किसी लेखक के लिए सचमुच साहसिक था.

    दरअसल राजेंद्र यादव अपने समूचेव्यक्तित्व  और लेखन में परंपरा भंजक और  विद्रोही थे .इसीलिये उन्होंने अपने व्यक्तित्वऔर लेखन द्वारा लगातार नयी बहसों और विवादों को जन्म दिया .स्त्री पराधीनता  ,पितृ सत्ता के कटघरे और हिन्दू धर्म कीवर्णाश्रमी जातिगत संरचना हमेशा उनके निशाने पर रही . ‘हंस’ के स्त्री ,दलित औरअल्पसंख्यक केन्द्रित विशेषांकों का प्रकाशन करके उन्होंने हाशिये के विमर्शों कोजो केन्द्रीयता प्रदान की वह स्वाधीन भारत में साहित्यिक पत्रकारिता के लिए एक नयीशुरुवात थी . .1927 में ‘चाँद’ पत्रिका के ‘अछूत अंक’ के प्रकाशन केबाद यह पहली बार था कि मुख्य धारा की किसी साहित्यिक पत्रिका का ‘दलित अंक’प्रकाशित किया गया हो . यह स्वीकार करना होगा कि ‘हंस’ के  ‘मेरी तेरी उसकी बात’ सरीखे सम्पादकीय स्तम्भके माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज और संस्कृति के मुद्दों पर जो वैचारिक हस्तक्षेप  किया उसने साहित्यकार की भूमिका को नया आधार भीप्रदान किया . ‘हंस’ के पृष्ठों पर प्रगतिशील लेखन आन्दोलन एवं उर्दू भाषा संबंधीबहसों ने हिन्दी साहित्य संसार को उसके सरोकारों और साझी संस्कृति की जमीन की भीयाद दिलायी .

    यह स्वीकार करना होगा कि राजेंद्र यादव ने‘हंस’ के माध्यम से साहित्यिक कुलीनतवाद और कलावाद को सशक्त चुनौती दी थी . जबसमूची हिन्दी पट्टी में साप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरतावाद की आंधी चल रही थी तबऐसे दौर में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में ही नहीं बल्कि धार्मिक कूढ़मगजताके विरुद्ध भी अभियान छेड़ा था .परिणामस्वरूप उन्हें मुकदमे , अदालतों और जमानत आदिके  खतरों और झंझटों से भी गुजरना पड़ा था .सहीअर्थों में राजेंद्र यादव एक ऐसे ‘पब्लिक इंटलेक्चुअल’ थे जो राजनीति ,संस्कृति औरसमाज के हर पहलू पर प्रगतिशील दृष्टिकोण रखते थे .यह सचमुच विस्मयकारी है कि वे यहसब अपनी उस बढी हुयी उम्र में कर सके थे जब सामान्यतः लोग संन्यास की आरामदायकमुद्रा में यथास्थितिवाद के पैरोकार और वर्चस्व की सत्ता के मुखापेक्षी हो जातेहैं .  

         राजेंद्र यादव अपने सामाजिक सरोकारोंऔर लेखन में ही नहीं बल्कि अपने व्यक्तित्व में भी पूरी तरह जनतांत्रिक थे . जिसतरह ‘हंस’ के पृष्ठों पर असहमति और बहस की पूरी छूट थी ,उसी तरह ‘हंस’ के कर्यालय कीअड्डेबाजी में भी . राजेंद्र जी युवतम लेखकों को भी बहस और असहमति की पूरी छूट हीनहीं देते थे बल्कि उसका सम्मान  भी करतेथे .यही कारण था कि ‘हंस’ जितना एक पत्रिका का कर्यालय था उससे कहीं अधिकसाहित्यिक अड्डेबाजी का केंद्र .समूचे देश के साहित्यकारों के  लिए ‘हंस’ का कार्यालय दिल्ली पहुँचने परअनिवार्य गंतव्य होता था .राजेन्द्र जी के ठहाकों से गुंजायमान इस अड्डे परपहुँचते ही उम्र और पीढ़ियों की दूरिया पल भर में तिरोहित हो जाती थीं .सचमुचराजेंद्र यादव का इस तरह अकस्मात चला जाना समूचे हिन्दी संसार को अवसन्न करने वालाहै . निश्चित रूप से यह हिन्दी साहित्य के एक युग का अवसान ही है .उन्हें अंतिमप्रणाम ! 

शंभूनाथ शुक्ल(चर्चित आलोचक-पत्रकार ) /राजेंद्र यादव को जानने के लिए उनसे मिलना जरूरी नहीं था। उनके उपन्यास और उनकी पत्रिका तथा उनके बारे में बहुश्रुत कहानियां ही उनकी पहचान कराने में सक्षम थीं।

 उर्मिलेश(वरिष्ठ पत्रकार) / राजेंद्र यादव का निधन हिन्दी ही नहीं, संपूर्ण भारतीय साहित्य, विचार और रचना जगत के लिए बड़ी क्षति है। उन्हें श्रद्दांजलि। लेकिन आज सुबह आश्चर्य हुआ, जब देखा, देश के कुछ बड़े अंग्रेजी अखबारों में उनके निधन की खबर तक नहीं है। क्य़ा ये अंग्रेजी अखबार भारत के गैर-अंग्रेजी लेखन या लेखक को विचार और रचना जगत का हिस्सा नहीं मानते? नागार्जुन, शमशेर और रामविलास शर्मा के निधन के समय पर ऐसा ही कुछ देखने को मिला था। इस बार कम से कम देश के एक बड़े अंग्रेजी अखबार-टाइम्स ने चौदहवें पेज पर ही सही, राजेंद्र जी के निधन की खबर छापी है।

कौशल किशोर(जसम के संयोजक)/ आज 30 अक्टूबर को लखनऊ के लेखकों व संस्कृतिकर्मियों ने कथाकार व ‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये। शोकसभा का आयोजन प्रलेस, जसम, जलेस, इप्टा, कलम, कैफी आज़मी एकेडमी व साझी दुनिया ने मिलकर किया था। इस मौके पर बोलते हुए आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि राजेन्द्र यादव सच्चे मायने में पब्लिक इन्टलेक्चूयल थे। वीरेन्द्र यादव ने विस्तार से उनके लेखन व व्यक्तित्व पर अपनी बातें रखी। अध्यक्षता रवीन्द्र वर्मा ने की तथा अपनी बात रखने वाले वक्ता थे नरेश सक्सेना, शिवमूर्ति, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, रूपरेखा वर्मा, कौशल किशोर, अखिलेश, अजय सिंह, रमेश दीक्षित, प्रीति चौधरी, वंदना मिश्र, सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ, शकील सिद्दीकी, नलिन रंजन सिंह, किरण सिंह, रंजना गुप्त आदि। सभा का संचालन राकेश ने किया। विलायत जाफरी, भगवान स्वरूप कटियार, दीपक कबीर, ताहिरा हसन, प्रज्ञा पाण्डेय, सुशीला पुरी, मालविका, कल्पना पांडेय दीपा, महेश भिष्म, सत्येन्द्र, ओम प्रकाश मिश्र, बी एम प्रसाद, प्रमोद प्रसाद सहित बड़ी संख्या में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शोकसभा में राजेन्द्र यादव को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

 तुलसी राम(वरिष्ठ लेखक) / राजेंद्र यादव: एक महान सामाजिक छति!  प्रसिद्ध कथाकार तथा हंस पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव नहीं रहे। मोहन राकेश, कमलेश्वर तथा राजेंद्र यादव की एक ऐसी साहित्यिक तिकड़ी है जिसमें से किसी भी एक को याद करने पर शेष दोनों याद आएँगे। फिर भी राजेंद्र यादव का स्थान हमेशा अति विशिष्ट बना रहेगा। वे दलित तथा स्त्री विमर्श के संरक्षक थे। जब दलितों की बात कोई सुनने को तैयार नहीं था, उन दिनों राजेंद्र यादव दलित साहित्य पर हंस का विशेषांक निकाल देते थे। मुझे व्यक्तिगत रूप से हमेशा यह दुख रहेगा कि आगे अब अपने वरिष्ठ साथी तथा प्रशंसक राजेंद्र यादव से बात नहीं कर पाऊँगा ।

गुलजार हुसैन (वरिष्ठ पत्रकार-लेखक)/ राजेंद्र यादव ने 'हंस' के संपादकीय में हर मुद्दे को छुआ। चाहे वो नक्सलवाद का मुद्दा हो या सांप्रदायिकता की राजनीति का । उन्होंने सब विषयों पर बेबाक और साहसिक टिप्पणियां की। वे ऐसे समय में सांप्रदायिक -राजनीतिक ताकतों के खिलाफ लिख रहे थे,जब देश भर में ऐसे विषय पर एक चुप्पी छाई थी। राजेंद्र ने धर्मांध ताकतों और कट्टरवाद के खिलाफ जैसा लिखा,उस दौरान कोई दूसरा लेखक इस तरह लिखने का साहस नहीं कर सकता था। उन्होंने शब्दों को भरे हुए बंदूक की तरह इस्तेमाल किया और नए ढंग के क्रांतिकारी लेखन की धारा चल निकली। कट्टरपंथी और सांप्रदायिक ताकतों ने उनके लेखन का जबर्दस्त विरोध किया, लेकिन उनके लेखन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे लगातार लिखते रहे। सांप्रदायिक दंगे और प्रांतवादी माहौल पैदा करवाने वाले ताकतवर राजनीतिज्ञों को उन्होंने खुले तौर पर 'नरभक्षी ' और 'भेड़िया ' कहा। नक्सलवाद रोकने के नाम पर होने वाले सरकारी जुल्मों का उन्होंने डंके की चोट पर विरोध किया।

मुसाफ़िर डी बैठा (आलोचक-कवि )/ किसी के देहावसान पर मौन रखना ब्राह्मणी-कर्मकांड भी हो सकता है नहीं भी. यदि यह किसी की आत्मा की शांति के लिए है तो जाहिर है, यह अंधविश्वास का पोषक है, कर्मकांड है. यदि यह महज उस व्यक्तित्व के प्रति सम्मान-भाव व्यक्त करने के लिए है तो अलबत्ता, कर्मकांडी नहीं है.इस वाकये को मुद्दा बनाकर आपस में तनाव-दुराव पालना ठीक नहीं. आत्मा की शांति वाले किसी आत्मा-सेवी के आयोजन में यदि किसी अनात्मवादी ने मौन रख ही लिया तो यह विवाद-योग्य नहीं बनना चाहिए, बखेड़े का सबब नहीं है.
आइये, हमारे समय में हमारे बीच आये इस अनन्य महापुरुष राजेन्द्र यादव के अच्छे कर्मों एवं वैचारिक-रचनात्मक दाय को हम थाती के रूप में सहेजें, उनसे अनुप्राणित हो, खुद को समृद्ध करें.

प्रमोद रंजन(फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक )/ यह राजेंद्र यादव की कमियाँ गिनाने का अवसर नहीं है। विकृतियाँ भी थीं। लेकिन ऐसी हजार चीजों का उनकी जिंदादिली पर वारा जा सकता है। अब चारों ओर गुरु-गंभीर लेखक बैठे हुए हैं, लड़ने-झगड़ने के लिए हम किसके पास जाएँगे? इतिहास की श्रेष्ठता को सभी लोग देख सकते हैं, पर वर्तमान की श्रेष्ठता को स्वीकार करना सब के लिए संभव नहीं होता। पुराने जमाने का लफंगा भी संत नजर आता है, अपने जमाने का संत भी लफंगा जान पड़ता है। हिंदी की पंडित बिरादरी ने यादव और उनके ‘हंस’ के ऐतिहासिक योगदान को कभी स्वीकार नहीं किया। वे दरअसल इन्हें गंभीरता से लेते ही नहीं थे। कुछ के अनुसार ‘हंस’ कामसूत्र का आधुनिक संस्करण था, तो कुछ इससे दुखी थे कि हर अंक में ब्राह्मणवाद को क्यों कोसा जाता है, मानो ब्राह्मणवादी होना कोई गौरव की वस्तु हो। अब अप-परंपराओं की भारी और भरकम संदूकें चैन की साँस ले सकती हैं कि उनके पेंदे तक जो सड़ा-गाल माल है, उसे निकाल कर उसकी प्रदर्शनी लगानेवाला नहीं रहा।

अमलेश प्रसाद(फारवर्ड प्रेस के पत्रकार) / राजेंद्र यादव ने यह खतरा उठाया – जान-बूझ कर नहीं, गिनती-विनती करके भी नहीं, बल्कि यह उनके व्यक्तित्व का अंग था। एक ग्वाले की यह मजाल कि वह भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रतीकों की आलोचना करे – पवन सुत हनुमान को पहला आतंकवादी करार दे। इसकी सजा जरूर मिलनी चाहिए। राजेंद्र यादव के लिए कौन-सी सजा मुकर्रर की गई?

चन्द्र प्रकाश झा/ गहरे सवाल हैं जो राजेन्द्र यादव जी के निधन की भारतीय भाषाओं की प्रिंट मीडिया के खबर देने और अधिकतर " आंग्ल " अखबारों के ना देने की ही नहीं , और भी हैं। ये सवाल संविधान में अंतरनिहित " दोहरे चरित्र " का भी है जो हमारे देश को ' इंडिया दैट इज़ भारत " कहता है ,गौर फरमाएं - आंग्ल पहले , शेष बस एकोमोडेट किया गया है ताकि हज़म हो जाए ये विधि -विधान .

निखल आनंद(वरिष्ठ पत्रकार) / राजेन्द्र यादव ने तमाम विरोध- प्रतिरोध- प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद साहित्य साधना में एक मुकाम हासिल किया है। जिसे किसी ने नहीं तरजीह दी- नहीं छापा उसे हंस ने छापने की दूरदर्शिता दिखाई और साहित्यकार बनाया, जाहिर है साहित्य की दुनिया में सबसे ज्यादा नये रचनाकारों को निखारने का श्रेय भी उन्हे ही जाता है। हिन्दी साहित्य की पारंपरिक मठाधीशी के केन्द्र में दरार डालने की दुस्साहस करने वाली हस्ती जो आलोचना से कभी घबराये नहीं और खास बात की एक बड़ी जमात ने अपना साहित्यिक वजूद ही आपकी आलोचना करके बनाई। राजेन्द्रजी सचमुच हिन्दी साहित्य की दुनिया के वोल्तेयर थे जिन्होंने साहित्य- समाज- संस्कृति- धर्म- राजनीति में क्रांतिकारी बहस की शुरूआत की जो विरले ही किसी के बूते की बात थी। राजेन्द्र यादव समाज के दलित-पिछड़े- शोषित तबके व महिलाओं के बड़े हिमायती रहे और इनका वजूद हिन्दी साहित्य में स्थापित कराया। राजेन्द्रजी साहित्य- संस्कृति- समाज में हम सभी के हमेशा आदर्श रहेंगे और उनकी कमी हम सभी को आने वाले वक्त में बहुत खलेगी जिसकी भरपाई वाकई में मुश्किल होगी। आपको जानना, आपसे तारूफ होना, संवाद करना और हंस में छपना मेरी जिन्दगी की सबसे बड़ी खुशकिस्मती में से एक रहेगी। हिन्दी साहित्य जगत के सबसे क्रांतिकारी शख्सियत Rajendra Yadavको हार्दिक श्रद्धांजलि - हम आपको कभी भूल नहीं पायेंगे। 

 सूरज यादव / नामी साहित्यकार और एक अहम् फेसबुक फ्रेंड राजेन्द्र यादव को श्रद्धांजलि:
एक-दो बार राजेन्द्र यादव जी से मिला था और परिचय देने पर बड़े प्यार से उन्होंने बात की थी। कॉलेज के दिनों में किरोड़ी मल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में होने वाले अंतर-महाविद्यालय बास्केट बॉल मैच में उनकी पुत्री रचना यादव को हिन्दू कॉलेज टीम से खेलते देखते हुए किसी ने बताया की रचना जी की माँ मशहूर लेखिका मनु भंडारी है। बाद में फेसबुक पर राजेंद्र यादव जी का दोस्त भी बना। 
राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त,1929 को आगरा में हुआ। वे हिन्दी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार व आलोचक थे। नयी कहानी के नाम से हिन्दी साहित्य में उन्होंने एक नयी विधा का सूत्रपात किया। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका हंस का पुनर्प्रकाशन उन्होंने प्रेमचन्द की जयन्ती के दिन 31 जुलाई 1986 को प्रारम्भ किया था। यह पत्रिका सन् 1953 में बन्द हो गयी थी। इसके प्रकाशन का दायित्व उन्होंने स्वयं लिया और अपने मरते दम तक पूरे 27 वर्ष निभाया।
राजेन्द्र यादव ने 1951 ई० में आगरा विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की। उनका विवाह सुपरिचित हिन्दी लेखिका मन्नू भण्डारी के साथ हुआ था। वे हिन्दी साहित्य की सुप्रसिद्ध हंस पत्रिका के सम्पादक थे।
हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा राजेन्द्र यादव को उनके समग्र लेखन के लिये वर्ष 2003-04 का सर्वोच्च सम्मान (शलाका सम्मान) प्रदान किया गया था।
28 अक्तूबर 2013 की रात्रि को नई दिल्ली में 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
राजेन्द्र यादव की स्मृति को नमन और उन्हें श्रद्धांजलि।

 

 

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