मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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मीडिया का पतन लोकतंत्र पर आघात

तनवीर जाफऱी/ विश्व के 165 स्वतंत्र देशों में हुए शोध के अनुसार पांच विभिन्न मापदंडों के आधार पर तैयार की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतवर्ष वैश्विक लोकतंत्र सूचकांक में दस पायदान नीचे चला गया है। 2017 में यह 42वें स्थान पर था। ब्राऊन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेएफ हालगोन द्वारा किए गए एक विस्तृत शोध के अनुसार किसी भी देश के लोकतांत्रिक मूल्यों की गिरावट का परीक्षण करने के दस माप…

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लेखन को स्थायित्व और वैधता देती निजी वेबसाइट

डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'/ इंटरनेट की इस दुनिया ने पाठकों की पहुँच और पठन की आदत दोनों ही बदल दी है, इसी के चलते प्रकाशन और लेखकों का नज़रिया भी बदलने लगा है। भारत में लगभग हर अच्छे-बुरे का आंकलन उसके सोशल मीडिया / इंटरनेट पर उपस्थिति के रिपोर्टकार्ड के चश्में से देखकर तय किया जा रहा हैं, संस्था, संस्थान, व्यक्ति, सरकार, कंपनी, साहित्यकर्मी से समाजकर्मी तक और नेता से अभिने…

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अब मीडिया सरकार के कामकाज पर नजर नहीं रखती, बल्कि सरकार मीडिया पर नजर रखती है

मॉनिटरिंग की कोई बात मॉनिटरिंग करने वाला बाहर न भेज दें, इस पर नज़र रखी जा रही है

पुण्य प्रसून वाजपेयी/ दिल्ली में सीबीआई हेडक्वार्टर के ठीक बगल में है सूचना भवन. सूचना भवन की 10वीं मंज़िल ही देश भर के न्यूज़ चैनलों पर सरकारी निगरानी क…

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भयानक है यह चुप्पी !

मीडिया की नाक में नकेल डाले जाने का सिलसिला पिछले कुछ सालों से नियोजित रूप से चलता आ रहा है

क़मर वाहिद नक़वी। एबीपीन्यूज़ में पिछले 24 घंटों में जो कुछ हो गया, वह भयानक है. और उससे भी भयानक है वह चुप्पी जो फ़ेसबुक और ट्विटर पर छ…

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​“हिंदी अखबारों का ये कैसा दौर”

आइए देखें हिन्दी के कुछ अखबारों ने कल के अविश्वास प्रस्ताव को कैसा ट्रीटमेंट दिया है...

संजय कुमार सिंह/ मैं कोलकाता के अंग्रेजी दैनिक दि टेलीग्राफ का फैन हूं। शुरू से। भाजपा सांसद एमजे अकबर इसके संस्थापक संपादक हैं और मैं स्थापना के…

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खबरों का मुंह विज्ञापन से ढका है ....

रामजी तिवारी/ समाचार पत्रों को सुबह हाथ में लेते समय हमारे मन में क्या चल रहा होता है ....? रात को टी वी समाचार चैनलों के सामने बैठकर हमारे जेहन में किस बात की उत्सुकता बनी रहती है ...? सोशल मीडिया को स्क्रॉल करते समय देश दुनिया को लेकर हम क्या सोच रहे होते हैं ....? …

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सस्ता डाटा, सोशल मीडिया और हमारा संकट

संजीव परसाई/ आग फैलेगी तो आएंगे कई घर जद में, यहाँ सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है...आग लगाने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि वे या उनका कोई इस समाज में शामिल है। आप समाज को जाहिल और जहरीला बनाएंगे तो सुरक्षित भविष्य की कल्पना कैसे की जा सकती है। आज मंदसौर में  हुए भयानकतम अत्याचार को लगभग 15-20 दिन हो चुके हैं, सुना है लाडली अब मुस्कुराई। इस दौरान लोगों को, मीडिया को, नेताओं को, लोगों को …

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‘उदन्त मार्तण्ड’ की परम्परा निभाता हिन्दी पत्रकारिता

30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष 

मनोज कुमार/ कथाकार अशोक गुजराती की लिखी चार पंक्तियां सहज ही स्मरण हो आती हैं कि 

राजा ने कहा रात है

मंत्री ने कहा रात है…

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क्या दुनियाभर में टीवी की बहस में भी संभव है- फिक्सिंग?

प्रदीप द्विवेदी/ टीवी पर खबरों को लेकर प्रसिद्ध पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के हवाले से जो कुछ कहा गया है, यदि वह अर्धसत्य है तो भी एक बड़ा सवाल फिर गहरा रहा है कि... क्या दुनियाभर में टीवी की बहस में भी संभव है- फिक्सिंग?…

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क्या सोशल मीडिया पर नियंत्रण की है जरूरत ?

हालिया दो भारत बंद से उपजे कई सवाल

नई दिल्ली/कुमोद कुमार/ दलित आंदोलन फिर उसके बाद आरक्षण विरोधी आंदोलन में ये रोज-रोज के भारत बंद आंदोलन कहां से पैदा हो रहे हैं? इसमें शामिल होने वाले लोग कहां से आ रहे हैं।…

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और भी मुद्दे --

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