मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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क्या दुनियाभर में टीवी की बहस में भी संभव है- फिक्सिंग?

प्रदीप द्विवेदी/ टीवी पर खबरों को लेकर प्रसिद्ध पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के हवाले से जो कुछ कहा गया है, यदि वह अर्धसत्य है तो भी एक बड़ा सवाल फिर गहरा रहा है कि... क्या दुनियाभर में टीवी की बहस में भी संभव है- फिक्सिंग?…

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क्या सोशल मीडिया पर नियंत्रण की है जरूरत ?

हालिया दो भारत बंद से उपजे कई सवाल

नई दिल्ली/कुमोद कुमार/ दलित आंदोलन फिर उसके बाद आरक्षण विरोधी आंदोलन में ये रोज-रोज के भारत बंद आंदोलन कहां से पैदा हो रहे हैं? इसमें शामिल होने वाले लोग कहां से आ रहे हैं।…

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क्या सिर्फ अभिव्यक्ति की आज़ादी का मामला या पत्रकारिता की आड़ में राजनीति

नवीन पटनायक सरकार का ओ टीवी चैनल का बहिष्कार…ग़लत या सही..

रवीश कुमार/ ओ टी वी ओडिशा का पहला प्राइवेट टीवी चैनल है। इसकी किसी स्टोरी से नाराज़ बीजेडी सरकार ने सार्वजनिक रूप से कहा कि इस टीवी के बहस वाले कार्यक्रम में नहीं जाएंगे। मुझसे प्रतिक्रिया मांगी गई। देर लगाई क्योंकि स्टोरी की जा…

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मुख्यधारा की मीडिया ने क्या दिखाया?

किसान आंदोलन और मीडिया की भूमिका

तनवीर जाफरी / किसानों, खेतीहर मज़दूरों तथा आदिवासियों द्वारा पिछले दिनों नासिक से शुरु हुआ पैदल किसान मार्च लगभग 180 किलोमीटर की यात्रा तय कर 12 मार्च को मुंबई पहुंचा। सूत्रों के अनुसार इस मार्च में लगभग 60 हज़ार आंदोलनकारी अपनी मांगों को लेकर मुंबई स्थित विधानसभा भवन का घेराव करने के इराद…

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गोरखपुर के नतीजे से 2019 का रिज़ल्ट निकाल दे रहे हैं!

राजनीतिक पत्रकार 

रवीश कुमार/ राजनीतिक पत्रकारों को कभी ठीक से समझ नहीं पाया। गोरखपुर में योगी की हार बड़ी घटना तो है लेकिन इस घटना में क्या इतना कुछ है कि चार चार दिनों तक सैंकड़ों पत्रकार लोग लिखने में लगे हैं। राजनीतिक पत्रकारों को ही सिस्टम को करीब से देखने का मौका मिलता है। मगर भीतर की बातों को कम ही पत्रकार लिख पाते हैं या लिखते हैं। उसकी व…

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मोबाइल मीडिया : प्रिंट मीडिया के लिए सवालिया निशान?

अभिमनोज/ प्रिंट मीडिया के हाथ से मीडिया की सत्ता की डोर छुटती जा रही है... पीएम नरेन्द्र मोदी की मोबाइल को लेकर भाजपाइयों को दी गई सलाह का भावार्थ तलाशेंगे तो यह बात साफ हो जाएगी कि मोबाइल मीडिया सारे मीडिया पर लगातार भारी पड़ता जा रहा है!…

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मौत के बहाने टीआरपी की चाहत

साकिब ज़िया/पटना/ भारतीय सिनेमा की अभिनेत्री श्रीदेवी को नमन।सबसे पहले चर्चा श्रीदेवी की, जी हाँ यह हकीकत है कि श्रीदेवी ने लगभग 4 साल की उम्र से लेकर 54 सालों तक सिल्वर स्क्रीन पर कई किरदारों को जीवंत किया।बॉलिवुड के अलावा तमिल, तेलुगू, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों में भी श्रीदेवी ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया। यहां तक कि बॉलिवुड का शायद ही कोई बड़ा कलाकार हो जिसके दिल में …

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श्रीदेवी की मौत पर डूब मरी ‘पत्रकारिता’

निर्मल रानी/ प्रसिद्ध भारतीय सिने अभिनेत्री पद्मश्री श्रीदेवी की पिछले दिनों दुबई के एमीरेटस टॉवर के कमरा नंबर 2201 में रहस्यमयी तरीके से मौत हो गई है। खबरों के अनुसार चूंकि उनकी लाश उनके कमरे में बाथटब में पाई गई इसलिए मौत के कारण निश्चित रूप से संदिग्ध हैं। परंतु जैसे ही श्रीदेवी की मौत की खबर वायरल हुई उसी समय भारतीय पेशेवर मीडिया ने अपनी औकात दिखानी शुरु कर दी। तीर-तुक्के च…

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सोचिये जब अच्छे पत्रकार – जज – नौकरशाह – प्रोफ़ेसर ना होंगे?

सवाल इतना भर नहीं है कि मीडिया संस्थानों को कैसे जकडा जा रहा है या जकड़ा गया है....

पुण्य प्रसून बाजपेयी/ जो हालात मीडिया के हैं, जिस तरह की पत्रकारिता हो रही है, उसमें ये सवाल तो जहन में आता ही है कि जब हालात बदलेंगे, तब कौन सी पत्रकारि…

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हिंदी अखबारों की भ्रष्ट भाषा

डॉ. वेदप्रताप वैदिक/ आजकल मैं मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के कई शहरों और गांवों में घूम रहा हूं। जहां भी रहता हूं, सारे अखबार मंगवाता हूं। मराठी के अखबारों में बहुत कम ऐसे हैं, जो अपनी भाषा में अंग्रेजी का प्रयोग धड़ल्ले से करते हों। उनके वाक्यों में कहीं-कहीं अंग्रेजी के शब्द आते जरुर हैं लेकिन वे ऐसे शब्द हैं, जो या तो अत्यंत लोकप्रिय हो गए हैं या फिर उनका अनुवाद करना…

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और भी मुद्दे --

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