मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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प्रिंट मीडिया पर कोविड-19 का कहर

सरकार आर्थिक मदद करे 

आदित्य कुमार दूबे/ अभी देशव्यापी लाक-डाउन के दो ही दिन हुए हैं कि प्रिंट मीडिया पर कोविड-19 का कहर साफ नजर आने लगा है। अखबारों के पन्ने कम हुए हैं, उनका वितरण बाधित हुआ है और विज्ञापन नदारद हो गए हैं।  जो अखबार 20 से 40 पेज के हुआ करते थे वे महज 12 से 20 पेज में सिमट गए हैं। जिन अखबारों में 40 से 60 फीसदी जग…

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सामाजिक क्रांति के महानायक पत्रकार : डॉ. अम्बेडकर

(‘मूकनायक’ के 100 साल- 31 जनवरी, 2020 पर विशेष)

संजय कुमार/ डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर किसी परिचय के मोहताज नहीं है, संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा के तौर विख्यात हैं। डॉ. अम्बेडकर के परिचय में एक सफल पत्रकार एवं संपादक शब्द भी जुड़ा है। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में डॉ.अम्बेडकर एक ऐसे महान एवं जुझारू पत्रकार थे जिन्होंन…

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इसका, उसका, किसका मीडिया

(‘मूकनायक’ के 100 साल- 31 जनवरी, 2020 पर विशेष)

संजय स्वदेश/  बाबा साहब भीम राव अंबेडकर ने 31 जनवरी 1920 को मराठी पाक्षिक ‘मूकनायक’ का प्रकाशन प्रारंभ किया था. सौ साल पहले पत्रकारिता पर अंग्रेजी हुकूमत का दबाव था. दबाव से कई चीजे प्रभावित होती थी. सत्ता के खिलाफ बगावत के सूर शब्दों से भी फूटते थे. आजाद भारत में यह दबाव धीरे…

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अंबेडकर की पत्रकारिता

(‘मूकनायक’ के सौ साल- 31 जनवरी, 2020 पर विशेष)

डॉ. विद्या शंकर विभूति/ डॉ.भीमराव अंबेडकर प्रशिक्षित अर्थशास्त्री एवं बैरिस्टर थे, पत्रकारिता से उनका कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन काल और परिस्थितियों की वजह से उन्हें इस क्षेत्र में आना पड़ा। यों मराठी दलित पत्रिका का इतिहास 1866 से शुरू होता है और सेना से स…

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मूक नायक की गूंज सौ वर्ष बाद भी

(‘मूकनायक’ के सौ साल- 31 जनवरी, 2020 पर विशेष)

मनोज कुमार/ प्रकाशन का नाम ‘मूकनायक’ था लेकिन आवाज इतनी बुलंद की आज गुजरते सौ वर्ष में भी  ‘मूकनायक’ का डंका बज रहा है। ‘मूकनायक’ डॉ. भीमराव अम्बेडकर की पत्रकारिता के सौ साल का साक्षी है। आज सौ साल के उत्सव के समय हम ‘मूकनायक’ और बाबा साहेब के उन संघर्षों का स्मरण करते हैं जब…

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आज की भी जरूरत हैं कर्मवीर और मूकनायक

मनोज कुमार/ शब्द सत्ता की शताब्दी मनाते हुए हम हर्षित हैं लेकिन यह हर्ष क्षणिक है क्योंकि महात्मा गांधी जैसे कालजयी नायक के डेढ़ सौ वर्षों को हम चंद महीनों के उत्सव में बदल कर भूल जाते हैं, तब सत्ता को आहत करने वाली पत्रकारिता की जयकारा होती रहे, यह कल्पना से बाहर है। इन सबके बावजूद शब्द की सत्ता कभी खत्म नहीं होने वाली है और ना ही उसकी लालसा स्वयं के जयकारा करने में है। शब्द सत्…

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इंटरनेट पर शीर्ष अदालत का फैसला बनेगा नज़ीर!

लिमटी खरे/ कानून और व्यवस्था की स्थिति निर्मित होने की आशंकाओं को देखकर धारा 144 को लागू करना लाजिमी है पर लंबे समय तक इस धारा का प्रयोग कैसे किया जा सकता है! देश की सर्वोच्च अदालत ने भी इस बारे में ऐतराज जताते हुए कहा है कि सीआरपीसी की धारा 144 (निषेधाज्ञा) को लंबे समय या अनिश्चित काल के लिए प्रभावी कतई नहीं किया जा सकता है। इसके लिए कम से कम एक सप्ताह में हालातों की समीक्षा किया …

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मीडिया पर मड़राता खतरा

रिंकी राउत/ रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) ने 18 अप्रैल, 2019 को पत्रकारों के प्रति बढ़ती हिंसा को दर्शाते हुए वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2019 जारी किया। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2019 की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 140वां स्थान पाया है। भारत की रैंक 2018 में 138वें स्थान से गिरकर पिछले वर्ष से दो अंक नीचे आ गया है। इंडेक्स के अनुसार, भारत में प्रेस स्वतंत्रता की वर्तमान स्थित…

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मीडिया ब्रेकडाउन !

जिस वक्त रिपोर्टिंग की ज़रूरत है, .... उस वक्त मीडिया अपने स्टुडियो में बंद है

रवीश कुमार/ “अगर मीडिया नहीं दिखाएगा तो हमें ही पूरे भारत को दिखाना होगा। इसे वायरल करो।“ इस तरह के मैसेज वाले जाने कितने वीडियो देख चुका हूं जिसमें पुलिस लोगों की संपत्तियों को नुकस…

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टेलीविजन की मश्कें कसता इंटरनेट

एक सर्वे के अनुसार देश के आधे से ज्यादा दर्शक अब टीवी देखने से परहेज ही करते हैं

लिमटी खरे/ परिवर्तन प्रकृति का अटल सत्य है। कोई भी चीज स्थित नहीं है। हर चीज में परिवर्तन आता रहता है। चाहे मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी अंतिम सांस तक के घटनाक्रम को देखें या …

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और भी मुद्दे --

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