मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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सांस्कृतिक संवेदनहीनता के समय में लोकजीवन और मीडिया

प्रो. संजय द्विवेदी/ ‘मोबाइल समय’ के दौर में जब हर व्यक्ति कम्युनिकेटर, कैमरामैन और फिल्ममेकर होने की संभावना से युक्त हो, तब असल खबरें गायब क्यों हैं? सोशल मीडिया के आगमन के बाद से मीडिया और संचार की दुनिया के बेहद लोकतांत्रिक हो जाने के ढोल पीटे गए और पीटे जा रहे हैं। लेकिन वे हाशिए आवाजें कहां हैं? जन-जन तक पसर चुके मीडिया में हमारा ‘लोक’ और उसका जीवन कहां है?…

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सामाजिक क्रांति के योद्धाओं, पेरियार से लेकर बाबा साहब तक को नजरअंदाज करती रही है मीडिया

पेरियार रामास्वामी की जयंती (17 सितम्बर ) पर विशेष 

संजय कुमार / दलितों की कोई नयी मांग नहीं है कि उनका अपना मीडिया हो।  व्यवसायिकता और व्यापकता के साथ भारतीय मीडिया पर द्विज काबिज है और हाशिये पर हैं दलित एवं दलित मीडिया। दलितों के ऊपर उत्पीड़न शोषण और उनकी खबरों को हिन्दुवादी मीडिया द्वारा अपने तरीके…

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मीडिया में चमत्कार को नमस्कार !

आखिर यह कौन तय कर रहा है कि किसे सुर्खियों में लाना है ?

तारकेश कुमार ओझा / डयूटी के दौरान लोगों के प्रिय - अप्रिय सवालों से सामना तो अमूमन रोज ही होता है। लेकिन उस रोज आंदोलन पर बैठे हताश - निराश लोगों ने कुछ ऐसे अप्रिय सवाल उठाए , जिसे सुन कर मैं बिल्कुल निरूत्तर सा हो  गया। जबकि आं…

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कौन कहता है कि मीडिया बिक गया है?

आलोक श्रीवास्तव/ एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए किसी देश के संस्थानों की निष्पक्षता की आवश्यकता होती है -- एक स्वतंत्र प्रेस, एक स्वतंत्र न्यायपालिका, और एक पारदर्शी चुनाव आयोग जो उद्देश्यपूर्ण और तटस्थ हो।…

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चौथे स्तम्भ की औक़ात बताते "अराजक माननीय"

तनवीर जाफ़री/ माना जाता है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत वर्ष की बुनियाद चार मज़बूत स्तम्भों पर टिकी हुई है। यह चार स्तम्भ हैं विधायिका, कार्यपालिका, न्‍यायपालिका और मीडिया (प्रेस)। लोकतंत्र की सफलता के लिए इन चारों स्तंभों का मज़बूत होना बेहद ज़रूरी है । मज़बूती का अर्थ यही है कि चारों स्तम्भ अपना अपना काम पूरी ईमानदारी, ज़िम्मेदारी, निष्पक्षता व निष्ठा से करें। विधायिका लोकहित…

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मास मीडिया को बड़े स्तर पर नियंत्रित किया जा रहा: महुआ मोइत्रा

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा लोकसभा में दिये अपने पहले भाषण से ही पूरे देश में चर्चित हो गयी हैं। इस भाषण में वह  हमलावर दिखीं। भाषण में वे कई मुद्दों के साथ आज की मीडिया की स्थिति पर भी बोलीं। अंग्रेज़ी में दिये गये उनके इस सम्पूर्ण भाषण का वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे ने हिंदी में अनुवाद किया है।…

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हमें तय करना है, सोशल मीडिया देश की वास्तविक आवाज बने

श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’/ सोशल मीडिया बाकी परम्परागत मीडिया से एक जुदा साधन है। इसके द्वारा अपने मोबाइल और कम्प्यूटर पर एकांत में बैठा व्यक्ति पूरी दुनिया से जुडा रह सकता है। फेसबुक, वाॅट्सअप, लिंकडइन, इन्स्टाग्राम आदि आदि सोशल मीडिया के बहुत सषक्त और आसान उपलब्ध साधन है। वर्तमान में जिंदगी का अहम् हिस्सा बन चुका यह मीडिया सूचना, संचार, षिक्षा,…

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हिन्दी पत्रकारिता: कहां से चले थे, कहां पहुंचे?

हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष  

मनोज कुमार/ अपने इतिहास का स्मरण करना भला-भला सा लगता है. और बात जब हिन्दी पत्रकारिता की हो तो वह रोमांच से भर देता है. वह दिन और वह परिस्थिति कैसी होगी जब पंडित जुगलकिशोर शुक्ल ने हिन्दी अखबार आरंभ करने का दुस्साहस किया. तमाम संकटों के बाद भी वे आखिरी दम तक अखबार का प्रकाशन जारी रखा. अंतत…

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पत्रकारिता की प्राथमिकता को टटोलने का समय

हिंदी पत्रकारिता दिवस, 30 मई पर विशेष 

लोकेन्द्र सिंह/ 'हिंदुस्थानियों के हित के हेत' इस उद्देश्य के साथ 30 मई, 1826 को भारत में हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी जाती है। पत्रकारिता के अधिष्ठाता देवर्षि नारद के जयंती प्रसंग (वैशाख कृष्ण पक्ष द्वितीया) पर हिंदी के पहले समाचार-पत्र 'उदंत मार्तंड' का प्रकाशन होता है। सु…

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मोदी की जीत और अखबारों के शब्द

मीडिया आपको किन शब्दों में उलझाकर पटकना चाहता है जरा उसकी बानगी देखिए

राजकुमार सोनी/ जब मैं अखबार की दुनिया में था तब हर दूसरे- तीसरे दिन मालिक और मूर्धन्य संपादक यही ज्ञान बघारा करते थे कि समाचार की भाषा बेहद सरल होनी चाहिए क्योंकि अखबार रिक्शा चलाने वाला भी…

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और भी मुद्दे --

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