मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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पीटीआई को सरकारी धमकी

डॉ. वेदप्रताप वैदिक/ प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) देश की सबसे पुरानी और सबसे प्रामाणिक समाचार समिति है। मैं दस वर्ष तक इसकी हिंदी शाखा ‘पीटीआई—भाषा’ का संस्थापक संपादक रहा हूं। उस दौरान चार प्रधानमंत्री रहे लेकिन किसी नेता या अफसर की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह फोन करके हमें किसी खबर को जबर्दस्ती देने के लिए या रोकने के लिए आदेश या निर्देश दे लेकिन अब तो प्रसार भार…

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यही तो है टी वी चैनल्स की 'गिद्ध पत्रकारिता'

निर्मल रानी/ हालांकि गत 28 मई को सुप्रीम कोर्ट में लॉकडाउन के कारण देशभर में फंसे मज़दूरों की दुर्दशा पर सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा था कि कुछ ‘क़यामत के पैग़ंबर’ हैं जो नकारात्मकता फैलाते रहते हैं. उन्होंने ये भी कहा था कि “सोफ़े में धंस कर बैठे बुद्धिजीवी” राष्ट्र के प्रयासों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं।' उन्होंने अवॉर्ड विजेता…

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भारत में लॉकडाउन और पत्रकारिता

प्रमोद रंजन/  लॉकडाउन में नागरिकों के दमन की ख़बरें सबसे ज्यादा केन्या व अन्य अफ्रीकी देशों से आई थीं। उस समय ऐसा लगा था कि भारत का हाल बुरा अवश्य है लेकिन उन गरीब देशों की तुलना में हमारे लोकतंत्र की जड़ें गहरी हैं। हमें उम्मीद थी कि हमारी सिविल सोसाइटी, जो कम से कम हमारे शहरों में मजबूत स्थिति में है, उस तरह के दमन की संभावना को धूमल कर देगी। लेकिन यह सब कुछ बालू की भीत ही थ…

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मीडिया भी इसी परसंतापी समाज का हिस्सा

कृष्ण कांत/ मीडिया यह तो छापता है कि फलाने कोरंटाइन सेंटर में कौन लोग मटन मांग रहे थे, कौन बिरयानी मांग रहे थे, लेकिन उसी उत्साह और सनसनी के साथ यह नहीं छापता कि कोरंटाइन में अखबार पर खाना परोसा गया और दाल बह गई, क्योंकि इसमें उन्माद नहीं है. मीडिया उन्माद बेचता है. …

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कसौटी पर है मीडिया की नैतिकता और समझदारी

प्रो.संजय द्विवेदी/ भारतीय मीडिया अपने पारंपरिक अधिष्ठान में भले ही राष्ट्रभक्ति,जनसेवा और लोकमंगल के मूल्यों से अनुप्राणित होती रही हो, किंतु ताजा समय में उस पर सवालिया निशान बहुत हैं। ‘एजेंडा आधारित पत्रकारिता’ के चलते समूची मीडिया की नैतिकता और समझदारी कसौटी पर है। सही मायने में पत्रकारिता में अब ‘गैरपत्रकारीय शक्तियां’ ज्यादा प्रभावी होती हुयी दिखती हैं। जो कहने…

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गुजरात में समाचार पोर्टल के संपादक पर राजद्रोह का मामला

सारे देश में पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज़ को ऐसे ही दबाया जा रहा हैं

पंकज चतुर्वेदी / नई दिल्ली/ गुजरात में एक समाचार पोर्टल के संपादक के खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज कर गिरफ्तार किया गया है. उन्होंने अपने पोर्टल पर खबर चलाई थी कि भाजपा आलाकमान मुख्य…

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भारतीय मीडियाः गरिमा बहाली की चुनौती

प्रो. संजय द्विवेदी/ भारतीय मीडिया का यह सबसे त्रासद समय है। छीजते भरोसे के बीच उम्मीद की लौ फिर भी टिमटिमा रही है। उम्मीद है कि भारतीय मीडिया आजादी के आंदोलन में छिपी अपनी गर्भनाल से एक बार फिर वह रिश्ता जोड़ेगा और उन आवाजों का उत्तर बनेगा जो उसे कभी पेस्टीट्यूट, कभी पेड न्यूज तो कभी गोदी मीडिया के नाम पर लांछित करती हैं। जिनकी समाज में कोई क्रेडिट नहीं वह आज मीडिय…

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अखबार मरेंगे तो लोकतंत्र बचेगा?

अरुण कुमार त्रिपाठी/ हम गाजियाबाद की पत्रकारों की एक सोसायटी में रहते हैं. वहां कई बड़े संपादकों और पत्रकारों(अपन के अलावा) के आवास हैं. इस सोसायटी में एक बड़े पत्र प्रतिष्ठान के ही पूर्व कर्मचारी अखबार सप्लाई करते हैं. वे बताते हैं कि कोरोना से पहले लोग तीन- तीन अखबार लेते थे. अब कुछ ने अखबार एकदम बंद कर दिया है और कुछ ने घर में लड़ाई झगड़े के बाद एक अखबार पर समझ…

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सामाजिक क्रांति के महानायक पत्रकार डॉ. अम्बेडकर

अंबेडकर जयंती, 14 अप्रैल पर विशेष

संजय कुमार/ संविधान निर्माता और बहुजनों के मसीहा डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर महान एवं जुझारू पत्रकार भी थे। डॉ. अम्बेडकर ने ‘मूकनायक’ पाक्षिक अखबार के जरिये 31 जनवरी 1920 को सामाजिक क्रांति का जो बीज, पत्रकारिता की दुनिया में बोया था वह अम्बेडकरी पत्रकारिता़ के रूप में 100 साल का सफर पूरा करने जा…

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‘मूक’ समाज को आवाज देकर बने ‘नायक’

अंबेडकर जयंती, 14 अप्रैल पर विशेष,  बाबा साहेब की पत्रकारिता  

लोकेन्द्र सिंह/ भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने समाज में व्याप्त जातिभेद, ऊंच-नीच और छुआछूत को समाप्त कर समता और बंधुत्व का भाव लाने के लिए अपना जीवन लगा दिया। वंचितों, शोषितों एवं महिलाओं …

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