मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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आज की भी जरूरत हैं कर्मवीर और मूकनायक

मनोज कुमार/ शब्द सत्ता की शताब्दी मनाते हुए हम हर्षित हैं लेकिन यह हर्ष क्षणिक है क्योंकि महात्मा गांधी जैसे कालजयी नायक के डेढ़ सौ वर्षों को हम चंद महीनों के उत्सव में बदल कर भूल जाते हैं, तब सत्ता को आहत करने वाली पत्रकारिता की जयकारा होती रहे, यह कल्पना से बाहर है। इन सबके बावजूद शब्द की सत्ता कभी खत्म नहीं होने वाली है और ना ही उसकी लालसा स्वयं के जयकारा करने में है। शब्द सत्…

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इंटरनेट पर शीर्ष अदालत का फैसला बनेगा नज़ीर!

लिमटी खरे/ कानून और व्यवस्था की स्थिति निर्मित होने की आशंकाओं को देखकर धारा 144 को लागू करना लाजिमी है पर लंबे समय तक इस धारा का प्रयोग कैसे किया जा सकता है! देश की सर्वोच्च अदालत ने भी इस बारे में ऐतराज जताते हुए कहा है कि सीआरपीसी की धारा 144 (निषेधाज्ञा) को लंबे समय या अनिश्चित काल के लिए प्रभावी कतई नहीं किया जा सकता है। इसके लिए कम से कम एक सप्ताह में हालातों की समीक्षा किया …

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मीडिया पर मड़राता खतरा

रिंकी राउत/ रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) ने 18 अप्रैल, 2019 को पत्रकारों के प्रति बढ़ती हिंसा को दर्शाते हुए वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2019 जारी किया। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2019 की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 140वां स्थान पाया है। भारत की रैंक 2018 में 138वें स्थान से गिरकर पिछले वर्ष से दो अंक नीचे आ गया है। इंडेक्स के अनुसार, भारत में प्रेस स्वतंत्रता की वर्तमान स्थित…

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मीडिया ब्रेकडाउन !

जिस वक्त रिपोर्टिंग की ज़रूरत है, .... उस वक्त मीडिया अपने स्टुडियो में बंद है

रवीश कुमार/ “अगर मीडिया नहीं दिखाएगा तो हमें ही पूरे भारत को दिखाना होगा। इसे वायरल करो।“ इस तरह के मैसेज वाले जाने कितने वीडियो देख चुका हूं जिसमें पुलिस लोगों की संपत्तियों को नुकस…

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टेलीविजन की मश्कें कसता इंटरनेट

एक सर्वे के अनुसार देश के आधे से ज्यादा दर्शक अब टीवी देखने से परहेज ही करते हैं

लिमटी खरे/ परिवर्तन प्रकृति का अटल सत्य है। कोई भी चीज स्थित नहीं है। हर चीज में परिवर्तन आता रहता है। चाहे मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी अंतिम सांस तक के घटनाक्रम को देखें या …

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सहिष्णुता मीडिया का गुण-धर्म

मनोज कुमार/ समाज में जब कभी सहिष्णुता की चर्चा चलेगी तो सहिष्णुता के मुद्दे पर मीडिया का मकबूल चेहरा ही नुमाया होगा. मीडिया का जन्म सहिष्णुता की गोद में हुआ और वह सहिष्णुता की घुट्टी पीकर पला-बढ़ा. शायद यही कारण है कि जब समाज के चार स्तंभों का जिक्र होता है तो मीडिया को एक स्तंभ माना गया है. समाज को इस बात का इल्म था कि यह एक ऐसा माध्यम है जो कभी असहिष्णु हो नहीं सकता. मीडिया की …

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भारतीय बाजार से लुप्त हो जाएंगे अखबार ?

डिजिटल माध्यमों से मिल रही हैं प्रिंट मीडिया को गंभीर चुनौतियां

प्रो. संजय द्विवेदी/ दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों से सूचनाएं मिल रही हैं कि प्रिंट मीडिया पर संकट के बादल हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि बहुत जल्द अखबार लुप्त हो जाएंगे। वर्ष 2008 में जे. गोमेज …

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सांस्कृतिक संवेदनहीनता के समय में लोकजीवन और मीडिया

प्रो. संजय द्विवेदी/ ‘मोबाइल समय’ के दौर में जब हर व्यक्ति कम्युनिकेटर, कैमरामैन और फिल्ममेकर होने की संभावना से युक्त हो, तब असल खबरें गायब क्यों हैं? सोशल मीडिया के आगमन के बाद से मीडिया और संचार की दुनिया के बेहद लोकतांत्रिक हो जाने के ढोल पीटे गए और पीटे जा रहे हैं। लेकिन वे हाशिए आवाजें कहां हैं? जन-जन तक पसर चुके मीडिया में हमारा ‘लोक’ और उसका जीवन कहां है?…

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सामाजिक क्रांति के योद्धाओं, पेरियार से लेकर बाबा साहब तक को नजरअंदाज करती रही है मीडिया

पेरियार रामास्वामी की जयंती (17 सितम्बर ) पर विशेष 

संजय कुमार / दलितों की कोई नयी मांग नहीं है कि उनका अपना मीडिया हो।  व्यवसायिकता और व्यापकता के साथ भारतीय मीडिया पर द्विज काबिज है और हाशिये पर हैं दलित एवं दलित मीडिया। दलितों के ऊपर उत्पीड़न शोषण और उनकी खबरों को हिन्दुवादी मीडिया द्वारा अपने तरीके…

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मीडिया में चमत्कार को नमस्कार !

आखिर यह कौन तय कर रहा है कि किसे सुर्खियों में लाना है ?

तारकेश कुमार ओझा / डयूटी के दौरान लोगों के प्रिय - अप्रिय सवालों से सामना तो अमूमन रोज ही होता है। लेकिन उस रोज आंदोलन पर बैठे हताश - निराश लोगों ने कुछ ऐसे अप्रिय सवाल उठाए , जिसे सुन कर मैं बिल्कुल निरूत्तर सा हो  गया। जबकि आं…

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और भी मुद्दे --

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