मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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पत्रकारिता का संकट पत्रकारों को खा रहा है

July 20, 2017

रवीश कुमार/ उस दोपहर बहस इस बात को लेकर हो गई कि अगर किसी नीतिगत या अन्य कारणों से पांच लाख छात्रों की ज़िंदगी प्रभावित है तो यह संख्या इतनी भी कम नहीं है कि सरकार का ध्यान न खींच सके। छात्र कहते रहे कि पांच लाख छात्र हैं, मैं अड़ा रहा कि तो फिर वे कहां हैं। पांच लाख छात्र जब अपनी लड़ाई नहीं लड़ सकते तो उनकी डरपोकता का बोझ मैं क्यों उठाऊं। अब उनका भी क्या दोष जो दो चार की संख्या …

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जो ‘उनको’ है पसंद वही बात करेंगे?

June 25, 2017

आज मीडिया पूरी तरह विकलांग दिखाई दे रहा है

तनवीर जाफरी / आपातकाल के 1975-77 के दिनों को जहां कांग्रेस विरोधी दल लोकतंत्र की हत्या के दौर के रूप में याद करते हैं वहीं उन दिनों को मीडिया अथवा प्रेस का गला घोंटने के दौर के रूप में भी याद किया जाता है। 1977 में इंदिरा गांधी के अजेय समझे जाने वाले शासन को उखाड़ फ…

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चैनलों ने जनता का गला घोंट दिया है

June 22, 2017

ख़बरें न कर पाने की व्यथा और अच्छी ख़बरों को साझा करने की खुशी

रवीश कुमार/ टीवी में तो ग्राउंड रिपोर्टिंग खत्म ही हो गई है। इक्का दुक्का संवाददाताओं को ही जाने का मौका मिलता है और दिन भर उन पर लाइव करने का इतना दवाब होता है कि वे डिटेल में काम ही नहीं कर पाते हैं। जब तक वे रिपोर्ट…

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जनवादी पत्रकारिता की बात करें

June 10, 2017

फ़िरदौस ख़ान/ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजा…

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खबरों के खजाने का सूखाग्रस्त क्षेत्र ...!!

May 27, 2017

क्या देश व समाज के कुछ हिस्से खबरों के खजाने से सदा दूर ही रहेंगे?

तारकेश कुमार ओझा/ ब्रेकिंग न्यूज... बड़ी खबर...। चैनलों पर इस तरह की झिलमिलाहट होते ही पता नहीं क्यों मेरे जेहन में कुछ खास परिघटनाएं ही उमड़ने - घुमड़ने लगती है। मुझे लगता है यह ब्रेकिंग न्यूज देश की…

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ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म

May 26, 2017

हिंदी पत्रकारिता दिवस (30 मई) पर विशेष  

मनोज कुमार/ ‘ठोंक दो’ पत्रकारिता का ध्येय वाक्य रहा है और आज मीडिया के दौर में ‘काम लगा दो’ ध्येय वाक्य बन चुका है। ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म का यह बदला हुआ स्वरूप हम देख रहे हैं। कदाचित पत्रकारिता से परे हटकर हम प्रोफेशन की तरफ आगे बढ़ चुके हैं जहां उद्देश्य तय …

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आप देख रहे हैं दर्शकों की हत्या का सीधा प्रसारण

May 15, 2017

आज न्यूज़ रूप में रिपोर्टरों का ढांचा ढह गया है

रवीश कुमार/ दो दिन से सोचता रहा कि चीन ने जो सम्मेलन बुलाया है, वो क्या है, क्यों भारत का जाना या न जाना ठीक है, उस पर पढ़ाई करूंगा। लेकिन जाने कहां वक्त धूल की तरह उड़कर चला गया। जस्टिस कर्णन से जुड़े विवाद से संबंधित एक भी ख़बर नहीं देख पाया। घर और दफ्त…

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आतंकवादः जरूरी है खबरों की गेटकीपिंग

May 9, 2017

संजय द्विवेदी/ वैश्विक आतंकवाद से जूझ रही दुनिया के सामने जिस तरह की लाचारगी आज दिख रही है वैसी कभी देखी नहीं गयी। जाति, धर्म के नाम होते आए उपद्रवों और मारकाट को इससे जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है क्योंकि आतंकवादी ताकतें मानवता के सामने इतने संगठित रूप में कभी नहीं देखी गयीं। अगर आज इनका एक बड़ा संजाल दुनिया के भीतर खड़ा हुआ है तो यह साधारण नहीं है। ऐसे में भारत जैसे आतंकवा…

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भारत का वरिष्ठ पत्रकार- चालाकियों से कब बाज आएगा

April 26, 2017

संजीव खुदशाह/ करीब पांच साल पहले रायपुर में छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी हॉस्पिटल जिसका नाम भारत रत्न डॉ भीम राव अंबेडकर हॉस्पिटल है मे अंडकोष के इलाज के लिए एक मशीन खराब हो गई थी उसे रिपेयर कर लिया गया तो छत्तीसगढ़ के एक प्रसिद्ध अखबार में इस समाचार के लिए शीर्षक लिखा अंबेडकर का अंडकोष ठीक हुआ.…

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हेडलाइन्स के ज़रिये काले धन से लड़ाई

April 17, 2017

बुरी ख़बर या साधारण ख़बर को भी अच्छी ख़बर के रूप में पेश किया जा रहा है ताकि लगे कि बहुत कुछ हो रहा है

रवीश कुमार/ राजनीतिक पटल से आर्थिक मसले ग़ायब होते जा रहे हैं। सुधार-सुधार बड़बड़ाने वाले उद्योगपति कहीं गुम हो गए हैं। …

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