मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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ठीकरा मीडिया के ऊपर फोड़ दीजिए!

गिरीराज सिंह ने  एंकर  को कहा, आप लोगों ने पार्टी के एजेंडे को लोगों तक पहुंचाने में काफी खराब भूमिका निभाई है

साकिब जिया / यह अच्छा तरीका है कि चुनाव में जनता से वायदा राजनीतिक पार्टियां करें और जब सरकार …

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क्या राजनीतिक सत्ता ने वर्चस्व के लिये मीडिया को ही खत्म करना शुरू कर दिया है?

जरा सोचिये जब मेनस्ट्रीम मीडिया को कोई देखने-सुनने पढ़ने वाला नहीं होगा !

पुण्य प्रसून बाजपेयी / क्या पत्रकारिता की धार भोथरी हो चली है । क्या मीडिया - सत्ता गठजोड़ ने पत्रकारिता को कुंद कर दिया है । क्या मेनस्ट्रीम मीडिया की चमक खत्म हो चली है । …

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ख़बरें मैनेज होती हैं, मरती नहीं हैं

अमित शाह का पीछा करती फ़र्ज़ी एनकाउंटर की ख़बरें और ख़बरों से भागता मीडिया

रवीश कुमार/ नहीं छपने से ख़बर मर नहीं जाती है। छप जाने से अमर भी नहीं हो जाती है। मरी हुई ख़बरें ज़िंदा हो जाती हैं। क्योंकि ख़बरें मैनेज होती हैं, मरती नहीं हैं। बस ऐसी ख़बरों को ज़…

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वीआईपी कवरेज के दौरान पत्रकारों के मोबाइल प्रयोग पर रोक?

(राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर विशेष)

संजय कुमार/ राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर पत्रकार मित्रों को बधाई! लेकिन कहीं सम्मान तो कहीं बेरूखी का समाना करना पड़ता है। खासकर वीआईपी एवं वीवीआईपी कवरेज में। …

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यौन अपराध पर चुप रहने की सलाह देने वालों के मुंह पर करारा तमाचा है #MeToo

 कैलाश दहिया /आजकल #MeToo कैंपेन की चर्चा मीडिया में जोरों शोरों पर है। यह कैंपेन हॉलीवुड से शुरू होकर भारत में भी फैल रहा है।

#MeToo में स्त्री पर कार्यस्थल पर किए गए यौन शोषण का खुलासा उन स्त्रियों द्वारा क…

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बिकाऊ टी वी चैनल्स की भडक़ाऊ बहस

तनवीर जाफरी/ पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी के मध्य बर्लिन में 1961 में बनाई गई विशाल दीवार को मात्र तीस वर्षों के भीतर जून 1990 में दोनों देशों की जनता ने मिलकर ढहा दिया। ज़ाहिर है जर्मनी के दोनों हिस्सों में रहने वाले लोग यह समझ चुके थे कि एक बड़े राजनैतिक षड्यंत्र के तहत जर्मनी को दो टुकड़ों में बांटा गया है। वहां की जनता ही नहीं बल्कि दोनों ओर के स्थानीय नेताओं ने भी इस अंतर्राष्ट…

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2019 के चुनावी साल में मीडिया की लाश आपके घर आने वाली है

आपकी क्या तैयारी है?

रवीश कुमार / 2019 के चुनाव में अब 9 महीने रह गए हैं। अभी से लेकर आख़िरी मतदान तक मीडिया के श्राद्ध का भोज चलेगा। पांच साल में आपकी आंखों के सामने इस मीडिया को लाश में बदल दिया गया। मीडिया की लाश पर सत्ता के गिद्ध मंडराने लगे हैं। बल्कि गिद्धों की संख्या इतनी अधिक हो चुकी है कि लाश दिखेगी भी नहीं। अब से रोज़ इस सड़ी हुई लाश …

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मीडिया का पतन लोकतंत्र पर आघात

तनवीर जाफऱी/ विश्व के 165 स्वतंत्र देशों में हुए शोध के अनुसार पांच विभिन्न मापदंडों के आधार पर तैयार की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतवर्ष वैश्विक लोकतंत्र सूचकांक में दस पायदान नीचे चला गया है। 2017 में यह 42वें स्थान पर था। ब्राऊन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेएफ हालगोन द्वारा किए गए एक विस्तृत शोध के अनुसार किसी भी देश के लोकतांत्रिक मूल्यों की गिरावट का परीक्षण करने के दस माप…

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लेखन को स्थायित्व और वैधता देती निजी वेबसाइट

डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'/ इंटरनेट की इस दुनिया ने पाठकों की पहुँच और पठन की आदत दोनों ही बदल दी है, इसी के चलते प्रकाशन और लेखकों का नज़रिया भी बदलने लगा है। भारत में लगभग हर अच्छे-बुरे का आंकलन उसके सोशल मीडिया / इंटरनेट पर उपस्थिति के रिपोर्टकार्ड के चश्में से देखकर तय किया जा रहा हैं, संस्था, संस्थान, व्यक्ति, सरकार, कंपनी, साहित्यकर्मी से समाजकर्मी तक और नेता से अभिने…

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अब मीडिया सरकार के कामकाज पर नजर नहीं रखती, बल्कि सरकार मीडिया पर नजर रखती है

मॉनिटरिंग की कोई बात मॉनिटरिंग करने वाला बाहर न भेज दें, इस पर नज़र रखी जा रही है

पुण्य प्रसून वाजपेयी/ दिल्ली में सीबीआई हेडक्वार्टर के ठीक बगल में है सूचना भवन. सूचना भवन की 10वीं मंज़िल ही देश भर के न्यूज़ चैनलों पर सरकारी निगरानी क…

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और भी मुद्दे --

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