मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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पत्रकारों को तीसमार होने का भ्रम

September 24, 2017

रिजवान चंचल / देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में आये दिन हो रही पत्रकारों की हत्याओं से जाहिर है की पत्रकार अब सुरक्षित नही है.पत्रकारों की हत्या और जान लेवा हमलों की घटनाएं कम होने के बजाय  बढ़ती जा रहीं हैं कहना न होगा सच्चाई लिखने और सच्चाई दिखाने वाले पत्रकार भ्रष्टाचारियो, अत्याचारियों, दबंगो, देशद्रोहियो, बलात्कारियों लुटेरों पर भारी पड़ रहे है …

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चैनल खोये हैं हनीप्रीत में, देश परेशान है मन के मीत से

September 20, 2017

तो क्या ... मीडिया की जरुरत बदल चुकी है या फिर वह भी डि-रेल है 

पुण्य प्रसून बाजपेयी/ एक तरफ हनीप्रीत का जादू तो दूसरी तरफ मोदी सरकार की चकाचौंध। एक तरफ बिना जानकारी किस्सागोई । दूसरी तरफ सारे तथ्यो की मौजूदगी में खामोशी । एक तरफ हनीप्रीत को कटघरे तक घेरने के लिये लोकल पु…

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टीआरपी पत्रकारिता वाला साहस !

September 11, 2017

साकिब ज़िया / पटना। राम-रहीम पर लगे आरोप डेढ़ दशक पुराने हैं, लेकिन मीडिया तब जागा, जब दो बहादुर बेटियों और एक जांबाज़ पत्रकार ने जान की बाज़ी लगाकर न्याय की लड़ाई जीत ली। राम रहीम के ‘कुकर्मों का खुलासा’ कर रहा मीडिया अब तक क्यों उनकी गोद में बैठा था ? क्यों मीडिया की ज़बान थी खामोश ?                    …

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सच को सच कह दोगे अगर तो फांसी पर चढ़ जाओगे

September 6, 2017

पत्रकार और समाजसेविका गौरी लंकेश की हत्या के बाद निर्मल रानी का लिखा आलेख

निर्मल रानी/ कट्टरपंथ के विरोध तथा धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में निरंतर उठने वाली एक और आवाज़ हमेशा के लिए खामोश कर दी गई। 55 वर्षीय मुखर महिला पत्रकार गौरी की गत् मंगलवार को बैंगलोर में…

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हिन्दी चैनलों पर सुबह की प्राइट टाइम ज्योतिष के इन्हीं एंकरों से गुलज़ार होती है

August 29, 2017

न्यूज़ चैनलों के बाबाओं का अध्ययन कीजिए। गुरमीत सिंह सिरसा में ही राम रहीम नहीं बनते हैं, वो कहीं भी बन जाते हैं

रवीश कुमार/ “कई बार महिलाओं को पीरियड की शुरूआत में ऐसी स्थिति बन जाती है, कि घर के पवित…

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पत्रकारिता का संकट पत्रकारों को खा रहा है

July 20, 2017

रवीश कुमार/ उस दोपहर बहस इस बात को लेकर हो गई कि अगर किसी नीतिगत या अन्य कारणों से पांच लाख छात्रों की ज़िंदगी प्रभावित है तो यह संख्या इतनी भी कम नहीं है कि सरकार का ध्यान न खींच सके। छात्र कहते रहे कि पांच लाख छात्र हैं, मैं अड़ा रहा कि तो फिर वे कहां हैं। पांच लाख छात्र जब अपनी लड़ाई नहीं लड़ सकते तो उनकी डरपोकता का बोझ मैं क्यों उठाऊं। अब उनका भी क्या दोष जो दो चार की संख्या …

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जो ‘उनको’ है पसंद वही बात करेंगे?

June 25, 2017

आज मीडिया पूरी तरह विकलांग दिखाई दे रहा है

तनवीर जाफरी / आपातकाल के 1975-77 के दिनों को जहां कांग्रेस विरोधी दल लोकतंत्र की हत्या के दौर के रूप में याद करते हैं वहीं उन दिनों को मीडिया अथवा प्रेस का गला घोंटने के दौर के रूप में भी याद किया जाता है। 1977 में इंदिरा गांधी के अजेय समझे जाने वाले शासन को उखाड़ फ…

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चैनलों ने जनता का गला घोंट दिया है

June 22, 2017

ख़बरें न कर पाने की व्यथा और अच्छी ख़बरों को साझा करने की खुशी

रवीश कुमार/ टीवी में तो ग्राउंड रिपोर्टिंग खत्म ही हो गई है। इक्का दुक्का संवाददाताओं को ही जाने का मौका मिलता है और दिन भर उन पर लाइव करने का इतना दवाब होता है कि वे डिटेल में काम ही नहीं कर पाते हैं। जब तक वे रिपोर्ट…

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जनवादी पत्रकारिता की बात करें

June 10, 2017

फ़िरदौस ख़ान/ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजा…

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खबरों के खजाने का सूखाग्रस्त क्षेत्र ...!!

May 27, 2017

क्या देश व समाज के कुछ हिस्से खबरों के खजाने से सदा दूर ही रहेंगे?

तारकेश कुमार ओझा/ ब्रेकिंग न्यूज... बड़ी खबर...। चैनलों पर इस तरह की झिलमिलाहट होते ही पता नहीं क्यों मेरे जेहन में कुछ खास परिघटनाएं ही उमड़ने - घुमड़ने लगती है। मुझे लगता है यह ब्रेकिंग न्यूज देश की…

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