मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी पर ब्रेक

शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन्हें भाता है!

मनोज कुमार/ ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी के चलन पर ब्रेक लग गया है. आप हिन्दी के हिमायती हों और हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिन्दी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिन्दी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न कर…

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न्याय के नाम पर क्या कर रहे हैं चैनल

मीडिया आत्महत्या भी कर रहा है, कई चीज़ों की हत्या भी

विनीत कुमार। इस तस्वीर से हम सबको डरना चाहिए. सारी बातों को पीछे रखकर सोचना चाहिए कि साल 2005 में गड्ढे में गिर गए छोटे प्रिंस को बचाने के लिए जी न्यूज़ जैसे चैनल ने पचास घंटे से ज़्यादा कवरेज दी और बाकी चैनल भी लगातार दिखाते रहे, चैनल की इ…

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तो क्यों न मैन पावर ही घटा लें?

अखबारों में छंटनी क्या कम कमाई के कारण है? 

पुष्य मित्र। अखबारों में कर्मियों की छटनी जरूर हो रही है, मगर यह कहना गलत है कि कोरोना काल में अखबारों की आय घटी है। अखबारों की प्रसार संख्या जरूर घटी है, मगर अखबारों का एकनॉमिक्स समझने वाले जानते हैं कि प्रसार बढ़ने का अखबारों की आय बढ़ने से कोई सीधा रिश्ता नहीं है…

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ये टीवी चैनल हैं या ‘मूरख-बक्से’ ?

हमारे टीवी चैनल लगभग पगला गए हैं

डॉ. वेदप्रताप वैदिक/ जब मैं अपने पीएच.डी. शोधकार्य के लिए कोलंबिया युनिवर्सिटी गया तो पहली बार न्यूयार्क में मैंने टीवी देखा। मैंने मेरे पास बैठी अमेरिकी महिला से पूछा कि यह क्या है ? तो वे बोलीं, यह ‘इडियट बॉक्स’ है याने ‘मूरख बक्सा’! अर्थात यह मूर्खों का, मूर्खों के लिए, मूर्खो…

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सुशांत के केस पर औसतन 500 स्टोरी!

सुशान्त बनाम किसानों की आत्महत्या/हत्या पर मीडिया कवरेज

अपूर्व भारद्वाज। सुशान्त की आत्महत्या/हत्या औऱ किसानों की आत्महत्या पर किये गए मीडिया कवरेज का जब मैंने तुलनात्मक डाटा विश्लेषण किया तो मैं हैरान हो गया। आप पोस्ट के साथ डाटा ग्राफ देख रहे होंगे वो भारत की मीडिया  की …

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आधारहीन है पुलिस उप महानिरीक्षक (मानवाधिकार) का पत्र

बिना आरएनआई या पीआईबी के पोर्टल अवैध कैसे, जब इनके द्वारा किसी साइट को मान्यता देने का अब तक कोई प्रावधान ही नहीं है ?

डॉ.लीना/  पटना। पुलिस उप महानिरीक्षक (मानवाधिकार) बिहार के वायरल हो रहे…

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भारतीय लोकतंत्र के ढहते स्तंभ !

कहीं नहीं लग रहा है कि इस लोकतंत्र में पत्रकारिता और उसके कर्णधार किसी भी दृष्टिकोण से लोकतंत्र के 'कथित चौथे स्तंभ ' अब रह गये हैं !  

निर्मल कुमार शर्मा/ प…

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सहकर्मी की मौत पर पत्रकार बिरादरी की चुप्पी

अभिमन्यु कुमार/ पटना की पत्रकार बिरादरी को खुद को मुर्दा घोषित कर देना चाहिए. उनकी चुप्पी यह दर्शाती है कि वो अपना जमीर बेच चुके हैं. उनके सहकर्मी की मौत संस्थान की प्रताड़ना की वजह से हो जाती है और उनके मुंह से एक शब्द तक नहीं निकलता. रोज हज़ारों शब्द लिखने वाले पत्रकारों के ‘प्रतिरोध के शब्द’ झड़ जाते हैं.…

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पीटीआई को सरकारी धमकी

डॉ. वेदप्रताप वैदिक/ प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) देश की सबसे पुरानी और सबसे प्रामाणिक समाचार समिति है। मैं दस वर्ष तक इसकी हिंदी शाखा ‘पीटीआई—भाषा’ का संस्थापक संपादक रहा हूं। उस दौरान चार प्रधानमंत्री रहे लेकिन किसी नेता या अफसर की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह फोन करके हमें किसी खबर को जबर्दस्ती देने के लिए या रोकने के लिए आदेश या निर्देश दे लेकिन अब तो प्रसार भार…

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यही तो है टी वी चैनल्स की 'गिद्ध पत्रकारिता'

निर्मल रानी/ हालांकि गत 28 मई को सुप्रीम कोर्ट में लॉकडाउन के कारण देशभर में फंसे मज़दूरों की दुर्दशा पर सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा था कि कुछ ‘क़यामत के पैग़ंबर’ हैं जो नकारात्मकता फैलाते रहते हैं. उन्होंने ये भी कहा था कि “सोफ़े में धंस कर बैठे बुद्धिजीवी” राष्ट्र के प्रयासों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं।' उन्होंने अवॉर्ड विजेता…

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