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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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शिक्षा से ही दलित वर्ग का विकास सम्भव- दिलीप सिंह भूरिया

पत्रकार- राजनेता का और पत्रकार-नौकरशाह का गठजोड़ लोकतंत्र के लिये अच्छा संकेत नहीं

पत्रकारिता विश्वविद्यालय में “अनुसूचित जाति एवं जनजाति का विकास: मीडिया की भूमिका” विषयक संगोष्ठी सम्पन्न

भोपाल। दलित वर्ग के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू शिक्षा का विकास करना है। शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार से ही अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग का विकास सम्भव होगा। मीडिया में दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व न के बराबर है। इसका मुख्य कारण यह है कि दलित वर्ग शिक्षित नहीं है। यदि दलित वर्ग शिक्षित होगा तो मीडिया में उसकी भागीदारी भी बढ़ेगी और दलित वर्ग के विकास में मीडिया अपनी सकारात्मक भूमिका का निर्वहन कर पायेगा। यह विचार माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति एवं जनजाति का विकास: मीडिया की भूमिका, विषयक एक दिवसीय संगोष्ठी में पूर्व सांसद श्री दिलीप सिंह भूरिया ने व्यक्त किये।

पत्रकारिता विश्वविद्यालय में आयोजित इस संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित श्री भूरिया ने कहा कि आज पत्रकारों और राजनेताओं का, पत्रकारों और नौकरशाहों का गठजोड़ बन गया है जो लोकतंत्र के लिये अच्छा संकेत नहीं है। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझते हुये व्यवस्था से उन कमियों को दूर करना होगा जिससे अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग प्रभावित है।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि मीडिया में अनुसूचित जाति और जनजाति से जुड़ी खबरों का प्रकाशन बहुत कम किया जाता है। आज स्थिति यह है कि दलित वर्ग की खबरें या तो प्रकाशित नहीं होती हैं या उन्हें विलम्ब से प्रकाशित किया जाता है या उनके स्वरूप में बदलाव कर दिया जाता है। दलितों की भागीदारी के बाद ही मीडिया में दलितों के मुद्दे उठें, यह अच्छा संकेत नहीं है। उन्होंने कहा कि आज समस्या मीडिया के आधुनिक चरित्र से है जिसमें मीडिया व्यावसायिक घरानों के हाथों की कठपुतली बन गया है और यही मुख्य वजह है कि जिसके कारण दलित वर्ग की खबरें मीडिया में अपना स्थान नहीं बना पाती।

कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि उच्चशिक्षा आयुक्त श्री जे.एस.कंसोटिया ने कहा कि दलित समाज की हमेशा यह शिकायत रही है कि उनके विचारों को मीडिया में पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि मीडिया में दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व ही नहीं है। हमारे देश में अनेक शोध रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं, जिसमें बताया गया है कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग का प्रतिनिधित्व मीडिया में नहीं है। आज इस विषय पर चिन्तन की आवश्यकता है कि किस तरह से दलित समाज का मीडिया में प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाये एवं मीडिया की भूमिका दलित समाज के विकास में किस तरह की हो।

कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ पत्रकार श्री विनोद पुरोहित ने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य अंतिम व्यक्ति का उदय है। आज सामुदायिक पत्रकारिता के माध्मय से उन लोगों की खबरों को स्थान दिया जा रहा है जो मुख्य धारा में नहीं है। हमारे देश में अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के लिये अनेकों अच्छी योजनाएँ बनी हैं परन्तु उनके क्रियान्वयन में बहुत कठिनाईयाँ हैं, इसे दूर किया जाना चाहिए। पत्रकारिता का लक्ष्य लोक कल्याण होना चाहिए।

कार्यक्रम में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुये विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि भारतीय समाज का बहुत बड़ा वर्ग चाहता है कि हमारे देश में सामाजिक समरसता हो, कोई भेदभाव न हो, परन्तु इसके बाद भी यह समस्या हमें समाज में देखने को मिलती है। हमने हर क्षेत्र में विकास किया, परन्तु जब दलित विकास की बात आती है तो हम अपने आपको बहुत पीछे पाते हैं। मीडिया देश-समाज को जोड़ने में सक्षम है परन्तु जब अनुसूचित जाति और जनजाति के विकास की बात आती है तो मीडिया अपनी भूमिका का ठीक तरह से निर्वहन नहीं कर रहा है। आज सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि बड़े-बड़े मीडिया घराने यह कह रहे हैं कि मीडिया में वही प्रकाशित होगा, वही दिखाया जायेगा जो बिकाऊ होगा। मीडिया में विषयवस्तु निर्धारण करते समय किसी वर्ग विशेष के प्रतिनिधित्व को न देखकर समाज हित को देखना बहुत आवश्यक है।

संगोष्ठी में पधारे महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार श्री रमेश पतंगे ने कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति की खबरें मीडिया में नगण्य हैं। महाराष्ट्र में सम्पन्न हुये कुछ शोध कार्यों का हवाला देते हुये उन्होंने कहा कि दलितों के नाम पर शासकीय एवं निजी संस्थाओं द्वारा लिया गया अनुदान उन तक नहीं पहुँच पा रहा है। ऐसी खबरों पर मीडिया की नजरें नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया में दलितों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना कोई आसान काम नहीं है, इसके लिये सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के प्राध्यापक श्री प्रदीप डहेरिया ने अपने विचार रखते हुये कहा कि सोशल मीडिया नागरिक पत्रकारिता के मुद्दे उठाता है और यह मीडिया जाति भेद नहीं करता।

संगोष्ठी के समापन सत्र के मुख्य वक्ता और दलित विषयों पर गम्भीर विमर्श करने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्री मोहनदास नेमिसराय ने कहा कि आज अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग पर संगोष्ठियों में बड़े विमर्श हो रहे हैं। दलित समाज पर शोध कार्य भी हो रहे हैं, परन्तु वास्तविकता यह है कि दलितों के सही विकास की बात कोई भी नहीं कर रहा है। दलित समाज की मीडिया में भागीदारी तभी सम्भव होगी जबकि दलित समाज शिक्षित होगा और वैचारिक धरातल पर मजबूत होगा।

संगोष्ठी के दौरान विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विद्यार्थी, अध्यापकगण, अधिकारीगण, शहर के गणमान्य नागरिक और मीडियाकर्मी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष श्री पुष्पेन्द्रपाल सिंह ने किया।

 

 

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना