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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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रेडियो प्रसारण का निजीकरण

जन मीडिया का अक्टूबर, 2021 अंक

डॉ लीना/ संचार, माध्यम और पत्रकारिता की पूर्व समीक्षित मासिक पत्रिका जन मीडिया ने अपने खास अंदाज और तेवर के साथ अक्टूबर 2021 के अंक में कई महत्वपूर्ण विषयों को खंगालने का प्रयास किया है।

"अध्ययन" के तहत 'रेडियो प्रसारण का निजीकरण', "मीडिया के किस्से" के तहत 'द्वितीय प्रेस आयोग को भंग करने का फैसला, पर रोशनी डाला गया है। "भाषण" के तहत 'अमेरिकी मीडिया का इस्लामिक आतंकवाद और भारत पर प्रभाव' शीर्षक से गंभीर मुद्दे को जहां उठाया है वही "दस्तावेज, के तहत '1907 के समाचार पत्र' पर जन मीडिया ने फोकस किया है।

जन मीडिया के संपादक अनिल चमडिया के 'रेडियो प्रसारण का निजीकरण' अध्ययन के तहत पूरा खाका पेश किया है और बताने की कोशिश की है कि पूंजीवादी शहरी संस्कृति का माध्यम: एफ एम रेडियो पर किस तरह से निजी नियंत्रण स्थापित हो चुका है। उन्होंने विश्लेषण के साथ पूरी तस्वीर पेश की। लेखक ने बताया है कि देश में कुल 381 एफएम चैनल है जिससे 35 निजी कंपनियों के द्वारा नियंत्रित है लेकिन आंकड़ों में 60% आबादी के लिए रेडियो प्रसारण सेवा देने वाले चैनलों को नियंत्रित और संचालित करने वाली कंपनियों की संख्या भले ही 35 दिखती हो। लेकिन यह महज कागजी खानापूर्ति है। डिक्टेशन यह भी कहता है कि एफएम चैनलों की मालिक 35 कंपनियां दिखती है लेकिन ब्रांड के नाम से यदि एफएम चैनलों पर मालिकाने की स्थिति का आकलन करें तो कुल 26 कंपनियां ही 381 को संचालित करते हैं। यानी तस्वीर निजी नियंत्रण की दिखती है। पूरे अध्ययन से समझ साफ बनती है।

1 फरवरी 1980 को राज्यसभा में पश्चिम बंगाल के सदस्य कल्याण राय ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा न्यायाधीश गोस्वामी की अध्यक्षता वाले द्वितीय प्रेस आयोग को भंग करने और नए प्रेस आयोग के गठन के फैसले पर आधारित एक ध्यानाकर्षण प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। न्यायाधीश गोस्वामी की अध्यक्षता वाले आयोग का गठन 1977 में केंद्र के सत्तारूढ़ जनता पार्टी की सरकार के कार्यकाल में किया गया था। मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार में भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। उस प्रस्ताव पर सदन में बहस का एक हिस्सा आलेख 'द्वितीय प्रेस आयोग को भंग करने का फैसला' में  श्रीकांत वर्मा द्वारा रखा गया है। श्री वर्मा ने बहस में हस्तक्षेप किया था।

'अमेरिकी मीडिया का इस्लामिक आतंकवाद और भारत पर प्रभाव' आलेख में लेखक राम पुनियानी ने हाल में अफगानिस्तान में जो कुछ हुआ और भारत की गोदी मीडिया ने जिस तरह की रिपोर्टिंग की, उसे सवालों के घेरे में रखते हुये मीडिया को जिम्मेदारी का एहसास दिलाया है। वे लिखते हैं, किसी मुद्दे की गहराई में जाकर सच की पड़ताल करें। अफगानिस्तान में जो कुछ हुआ है वह बहुत पुराना इतिहास नहीं है। उसके बारे में जानकारियां अनेक पुस्तकों में उपलब्ध है।

दस्तावेज कॉलम के माध्यम से जन मीडिया ने '1907 के समाचार पत्र' शीर्षक से उस दौर के पत्र मसलन 'हिंद केसरी', 'मारवाड़ी बंधु' नृसिंह सहित कई पत्रों को खंगालने का प्रयास किया है। यह प्रयास अच्छा इसलिये है कि उस दौर के समाचार पत्र की धारा गोदी मीडिया नहीं थी यह आलेख उस दौर  और आज के पत्रों की क्या धारा थी को समझने का रास्ता खोलती है।

हर अंक की तरह  जन मीडिया के 115 वां अंक पठनीय और संग्रहणीय है। खासतौर से मीडिया के छात्रों और मीडिया से तालुकात रखें वालों के लिए यह महत्वपूर्ण तो है ही साथ ही आम लोगों की भी समझ को साफ करता है।

पत्रिका: जन मीडिया

संपादक- अनिल चमड़िया

वर्ष -10, अंक-115, अक्टूबर, 2021

मूल्य- 20 रु

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सम्पादक

डॉ. लीना