“एनडीटीवी इंडिया का युवा मीडियाकर्मी सुमित सर-सुमित सर कर रहा है और सुमित सर( सुमित अवस्थी ) हैं कि सोफे पर पड़े मोबाईल फोन की गिरफ़्त से बाहर ही नहीं आ रहे.”
विनीत कुमार/ एक दृश्य माध्यम( विजुअल मीडियम ) के तौर पर टेलिविज़न तेजी से मर रहा है. ख़ासतौर पर समाचार चैनल ने संभावनाओं से भरे इस माध्यम को महज साईन बोर्ड में बदल दिया है. हममें से जिनके दिमाग़ में संख्या में बढ़ोतरी मतलब किसी चीज़ का विकास-विस्तार होता है, ये फिट बैठ गया है, उन्हें यह बात समझने से पहले स्वीकार करने में बड़ी मुश्किल होगी कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इतने चैनल के रहते यह माध्यम मर रहा है. लेकिन बहुत सारी किताबें, सैद्धांतिकी या फिर मीडिया रिपोर्ट का अध्ययन न भी करके दर्शक के स्तर पर ही थोड़ी सी मेहनत करके कुछ सूची तैयार करने लग जाएं और ठहरकर इसकी सामग्री पर नज़र रखना शुरु करें तो मरनेवाली इस बात न केवल महसूस करने लगेंगे बल्कि इस बात को लेकर गहरी चिंता होगी कि जैसे हमारे परिवेश से देखते-देखते कई तरह की चिड़िया, वनस्पति, खाने-पीने की प्राकृतिक चीज़ें ग़ायब होती जा रही है, ठीक वैसे ही टीवी के भीतर बहुत कुछ तेजी से मर रहा है.
टेलिविज़न मर रहा है, न्यूज चैनल एक दृश्य माध्यम के तौर पर दम तोड़ दे रहे हैं, जब हम यह बात कर रहे हैं तो इसका मतलब क्या है ? वो आधार क्या है जिन्हें लेकर ये बात कही जा रही है ? इस बात को मैं एक संदर्भ के साथ बताने की कोशिश करता हूं.
आपमें से बहुत ऐसे लोग जो मेरी टाइमलाइन पर आते-जाते रहे हैं, संभवतः किसी न किसी समाचार चैनल में इन्टर्नशिप की होगी. इन्टर्नशिप के दौरान आपके दिमाग़ में चौबीस एक ही बात घूम रही होती है- किसी तरह स्क्रीन पर आ जाएं, कोई ख़बर ब्रेक कर दें. एक बार स्क्रीन पर आने का मौक़ा मिल जाय. ऐसे दौर में जबकि चैनलों के बड़े-बड़े चेहरे ख़ुद एनफ्लुएंसर और डिडिटल मीडिया के पोस्टर ब्ऑय के भरोसे अपने को इस कारोबार में बनाए रखने की जुगत में हों, आपको ये बात अजीब लग सकती है कि स्क्रीन पर आना कौन सी बड़ी बात है ? पर मुझे लगता है कि किसी न्यूज नेटवर्क के जरिए टीवी पर आना आज भी बड़ी बात है. ख़ैर,
इन्टर्नशिप के दौरान आप स्टोरी आइडिया लेकर जब बॉस के आगे होते तो थोड़ी सी बात सुनकर वो आपसे कहते- वो सब तो ठीक है लेकिन विजुअल्स कहां से लाओगे ? फुटेज है ? बिना विजुअल्स के तो स्टोरी चलेगी नहीं ? यानी कि आप कितना भी अलग और नया सोच रहे हो, आपको विजुअल्स के सिरे से सोचना होगा. सोचना होगा कि स्क्रीन पर ये बात कैसे जाएगी ?
आज मैंने एक दृश्य देखा- एक कि एनडीटीवी इंडिया पर एक अपेक्षाकृत युवा मीडियाकर्मी सुमित सर, सुमित करके उनसे बातचीत को आगे बढ़ाना चाह रहा है और सुमित अवस्थी सर सोफ़े पर बैठकर फोन में लग गए हुए हैं. चैनल के इस संपादक ने आजतक से लेकर आधे दर्जन अलग-अलग बड़े मीडिया संस्थानों में लंबी पारी खेली है. न जाने कितने इन्टर्न, ट्रेनी, युवा मीडियाकर्मियों से सवाल पूछे होंगे कि स्टोरी तो ठीक है लेकिन विजुअल्स कहां है ?
आज सुमित अवस्थी ख़ुद एनडीटीवी इंडिया के नए चेहरे होकर भी उनका सहयोगी मीडियाकर्मी उनसे सवाल कर रहा है और सोफे पर बैठे सर का है कि मोबाईल फोन से ध्यान ही नहीं हटा रहा. अवस्थी का यह रवैया इस बात का संकेत है कि उन्होंने विजुअली सोचना छोड़ दिया है. यह अजीब सी बात है न कि जो एंकर अपनी उपस्थिति पर लाखों रूपये कमाता है और बेहतर, चुस्त, फिट दिखने के लिए खर्च करता है वो हम दर्शकों के आगे मोबाईल में लगा हुआ नज़र आता है. माध्यम ऐसे मर रहा है.
पश्चिमी देशों को दिन-रात पानी पी-पीकर कोसनेवालो न्यूज चैनलों का कांटेंट-फॉर्मेट चाहें इंटरव्यू हो, परिचर्चा हो या फिर स्टूडियो और एडिटिंग मशीन से पैदा न्यूज के नाम पर पैदा कोई दूसरी संतान..ले-देकर सब उन्हीं देशों के बड़े प्लेटफॉर्म की नकल है. इसी कड़ी चैनलों की डिजिटल टीम ने अनौपचारिक बैठक की शक़्ल में बहस आधारित कार्यक्रम शुरु किया है जो कि पॉडकास्ट की संकर नस्ल है. लेकिन
अनौपचारिक होने के नाम पर एक से एक अनुभवी एंकर और मीडियाकर्मियों की हरकतें ऐसी है जैसे योग से जी चुरानेवाले लोग सबसे ज़्यादा तत्परता शवासन करने में दिखाते हैं.
टेलिविज़न और कारोबारी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जो बड़े चेहरे हैं, उनके भीतर ये भयानक ख़ुशफ़हमी पैदा हो गयी है कि हम स्क्रीन पर चाहें जिस भी हालत-हरकत के साथ मौज़ूद रहें, अपना “हिट्स-लाइक-शेयर” कहीं नहीं जा रहा. यह सब किन विजुअल्स को ग़ायब करके, उन्हें स्टूडियो के बाहर से ही धकियाकर, फील्ड से आयी फीड को डम्प करके किया जा रहा है, इस पर फिर कभी.

