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___________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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कंवल भारती को प्रमोद रंजन का उत्तर

फेसबुक पर टिप्पणियों को लेकर तकरार

कंवल भारती जी ने गत 25 फरवरी, 2014 को अपने फेसबुक वॉल पर मेरे बारे में एक बेहूदा टिप्‍पणी की है।  बाद में यह टिप्‍पणी भडास फॉर मीडिया पर भी दिखी।  कंवल भारती ने लिखा कि '' प्रमोद रंजन जैसे भाजपा समर्थक पत्रकार को प्रेमकुमार मणि जैसे लेखक से कोई शिकायत नहीं है, जो बिहार में नितीश कुमार का दामन पकड़कर एमएलसी बनते हैं, सत्ता का उपभोग करते हैं और अब नितीश कुमार को छोड़ कर लालू यादव का दामन थामे हुए हैं. वे उन्हें प्रखर चिंतक कहते हैं. लेकिन कांग्रेस से जुड़े कँवल भारती उनकी आँखों में इसलिए चुभते हैं, क्योंकि मैंने फारवर्ड प्रेस का बहिष्कार कर दिया है. वे उदित राज से मेरी तुलना करने लगे हैं. वह यही नहीं जानते कि उदित राज और कँवल भारती में क्या अंतर है? उन्हें मालूम होना चाहिए की मैं न राजनेता हूँ, न कोई संगठन चलाता हूँ, और न मेरी कोई खवाइश MP, MLA बनने की है, जैसी कि उदित राज और प्रेमकुमार मणि की है. कांग्रेस से जुड़ने के बाद भी राहुल गाँधी की आलोचना करने की जो हिम्मत मैंने दिखायी है, वह हिम्मत क्या प्रेमकुमार मणि लालू की और उदित राज मोदी की आलोचना करके दिखा सकते हैं? कभी नहीं दिखा सकते, क्योंकि वे राजनीतिक स्वार्थों के व्यक्ति हैं. ऐसे लोग, जो मेरे बारे में कुछ नहीं जानते, मेरी आलोचना करके सिर्फ मुंह की ही खा सकते हैं. मैं कांग्रेसी परिवार से हूँ, मेरे पिता भी कांग्रेसी थे. मेरा परिवार तब से कांग्रेसी है, जब उसका चुनाव निशान ‘दो बैलों की जोड़ी’ हुआ करता था. मैं कांग्रेस से जुड़कर भी कभी अँधा कांग्रेसी नहीं बन सकूँगा. मेरा मुकाबला न उदित राज कर सकते हैं और न प्रेमकुमार मणि. मेरी ज़मीन लोकतंत्र और सामाजिक परिवर्तनवादी आंदोलनों की है, जो मेरे लेखन में पूरी निर्भीकता से हमेशा रहेगी.''

मैंने उनके वॉल पर ही उसका उत्‍तर दिया तो वे चुप्‍पी साध गये। अगर मेरे उत्‍तर के बाद भारती लगता कि उन्‍होंने जो लिखा वह गलत था, तो वे इसे स्‍वीकार करते और माफी मांगते। लेकिन उनकी कुंठा, उन्‍हें ऐसा नहीं करने देगी। यहां यह जान लेना भी आवश्‍यक होगा कि मैंने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा था कि '' कंवल भारती कांग्रेस में, उदित राज भाजपा में। यह सूचना यह भी बताती है कि बहुजनों के क्षेत्रीय दल अपने योग्‍य लोगों को जगह देने में असफल हुए हैं। इन दलों में विचारधारा और सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर भारी पाखंड चल रहा है। उदित राज को मेरे शुभाकामनाएं। मुझे उम्‍मीद है कि वे जहां भी रहेंगे, बुद्ध की शिक्षाओं को याद रखेंगे।''  इसका मर्म समझने की वजाय वह मुझे भाजपा समर्थक बताते हुए अनाप-शनाप लिख गये।  बहरहाल, कोई और होता तो मुझे स्‍पष्‍टीकरण देने की आवश्‍यकता न पडती लेकिन कंवल भारती एक लेखक रहे हैं, इसलिए मेरे लिए उनकी बातों का उत्‍तर देना आवश्‍यक हो गया है, ताकि कम से कम सनद रहे। 

प्रिय कंवल भारती जी, आपकी टिप्‍पणी को कई बार पढा। आपकी तरह आवेश में मैं भी कुछ कह सकता था। लेकिन, इस तरह की मूर्खता मैं अपने लिए श्रेयकर नहीं समझता। सिर्फ आपकी बातों का उत्‍तर दे रहा हूं। 

1. आपका कांग्रेस में जाना मेरी आंखों में नहीं चुभ रहा है। अपने मोतियाबिंद का इलाज करवाएं।

2. भाजपा समर्थक जैसा बेहूदा आरोप लगा कर आप क्‍या साबित करना चाहते हैं? यानी, आपको लगता है कि जो कांग्रेस में नही है, वह भाजपायी है। आपकी बुद्धि को क्‍या हो गया है? 

3. आपने फारवर्ड का कथित तौर पर वहिष्‍कार इसलिए किया था क्‍योंकि आपका एक लेख मैंने छापने से इंकार कर दिया था तथा दूसरे के बारे कहा था कि छपने में देर हो सकती है। राजनेताओं को जब टिकट नहीं मिलता या कुर्सी छीन जी जाती है कि वे कहते हैं कि 'जाति' का अपमान हो गया। इसी तरह, आपने आरोप लगाये कि फारवर्ड प्रेस दलितों की नहीं, ओबीसी की पत्रिका है और भाजपा के हाथों बिक गयी है। इसी कारण, दलित होने के कारण आपको प्रकाशित नहीं कर रही है। उस समय यही सब आपने खुद को एक प्रतिबद्ध एक आम्‍बेडकरवादी मार्क्‍सस्टि जतलाते हुए फेसबुक पर लिखा था। उसके एक महीने बाद आप कांग्रेस मे शामिल हो गये। 

4. फारवर्ड प्रेस क्‍या - आप 'हंस' समेत लगभग 10 साहित्‍यक-वैचारिक पत्रिकाओं का पहले भी वहिष्‍कार कर चुके हैं। जिस भी पत्रिका के बारे में आपको लगता है कि वह आपको पर्याप्‍त भाव नहीं दे रही, उस पर आप कोई न कोई आरोप मढ कर वहिष्‍कार कर देते रहे हैं।

5 . महोदय, आप नाखून कटवाकर शहीद कहलाने का शौक पालने वालों में से हैं।

6. मेरे द्वारा कंवल भारती और उदित राज की तुलना करने में कोई निंदा का भाव नहीं था। वैसे आप बताएंगे कि उदित राज और कंवल भारती की राजनीति में कौन सा मौलिक अंतर है? प्रेमकुमार मणि के नाम को इस बहस में घसीट कर आपने इसे और नीचे लाने की कोशिश की है। उसका उत्‍तर मैं आपके वॉल पर दे चुका हूं। 

7 . खानदानी कांग्रेसी महोदय, हमारे मन में आपके लिए सम्‍मान आम्‍बेडकरवादी लेखक होने के कारण रहा है, न कि कांग्रेस या किसी भी पार्टी में जाने के कारण। कम से कम अभी राजनीति में आपकी औकात एक चिरकुट छुटभैये नेता से ज्‍यादा नहीं है। कौन आपको एमपी/एमएलए बना रहा है, जिसकी दुहाई आप दे रहे हैं? 

8. वैसे भी, मैं आपके आलोचकीय विवेक का कभी कायल नहीं रहा। आप चिरकुट टाइप के चापलूस लोगों में से रहे हैं, जिसने उदभ्रांत जैसे कवि के कथित महाकाव्‍य 'त्रेता युग' पर सिर्फ इसलिए एक मोटी किताब लिखी क्‍योंकि वे दूरदर्शन के बडे पद पर थे। उद्भ्रांत जी प्‍यारे व्‍यक्ति हो सकते हैं लेकिन आपको उन्‍हें इस सदी का महान कवि साबित करते हुए शर्म नहीं आयी? 

9. मैंने अपने व्‍यक्तिगत अनुभव से यह भी देखा है कि आप निहायत ही कुंठाजन्‍य आवेग में व्‍यक्तिगत स्‍तर पर चीजों को देखते और समझते हैं। 

10 . आप उद्भ्रांत जैसों को ही सर्टिफिकेट बांटते रहें। मुझे आपके प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है।

-प्रमोद रंजन
प्रमोद रंजन के फेसबुक पर इस संबंध आयी कुछ और टिप्‍पणियां : 

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Ajay Jadhav Pramod जी एक और वीभीषण का भंडाफोड के लीये तहे दील से शुक्रीया

5 hours ago · Unlike · 1

Suresh Gautam ऐसा लगता है कुछ लोग जब कुछ हो जाते है तो वह ऐसा समझने लगते है कि हमी सब कुछ है और वह दुसरो को कुछ ना समझने की गलती कर वैठ्ते है जबकि हकीकत में ऐसे लोग कुछ नहीं होते है

5 hours ago · Unlike · 1

Devraj Rawat प्रमोद रंजन साहेब आप ऐक मजे हुये पत्रकार हो और कँवल भारती जी ऐक अच्छे लेखक तो मैं तो ये ही कहुंगा की आप दोनो ही अपनें समाजो में व्याप्त बुराईयो को अपनी लेखनी द्वारा समाप्त करें, ऐसे वैचारिक द्वन्द से दुर रहकर।

5 hours ago · Unlike · 3

Ajay Jadhav इसकी तुलना तो उदीत राज से नही जगजीवन राम से होनी चाहीये

5 hours ago · Unlike · 1

Pramod Ranjan Devraj Rawat जी,जब पानी सर से ऊपर गुजरने लगे तो क्‍या करें?

4 hours ago · Like · 2

Umrao Singh Jatav सहमत आपसे , प्रमोद जी

4 hours ago · Edited · Unlike · 1

Pramod Ranjan हां, एक बात और कंवल भारती जी, प्रेमकुमार मणि जी के बारे में अपनी जानकारी दुरूस्‍त कर लें। उन्‍हें जदयू से नीतीश कुमार की नीतियों की आलोचना करने के कारण ही निकाला गया था। वर्ष 2010 में जेएनयू में मैंने, Jitendra Yadav व अन्‍य साथियों ने नीतीश सरकार के विरोध में एक पुस्तिका जारी की थी, जिमें पहला लेख प्रेमकुमार मणि का था - 'सवर्ण आयोग का सच'। यह नीतीश कुमार के सवर्ण आयोग के विरोध में था। बाद में जब उन्‍हें पार्टी से निकाला गया तो उस पुस्तिका को भी उसका आधार बनाया गया। नीतीश सरकार बनने दो सप्‍ताह बाद से ही उन्‍होंने उनकी सवर्ण परस्‍त नीतियों की आलोचना शुरू कर दी थी। 

आपसे विनम्र आग्रह है कि बिना जानकारी के किसी को अनावश्‍यक विवाद में घसीटने से बचें। वैसे भी आपने पिछले छह-आठ महीने में फेसबुक पर ऊलूल जुलूल लिखकर अपनी प्रतिष्‍ठा काफी घटा ली है। मैं तो आपकी लेखकीय सनक समझ सकता हूं, और आपके प्रति अपने सम्‍मान को बरकरार रखने में भी सक्षम हूं लेकिन शायद अन्‍य लोगों के लिए यह संभव न हो।

3 hours ago · Like · 1

Pramod Ranjan नेट पर प्रेमकुमार मणि के बारे में बहुत कम सामग्री उपलब्‍ध है।शायद इसलिए क्‍योंकि वे स्‍वयं प्रचार से दूर रहकर अपना काम करते रहे हैं। वर्ष 2009 में उनके द्वारा नीतीश कुमार को लिखी गयी एक चिट्टी अभी मुझे मिली, इसे भी मैंने ही Avinash Das से मोहल्‍ला लाइव के लिए साझा किया था। मणि जी शायद 2013 में जदयू से निकाले गये। उनके विरोध का स्‍वर 2009 में कैसा था, इसे कंवल भारती समेत अन्‍य साथियों को भी पढना चाहिए ताकि वे जान सकें कि मैं मणि जी का प्रशंसक क्‍यों रहा हूं (वैसे कंवल भारती का निंदक भी नहीं रहा था, क्‍योंकि उन्‍होंने कुछ भूले बिसरे दलित-बहुजन लेखकों को आप सामने लाने में अपना योगदान दिया है)।

यह रहा प्रेमकुमार मणि की उस चिट्ठी का लिंक : http://mohallalive.com/2011/05/15/letter-to-nitish-kumar-by-premkumar-mani/

Upendra Kumar Satyarthi Pramod ji aapne sahi kha h. Sahmat hu aapki bat se .

3 hours ago · Unlike · 1

Siriman Sudatt Wankhede Pramod Ranjanji Satya kaha aapne use nazar andaz nahi karna chahiy.

2 hours ago · Like

Veerendra Meena आपस में मत लड़ो |

about an hour ago · Like

Pramod Ranjan अपने अर्नगल प्रलापों के लिए कंवल भारती ने फारवर्ड प्रेस के जून, 2013 अंक को आधार बनाया है। उस अंक की कवर स्‍टोरी थी 'ओबीसी राजनीति का आगाज' और कवर पर मोदी की तस्‍वीर थी। फारवर्ड प्रेस में यह स्‍टोरी हमलोगों ने पूरी चेतनता के साथ प्रकाशित की थी। आप यह देखेंगे कि हमने उस समय ही यह बताया कि भाजपा 'ओबीसी कार्ड' खेलने जा रही है। उस समय कोई इस बात को नहीं देख पा रहा था। आज वह बात सच साबित हुई है। उसी अंक में हमने एक लंबी रिपोर्ट नरेंद्र मोदी के राज में दलितो की बदहाल हालत के बारे में भी छापी। मोतियाबिंद के शिकार लोग सिर्फ शीर्षक देखकर चीजों को तय करते हैं। बेहतर होगा कि आप दोनों लेखों को पढें ओर तय करें। पेज 9 से पेज 17 तक दो लेख हैं। दोनों पढ जाइए। 
यह रहा पूरा अंक :  https://docs.google.com/file/d/0B1rDQQ8lLTkyZEpLR25GQ3ItUzA/edit?pli=1

 

Pramod Ranjan हम शुतुर्मुर्ग कैसे बने रह सकते हैं? एक पत्रकार के रूप में मेरी प्राथमिक जिम्‍मेवारी राजनीतिक ट्रेंड को पकडने की है। 'ओबीसी राजनीति का आगाज' शीर्षक लेख छापकर हमने यही किया था। फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2012 अंक में मैंने खुद कवर स्‍टारी लिखी थी भाजापा में 'गये राम आए कृष्‍ण' (http://mohallalive.com/2012/02/08/exit-ram-enter-krishna/)'। उस समय भी मैंने यही बताना चाहा था कि भाजपा ओबीसी को टारगेरट करेगी। आज वह सच साबित हो रहा है। मुझे लगता है कि मैंने एक पत्रकार के रूप में अपनी आगाह करने की जिम्‍मेवारी निभायी है। 

हां, मै डॉक्‍टर नहीं हूं। किसी के अंधेपन कोई इलाज मेरे पास नहीं है। 
फारवर्ड प्रेस के ताजा अंक (मार्च, 204) में एक बार फिर भाजपा कवर पेज पर है। यह कवर स्‍टोरी सीएसडीएस के वर्तमान निदेशक संजय कुमार ने लिखी है। वे कवर स्‍टोरी में बता रहे हैं कि ओबीसी का वोट तेजी से भाजपा में शिफट हो रहा है। तो क्‍या अब हम उन आंकडो को न छापें। मेरा मानना है कि पत्रकारिता का दायित्‍व सत्‍य का बताना है, यही वास्‍तव में आगाह करना भी है। 
'गये राम, आए कृष्‍ण' लेख पर हमें विश्‍व हिदू परषिद ने पत्र लिख प्रछन्‍न्‍ा रूप से घमकाया भी। मेरा मानना है कि जो लोग हिंदूतवाद ताकतों का सचमुच विरोध करते हैं, उसे इस लेख को पढना चाहिए, ताकि वे जान सकें कि पिछडे तबकें में घुसपैठ की उनकी साजिश कितनी पुरानी है। मोहल्‍ला लाइव के इस लिंक पर वह लेख आप देख सकते हैं : http://mohallalive.com/2012/02/08/exit-ram-enter-krishna/

Sohan Singh डीयर कंवल भारती जी , मैं व्‍यक्तिगत तौर पर प्रमोद सर को जानता हूं वो नरेन्‍द्र मोदी और भाजपा के घोर विरूद्वी रहे हैं और मुझे लगभग 1वर्ष हो गया उनके साथ फॉरवर्ड पात्रिका में काम करते हुए वो हमेशा कोशिश करते रहें हैं कि फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका में s/c और s/t समाज की खवरे जाए । और आपका आरोप मुझे निराधार लगा । जिसकी पुष्टि उन्‍होने आपको की है। 

38 minutes ago · Edited · Like · 1

Pramod Ranjan पिछले दिनों जब भाजपा की मोदी लहर चढने लगी तो मैंने अपने वरिष्‍ठ पत्रकार साथी Birendra Kumar Yadav को कांचा आयलैया का साक्षात्‍कार करने के लिए इस स्‍पष्‍ट निर्देश के साथ कहा कि वे मोदी को वोट न करने की अपनी अपील को दुहराएं और उसे दिसंबर, 2014 अंक में प्रमुखता से प्रकाशित किया। 
Prof.Kancha Ilaiah कांचा का फारवर्ड प्रेस के दिसंबर अंक में छपा इंटरव्‍यू यह रहा। क्‍या Kanwal Bhartiबता सकते हैं कि अगर लघु पत्रिकाओं को छोड दें तो किस पत्रिका अन्‍य पत्रिका में मोदी को वोट न करने की इतनी मुखर अपील छापने का साहस है?

 

29 minutes ago · Edited · Like · 1

 

 

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सम्पादक

डॉ. लीना