हिन्दी चैनल के न्यूज एंकरों में क्लास चेंज करने और उससे भी कहीं ज़्यादा “चेंज हो चुका है” दिखाने की तड़प चरम पर है
विनीत कुमार/ ये स्क्रीनशॉट किसी जूते के विज्ञापन का हिस्सा नहीं है और न ही सूटिंग-शर्टिंग का ही और न ही मैंने मोहल्ले के टेलर की दूकान पर चिपकी ऐसी दर्जनों तस्वीरों में एक पसंद आ गयी तो लाकर यहां पोस्ट कर दे रहा हूं. ये एक न्यूज एंकर के एक चैनल को छोड़कर दूसरे नए चैनल पर आने को लेकर चलाया जा रहा प्रोमो है- आ रहा हूं बॉस, तैयार रहिएगा.
मैं जब इस प्रोमो से गुज़रा तो अस्सी के दशक के उन बम्बईया सिनेमा के ओपनिंग शॉट्स का ध्यान आया जिनमें पर्दे पर इसी तरह भारी-भरकम जूते और चाल दिखाई देते, कदम धीरे-धीरे आगे बढ़ते और एक्सट्रीम क्लोजअप शॉट, दूसरे सभी शॉट्स की यात्रा करके लॉग शॉट तक जाकर स्थिर हो जाता और तब हम उस आकृति को अमरीश पुरी, प्राण या फिर शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, मिथुन चक्रवर्ती के तौर पर पहचान पाते. उनके चेहरे देखने से पहले उनके पैर, उनके बूट, उसके बाद बेल्ट, उसके बाद हवा में लहराता कोई हथियार, उसके बाद गले में झूलता लॉकेट…इस तरह सवा दर्जन कॉस्ट्यूम देखने के बाद सिनेमा के नायक या खलनायक की शक़्ल देख पाते. चैनल ठीक वही अंदाज़ अपने एक नए नवेले एंकर( वैसे तो वो न्यूज इन्डस्ट्री में बीस साल पुराने हैं ) को पेश कर रहा है.
एंकर के स्टाईलिश, बिना पॉलिश्ड( ब्रांड न्यू जूते को पॉलिश की क्या ज़रूरत है ) जूते फ़र्श पर पड़ते ही रंग-बिरंगे चॉक स्टिक्स छितराने लग जाते हैं, यूं कहिए कि कांपने लग जाते हैं. वे चॉक स्टिक्स जो स्मार्टबोर्ड और व्हॉइटबोर्ड के आगे देश के कई क्लासरूम से लगभग ग़ायब हो चुके हैं. आप प्रोमो देखकर एकबारगी नॉल्टैल्जिक हो सकते हैं लेकिन स्क्रॉल करते हुए एक दूसरा प्रोमो आता है जिसमें स्कूली बच्चों की आवाज़ में सुनाई देता है- “मैडम आ रही हैं.” इस आवाज़ में थोड़ा डर है, थोड़ी उत्सुकता, थोड़ी घबराहट और ठीक क्लासरूम के पहले टीचर के आने को लेकर क्लासरूम के माहौल को दिमाग़ी तौर पर असर पैदा करने की कोशिश. एक चैनल में न्यूज़ एंकर के लिए दर्शक-श्रोता बॉस हैं, दूसरे के लिए छात्र.. आप दोनों प्रोमो को एक साथ देखते हैं तब जाकर समझ आता है कि जैसे दिल्ली के पटेल चेस्ट पर जाकर एक ही शॉप से एक ही साथ कई छात्र प्रोजेक्ट तैयार करवाते हैं, ये भी वैसा ही है. रचनात्मकता, भाषा, प्रस्तुति और प्रभाव के स्तर पर कोई नयापन नहीं, वही अंदाज़ कि देश के दर्शक हमें छोड़कर जाएंगे कहां ! ख़ैर,
कांपते-थरथराते चॉक स्टिक्स में से एक सफ़ेद स्टिक न्यूज एंकर उठाते हैं और शीशे पर चैनल का नाम लिखते हैं. ये चॉक शीशे पर चल भी जाता है. आप-हम चलाकर देखिए तो जरा, कैसे वापस घर लौटने से मना कर रहे मवेशी की तरह वो अड़ता है ! चॉक से शीशे पर आप लिख ही नहीं सकते और ग़र लिख भी दिया तो कौन पढ़ पाएगा ! लेकिन सर की मुद्रा में मौज़ूद एंकर लिखते हैं और वो हमें वैसा ही साफ़-साफ़ दिखाई देता है जैसे खान मार्केट के क़ैफे के आगे चॉक से लिखे मैन्यू.
अब एंकर की स्मार्ट वॉच दिखाई देती है, शूट की बाहों से झांकती हथेलियां, उसके बाद फुल-लांग शॉट में साबुत एंकर. आ रहा हूं बॉस बोलने के दौरान हल्के दबाव से हथेलियों के मसलने का ऐसा अंदाज़ कि सामने प्रकाश झा की “अपहरण” या “राजनीति” का टुकड़ा चिपका दिया गया हो.
एंकर के शरीर पर लदी एक-एक चीज़ इतनी प्रमुखता से दिखायी जाती है कि ख़ुद धीरे-धीरे एंकर ही उनके ग़ायब होने लग जाते हैं. भाव-भंगिमा और भाषा के असर से वो पूरी तरह ग़ायब भी हो जाता है और सामने होता है उच्च मध्यवर्गीय समाज का प्रतिनिधि पुरुष जिसके ख़ुद के होने पर गुरुर है. बढ़िया डिज़ायनर सूट, जूते, घड़ी की जुबान हो तो डपट दे. चेहरे, हाथ, पैर, शरीर की एक ऐसी भाषा जो दर्शकों को पहली नज़र में ख़ुद से अलग कर ले और तब दर्शक हसरत भरी नज़रों से देखना शुरु करे. एंकर के स्टूडियो से बाहर निकलते ही शूट की सिलाई छूकर देखना चाहे, घड़ी को एक बार टच करना चाहे और दर्शक बैचमेट हो तो बराबरी का भाव पैदा करते हुए पूछ बैठे- शूट कहां सिलवाता है बे ? एक जरा एड्रेस तो दियो, अगले महीने वो अपना रमभजुआ था न, उसका सेकेण्ड मैरिज है तो पहिनकर जाएंगे. तुमको भी तो बुलाया ही होगा..
न्यूज एंकर्स को यह बात ठीक-ठीक पता है कि दर्शक उन्हें ख़बर, ख़बर की भाषा, शालीनता और इंसानी दुनिया के बीच बेहतर ढंग से पेश आने के लिए नहीं देखते. यदि उनकी प्राथमिकता ये सब होती तो अव्वल हमें देखते ही नहीं, हमारे विकल्प पहले से मौज़ूद हैं. वे हमें अब हमारे रूतबे के लिए देखते हैं जिससे रौब पैदा होता है, उन सब पर ग़ौर करने के लिए देखते हैं. लिहाज़ा, हमारा काम उनके भीतर की हसरत को समझना है और ये हसरत बरक़रार रखना है. गॉगल्स, जूते से लेकर थार-एसयूवी होते हुए सिंघम स्टाईल में गॉगल्स लगाकर देश के ग़रीब-गुरबे के बीच चॉपर से उतरना..ये सब इसी का हिस्सा है.
आप जब टीवी सीरियल्स की दुनिया पर अध्ययन करेंगे तो इस विषय पर आपको दर्जनों किताबें मिल जाएंगी। जिनसे गुज़रते हुए आपको तरह-तरह की रिपोर्ट मिलेंगी. उनमें से एक रिपोर्ट यह भी कि चालीस फीसद से ज़्यादा लोग टीवी सीरियल्स इंटिरियर, जूलरी और इसी तरह से कॉस्ट्यूम में दिलचस्पी रखने के कारण देखते हैं. रिपोर्ट से गुज़रने के बाद इसके असर से पैदा किए गए बाज़ार का अध्ययन करेंगे तब आपको टीवी स्क्रीन का राजनीतिक-सांस्कृतिक संदर्भ समझ आएगा.
हिन्दी चैनल के न्यूज एंकरों में क्लास चेंज करने और उससे भी कहीं ज़्यादा “चेंज हो चुका है” दिखाने की तड़प चरम पर है. इस बेचैनी के आगे स्टोरी, भाषा, माध्यम और उसकी संभावना..ये सब पीछे रह जाती है. हर न्यूज एंकर का सिकुड़ा हुआ ही सही, एक समाज होता है जिसके आगे उन्हें साबित करना होता है कि हम अब वही नहीं है जो गली-मोहल्ले में दूध की पन्नी लटकाते दिख जाया करते, हॉस्टल के समय उधार का खाता चलाना पड़ता और स्ट्रगल के दिनों में उधारी न मांगे तो मेन गेट का ताला बंद रखना पड़ता..अब हम न्यूज़रूम के सिंघम हैं, कपड़े सिलवाकर नहीं, डिज़ायन करवा कर पहनते हैं.. नहीं तो,
एक न्यूज़ एंकर का दूसरे चैनल में जाना और उसी चैनल की न्यूज़ एंकर का उसकी जगह पर आना, मीडिया इन्डस्ट्री की सामान्य घटना है. पाठशाला में पहले जो व्हॉइट बोर्ड पर मार्कर से लिखकर कोचिंगवाले सरजी की मुद्रा अपनाने की कोशिश की जाती रही, अब चॉक स्टिक्स से लिखने की क़वायद के बीच, ख़बर, भाषा और उसकी पक्षधरता बदल तो नहीं जाएगी ! बस अब देखना ये है कि दर्शकों की हसरत और उसका ग्राफ कितना उपर-नीचे होता है !
विनीत कुमार

