खरी खरी
शिशिर सोनी/ कुछ पत्रकार रहे साथियों को राजनीतिक दलों ने अपना मुलम्मा चढ़ा दिया है। कुछ उनके ही रंग में रंग गए हैं। कुछ रंग पाने के लिए छटपटा रहे हैं। कुछ को दुमछल्ला बना लिया गया है। कुछ चाभी के छल्ले भी बनने को आतुर हैं। पत्रकारिता जाए भाड़ में !
भांडों की एक फौज पत्रकारों के बीच खड़ी कर दी गई है। सभी को परसादी बांटी जा रही है। किसी को परसाद में पेड़े मिल रहे हैं तो किसी को चुकंदर। पर हर छुछुंदर पेड़े की ललक लिए है। सो टीवी में है तो स्क्रीन पर आएं बाएं शाएं बके जा रहा है। प्रिंट में है तो शब्दों को नाली में बहाये जा रहा है। शरम, हया, अपने खास व्यक्तित्व पर बेशर्मी की लिहाफ ओढ़े हमारे ही बीच के साथियों को मैं पत्रकारिता से बलात्कार करते हर रोज देख रहा हूं।
अभी के एपस्टीन, 2006 के मोनिंदर सिंह पंढेर (निठारी कांड) और उनके सफेदपोश गुर्गों से कहीं खतरनाक हैं पत्रकार के भेष में ये दरिंदे। जो हर रोज देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ बलात्कार कर रहे हैं। कांग्रेसी शासन में सत्ता से मलाई खाई। अब भाजपा शासन में सत्ता के तलवे चाट रहे हैं। निढाल पड़े लोकतंत्र के खून में पगी रसमलाई चांप रहे हैं। कुछ अपनी बारी की बाट जोह रहे हैं।
ऐसे ढीठ, निर्लज्ज, मोटी चमड़ी के हमारे साथी पत्रकारों को रात में नींद कैसे आती होगी ?
क्या ये कभी अपने अंदर नहीं झांकते होंगे ?
क्या ये कभी खुद से सवाल नहीं करते होंगे ?
चंद सिक्कों के लिए, कुछ समय के फरेब पावर के लिए, झूठी चमक दमक के लिए, भगीरथ पत्रकारिता को सूली पर चढ़ा कर देश का कितना नुकसान कर रहे हैं, क्या कभी नहीं सोचते होंगे ?
सत्ता का काम है फूट डालो, राज करो। क्या हम में इतना भी शउर नहीं बचा कि हम ये समझ सकें? क्या साथी पत्रकारों को, सीज़न्ड जर्नलिस्ट को नहीं दिख रहा है कि कुछ बहुरूपिए समूची पत्रकारिता को भंडूल करने हमारे बीच प्लांट किये जा रहे हैं? क्या ये नहीं दिख रहा कि कैसे पेशागत, खालिस पत्रकारों को "स्वाहा " करने अप्रत्यक्ष ताकत काम कर रही है ? क्या आपको वाकई ये नहीं दिख रहा कि पत्रकारिता कैसे सिसक रही है ? आप सब ने तो कई मौसम देखें हैं, क्या ये नहीं दिख रहा कि कैसे देश में, देश के नाम पर पत्रकारिता को चारण भाट में तब्दील किया जा रहा है ?
विमर्श कीजिए।
आत्ममंथन कीजिए।
हो सके तो फिर पत्रकारिता शुरू कीजिए।
आपको भारत माता की कसम।

