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मीडियामोरचा

___________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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भारतीय मीडिया में विदेशी एजेंट

यह तथ्य कमोवेश सबको ज्ञात हैं कि भारतीय मीडिया का एक बडा तबका अपनी आजीविका विदेशियों की ऐजेंटी से चलाता है। हर एक समाचार पत्र का पाठक या टेलीविजन का जागरूक दर्शक यह जानता है कि मीडिया में एक तबका है जो अमेरिका की भारत से ज्यादा चिंता करता है तथा उसके लिये मर मिटने के लिये खडा रहता है। मीडिया उद्योग के अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों जिनमें बहुत सारे बड़े पत्रकार भी रहे हैं उनका मानना है कि विश्व मीडिया में विशेषकर भारत जैसे देशों की मीडिया में एजेण्टों की संख्या सबसे ज्यादा है।

भारत जैसे देशों में मीडिया को अब कमोवेश विदेशी प्रतिष्ठानों ने पैसा निवेश द्वारा अधिग्रहित कर लिया है और जहां पूंजीनिवेश नहीं है वहां अपने कैप्चर करने की विशेषज्ञता द्वारा विदेशी भारतीय लूटेरों के साथ एक गठबन्धन में हैं। गौरतलब है कि तमाम क्षेत्रों में पूँजीनिवेश वास्तव में सत्ता का एक गठंबन्धन है न कि केवल व्यापार मात्र। यह एक टेरिटोरियल एफिलियेशन है। मीडिया के तमाम क्षेत्रों में यह दो तरफा एफिलियेशन है। भारत के ज्यादातर पूँजीपति मूर्ख हैं, कम पढे लिखे हैं इसलिये उनका सहज आकर्षण अंग्रेजो की मेधा की तरफ रहता है और वे उन्हें ही अपने विशेषज्ञ के बतौर रखते है। भारतीय हिन्दी समाचार पत्रों में ज्यादातर के  पॉलिसी या कन्टेन्ट विशेषज्ञ विदेशी है। मीडिया कारपोरेटीकरण के दौर के बाद से भारतीय मीडिया का हर एक तबका, क्या हिन्दी क्या अंग्रेजी कहीं न कहीं अमेरीकी प्रभुत्व में है तथा अमेरिकियो का अप्रत्यक्ष निवेश ज्यादातर मीडिया में है।

दी गार्जियन के पत्रकार रॉय ग्रीन्सलेट का मानना है कि ब्रिटिश मीडिया के ज्यादातर टेबलायड और समाचार पत्रों में हर पांच में से एक सीआईए का एजेन्ट है तथा ज्यादातर सम्पादक किसी न किसी स्तर पर किसी न किसी के एजेण्ट हैं। गार्जियन में ही छपे एक लेख में उन्होने जिक्र किया कि समाचार पत्रों में पत्रकारों से ज्यादा पीआर एजेन्ट हैं तथा सीआईए कमोवेश 265 मिलियन डॉलर हर साल इन एजेण्टों पर खर्च करती है। अंग्रेजी के ज्यादातर समाचार पत्र तथा टेलीविजन चैनलों का रेवेन्यू पीआर पर ही टिका है चाहे व ओबामा का पीआर कर रहें हो या किसी हीरो-हिरोईन या सिनेमा रिलीज का या किसी नेता का पीआर कर रहे हों। इसमे कोई आश्चर्य नही कि भारतीय मीडिया ओबामा पर जिसना समय देती है उतना मिट रोमनी पर नहीं देती है। किसकी धौस है मीडिया पर, क्या ओफरा विन फ्रे की धौस है, जो ओबामा के दौरे के समय भारत आई  थी और नाच गा कर बता रही थी कि उसे भारतीयता से बडा लगाव है?  भारतीय मीडिया इस समय पूरी तरह पैरासाईट तंत्र है इस बात को बहुत सिद्ध करने की जरूरत नहीं है। रिचार्ड नार्टन टॉयलर के अनुसार ब्रिटेन कें पाँच सौ से अधिक पत्रकार ऐसे हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से सीआईए की सेवा में है और एक गुप्त पूंजीवादी सत्ता कें लिये काम करते है तथा नाईटहुड के दावेदार हैं।

ऐसा नहीं है कि एजेण्ट सिर्फ सीआईए के ही हैं अन्य सत्ताओं के भी एजेण्ट है जो तमाम तरह की मुखबिरी में लगे हुये है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने एक बडी संख्या में मुखबिरों को छोटीमोटी नौकरी पर रखा है जिनका काम इन्टरनेट पर फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में रहकर लोगों की गतिविधियों की सूचना इकट्ठा करना है तथा उसकी जानकारी पहूंचाना है। एजेन्टी के बावत भारतीय मीडिया ब्रिटिश मीडिया का भी बाप है क्योंकि यहां न केवल सीआईए के एजेण्ट हैं बल्कि तमाम विदेशी संस्थानो, बिजनेस हाउसेस, तथा आजकल एफडीआइ इन रिटेल है तो मेघनाद देसाई जैसे दलाल वॉलमार्ट की दलाली करते हैं तथा मीडिया स्पेश का उपयोग उनके हित सम्बर्धन में करते हैं। मीडिया में विदेशियों के हथियार बेचने वाले भारतीय पत्रकार भी हैं जो टेलीविजन के प्रोग्राम सिर्फ इसलिये बनाते हैं कि दिखा सकें कि किस तरह अमेरीकी लडाकू विमान दुश्मन को शिकस्त देता है और अन्तं में सरकार को सुझाव की यह हमारी आवश्यकता है। यह एक प्रयोजित कार्यक्रम होता है. यह शुद्ध एजेण्टई है। दूसरी तरफ अमेरीकी हथियार बनाने वाली कम्पनियों ने भारतीय मीडिया में इतने एजेण्ट पैदा कर रखते हैं कि वे चीन को स्थाई दुश्मन के बतौर पेश करते रहते हैं जिससे की भारत अमेरिकोन्मुख बना रहे। इन खबरों के पीछे एकमात्र उद्देश्य यह बतलाना होता है कि अमेरीका के युद्धक विमान तथा उसका वरदहस्त ही भारत को चीन के खतरे से बचा सकता है। भारतीय मीडिया की यह परिजीविता कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योकि जब भारत का प्रधानमंत्री तक बात बात में व्हाईट हाउस की हां ना पर आश्रित रहता है तब इन तुच्छ प्राणियों की क्या बिसात है।  अमेरीका की तर्ज पर आजकल एनडीटीवी के इनिशियेशन के बाद माडल, हिरोईने तथा रण्डियां भी वायुयान तथा जेट उडाने लगी हैं। मॉडलों का जवानों के बीच होना इस बात को सामने रखता है कि भारतीय सेना भी एकतरह से कार्पोरेट बनती जा रही है तथा अभी हाल में मीडिया में जो खुलासे हुये वह बतलाते हैं कि सेना के सर्वोच्च पदों पर बैठा हुआ सेनापति देश की सेवा न कर एक नाइट की तरह विदेशी शस्त्र बनाने वाली कम्पनियों की सेवा कर रहा है। भारत की तीनों सेनाओं में सीआईए के दलालों की संख्या में भारी बढोत्तरी हुई है। भारत की यह एक ऐतिहासिक त्रासदी है कि भारत का पेटी-बुर्जुआ मध्य वर्ग जन्मजात दलाल होता है तथा उसकी वेष्यावृत्ति का कोई अन्त नहीं है। इन्हे अंग्रेजी मे कहिये अंग्रेजों के प्वायजनस कन्ट।  यहां हर व्यक्तिं बिकाऊ है इन्क्लुडिंग राष्ट्रपति इसलिये मार्क्स नें लिखा था कि भारत एक दास चेतना सम्पन्न देश है। इस दासत्व से इस देश को कब स्वतंत्रता मिलेगी कहना मुश्किल है।

दूसरी तरफ एकवर्ग जो शहरी है वह जन्मजात एजेण्ट होता है, पैदा होते ही वह अंग्रेजी बोलता है ( उसकी माता तो वैसे भारतीय होती है लेकिन उसके स्तन से अंग्रेजियत प्रवाहित होता है) तथा अंग्रेजों की नकल करता है। वह यह मानता है कि अंग्रेजी ही आधुनिक है और उससे ही उसकों समाजिक आधिपत्य में हिस्सेदारी मिलती है। भारतीय स्त्रियों में अंग्रेजो की नकल करने की प्रथा सबसे तेज है क्योकि सबसे मूर्ख तबका यही है। भारत की त्रासदी एक वजह यह पाश्चात्य वेष्यामूलकता है। एक गंवार दसवीं पास भी अंग्रेजी की टूटी-फूटी भाषा बोल कर गांड चमकाती है और वेष्यावृत्ति का आदर्श सामने रखती है। यह एक अजीब तरह का परवरजन है जो किसी अन्य देश में शायद नही मिलेगा। एशियाई देशों में चीन में पूँजीवाद अपनी एक नई रफ्तार में है लेकिन वहां हमें इस तरह का परवरजन नही मिलता, भाषा तथा संस्कृति उनकी पहचान है। मैकियावली या जॉन लॉक वहां राजनैतिक चिंतक नहीं है बल्कि कन्फ्यूशियस हैं जिन्हे पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में पढाया जाता है तथा जिससे उनका चीनी वर्क ईथिक्स बनता है। भारतीयों का इस ईमिटेटिव वर्गों को हम मीडिया के सम्बन्ध में रखकर यदि देखे तों एक नई बात सामने आती है। यह वर्ग सफेद चमड़ी पसंद है, उसे श्याम रंग पसंद ही नहीं है और आप देखे तो मीडिया में स्त्रीयों का एक चेहरा भी श्याम वर्ण का नहीं मिलगा। यह मीडिया का भारतीय रंग भेद है। अंग्रेजों ने भारतीयों के देह ही नहीं खराब की दिमाग में भी मूत गये।  वास्तव में एक उपनिवेशवादी मानसिकता का परिणाम है, कांग्रेस पार्टी ने उपनिवेशवाद को ज्यों का त्यों बनाये रखा बल्कि परजीविता के उत्पादन से उसे और भी खतरनाक संरचनात्मक स्वरूप दिया। भारतीय वामपंथ अपनी स्थापना के बाद से आज तक भारतीय भाषा नहीं सीख पाया, हिन्दी तो उसे आती ही नही या आती है तो वह उसे बोलता नही है, अंग्रेजी लेफ्ट की अफिसियल भाषा है। उन सभी दलालों, चोरों तथा उपनिवेशवादियों को हिन्दुत्व ( अब यह भाजपा का नही है, हिन्दुत्व मात्र मानिये) शब्द मात्र से नफरत इसलिये है कि यह भाषा को तरजीह देता है।

हम अपनी भाषा की सन्तान है और जब तक हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे तब तक यह उपनिवेशवाद बना रहेगा। संस्कृति का सवाल भी इससे ही जुडा हुआ है, अंग्रेजी की पूंजीवादी संस्कृति चाहे वह आधुनिक हो उत्तरआधुनिक अपने स्वरूप में प्रोटैस्टेन्ट है। गौरतलब हो की जर्मन चिंतक मैक्स बेवर नें मार्क्स के बाद दूसरा बडा सच वर्षो के शोध के बाद यह सामने रखा था कि पाश्चात्य पूंजीवाद मूलभूत रूप से ईसाई पूँजीवाद है क्योकि उसकी संस्कृति और वर्क ईथिक्स प्रोटेस्टेन्ट है। इस बात पर बहुत तर्क की गुंजाईश नहीं है क्योकि दरिदा से लेकर तमाम विचारकों नें इसको पुष्ट किया है। भारतीय सफेद चमडी पसंद वर्ग जो पाश्चात्यों का पिछल्ग्गू रहता है वह अनपढ है इसलिये उसे इसका कोई ज्ञान हीं होता। यही वर्ग अंग्रेजी उपनिवेशवादी शासक वर्ग के साथ गहरे नाभिनाल-बद्ध रहता है-यही उनके साथ फिट बैठता है। यहां वर्ग को उस रूढिवादी अर्थ में नही लिया जाना चाहिये जिस अर्थ में कम्यूनिस्ट परिभाषित करते हैं बल्कि और व्यापक अर्थ में, एक ऐसे वर्ग के रूप में जो एक शोषणपरस्त पूंजीवाद को गति देता है तथा जिसकी कोई इतर सब्जेक्टिविटी नहीं है। हाल ही में एक इंटरनेट  सर्वे में जो खुलासा हुआ वह इस वर्ग के बारे ज्यादा बेहतर जानकारी देता है। कम्पनी के सर्वे में 80 प्रतिशत महिलाये जिसमें सभी कामकाजी सफेद चमडी पदंद फेसबुकिया महिलाये थीं उनके लिये पिज्जा एक भावनात्मक खाद्य सामग्री थी जबकि 50 प्रतिशत रेशनलिस्ट पुरूपो की सोच पैसे से उपर नही गई। अर्थात जो पिज्जा इमोशनलिज्म वाले व्यक्तित्व थे वे एक बदतर कोटि कें रेशनलिस्ट निकले और जो रेशनलिस्ट थे वे पैसा रेशनलिस्ट थे जो पूँजीवाद का आदर्श व्यक्तित्व सामने रखते थे। यह वर्ग ही पूँजीवाद को गति देता है क्योकि उनके कोई विषयीगत चेतना नही है। यही वर्ग मूलभूत रूप से ऐतिहासिकतः दलाल रहा है।  यह वर्ग न केवल एक मशीनी भीड है बल्कि एक ऐसा वर्ग है जिससे बहुत सारे खतरे है क्योंकि इस वर्ग की कोई सब्जेक्टिविटी नहीं है, कोई स्वतंत्र सोच नहीं है। पूँजीवाद उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में ऐसे वर्गों का उत्पादन करता रहा है। भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने भारतीय मुनिब तथा अधिकारी इसी वर्ग में पैदा किये। यही वर्ग लॉट साहेब बना जो ज्यादातर मामलों में अग्रेजों के साथ की गई वेष्यावृत्ति का परिणाम था। गौरतलब है कि लाट साहेब बाईबिल का ही लॉट साहेब है जो हर तरह के परिवारिक टैबू को तोड कर अपनी मां, बहन, बेटी सब पर चढता रहता है। अंग्रेज लॉट साहेब कहे जाते थे और जाते जाते भारतीयों कें दिमाग में जब मूत गये तब वर्तमान समय के अंग्रेजी बोलने वाले लॉट साहेब पैदा हुये। यह वर्ग ही वह वर्ग था जिसनें भारत में सबसे पहले पनामा सिगरेट इन्ट्रोड्यूज किया, मैन यह बात मैनेजमेन्ट की एक किताब में पढी थी। अंग्रेजों ने इस नये वर्ग को अपनी लाट साहेबी भाषा दी तथा अपना चरित्र दिया और उनसे ही उन्होनें भारत को उपनिवेश बनाया। यह कहना कि अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया था पूरा सच नहीं है।

यही वर्ग जो सदैव अस्मितावीहीन रहा है सबसे बडा उपभोक्ता रहा है तथा यही सबसे कुशल कोलोनाईजर भी है। यह वर्ग ही संस्कृति के क्षेत्रों में ईसाई संस्थानों से पैसे पाकर दुर्गा या लक्ष्मी या सीता को वेष्या के रूप में चित्रित करता है और पैसे बनाता है। यही शासक वर्ग का वास्तविक वर्क फोर्स भी है-जिसे हम कामकाजी तबका कहते हैं।  यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जिस कामकाजी तबके की बात कर रहा हूँ उसका एक सेलेक्टिव उत्पादन किया गया है। दे हैव बिन चुसेन। दूसरी तरफ वह वर्ग है जिसे मार्क्सवादी बिग पेटी-बुर्जुआ कहते हैं जो छोटे मोटे पूँजीवादी स्तर तक उठ गया है। यह वर्ग दूसरा सबसे बडा कोलोनाईजर है, दूसरा सबसे बडा एजेण्ट है क्योकि वह कभी वास्तविक पूँजीपति नही बन पाता और न ही उसका वह ऐस्पिरेशन होता है। यह वर्ग बहुधा एक परजीवी वर्ग है जो उपनिवेशवादी ग्लोबल पूँजीवाद का पिछलग्गू होता है। यह पेटी-बुर्जुआ अरचनाशील, अनुत्पादक तथा जातिय-धार्मिक-राष्ट्रिय पहचान से उपर उठकर ग्लोबल पूंजीवाद का स्वागत करता है तथा उससे नाभिनाल-बद्ध हो जाता है। भारतीय मीडिया का कार्पोरेटीकरण कमोवेश इसी सच को सामने रखता है।

भारतीय छोटे बडे मीडिया ग्लोबल पूँजीवाद के साम्राज्यवाद से हमजोली होकर अंग्रेजियत तथा प्रोटेस्टैन्ट पूंजीवादी सम्राज्यवाद के समक्ष एकबार फिर नतमस्तक हो गये हैं। इसका अर्थ है भारतीय पेटी-बुर्जुआ इस हद तक अनुत्पादक तथा अरचनाशील है कि उसने ईसाई पूँजीवाद है, उसकी संस्कृति और वर्क ईथिक्स को स्वीकार कर लिया है। यदि मीडिया पाश्चात्यता पर इतना जोर देता है तथा घण्टों ओबामा के कार्यक्रम प्रस्तुत करता है जिसका भारतीय जनता के लिये कोई बहुत प्रासंगिकता नही होती तो यह उसकी मजबूरी मात्र होती है। उसनें जब पैक्ट बनाया होगा तब यह शर्ते रही होंगी। तीसरा वर्ग कार्पोरेट है, बडे पूँजीपति हैं। यह तीनो वर्ग मिलकर एक नये उपनिवेशवाद का निर्माण करते हैं और मीडिया इन तीनों से निर्मित भी होती है तथा इसके इदगिर्द घूमती भी रहती है। जब टीवी का कैमरा गरीब बस्ती या गांव देहात मे जाता है तो वह एक उपनिशवादी की तरह ही जाता है न कि एक भारतीय की तरह । टेलीविजन मीडिया डाक्यूमेन्ट्री एक सूचना के बतौर बनाता है जिसकी एक उपयोगिता कोलोनाईजर के लिये है तथा दूसरी इस नये उपनिवेशवादी शासक वर्ग के लिये कि “देखो सब कुछ ठीक नही है”।

जब मीडिया जनजातिय प्रदेशो में माओवादीयों को क्रियाशील देखता है और उसे कैमरे मे कैद करने मे सफल होता है तो वह सावधान करती हुई खबर दिखाता है कि उधर हमारे लिये खतरा बढ रहा है क्योंकि उधर ही संसाधन है-इस दिशा में ध्यान देने की जरूरत है। कई बार तो यह मीडिया शासक को अपनी ही जनता पर आक्रमण करने तक को कहता है। एजेण्टों के इस समय में इस देश की बहुसंख्यक जनता का सब कुछ दाँव पर है. वह पुनः एक नये उपनिवेशवादी शिकंजे में फंसता जा रहा है।  इधर बीच हुए तमाम लूट वास्तव में इस उपनिवेशवादी दौर की पुष्टि करते हें। इस देश में पुनः एक नई स्वतंत्रता की लडाई की जरूरत है। ( यह आलेख श्री राजेश शुक्ला के ब्लॉक  http://rajcritic.wordpress.com/से साभार है )

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राजेश शुक्ला 

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सम्पादक

डॉ. लीना