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___________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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समाजवाद की आड़ में जारकर्म समर्थक का चेहरा

कैलाश दहिया/ आर.डी. आनंद ने दिनांक 25 मार्च, 2021को अपनी फेसबुक वॉल पर 'आम्बेडकरवादी और आजीवक' शीर्षक से अपना लेख लगाया है। सर्वप्रथम तो, इन के लेख का शीर्षक ही गलत है। आजीवक एक कंप्लीट धर्म है, जो अपने पर्सनल कानूनों के साथ दलितों की समस्याओं को हल करता आया है। इस के विपरीत अंबेडकरवाद का अर्थ है धर्मांतरण। धर्मांतरण करने वाला व्यक्ति किसी भी धर्म में छलांग लगा सकता है। ऐसे में कोई भी आजीवक से धर्मांतरणवाद की तुलना नहीं कर सकता। आजीवक धर्म की तुलना ईसाई, इस्लाम, ब्राह्मण जैसे धर्मों से की जा सकती है, जो विशुद्ध रूप से धर्म हैं। आगे बढ़ने से पहले यहां धर्म का अर्थ बताया जा सकता है। धर्म का अर्थ होता है अपनी परंपरा, रीति-रिवाज और रूढ़ियों सहित चिंतन की पूर्णता, जिसमें किसी कौम की समस्याओं के समाधान निकलते हैं। इसी में अपनी बहन बेटियों की सुरक्षा भी निहित होती है। महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर ने तो बताया ही है- "आजीवक समाज एक पूर्ण समाज है। यह किसी पूर्ण समाज का कोई अंग या खास अंग नहीं है। यदि ब्राह्मणों, बौद्धों और जैनियों की भाषा में बोला जाए तो यह उन की समाज व्यवस्थाओं का कोई भाग नहीं है। इसलिए इस अर्थ में यह अपने आप में विश्व की किसी भी समाज व्यवस्था से बराबरी के स्तर पर तुलनीय है। यह किसी की गुलाम कौम या किसी का अछूत नहीं है। इस का अपना साधु समाज है, अपने राजा हैं, अपने व्यापारी हैं, अपने किसान हैं, अपने कारीगर हैं और अपने मजदूर हैं। यह भारत में चर्चित वर्ण व्यवस्था का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र में से कुछ भी नहीं है क्योंकि यह अवर्णवादी है।"(1) उम्मीद है, बात समझ आई होगी।

एक अन्य बात, जो यहां पूछी जा सकती है, डॉ. अंबेडकर धर्मांतरण कर के बौद्ध हो रहे हैं, तो इस  का अर्थ है वे बुद्ध की परंपरा का पालन करने को कह रहे हैं। बुद्ध क्या कह रहे हैं? बुद्ध पक्के वर्णवादी और पुनर्जन्म को मानने वाले हैं। इधर दलित तो इन बातों को मानते नहीं, ऐसे में वे मारे ही जाने हैं, क्योंकि दलित डॉ. अंबेडकर की मान कर धर्मांतरण कर रहे हैं। फिर, अंबेडकरवाद क्या है? अंबेडकरवाद एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षी सोच का नतीजा है, जबकि आजीवक हमारी ऐतिहासिक परंपरा में हमारे महान चिंतकों  मक्खली गोसाल, सद्गुरु रैदास, कबीर साहेब और डॉ. धर्मवीर समेत तमाम दलितों की सोच की देन है। इसी परंपरा में हमारे अनेक संत और महात्मा हुए हैं। वैसे तो डॉ. अंबेडकर भी इसी परंपरा में आते हैं, लेकिन अति महत्वाकांक्षा व्यक्ति को कहीं का नहीं छोड़ती।

यह सही है कि दलितों में बौद्ध धर्मांतरण करने वालों में मुट्ठी भर पढ़े लिखे लोग हैं। लेकिन आजीवक चिंतन के आने से इन के पांवों के नीचे की जमीन ही निकल गई है। वरिष्ठ लेखक सूरजपाल चौहान जी 24 मार्च, 2021 को अपने एक पत्र में बताया ही है,'कड़वा सच है कि बाबा साहेब के सिवाय दलितों के किसी भी महापुरुष ने 'धर्म-परिवर्तन' नहीं किया है। बौद्ध धर्म अपनाकर भी देश के दलितों को क्या मिला ? क्योंकि आज भी दलितों की वही पुरानी पहचान बनी हुई है।' (2) इस पत्र को अरुण आजीवक की इसी दिन की फेसबुक वॉल पर देखा जा सकता है।

दरअसल, बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर बड़े रिसर्च स्कॉलर थे। उन्होंने ब्राह्मण अर्थात हिंदू धर्म की चीर-फाड़ की है। इसी क्रम में वे बुद्ध के पास चले जाते हैं। जबकि यह ब्राह्मण और बौद्ध यानी द्विजों का आंतरिक मामला है। जिस का दलितों से कुछ भी लेना-देना नहीं। इधर, आजीवक तो ऐसे वर्णवादियों से लोहा ले रहे हैं। सभी दलित साथियों को इस अंतर का ध्यान रखना चाहिए। सही में, डॉ. अंबेडकर बड़े स्कॉलर थे। आजकल के डिग्रीधारकों की तरह नहीं कि नाम के आगे डाक्टर लग गया लेकिन अपने विषय की प्रारंभिक जानकारी तक नहीं रखते। इस में दलितों का हाल तो और भी खराब है, क्योंकि ये पिछले ढाई हजार सालों से धर्महीन अर्थात विचारहीन स्थिति में भटक रहे हैं।

गजब की बात है, ऐसे लोग हमें शिक्षा देने का स्वांग रच रहे हैं, कोई डॉ. अंबेडकर से नहीं पूछता कि उन्होंने बौद्ध धर्मांतरण क्यों किया? क्यों  उन्होंने अपने से वरिष्ठ स्वामी अछूतानंद और बाबू मंगू राम की नहीं सुनी? फिर, इधर तो चिंतन के रूप में पूरा धर्म है। जिस में अपने पर्सनल कानून हैं। हम अपने दलितों को बुद्ध की तरह भटकने नहीं देंगे। भीख का कटोरा हाथ में लेने वालों को कबीर साहेब फटकार लगाते हुए कहते हैं 'स्वांग जती का पहर कर, घर-घर मांगे भीख।' (3)

आजीवक चिंतन दलितों की पहचान की समस्या को ले कर आया है। यह किसी से रूसने-मनाने नहीं आया। हरियाणा में एक कहावत है 'निरभागी ब्याह मैं रुसया करै'। बताइए, इधर पूरा धर्म आ गया है और आनंद महोदय कह रहे हैं,'धर्म झगड़े की जड़ है। इन सब का निस्तारण पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति में है।' अरे भई, आप को किसी ने रोका है समाजवादी क्रांति करने से? किस का इंतजार कर रहे हैं? ऐसे ही कुछ दलित हैं जो जारिणी रमणिका गुप्ता के यहां मुक्ति तलाशते रहे। पता नहीं ये और बाकी के अपनी डफ़ली बजाने वाले आजीवकों से क्या चाहते हैं?

 II

आजीवक चिंतन में जारकर्म के सिद्धांत से ये खासे डरे हुए दिखाई दे रहे हैं, ये कह रहे हैं, 'डॉ. धर्मवीर और उनके प्रबुद्ध अनुयायी दलितों की समस्याओं का कारण जारकर्म में फँसी स्त्रियों को मानते हैं। उन्हें लगता है दलित पुरुष अपनी स्त्रियों द्वारा किए गए जारकर्म से उत्पन्न सवर्णों के बच्चों को पाल रहे हैं।'(4) अब इन से पूछा जाए, इस में गलत क्या कहा जा रहा है? आजीवक चिंतन में बार-बार बताया जा रहा है, बलात्कार के लिए अगर कोई दोषी है तो वह है पुरुष, ऐसे ही जारकर्म के लिए स्त्री को चिह्नित किया गया है। लेकिन, जार स्त्री को निरीह, अबला कह कर उस का बचाव करता फिरता है। परन्तु इस से स्त्री बच थोड़े जाती है। हिंदू कोड बिल पर बोलते हुए बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर कहते हैं --"भारत में स्त्रियों में नैतिक साहस की कमी और चरित्र बल की कमी इस में बाधक रही थी। कोई भी विख्यात स्त्री नेता हमारी स्त्रियों की सामाजिक प्रगति में वास्तविक रूचि नहीं रखती।"(5)  बाबासाहेब के इस कथन पर इन का और इन के समर्थकों का क्या कहना है?

जब आजीवक चिंतन में जारकर्म को ले कर स्त्री को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है तो इस बात का अर्थ यह नहीं है कि हर स्त्री जारिणी हो गई। जारकर्म में बुरी स्त्री गिरती है। हमारी अच्छी और मोरल स्त्रियां भी हैं, जिन्होंने जारकर्म की धज्जियां उड़ाई हैं। वरना तो बुधिया, सुखिया, मसायी और भंवरी देवियों जैसियों ने दलितों को द्विजों और सवर्णों का गुलाम बनवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। एक और बात इन्हें और अन्य दलितों को समझाई जा सकती है, जिस दिन स्त्री पर बलात्कार का आरोप आएगा उसी दिन पुरुष को जारकर्म के लिए दोषी माना जा सकता है। अभी तो आजीवक चिंतन में बताया जा रहा है, जारकर्म के लिए स्त्री शत-प्रतिशत दोषी है। उस के इस अपराध के लिए इसे तलाक दिया ही जाएगा।

यह तलाक का ही अधिकार था जिस के कारण दलित दुरूह परिस्थितियों में भी अभी तक बचे रहे। डॉ. अंबेडकर  की वजह से दलित हिन्दू मान लिए गए और ब्राह्मणी कानूनों की वजह से अपने इस अधिकार को खो बैठे। यही वजह रही कि डॉ. धर्मवीर को इस के खिलाफ महासंग्राम में उतरना पड़ा। 'मेरी पत्नी और भेड़िया' इस बात की गवाही देती है। ‌विट्ठल कांबले ने जारिणी बनी मसायी को तलाक दे कर गुलामी से छुटकारा पाया है, अन्यथा तो किस-किस के बच्चे उन्हें पालने पड़ते। तभी बताया गया है कि अक्करमाशी का दलितों से कुछ भी लेना-देना नहीं। हमने तो अक्करमाशियों समेत मसायी को हणमंता लिम्बाले को दे दिया है। वह जाने इन का क्या करना है। तभी हमारा स्पष्ट मत है कि शरण कुमार लिम्बाले के लिखे का दलित जीवन और साहित्य से कुछ भी लेना-देना नहीं है। लिम्बाले जैसों का लिखा ब्राह्मण साहित्य के अंतर्गत आता है। फिर, अक्करमाशी क्या है? असल में यह आत्मकथा पुराणकथा महाभारत का लौकिक सच है। जिसे हर द्विज के साथ घटता देखा जा सकता है। इन्हें बुद्ध के घर छोड़ने पर ध्यान लगाना चाहिए। और, अगर इन्होंने अक्करमाशी नहीं पढ़ी, तो पढ़ लें। इस के बाद इन्हें और इन के जैसों को सोच-समझ कर लिखना पड़ जाएगा। अभी तो ये आंखें बंद करके ही लिखने में लगे हैं।

इन की तिकड़म देखिए, ये एक तरफ लिख रहे हैं, 'डॉ. धर्मवीर और उनके प्रबुद्ध अनुयायी दलितों की समस्याओं का कारण जारकर्म में फँसी स्त्रियों को मानते हैं। उन्हें लगता है दलित पुरुष अपनी स्त्रियों द्वारा किए गए जारकर्म से उत्पन्न सवर्णों के बच्चों को पाल रहे हैं।'(6) इस बात को जानते-समझते हुए ये अपनी दिनांक 27 मार्च, 2021 की फेसबुक पोस्ट में लिख रहे हैं, 'दुखद यह है कि स्त्रियों को हमेशा पिता, पति और पुत्र रूपी भेड़ियों के मध्य जीवन यापन करना होता है। अमूमन हर स्त्रियाँ अपने पिता, पति और पुत्र को इन भेड़ियों से अलग देखती हैं, उन्हें लगता है जैसे उनके घर के पुरुष बिना दाँत के मेमने हों। स्त्रियों को हर पुरुष के साथ उनके बचपन से ही बिल्कुल सख़्त बने रहना चाहिए क्योंकि ये बिना दाँत का मेमना ही कल को खुंखार भेड़िया बनता है।' कोई इन दोनों वक्तव्यों से इन के दिमाग को पकड़ सकता है कि उस में क्या चल रहा है। एक तरफ तो यह जारकर्म के अपराध से स्त्री को मुक्त करते हैं, दूसरी तरफ पिता, पति और पुत्र को भेड़िए के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। यही इन के जारकर्म समर्थक होने का पक्का लक्षण है। बताइए, पिता, पति और पुत्र को अपराधी बताया जा रहा है! इन के मुंह से जार का नाम तक नहीं निकल रहा। यह जार ही है जो जारिणी के साथ मिल कर जारकर्म के अपराध को अंजाम देता है। जिस में पति की हत्या होना आम बात है। जारिणी तो जारकर्म के लिए अपने उदर से पैदा हुई संतान तक को मार देती है।

सवाल यह है कि इन के मुंह से जार का नाम क्यों नहीं निकल रहा? असल में ये 'मेरी पत्नी और भेड़िया' में पकड़े गए भेड़िए के पक्ष में ताल ठोक रहे हैं। तभी ये कह रहे हैं, 'यदि पूँजीवाद समाप्त कर लिया गया, तो जारकर्म भी समाप्त हो जाएगा क्योंकि संपत्ति और संसाधनों का व्यक्तिगत मालिकाना ही लोगों को अहमी और दुष्कर्मी बनाता है।' एक तरह से इन्होंने सारी दुनिया को जारकर्म में धकेल दिया है। ये तो जार शिरोमणि राजेंद्र यादव से भी सौ कदम आगे बढ़ गए हैं। ये बताएं, जब सद्गुरु रैदास और कबीर साहेब जारकर्म की धज्जियां उड़ाते हैं उस समय कौन सा पूंजीवाद था? जब महान मक्खलि गोसाल जारकर्म पर तलाक की व्यवस्था देते हैं उस समय कौन सा पूंजीवाद था? ये इतना ही बता दें,  बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर जिस बात के लिए मंत्री पद से इस्तीफा देते हैं, वह क्या बात थी?

III

पता लगता है कि इन्होंने डॉ. धर्मवीर की आलोचना दृष्टि पर कोई किताब भी लिखी है। जब इन से वह किताब उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया तो इन्होंने कह दिया कि वह इन के पास उपलब्ध नहीं है। इन्होंने प्रकाशक से बात करके उपलब्ध कराने की बात कही। किताब छोड़िए प्रकाशक का मोबाइल नंबर तक इन्होंने नहीं दिया। पता नहीं किस बात का भय है इन्हें? वैसे, इन के लिखने का इसी बात से पता लग रहा है, इन के लेख में डॉ. साहब की किताब तक का नाम गलत लिखा गया है। संदर्भ का तो भगवान ही मालिक है। फिर ये लिखाड़ी भी बनते हैं। वो भी ऐसे वैसे नहीं थ्योरी देने वाले! बताइए, इन से एक किताब तक का नाम 'थेरीगाथा की स्त्रियां और डॉ. अंबेडकर' (7) ठीक से नहीं लिया जा रहा, ये उसे "थेरीगाथा की भिक्षुणियाँ" बता रहे हैं!

खुद को थियरिस्ट समझने वाले इन के दिमाग की समझ देखिए, ये कह रहे हैं, 'यदि पूँजीवाद समाप्त कर लिया गया, तो जारकर्म भी समाप्त हो जाएगा क्योंकि संपत्ति और संसाधनों का व्यक्तिगत मालिकाना ही लोगों को अहमी और दुष्कर्मी बनाता है। सरकार नामक संस्था पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी होती है इसलिए उनके पास शक्ति और न्याय भी उपलब्ध है।'(8) बताइए, इन्होंने क्षण भर में  स्त्री को व्यक्तिगत संपत्ति बना दिया। हमारा कहना है कि स्त्री जार पति के कूल्हे पर लात मार के उस से दूर हटे। वह किसी से भरण-पोषण के चक्कर में ना पड़े। फिर, चिंतक बनने चले इन महोदय से पूछा जा सकता है अगर किसी पूंजीपति की पत्नी जारिणी बन जाए, तो वह क्या करे? उस की तो संपत्ति जारिणी अपने जारों पर लुटा देगी? अब पूंजीपति और पूंजीवाद क्या करेगा? फिर, इस देश के समाजवादियों का हाल किसी से छुपा नहीं है। ये बलात्कार के मामले में यहां तक कह चुके हैं कि बच्चों से गलती हो जाती है। लगता है इन महोदय का समाजवाद कुछ अलग है, ये जरा उस की व्याख्या कर दें। उस में इतना अवश्य बता दें कि जारकर्म का इन के समाजवाद में क्या समाधान है? दरअसल, इन्हें ना समाजवाद से मतलब ना पूंजीवाद से। ये केवल जारकर्म की छूट चाहते हैं। बाकी कुछ भी होता रहे। ये दलित का आवरण ओढ़ कर उन्हें अंधे कुएं में धकेलने में लगे हैं। फिर, इस देश में समाजवाद का आवरण उतर चुका है। पीछे से ब्राह्मण का चेहरा ही झांकता मिला है। वैसे भी जब राजा पिट जाता है तो सैनिक भाग खड़े होते हैं। वे दिखाई नहीं पड़ते। इस देश में मार्क्सवाद-प्रगतिवाद- समाजवाद के मुखौटाधारियों 'प्रेमचंद और नामवर सिंह' की असली शक्ल दलित विमर्श में दिखाई जा चुकी है। ये कोई अलग थोड़े हैं। इन का दिमाग देखिए, इन्होंने सरकार को 'पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी' ही बता दिया! तब पूछा जा सकता है, दलित किन पूंजीपतियों के लिए सरकार बनाना चाहते हैं?

ये कह रहे हैं, 'स्त्रियों की बुद्धिमत्ता भेड़ियों से बचने में ही खर्च हो जाती है, फिर भी लाखों-लाख स्त्रियाँ पुरुषों के हवस और हत्या की शिकार होती ही रहती हैं। स्त्रियों की हुशियारी और बुद्धिमत्ता का तभी कोई मायने है जब वे पुरुषों के इस विकृत मानसिकता के कारणों का अध्ययन कर लें तथा उस मूल कारण का ही उन्मूलन करने का संघर्ष जारी रखें। दुखद यह है कि स्त्रियों को हमेशा पिता, पति और पुत्र रूपी भेड़ियों के मध्य जीवन यापन करना होता है। अमूमन हर स्त्रियाँ अपने पिता, पति और पुत्र को इन भेड़ियों से अलग देखती हैं, उन्हें लगता है जैसे उनके घर के पुरुष बिना दाँत के मेमने हों। स्त्रियों को हर पुरुष के साथ उनके बचपन से ही बिल्कुल सख़्त बने रहना चाहिए क्योंकि ये बिना दाँत का मेमना ही कल को खुंखार भेड़िया बनता है।' (9)  बताइए, कैसे-कैसे लोग दलितों में लेखक बन बैठे हैं! यह बलात्कारी का नाम ना ले कर पिता, पुत्र और पति को बलात्कारी के रूप में पेश कर रहे हैं। यूं तो हर पुरुष और स्त्री के रिश्ते का कोई नाम तो होता ही है। बलात्कारी किसी का पति, पिता, पुत्र और भाई हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पति, पिता, पुत्र और भाई बलात्कारी हो गए। बलात्कारी तो बलात्कारी होता है। फिर, इन्हें पता होना चाहिए कि इस देश के संदर्भ में बलात्कारी होना जाति से जुड़ा मामला भी होता है। हाथरस के 'मनीषा बलात्कार केस' में तो बलात्कारी से जुड़ी स्त्रियां ही बलात्कारी/बलात्कारियों को बचाने में लगी थीं। फिर इन्हें यह पता होना चाहिए कि दलित के संदर्भ में यही बलात्कारी जार भी होता है। महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर ने 'प्रेमचंद सामंत का मुंशी' में इस की स्पष्ट पहचान करा दी है।

ये कह सकते हैं कि इन्होंने तो 27 मार्च, 2021की पोस्ट बलात्कार को ले कर लिखी है। तो आगे बढ़ने से पहले यहां बताया जा सकता है, जारकर्म में बलात्कार और जारकर्म, दोनों अपराध शामिल हैं। इन से पूछा जाए, अगर पिता, पति और पुत्र बलात्कारी भेड़िए हैं, तो ये बताएं दलितों में ऐसा भेड़िया कौन है? क्या ये खुद ऐसा भेड़िया हैं? या, इन के पिता और पुत्र इस श्रेणी में आते हैं? हाथ में कलम पकड़ने से कोई लेखक और आलोचक नहीं बन जाता। इस के लिए पूरी परंपरा और चिंतन से गुजरना होता है। तो, पहले ये कुछ जान-समझ लें उस के बाद मैदान में उतरें, अन्यथा जग हंसाई के खतरे  ही खतरें हैं।

IV

इस बात पर क्या किया जा सकता है कि आजीवकों के सवालों का अंबेडकरवादियों, नवबौद्धों, मार्क्सवादियों के पास कोई जवाब नहीं हैं। अगर ये बौखलाते हैं, तो कोई क्या कर सकता है? जहां तक दलितों की बात है वे दम साधे विमर्श को देख-समझ रहे हैं। बाकी वादी अपनी थाली बजा रहे हैं, जिसे कोई सुनता नहीं। आर.डी.आनंद भी इन थाली पीटने वालों के साथ हो लिए हैं। क्या ये जानते नहीं कि ये जिस के लिए  ये थाली पिट रहे हैं, वह गूंगा-बहरा पैदा हुआ है।

इन के यह कहने कि 'यदि आजीवक भी एक धर्म के रूप में अस्तित्वमें आ गया तो इसकी भी कुछ जनता हो जाएगी और समाज में ये भी एक पहचान लिए स्वधन्य रहेंगे।' पूछा जाए, इन्हें इस पर क्या आपत्ति है? वैसे भी, यह बात किसी से छुपी नहीं है कि आजीवक दलितों की गुलामी के खिलाफ लड़ रहे हैं। दलित भी इस बात को भली-भांति जानते हैं। दलित अपनी पहचान के साथ रहे इस बात से किसी को क्या परेशानी है?  दलित का इस पर परेशान होना समझ से परे है। अरे भई, जब ब्राह्मण अपनी पहचान के साथ रह सकता है तो आजीवक क्यों नहीं? हां, जिसे यह पहचान नहीं चाहिए वह जैसे रहना चाहे रहे। हम उसे कुछ नहीं कह रहे। दरअसल, दलित की समस्या ही 'पहचान' की है। अब जब पहचान निश्चित हो गई है, तब आर.डी. आनंद और इन जैसों का परेशान होना समझ से परे है। वैसे, ऐसे सवाल ये डॉ. अंबेडकर से क्यों नहीं पूछते, जिन्होंने दलितों को बौद्ध की झूठी पहचान देने की कोशिश की। इसी झूठी पहचान के चलते वे बौद्ध नहीं नवबौद्ध के रूप में पहचाने जाते हैं। इन की यह बात सही है, 'आजीवक भी एक धर्म के रूप में अस्तित्वमें आ गया' है। यह इस से भयभीत ना हों। हम इंसान का इंसान के रूप में बेहद सम्मान करते हैं और दूसरों से भी यही उम्मीद करते हैं। वैसे, क्या इन्हें नहीं पता कि व्यक्ति से ही अगला सवाल यही पूछा जाता है, वह क्या है? तब अगर कोई ईसाई है या मुसलमान या ब्राह्मण, तब दलित कहा जा रहा व्यक्ति आजीवक है।

असल में ये दलितों के सरपंच बनने चले हैं। देखा जाए तो ये प्रवाचक की भूमिका के लिए तड़प रहे हैं। जब हमने कथित प्रगतिवादियों को पीट दिया और उन की असली शक्ल दलितों को दिखा दी, तब इन जैसे चिलम भरने वाले दलित तो कहीं के भी नहीं रहने वाले। ये हैं कि उन्हीं का ढोल बजाने में लगे हैं। वैसे, किसी ने इन्हें समाजवादी क्रांति करने से रोका नहीं है। ये इस का जी भर कर प्रचार करें। हां, आजीवक यानी दलित इन के झांसे में नहीं आने वाले। जब ऐसी क्रांति हो जाए तो ये हमें भी बता दें। दरअसल, असली क्रांति होते देख इन जैसों के हाथ-पांव फूल गए हैं। एक अन्य बात जो बताने लायक है, वह यह कि ये आजीवक चिंतन को समझ गए हैं लेकिन ना- समझी का नाटक कर रहे हैं। ऐसे लोगों को ढीठ कहा जाता है। जार पक्का ढीठ होता है।

देखा जाए तो ये उपदेशक की भूमिका में आ गए हैं। करेंगे धरेंगे कुछ नहीं बस इधर-उधर की बोल कर चिंतन को खराब करेंगे। ऐसे लोगों की दलितों में कमी नहीं है। अब इन्हें ही देख लिया जाए, प्रवचन देने वाले की तरह हाथ खड़े कर बांड रहे हैं :

1. 'डॉ. धर्मवीर ने मख्खलि गोशाल ( मक्खलि गोसाल) का अध्ययन किया। अध्ययन के उपरांत उन्हें लगा कि दलित नाहक बुद्ध की तरफ मुड़ गया बल्कि डॉ. आम्बेडकर ने बेकार ही बौद्ध धर्म पर मेहनत किया और दलितों को उस तरफ मोड़ दिया।' (10)

इन से पूछने को मन करता है, इस में गलत क्या है? अध्ययन में ही तो अपने महान पुरखे और उन के चिंतन का पता चला है। कोई मनगढंत सिद्धांत तो गढ़ा नहीं कि 'मरे जानवर का मांस खाते थे, इस लिए दलित हैं।'

2.'उनके प्रबुद्ध अनुयायी अपने ज्ञान के नशे में आम्बेडकर व बुद्ध के अनुयायियों को बेवकूफ़ समझते हैं, नीचा दिखाने की जद्दोजहद करते हैं, छीटाकशी करते हैं, कटाक्ष लिखते हैं, जो इन साथियों से तर्क करते हैं अथवा आम्बेडकर का पक्ष लेते हैं, उनको डिमोरलाइज करते हैं..।'(11) इन का यह कथन गलत और आपत्तिजनक है। इसे इन्हें प्रमाणित करना होगा।

3.'अच्छा यह होता कि वे साथी मख्खलि गोशाल, डॉ. धर्मवीर और आजीवक परम्परा के वास्तविक तत्वों को बताते, समझाते, प्रचार करते और आजीवक धर्म के अनुयायियों की संख्या बढ़ाते। ऐसे में आजीवक का प्रभामंडल विस्तार लेता'(12)

यह जानबूझकर भोले बन रहे हैं। क्या सचमुच इन्हें नहीं पता कि दलित विमर्श आजीवक विमर्श में बदल चुका है। इन्हें नासमझ बनने की जरूरत नहीं।

4.'आजीवक साथियों को धर्म और जारकर्म के सिद्धांत के अतिरिक्त दलित जनता की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक समस्याओं के समाधान की तरफ भी ध्यान देना होगा।'(13)

ऐसा लगता है इन्हें आंदोलनों के इतिहास की मूलभूत जानकारी भी नहीं है। इन से पूछा जाए, आजादी के आंदोलन के मूल में क्या था? अगर ये इतनी सी बात समझ लेंगे, तो इन्हें बाकी भी समझ आ जाएगा। अभी ये इतना ही है जान लें, आजीवक आंदोलन दलितों की गुलामी के विरुद्ध लड़ रहा है।

5. 'सभी दलितों को बहुत प्यार से एकमत किया जाना आवश्यक है। इस आवश्यकता के लिए आपस में लड़ने की नहीं बल्कि प्यार की बेहद जरूरत है।'(14)

6. 'आजीवक साथियों! आप दलितों को जोड़ने और मार्ग दर्शक का कार्य करिए, नहीं तो आप उनके नफ़रत का हिस्सा बन जाएंगे और आप का वांक्षित दर्शन बेकार सिद्ध हो जाएगा।'(15)

7.'यदि पूँजीवाद समाप्त कर लिया गया, तो जारकर्म भी समाप्त हो जाएगा क्योंकि संपत्ति और संसाधनों का व्यक्तिगत मालिकाना ही लोगों को अहमी और दुष्कर्मी बनाता है।'(16)

8.'सभी धर्म आपस में लड़ते हैं वैसे एक धर्म और लड़ने के लिए तैयार हो जाएगा। धर्म झगड़े की जड़ है। इन सब का निस्तारण पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति में है।'(17)

जिस तरह से ये उपदेश दे रहे हैं, ऐसे लगता है मानो ये दलितों के आसाराम बापू बनना चाहते हैं।

वैसे तो इन की नब्ज जारकर्म को ले कर दबी हुई लगती है। बताइए, जारकर्म को खत्म करने का फार्मूला भी ढूंढा है तो व्यक्तिगत संपत्ति के खात्में में! इन के मुंह से 'तलाक' शब्द नहीं निकल रहा, जो जारकर्म को ले कर हमारे महापुरुषों ने समाधान दिया है। फिर, सभी धर्म आपस में लड़ते हैं, इस लिए अपना धर्म ना खड़ा करें! कैसी समझ है इन की? दलितों पर अत्याचार ही इस लिए होते हैं क्योंकि ये धर्महीन हैं। बाबासाहेब डा. भीमराव अम्बेडकर को इन्होंने क्षणभर में गलत सिद्ध कर दिया जो वे दलितों के लिए धर्म की आवश्यकता के चलते बौद्ध धर्म की ओर गए। बेशक उन का बौद्ध धर्मांतरण गलत निर्णय था। इस से अच्छा वे अपने नाम से ही धर्म बना जाते।दलितों के लिए इस से बढ़ कर दुख क्या होगा कि आज बुद्ध के सम्मुख डॉ. अंबेडकर बौने बन कर रह गए हैं। वैसे इस के जिम्मेदार वे स्वयं हैं। वे जबरन बुद्ध की गोदी में चढ़े हैं। यह दलितों का सौभाग्य है कि डॉ. धर्मवीर अपनी परंपरा और चिंतन में आजीवक धर्म खोज लाए। इस से दलित विरोधियों का विरोध तो समझ आता है, लेकिन ये क्यों परेशान हैं? इन्हें यह भी बताया जा सकता है, आजीवक होना कोई धर्मांतरण का मामला नहीं, बल्कि हर दलित जन्मजात आजीवक होता है। दलितों के खून में आजीवक चिंतन प्रवाहित हो रहा है। इसी लिए हर दलित वर्ण विरोधी, पुनर्जन्म विरोधी और संन्यास विरोधी होता है। जारकर्म दलितों को कतई बर्दाश्त नहीं होता। अब ये अपने बारे में सोच लें।

ये चाहते हैं इन्हें दुधमुंहे बच्चे की तरह पुचकार कर समझाया जाए।

इन महोदय की उपदेश देने की प्रवृत्ति को ले कर डॉ.भूरेलाल चक्रवर्ती जी ने बिल्कुल सही लिखा है-"चलिए एक और उपदेशक और पुरोहित दलितों के मत्थे आ गया। इन का क्या पक्ष है और दलितों को उपदेश देने की इन की क्या बौद्धिक हैसियत है,स्पष्ट नहीं।...दलितों की मूल समस्या धार्मिक है, और यह धर्मान्तरण के कारण और जटिल हुई है। धर्मान्तरण के पक्षधर लोगों से लड़े बगैर दलितों को उन की मूल ऐतिहासिक परम्परा पर लाना सम्भव नहीं। दलित इतिहास में सदा से बाहर की लड़ाई लड़ते आ रहा है, उसे आंतरिक गम्भीर मामलों को सुलझाने के लिए अपने भीतर की अच्छे से सफ़ाई ज़रूरी है। मर्मान्तक पीड़ा के बावजूद फोड़े की चीड़फाड़ ज़रूरी होती है। कौम की गम्भीर समस्या का समाधान होना है और इस के लिए परिवर्तन अनिवार्य है, और परिवर्तन किसी से पूछ कर आसानी से नहीं हो जाया करते। उस के लिए भीतरी और बाहरी अवरोधों से दो-चार होना पड़ता है।...सामाजिक जिम्मेदारी समझने वाले लोग उपदेश नहीं देते बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के अनिवार्य हिस्सेदार बनते हैं।"(18)

इन का यह लिखना बेहद आपत्तिजनक है कि 'दलित समाज पिछड़ा समाज है। वह बौद्धिक रूप से अभी बहुत पीछे है।'(19) बताइए, आज दलित विमर्श से बड़े से बड़ा द्विज खेत रहा है। ' 'कबीर के आलोचक' (20)  और 'हिंदू विवाह की तानाशाही' (21) से शुरू हुई बहस में सभी दलित विरोधी पिट चुके हैं, बल्कि भयाक्रांत हैं। एक नाम हो तो बताया जाए। यह कह रहे हैं कि 'दलित बौद्धिक रूप से अभी बहुत पीछे हैं' हो सकता है यह खुद बौद्धिक रूप से पिछड़े हों? इन्हें अपना पिछड़ापन दलितों पर थोपने की जरूरत नहीं है। हां, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि द्विजों ने इन्हें आगे कर रखा हो। दलितों में ऐसों की कमी नहीं है। इन जैसों को आजीवक चिंतन 'मुनाफिक' के रूप में चिह्नित कर रहा है।

संदर्भ :

1, 3

महान आजीवक कबीर, रैदास और गोसाल, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली- 110002, प्रथम संस्करण : 2017, पृष्ठ क्रमश: 5, 343

2. अरुण आजीवक की 24 मार्च, 2021की फेसबुक पोस्ट से।

4, 6, 8, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17 और 19

आर. डी. आनंद की 25 मार्च, 2021 की फेसबुक पोस्ट से।

5. डॉ. आंबेडकर, संपूर्ण वांग्मय, Volume - 37, Page - 390

7. थेरीगाथा की स्त्रियां और डॉ.अंबेडकर, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली- 110002, प्रथम संस्करण : 2005.

9 आर.डी. आनंद की 27 मार्च, 2021की पोस्ट से।

18. आर. डी. आनंद की 25 मार्च, 2021की फेसबुक पोस्ट पर  29 मार्च, 2021 को डॉ.भूरेलाल चक्रवर्ती जी का कमेंट।

20. कबीर के आलोचक, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली- 110002, प्रथम संस्करण : 1997.

21. हिंदू विवाह की तानाशाही, डॉ. धर्मवीर,  हंस, जुलाई, 2003, अक्षर प्रकाशन प्रा. लि., 2/36, अंसारी रोड, दरियागंज, नयी दिल्ली- 110002, पृष्ठ-45-8.

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डॉ. लीना