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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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नक्सली हत्या करके पत्रकारों को डराना चाहते हैं?

बस्तर के पत्रकार, आदिवासी  झेल रहे हैं दोतरफा मार
गिरीश पंकज / तथाकथित रूप से 'बहादुर' नक्सलियों ने बस्तर में एक बार फिर 'क्रान्ति' की. उन्होंने  फिर एक पत्रकार की  चौराहे पर हत्या कर दी. बीजापुर के साईं रेड्डी नामक पत्रकार को मौत के घाट  उतार कर नक्सलियों ने यह बता दिया है कि वे किस दिशा में काम कर रहे है,  इसी साल उन्होंने नेमीचन्द जैन नामक पत्रकार की हत्या की थी, अब 6 दिसम्बर को उन्होंने पत्रकार रेड्डी को मार डाला। नक्सलियों को शक था कि रेड्डी पुलिस का मुखबिर  है. बस्तर के पत्रकारो, आदिवासियों और अन्य का दुर्भाग्य है कि वे दोतरफा मार  झेल रहे हैं. नक्सली समझते है कि फलाना पुलिस का मुखबिर है, तो  पुलिस समझती  है कि वो  नक्सलियों से मिला हुआ है,  रेड्डी के साथ यही होता रहा.  पुलिस ने उसे नक्सलियों का समर्थक समझ कर छह साल पहले तथाकथित  जनसुरक्षा अधिनियम के तहत  गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया था।  बड़ी मुश्किल से रेड्डी जेल से छूटे थे।  उसके बाद से रेड्डी ने अपना घर छोड़ कर बीजापुर को अपना कार्य क्षेत्र बना लिया था, लेकिन वे हिम्मत  के साथ रिपोर्टिंग कर रहे थे, और नक्सलियों के खिलाफ भी लिख रहे थे, आखिर कब तक? 

बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नक्सलियों ने रेड्डी की हत्या करके पत्रकारों को भी यह सन्देश देने की कोशिश की है कि हम से जो टकराएगा, वो बेमौत मारा जाएगा।  और हत्या करना तो नक्सलियों का उत्सव ही होता है. ये बर्बर लोग हत्याएं  करते हैं  और लाश पर खड़े हो कर नाचते भी हैं. मई 2013 को ही उन्होंने सामूहिक नरसंहार किया था. इसमें तीस से ज्यादा लोगों की उन्होंने जान ली थी. नक्सलियों  के दुश्मन नंबर वन माने जेन  जुझारू नेता महेंद्र कर्मा को गोलियों से झेलनी करके भी नक्सलियों को चैन नहीं आया तो वे उनकी लाश पर नाच करने लगे, जैसे पाषाणकाल में किसी शिकार के बाद मानव नाचा करता था.तो ये हाल है नक्सलियों का. छत्तीसगढ़ में विधान सभा चुनाव के दौरान अभी नक्सली शांत थे, हालाँकि उन्होंने मतदान करने पर मतदाताओं को देख लेने की धमकी दी थी, मगर उनकी धमकी का असर नहीं हुआ और वहा अच्छा-खासा मतदान हुआ.यह देख कर भी नक्सली समझ नहीं सके  कि उनका कोई असर नहीं है. 

हताश नक्सली अब फिर गुस्से में हैं और फिर उनकी हिंसक गतिविधियां तेज हो रही है,  आगजनी और हत्या उनका शौक है. आतंक फैला कर यातायात बाधित करना भी उनका स्थाई काम है, लोग समझ ही नहीं पाते कि नक्सलियो की पॉलिटिक्स है क्या? आखिर ये किस  समाज की रचना के लिए जंगल में रह कर नपुंसक लड़ाई लड़ रहे है ? जो पत्रकार सच लिख रहे है,  जन समस्याओं को सामने ला कर अपना फ़र्ज़ निभा रहे हैं , उनको जान से मार कर क्या वे  सही मायने में कोई क्रान्ति कर रहे है? यह क्रांति नहीं,  एक भ्रांति  है मगर अनेक विश्व विद्यालयों में पढने ने वाले कुछ छात्र इसी हिंसा को क्रांति समझ कर नक्सलियों के समर्थक बन बैठे है. दरअसल हिंसा में एक रोमांच है. खून करना, खून देखना कुछ लोगों को आनंदित करता है, यह एक तरह का परपीड़न-सुख ही है. इसे नक्सली अंजाम दे कर खुश होते है, अपने कु- कृत्य की जिम्मेदारी भी लेते है. समाज को वे दहशत में लपेटे रखना चाहते है ताकि उनकी वसूली , उनकी गुंडागर्दी कायम रहे, अगर वे सचमुच कोई परिवर्तन चाहते है,  तो वे किसी की हत्या नहीं करते और अभी जो विधान सभा चुनाव हुए, उसमे भाग ले कर लोकतान्त्रिक तरीके से परिवर्तन का रास्ता अपनाते।  मगर ऐसा नहीं हुआ , जंगल में छिप कर रहना, छिप कर वार करना कोई बहादुरी नहीं है एक तरह का पलायन है. लेकिन इसे ही नक्सली 'बहादुरी' बताते है. पत्रकार नेमीचंद जैन  और उसके बाद अब साई  रेड्डी की हत्या करके नक्सली अभिव्यक्ति के अधिकार की हत्या भी कर रहे है. उनके समर्थक किस मुंह से अभी व्यक्ति की बात करेंगे? सरकार द्वारा लागू जनसुरक्षा अधिनियम अलोकतांत्रिक है.  जिसका खामियाजा रेड्डी भी भुगत चुके है. वे  दो साल तक जेल में रहे. जेल से बाहर आकर फिर से मुखर हो कर पत्रकारिता करते रहे. उनका घर तक जला दिया गया. उनका दमन का सिलसिला जारी रहा. हालत यह हुयी कि उन्हें अपना मूल स्थान छोड़ कर बीजापुर आना पड़ा. कहा जा रहा है कि रेड्डी की हत्या नक्सलियों के बाल संघम ने की है जिसमे किशोर  वय के लोग शामिल रहते है. उन्होंने भरे बाज़ार रेड्डी की हत्या की।  इस टार उनको जो तरंग दी जा रही थी, उसका एक तरह से प्रेक्टिकल हो गया. नक्सलियों की हिंसक सोच पूरे समाज के लिये खतरनाक है , खतरनाक यह भी है कि कुछ बुद्धिजीवी नक्सली हिसा के पक्ष में नज़र आते है , यह एक फैशन -सा हो गया है, अगर नक्सली हिंसा की मैं निदा कर रहा हूँ तो कुछ लेखक-पत्रकार सामने आ कर निंदा करेंगे। वे नक्सलियों के हर काम को क्रांतिकारी कार्य ही समझते है. ऐसे अनेक लेखक-पत्रकार है, जो यह मान कर ही चलते है कि हिंसा जायज है जबकि  गांधीवादी तरीके से ही लड़ा जाना बेहतर आना जाता रहा है, यही हमारी परमपरा है, यही गांधी का रास्ता है. लेकिन यह बात न तो नक्सलियों को समझ में आती है, न उनके समर्थको को.  साईं  रेड्डी जैसे हिम्मती पत्रकार की हत्या करके नक्सली क्या साबित करना चाहते है? वे शायद वे पत्रकारो को डराना चाहते है, लेकिन बस्तर के अनेक पत्रकार हैं जो बिक नहीं सके हैं, वे सहस के साथ निकसलियों के खिलाफ भी लिखते हैं तो सरकार के खिलाफ भी।  रेड्डी ऐसे ही पत्रकार थे. अब वे हमारे बीच नहीं हैं।  हम उन्हें नमन करते हैं और यही उम्मीद करते है कि अन्याय और हिंसा के विरुद्ध लड़ाई जारी रहेगी। 

गिरीश पंकज
संपादक, सद्भावना दर्पण (मासिक )
२८ प्रथम तल, एकात्म परिसर, 
रजबंधा मैदान 
रायपुर. छत्तीसगढ़. 492001
मोबाइल : 09425212720

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सम्पादक

डॉ. लीना