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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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सुशासन का बजाएगा ‘बाजा‘, अखबारों का ‘राजा’?

वीरेंद्र कुमार यादव।पिछले पांच महीनों से बिहार के मीडिया बाजार में दहशत पैदा करने वाला ‘दैनिक भास्कर’ आगामी 19 जनवरी से पटना से प्रकाशित हो रहा है। इसके लिए बड़े-बड़े होर्डिंग शहर में लगाए गए हैं। पिछले पांच महीनों से अलग-अलग मीडिया स्लोगन और कम्पेन के माध्यम से चर्चा के केंद्र में बना रहा भास्कर। एक से एक आकर्षक नारे लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा था।

पटना से प्रकाशित अखबारों की कीमतों पर उठाए गए सवाल का इतना जबरदस्त असर हुआ कि हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर समेत सभी अखबारों ने अपने दामों में कटौती की। इसका सीधा लाभ ग्राहकों को मिला। इससे ज्यादा लाभ भास्कर के कम्पेन को हुआ। पाठकों को मालूम चला कि भास्कर के आने की चर्चा से अन्य अखबारों ने अपने दामों में कटौती की है। इसी के साथ भास्कर ने सदस्यता अभियान चलाया। इसके समानांतर सभी अखबारों का सदस्यता अभियान चला, लेकिन चाहे-अनचाहे लाभ भास्कर को हुआ।

भास्कर की पूरी रणनीति एक आक्रमण ‘राजा’ की तरह रही है और मनमाफिक कर्मचारियों को बहाल कर साबित कर दिया है कि अखबारी बनियों के मुकाबले में वह अभी सब पर भारी है।

मीडिया जगत में भास्कर की नियुक्तियों का दौर कम आकर्षक नहीं रहा। भास्कर ने निर्विवाद और बिहार मामलों के जानकार वरीय पत्रकार सुरेंद्र किशोर जी को सलाहकार संपादक के रूप में अखबार से जोड़ा। भास्कर में सुरेंद्र किशोर की नियुक्ति मीडिया और राजनीतिक जगत के लिए चौंकाने वाली खबर थी। इसके बाद प्रभात खबर के स्थानीय संपादक प्रमोद मुकेश  स्थानीय संपादक के रूप में भास्कर से जुड़े। स्थानीय संपादक की नियुक्ति के लिए भास्कर प्रबंधन ने कई दौर में पटना के वरीय पत्रकारों के साथ चर्चा की। इस दौड़ में कई लोग थे। लेकिन अंतिम मुहर प्रमोद मुकेश  के नाम पर लगी। फिर दिसंबर में थोक भाव से पत्रकारों की बहाली हुई। इन पूरी प्रक्रियाओं में भास्कर चर्चा में बना रहा।

गिफ्ट के साथ बुक हुए अखबार
अब भास्कर बाजार में उतरने के लिए तैयार है। इसके मुकाबले के लिए दूसरे मीडिया हाउस भी तैयारी में जुट गए हैं। भास्कार बनाम अन्य का मुकाबला रोचक भी होगा और आक्रमक भी। खबर के स्तर भी और ग्राहक (पाठक नहीं) के स्तर पर भी। पटना के बाजार में अखबार के साथ गिफ्ट नहीं दिए जा रहे हैं, बल्कि गिफ्ट (आफर व सामान) के साथ अखबार बेचे जा रहे हैं। मेंबरशिप कंपेन में गिफ्ट की भूमिका ही महत्वपूर्ण थी। लेकिन अब ‘खबरों की लड़ाई’ होगी। खबरों को बेचने की रणनीति बनायी जाएगी। खबरों की प्लानिंग पर काम करना होगा। मार्केट की लड़ाई एडोरियल डेस्क पर शुरू होगी।

भामासाह की लड़ाई लड़ेंगे राणा प्रताप
बिहार में मीडिया का सामाजिक व जातीय चरित्र बदला है। कभी अखबारों के शीर्ष पदों पर ब्राह्मणों और भूमिहारों का आधिपत्य था। लेकिन अब राजपूत निर्णायक भूमिका में आ गये हैं। हिन्दुस्तान और भास्कर के दो शीर्ष पदों पर राजपूत जाति के लोग विराजमान हैं, तो जागरण के एक शीर्ष पद को छोड़कर अन्य शीर्ष पदों पर राजपूत पत्रकार ही मौजूद हैं। प्रभात खबर को राजपूतों का अखबार ही माना जाता है। हालांकि प्रभात खबर में ब्राह्मणों का आधिपत्य बढ़ने लगा है। दूसरे शब्दों में मीडिया बाजार में भामासाह (सभी अखबारों के मालिक बनिया हैं) की लड़ाई अब राणा प्रताप (अखबारों के शीर्ष पदों पर बैठे राजपूत) लड़ेंगे।

सत्ता उन्मुखी पत्रकार
बिहार में वरीय पत्रकारों का एक मुख्य कार्य सरकार के साथ समन्वय बनाकर अखबारों के व्यावसायिक हित को पूरा करना भी रहा है। इस तरह के आरोप आमतौर चर्चा में भी रहे हैं। अखबारों में लगने वाले ‘पत्रकारों का हनुमान कूद’ में पत्रकारों के व्यासायिक चरित्र (पत्रकारिता का चरित्र नहीं) नयी दुकान के लिए कितना फायदेमंद होता है, इस पर बहुत कुछ अखबारों की दिशा-दशा निर्भर करेगी। लेकिन बनिया के लिए ‘शुद्ध लाभ’ सर्वोपरि है। वैसी स्थिति में पत्रकारों के लिए पेशेगत ईमानदारी और व्यवसायगत लाभ के बीच समन्वय बनाना बड़ी चुनौती है।

व्यवस्था के खिलाफ खबरों का प्लान
बिहार के पाठकों को उम्मीद है कि भास्कर के आने के बाद खबरों का टेस्ट भी बदलेगा। राजनीति खबरों में अब ‘नीतीश वंदना’ को लेकर तेवर भी तख्त होगा। शुरुआती दौर में ग्राहकों में अपनी पैठ बनाने के लिए भास्कर को सरकार और व्यवस्था के खिलाफ पाठकों के सामने खबरें परोसनी होगी। बिहार के ‘राजा’ का ‘बाजा’ बजाने की जोखिम उठाना होगा। यदि खबरों का टोन परंपरागत बना रहा तो नयी पहचान खड़ी करने में भास्कर के सामने कई चुनौतियां आ सकती हैं। इस सच से प्रबंधन भी वाकिफ है। इन्हीं चुनौतियों से मुकाबले के लिए संपादकीय कर्मियों को पिछले डेढ़ महीने से प्रशिक्षण दिया जा रहा है। खबर के साथ पाठकों की रुचि, बाजार की मांग और अन्य अखबारों की रणनीति को लेकर जानकारी उपलब्ध करायी जा रही है। उधर दूसरे अखबार भी भास्कर की रणनीति की टोह लेकर तैयारी कर रहे हैं। बदली परिस्थिति में स्थापित मठी अखबारों को भी सरकार के खिलाफ मुंह खोलने को विवश होना पड़ेगा। मीडिया की स्पर्धा का खामियाजा आखिरकार नीतीश कुमार सुशासन को भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए।

खबरों का महासंग्राम
मीडिया बाजार में अब पाठकों की मांग सबके लिए प्राथमिक होगी। जन सरोकार के मुद्दे का असर दिखेगा। दिखने भी लगा है। कोई मुद्दों को लेकर अभियान चला रहा है तो कोई नारों में जन जागरूकता की दुहाई दे रहा है। जनता भी चुप नहीं है। वह भी सर्वेक्षणों के दौरान अपनी रुचि प्रबंधन तक पहुंचा रहा है। ऐसी स्थिति में खबरों का महासंग्राम काफी रोचक होगा। हम और आप एक पाठक एवं ग्राहक के रूप में 19 तारीख का इंतजार कीजिए और बनियों की बनियागिरी का आंनद लीजिए।

 

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सम्पादक

डॉ. लीना