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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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हमें तय करना है, सोशल मीडिया देश की वास्तविक आवाज बने

श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’/ सोशल मीडिया बाकी परम्परागत मीडिया से एक जुदा साधन है। इसके द्वारा अपने मोबाइल और कम्प्यूटर पर एकांत में बैठा व्यक्ति पूरी दुनिया से जुडा रह सकता है। फेसबुक, वाॅट्सअप, लिंकडइन, इन्स्टाग्राम आदि आदि सोशल मीडिया के बहुत सषक्त और आसान उपलब्ध साधन है। वर्तमान में जिंदगी का अहम् हिस्सा बन चुका यह मीडिया सूचना, संचार, षिक्षा, मनोरंजन और जागरूकता का आधुनकि प्रभावकारी तरीका है। सामाजिक सम्पर्क के इन साधनों ने लगभग हर आम आदमी को अपनी बात कहने का मंच दिया है और एक तरह से कहे तो पत्रकार बना दिया है। प्रत्येक विषय पर कोई व्यक्ति क्या सोचता है और कैसे सोचता है इसकी अभिव्यक्ति का सोषल मीडिया शानदार जरिया है। जहां एक और इस माध्यम से समाज के हर तबके की आवाज को स्थान मिला है वहीं दूसरी ओर दुष्प्रचार और मानसिक पूर्वाधारणा का भी समाज में इस माध्यम से जबरदस्त स्थान बना है। हालात ये है कि बिना जाने, समझे, सोचे और आधिकारिकता का पता लगाए सोशल मीडिया यूजर काॅपी पेस्ट के माध्यम से सूचनाओं को आगे से आगे फैलाता रहता है। बेरोकटोक सोशल मीडिया जहां असम्पादित है वहीं काफी बार यह अमार्यादित व्यवहार भी करता है।

यह सच है कि समाज की आवाज इस माध्यम से हर स्तर तक जा रही है लेकिन इसका दूसरा रूप यह भी है कि इस माध्यम ने भारत जैसे सामाजिक समरसता वाले देश में कहीं न कहीं जहर घोलने का काम भी किया है। देश की अधिकांश जनता धर्म, समाज और रीति रिवाज सहित पूर्वाधारणा से जकडी है जिसमें कुछ होशियार और चालाक लोग इस माध्यम से आमजन की भावनाओं को भडकाने का काम करते हैं और अपनी राय थोपने के लिए संगठित कार्ययोजना पर भी काम करते हैं। जल्दी से जल्दी खबर देने की होड और अपने आप को सर्वश्रेष्ठ मनवाने की दौड में आमजन बिना विचार किए इस संगठित कार्ययोजना का अनजाने में हिस्सा बन जाता है। इस कारण काफी ऐसी सूचनाओं का प्रसार प्रसार हो जाता है जो सत्यता और तर्क की कसौटी पर कहीं भी खरी नहीं उतरती। ऐसे ऐसे लोग भी उन खास विषयों पर अपनी राय देते नजर आते हैं जिनके बारे में उनको ढेला भी पता नहीं। भारत जैसे स्वच्छंद देश में ये अल्हडता और फकीरी कब साम्प्रदायिक तनाव, जातीय हिंसा या वैचारिक अनर्गल संवाद का रूप ले लेगी इसकी चिंता किसी को नहीं है। यह भी सच है कि सोशल मीडिया ने समाज के संवाद को बढाया है और काफी मुष्किलों का सामना करना भी सिखाया है।

वर्तमान में सोशल मीडिया के माध्यम से व्यवस्था में भ्रष्टाचार पर नजर रखी जा रही है और उच्च व मध्यम स्तर पर आमजन के इस हथियार का खौफ भी देखने को मिलता है। सोशल मीडिया ने देश की व्यवस्था में परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है इससे नकारा नहीं जा सकता पर यह भी सिक्के का दूसरा पहलू है कि इस माध्यम से ऐतिहासिक चरित्रों व कालजयी व्यक्तियों के चरित्र हनन और अपमान का कार्य भी किया जा रहा है। समय के हिसाब से इस व्यवस्था पर कानून भी बने हैं और सरकारें ऐसे गलत उपयोग पर नजर भी रख रही है लेकिन वर्तमान में यह प्रयास ऊॅंट के मुंह में जीरे जैसा ही प्रतीत हो रहा है। यहां यह कहना उचित होगा कि कौन सा साधन किस रूप में और कैसे प्रयोग लेना है यह उस साधन का उपयोग करने वाले पर ज्यादा निर्भर करता है। इसलिए सोषल मीडिया को समाज के विकास, उत्थान, समृद्धि और सामाजिक समरसता का साधन बनाना है या साम्प्रदायिक उन्माद और वैचारिक दबाब के माध्यम से समाज विनाश का यह अब हमें तय करना है। उम्मीद है विकास का यह हथियार भारतीयता का फैलाव करेगा और देश की वास्तविक आवाज बनेगा।

श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’

पुष्करणा स्टेडियम के पास

नत्थूसर गेट के बाहर

बीकानेर {राजस्थान} 334004

मोबाईल: 9950050079

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सम्पादक

डॉ. लीना