कुमार कृष्णन/ कुछ लोग चले जाने के बाद भी अनुपस्थित नहीं होते। वे अपने शब्दों, अपने सरोकारों और अपने स्पर्श से हमारे भीतर जीवित रहते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा, जिन्हें पूरा पत्रकारिता जगत केवल 'अमरनाथ' के नाम से जानता था, ऐसे ही व्यक्तित्व थे। 17 जून 2026 को पटना में उनके निधन का समाचार मिला तो …
Blog posts : "संस्मरण"
अमरनाथ झा : पत्रकारिता से नदी-पानी के जनसरोकार तक की अविस्मरणीय यात्रा
एक बेहतरीन फोटो जर्नलिस्ट के साथ बेहतरीन इंसान भी
स्मृति शेष: सुबोध सागर (26 अप्रैल 2025 को निधन)
कुमार कृष्णन/ सुबोध सागर एक नाम प्रेस फोटोग्राफी की दुनिया का। छह दशक तक अखबारों और पत्र पत्रिका के लिए पूरे जुनून और समर्पण के साथ सभी तस्वीरें लीं, खबरों का कवरेज किया। सुबोध सागर की खींची तस्बीरें के कायल बिहार के बड़े बड़े संपादक होते थे। कार…
अलविदा फोटो जर्नलिस्ट राजीव
कुमार कृष्णन/ राजीव नाम से चर्चित राजीवकांत बिहार के चर्चित फोटो जर्नलिस्ट रहे हैं। उनके जीवन में, उनकी नैतिकता में, उनके संस्कार में पैसे महत्वपूर्ण नहीं रहे। वे जीवन को संपूर्णता के साथ जीते-देखते रहे। राजीवकांत आज इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनसे जुड़ी अनेक यादें हैं।
राजीवकांत से मेरी पहल…
पत्रकारों की असमय मृत्यु का राज़ !
वरिष्ठ पत्रकार राज बहादुर का निधन
नवेद शिकोह/ राजनीतिक रिपोर्टिंग पर राज करने वाले लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार राज बहादुर की मृत्यु के राज़ भी राज़ रह जाएंगे। ख़ुद्दारी की चादर में लिपटी ना जाने कितने ही पत्रकारों की देह एक राज़ के साथ ख़ाक हो जाती है। राजबहादुर जी की मौत के साथ भी उनकी पेशेवर मजबूरिय…
एक पत्रकार जो रिपोर्ट लिखने और लोगों की जान बचाते शहीद हो गया
सीटू तिवारी/ गणेश शंकर विद्दार्थी को याद करना इस वक्त बहुत जरूरी है.
आज जब पत्रकार के एक्टीविस्ट हो जाने या अपनी रिपोर्ट से इतर जरा सा बोल देने या कोई हस्तक्षेप कर देने पर भवें तन जाती है, तब गणेश शंकर विद्दार्थी को याद करना बहुत जरूरी है.
ये जानना और समझना भी जरूरी है कि पत्रकारिता को ऐसे एक …
भीड़ में अकेले पुष्पेंद्र
मनोज कुमार/ कोई कहे पीपी सर, कोई कहे बाबा और जाने कितनों के लिए थे पीपी. एक व्यक्ति, अनेक संबोधन और सभी संबोधनों में प्यार और विश्वास. विद्यार्थियों के लिए वे संजीवनी थे तो मीडिया के वरिष्ठ और कनिष्ठ के लिए चलता-फिरता पीआर स्कूल. पहली बार जब उनसे 25 बरस पहले पहली बार पुष्पेन्द्रपाल सिंह उर्फ पीपी सि…
जब सचमुच पत्रकारिता ही होती थी
जाना नैयर साहब का
दिनेश चौधरी/ सड़क के एक छोर पर कॉफी हाऊस था और दूसरी ओर नया-नया 'दैनिक भास्कर'। अखबार के दफ्तर में किसी ने बताया कि नैयर साहब कॉफी हाऊस में मिलेंगे। जोश और जुनून में मैंने जबरदस्ती एक अखबार में इस्तीफा दे दिया था और नई नौकरी की तलाश में था। नैयर साहब कुछ मित्रों की सोहबत में गप ल…
इतनी जल्दी क्या थी दोस्त इस दुनिया को छोड़कर जाने की
वरिष्ठ पत्रकार संजीव प्रताप सिंह का निधन, स्मृति शेष
लिमटी खरे/ सुबह साढ़े सात बजे के लगभग जब अखबार बांच रहे थे, उसी दौरान मोबाईल पर घंटी बजी, मित्र संजीव प्रताप सिंह का फोन था। छूटते ही बोले ‘भैया मेरे राखी के बंधन को . . ., उसके बाद चिर परिचित ठहाका। इसके उपरांत बचपन की ढेर सारी यादों पर लगभग आध…
एक राष्ट्रवादी पत्रकार का यूं चले जाना!
सतीश पेडणेकरः स्मृति शेष
निरंजन परिहार/ आईएसआईएस की कुत्सित कामवृत्ति, दुर्दांत दानवी दीवानगी और बर्बर बंदिशों की बखिया उधेड़ता इस्लामिक स्टेट की असलियत से अंतर्मन को उद्वेलित कर देने वाला लेखा-जोखा दुनिया के सामने रखनेवाले पत्रकार सतीश पेडणेकर संसार को सदा के लिए छोडकर निकल गए। तीन दशक तक जनसत्…
रचना, सृजन और संघर्ष से बनी थी पटैरया की शख्सियत
प्रो. संजय द्विवेदी/ वे ही थे जो खिलखिलाकर मुक्त हंसी हंस सकते थे, खुद पर भी, दूसरों पर भी। भोपाल में उनका होना एक भरोसे और आश्वासन का होना था। ठेठ बुंदेलखंडी अंदाज उनसे कभी बिसराया नहीं गया। वे अपनी हनक, आवाज की ठसक, भरपूर दोस्ताने अंदाज और प्रेम को बांटकर राजपुत्रों के शहर भोपाल में भी एक नई दुनिय…
बेमिसाल शिक्षक और जनसरोकारों के लिए जूझने वाली योद्धा थीं वे
दविंदर कौर उप्पल होने के मायने
प्रो. संजय द्विवेदी / माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग की अध्यक्ष रहीं प्रो. दविंदर कौर उप्पल का जाना एक ऐसा शून्य रच रहा है, जिसे भर पाना कठिन है। वे एक बेमिसाल अध्यापक थीं, बेहद अनुशासित और अपने विद्यार्थियों …
प्रो.कमल दीक्षितः उन्होंने हमें सिखाया जिंदगी का पाठ
प्रो. संजय द्विवेदी (महानिदेशक, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली)/ मेरे गुरू, मेरे अध्यापक प्रो. कमल दीक्षित के बिना मेरी और मेरे जैसे तमाम विद्यार्थियों और सहकर्मियों की दुनिया कितनी सूनी हो जाएगी यह सोचकर भी आंखें भर आती हैं। वे ही ऐसे थे जो एक साथ पत्रकारिता,संपादन, अध्यापन,लेखन और अध्यात्म को स…
हक के प्रेमी का यूं अचानक चले जाना
हकदार के संस्थापक व जुझारू पत्रकार पन्नालाल प्रेमी का 22 अक्तूबर को निधन
ताराराम गौतम/ देश भर में दलित पत्रकारिता में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले साप्ताहिक अखबार "हकदार" के संस्थापक, स्वामी, श्रेष्ठा और ओजस्वी वक्ता पन्नालाल प्रेमी अब हमारे बीच में नहीं रहे। दलितों, पिछड़ों के हक की आवाज को बुलंद…
यह सुधार समझौतों वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली
पं. माखनलाल चतुर्वेदी की जयंती (4 अप्रैल,1889) पर विशेष
प्रो. संजय द्विवेदी/ पं.माखनलाल चतुर्वेदी हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसा नाम हैं, जिसे छोड़कर हम पूरे नहीं हो सकते। उनकी संपूर्ण जीवनयात्रा, आत्मसमर्पण के खिलाफ लड़ने वाले की यात्रा है। रचना और संघर्ष की भावभूमि पर समृद्ध …
उनकी आंखों में था एक समृद्ध लोकजीवन का स्वप्न
नहीं रहे पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार पं. श्यामलाल चतुर्वेदी
प्रो. संजय द्विवेदी/ भरोसा नहीं होता कि पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार- साहित्यकार पं.श्यामलाल चतुर्वेदी नहीं रहे। शुक्रवार सुबह ( 7 दिसंबर,2018) उनके निधन की सूचना ने बहुत सारे चित्र और स्मृतियां सामने ला दीं। छत्तीसगढ़ी राजभ…
साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता के एक सूर्य का अस्त होना
मनोज कुमार/ मन आज व्याकुल है। ऐसा लग रहा है कि एक बुर्जुग का साया मेरे सिर से उठ गया है। मेरे जीवन में दो लोग हैं। एक दादा बैरागी और एक मेरे घर से जिनका नाम इस वक्त नहीं लेना चाहूंगा। दोनों की विशेषता यह है कि उनसे मेरा संवाद नहीं होता है लेकिन वे मेरे साथ खड़े होते हैं। उनका होना ही मेरी ताकत है। …
'पाठकों के पत्र' वाला कॉलम तब बहुत लोकप्रिय होता था
एक था अखबार ( खण्ड-दो)
दिनेश चौधरी/ जिस अखबार के दफ़्तर में चौबीसों घण्टे कर्फ्यू लगा रहता था और जहाँ घड़ी की टिक-टिक साफ सुनाई पड़ती थी, मुझे बतौर प्रशिक्षु 'पाठकों के पत्र' एडिट करने का जिम्मा दिया गया। साथ में सम्पादकीय पृष्ठ की कुछ सामग्री और कुछ साप्ताहिक परिशिष्ट। 'पाठकों के पत्र' वाला कॉलम तब…
एक था अखबार!
जरा घड़ी भर ठहरकर यह सोच लें कि जब आपकी दिमागी खुराक सेठ प्रजाति के लोग तय करें तो उस खुराक में जहरीले तत्वों की मात्रा कितनी होगी?
दिनेश चौधरी। अखबार के दफ्तर में आने के बाद अखबार को लेकर जो कुछ भी आकर्षण, मोह, खिंचाव वगैरह रहा होगा; सब एक झटके में खत्म हो गया था। मेरे मन में अखबार की जो कल्पना थ…
मुज्जफर हुसैनः हम तुम्हें यूं भुला ना पाएंगें
13 फरवरी की रात हुआ है वरिष्ठ पत्रकार – स्तंभकार श्री हुसैन का निधन
संजय द्विवेदी/ मुंबई की सुबह और शामें बस ऐसे ही गुजर रही थीं। एक अखबार की नौकरी, लोकल ट्रेन के धक्के, बड़ा पाव और ढेर सी चाय। जिंदगी में कुछ रोमांच नहीं था। इस शहर में बहुत कम लोग थे, जिन्हें अपना कह सकें। पैसे इतने कम कि मनोरंजन…
तू इस तरह से मेरी ज़िंदग़ी में शामिल है
हरीश बर्नवाल। 10 दिसंबर 2005 की घटना है। उन दिनों मैं स्टार न्यूज में कार्यरत था। मुंबई के जुहू तारा रोड स्थित रोटरी सेंटर में एक कार्यक्रम की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थीं। इस कार्यक्रम के दो हीरो थे। एक निदा फाजली, जिनकी किताब का विमोचन था और दूसरा मैं, जिसे अखिल भारतीय अमृत लाल नागर पुरस्कार का…
नवीनतम ---
- कैमरे में दर्ज एक दौर की जीवंत गाथा
- सदस्यों की समस्याओं के निवारण के लिए नियमित बैठक
- शीघ्र होगा सभी जिला इकाइयों का गठन
- डब्ल्यूजेएआई बिहार अगस्त में आयोजित करेगा राज्यस्तरीय कार्यक्रम
- झारखंड में डब्ल्यूजेएआई की नई टीम गठित
- एमसीयू में तनाव प्रबंधन पर कार्यक्रम
- अमरनाथ झा : पत्रकारिता से नदी-पानी के जनसरोकार तक की अविस्मरणीय यात्रा
- डब्ल्यूजेएआई बिहार प्रदेश की नई कार्यकारिणी का गठन
- डॉ. अंबेडकर का बौद्ध धर्मांतरण एक प्रयोग था जो फेल हो गया
- आपत्तिजनक पोस्ट करने वालों के विरुद्ध बिहार पुलिस की कार्रवाई
- एक इंजीनियर के आगे हांफती मीडियाकर्मी की भाषा
- कॉस्ट्यूम पत्रकारिता के दौर में साख की चिंता किसे है
- स्मृति कल्प का आयोजन 14 जून को
- अपने समय से संवाद का नाम है ‘संजय उवाच’
- पत्रकार या 'पत्थरकार'
- माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!
- मिशन, बाजार और साख का संकट
- हिंदी पत्रकारिता निश्चित रूप से और आगे बढ़ेगी
वर्गवार--
- feature (51)
- General (179)
- twitter (2)
- whatsapp (3)
- अपील (8)
- अभियान (10)
- अख़बारों से (5)
- आयोजन (103)
- इंडिया टुडे (3)
- खबर (1744)
- जानकारी (5)
- टिप्पणी (1)
- टीवी (3)
- नई कलम (1)
- निंदा (4)
- पत्र (2)
- पत्रकारिता : एक नज़र में (2)
- पत्रकारों की हो निम्नतम योग्यता ? (6)
- पत्रिका (45)
- पुस्तक समीक्षा (50)
- पुस्तिका (1)
- फेसबुक से (243)
- बहस (17)
- मई दिवस (2)
- मीडिया पुस्तक समीक्षा (23)
- मुद्दा (526)
- लोग (10)
- विरोधस्वरूप पुरस्कार वापसी (6)
- विविध खबरें (621)
- वेकेंसी (14)
- व्यंग्य (31)
- शिकायत (17)
- शिक्षा (11)
- श्रद्धांजलि (120)
- संगीत (1)
- संस्कृति (1)
- संस्मरण (33)
- सम्मान (17)
- साहित्य (104)
- सिनेमा (16)
- हिन्दी (5)
पुरालेख--
- July 2026 (5)
- June 2026 (11)
- May 2026 (14)
- April 2026 (7)
- March 2026 (4)
- February 2026 (9)
- January 2026 (7)
- December 2025 (8)
- November 2025 (5)
- October 2025 (5)
- September 2025 (8)
- August 2025 (12)
- July 2025 (11)
- June 2025 (7)
- May 2025 (35)
टिप्पणी--
-
सुख मंगल सिंहJuly 4, 2026
-
कैलाश दहियाJuly 3, 2026
-
Kailash DahiyaJuly 3, 2026
-
Omprakash KashyapJune 30, 2026
-
foo barMarch 2, 2025
-
रवि अहिरवारJanuary 6, 2025
-
पंकज चौधरीDecember 17, 2024
सम्पादक
डॉ. लीना
