मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

Print Friendly and PDF

मोहक भाषा और प्रभावशाली शिल्प के यशस्वी कथाकार थे राजा राधिका रमण

साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुई जयंती

पटना । विलक्षण प्रतिभा के रस-सिद्ध साहित्यकार और शैलीकार थे राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह्। वे वहुभाषा-विद थे। संस्कृत, अँग्रेजी, उर्दू और फ़ारसी का भी गहन-ज्ञान था उन्हें। यही कारण था कि उनकी भाषा और शैली पाठकों को अभिभूत करती थी। वे समन्वय के पक्षधर और धार्मिक-सहिष्णुता के पक्षधर थे। ‘राम-रहीम’ नामक उनकी बहुचर्चित कहानी इसी संवेदना और सघन भाव की अभिव्यक्ति है।

यह विचार रविवार को  यहाँ साहित्य सम्मेलन द्वारा आयोजित हिन्दी पखवारा के 10वें दिन ‘शैली-सम्राट’ की साहित्य-उपाधि से विभूषित हिन्दी के मूर्द्धन्य कथाकार राजा राधिका रमण सिंह जयंती समारोह में मुख्य-वक्ता के रूप में अपना पत्र प्रस्तुत करती हुई विदुषी प्राध्यापिका डा भूपेन्द्र कलसी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि, राजा राधिका रमण अत्यंत संवेदनशील और संयमी साहित्यकार थे। उपेक्षितों और पीड़ितों के प्रति उनके मन में अपार करुणा थी और यही करुणा कथा बनकर साहित्य में प्रकट होती रही।

 समारोह की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि, राजा साहब हिन्दी कहानियों के आरंभिक काल के सर्वाधिक स्वीकार्य कथाकार हैं। उनकी भाषा और शैली अत्यंत मोहक थी। उनकी कथाओं से गुज़रना, संवेदनाओं से अभिभूत एक नयी भाव-भूमि से गज़रने की तरह है। यों तो उन्होंने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं मे अपनी लेखनी चलायी, किंतु वे एक कथाकार हीं माने जाते हैं। उनपर महात्मा गांधी के आदर्शों और विचारों का गहरा प्रभाव था। इसीलिए उनकी कथाओं का प्राण-तत्त्व ‘पर-दुख कातरता’ है। उन्होंने पीड़ितों की व्यथा को अपनी कहानियों का विषय बनाया। उनकी कहानियों में समाज की विकास-प्रकिया और जीवन की गुत्थियों को समझा जा सकता है।

डा सुलभ ने कहा कि, राजा साहेब एक सत्र के लिए सम्मेलन के अध्यक्ष भी रहे। सम्मेलन के उस सत्र के अधिवेशन में दिया गया उनका उद्बोधन हिन्दी साहित्य की एक जाग्रत धरोहर है। वे जितनी रस-प्रवणता से लिखते थे, उतनी हीं मोहक-वाणी में व्याख्यान भी देते थे। कथा-साहित्य में उनके योगदान पर बिहार को सदैव गर्व रहेगा।

सम्मेलन के साहित्य मंत्री डा शिववंश पाण्डेय ने कहा कि राजा साहेब अपने लेखन में उर्दू-हिन्दी मिली-जुली भाषा ‘हिन्दुस्तानी’ का बहुत हीं सुंदर और आकर्षक ढंग से प्रयोग किया। उसका आज तक अनुशरण नही किया जा सका।

सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेन्द्र नाथ गुप्त, प्रो वासुकी नाथ झा तथा ओम प्रकाश पाण्डेय ‘प्रकाश ने भी अपने उद्गार व्यक्त किये। इस अवसर पर आचार्य आनंद किशोर शास्त्री, संगठन मंत्री ई चन्द्रदीप प्रसाद, शंकर शरण मधुकर, बांके बिहारी साव, प्रभात धवन, नेहाल कुमार सिंह, शंभु नाथ सिन्हा, प्रो सुशील झा तथा कृष्णनंदन सिंह समेत अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

मंच का संचालन किया योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने, अतिथियों का स्वागत सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा कल्याणी कुसुम सिंह ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन पं शिवदत्त मिश्र ने किया।

 

Go Back

Comment