मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "फेसबुक से "

ये मीडिया नहीं हैं

उर्मिलेश। जिन 'खबरिया चैनलों' को मीडिया कहकर आप मीडिया को कोसते हैं, वो मीडिया नहीं है भाई!

इसे मीडिया कहना बंद कीजिए! यह सत्ता और और कुछ 'शक्तिशाली निहित…

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सत्ता के चरण चाट टीवी चैनल

मनोज कुमार झा। लोग कहते हैं सुशांत सिंह  राजपूत को चरस गांजा शराब और तमाम तरह के नशे का व्यसन  था जो विश्व  की सभी फिल्मी दुनिया में आम है।  वे कथित  बाई पोलर डिसाडर से भी ग्रस्त थे। कई महिलाओ के साथ लिवइन में रहा जैसे अंकिता लोखंडे, कीर्ति सोनन, सारा, रिया आदि, कई महिलाओं से…

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विश्व स्वास्थ्य संगठन और मीडिया का गठजोड़ !

गिरीश मालवीय। WHO ओर मीडिया का गठजोड़ किस कदर कोरोना का ख़ौफ़ बनाए रखना चाहता है इसका एक और उदाहरण देता हूँ.........

आपको याद होगा मार्च के…

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एडवर्टोरियल पाठक को धोखा देना है

राजेश चंद्रा। ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश में अपराध चरम पर है, सरकार कोरोना और अपराधियों के सामने लाचार और अक्षम साबित हो चुकी है, तब इंडियन एक्सप्रेस ने आज यह फेक न्यूज़ छापा है और इसे एडवर्टोरियल नाम दिया है! …

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बीमारी बढ़ गयी, खबर सिकुड़ गयी

21 मार्च को 50 नए मामले थे, 25 जुलाई को 50,000 नए मामले। एक ही अखबार की रिपोर्टिंग।

बीमारी बढ़ गयी, खबर सिकुड़ गयी।

सीटू तिवारी के फेसबुक वाल से…

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कैसे कैसे रिसर्च स्कालर!

अरुण आजीवक/  एक रिसर्च स्कालर हैं प्रदीप कुमार गौतम। ये रिसर्च नहीं बल्कि भाषणबाजी करते हैं। भाषणबाज बनने का दंभ भरते हैं। यू ट्यूब पर अपलोडेड अपने एक भाषण का इन्होंने कैलाश दहिया जी के दिनांक 28 जून, 2020 की एक फेसबुक पोस्ट 'कुसुम वियोगी और कबीर कात्यायन में क्या अन्तर है?' पर टिप…

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एक संवेदनशील पत्रकार की मौत और उसकी वजह

सुनील पांडेय / वरिष्ठ पत्रकार राज रतन कमल नहीं रहे। शुक्रवार देर रात निधन हो गया। आज सुबह से ही FB पर उनके लिए संवेदना व्यक्त की जा रही है। मैं भी इस दुःख की घड़ी में उनके परिवार के साथ खड़ा हूँ। लेकिन मुझे घोर आश्चर्य हो रहा है कि पटना में मौजूद उनके साथ काम कर चुके, उन्हें निजी…

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पत्रिका अखबार का काला पानी संस्करण बंद

राजकुमार सोनी/ आज से डेढ़ साल पहले जब छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थीं तब मेरा तबादला कोयम्बटूर ( तमिलनाडु ) कर दिया गया था. यहां कुछ दिन मैंने संपादकीय प्रभारी के तौर पर काम किया, लेकिन ठीक विधानसभा चुनाव के पहले जयपुर में पदस्थ एक वरिष्ठ संपादक ने मुझसे फोन पर कहा कि मैंने चा…

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प्रिंट मीडिया में संकट और गहरा जाएगा

अम्बरीश कुमार। लॉक डाउन के कुछ ही दिन बाद एक पोस्ट लिखी कि प्रिंट मीडिया के बहुत खराब दिन आ गए हैं ।कई संस्करण बंद हो चुके हैं ।वेतन आधा रह गया है बहुत अखबारों में । स्टाफ कम किया जा चुका है ।पत्रकार संगठन अब बोलते नही सरकार की कैसे तारीफ की जाए इसमें जुटे हैं ।वेज बोर्ड नि…

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बारूद के ढेर पर न्यूज़ रीडिंग!

ये समाचार नहीं बताते सीधा मतलब समझा देते हैं

सरस्वती रमेश/ आपने कभी बारूद के ढेर पर बैठकर न्यूज रीडिंग करते हुए न्यूज़ रीडरों को देखा है!  अगर नहीं,  तो रिपब्लिक भारत चैनल देखिए। उसके न्यूज़ रीडरों के स…

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बधाई नहीं अपनी संवेदना जतायें !

साकिब खान/ हिंदी पत्रकारिता दिवस पर बधाई नहीं अपनी संवेदना जतायें। दोस्तों हिंदी की पत्रकारिता अपने सबसे मुश्किल दिनों में है। …

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यह समय बधाई का नहीं है

कुमार निशांत/ मैं सोशल मीडिया पर आज देख रहा हूं कि हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर पत्रकार एक दूसरे को बधाइयां दे रहे हैं. लेकिन, अभी यह समय बधाई हो का नहीं है. अभी पत्रकारिता बहुत ही भयावह स्थिति में गुजर रही है. जो लोग अखबार में या इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया में बने हुए हैं वह कितने दिन…

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मीडिया को बचाइए

संतोष मानव/ आप नहीं जानते, मीडिया मुगल कितनी कमाई करते हैं? किन-किन रास्तों से करते हैं? सरकारों से किस-किस तरह के लाभ लेते हैं। कभी पुचकार और कभी दबाकर। कहां-कहां फंड डाइवर्सिफाइ करते हैं। कल का खाकपति आज खरबपति हैं। साइकिल पर अखबार बेचने वाले, मिठाई बेचने वाले, केरोसिन बेचने वाले…

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आप सरकार की आवाज क्यों बनना चाहते हैं ?

खुला_पत्र_सम्पादकों_के_नाम

यह खुला पत्र सभी मीडिया घरानों - प्रिंट मीडिया, टीवी न्यूज़ चैनल और डिजिटिल वेब मीडिया में एडिटोरियल कंटेंट तय करने वाले संपादक बंधुओं के लिए है। संपादक एक ऐसी संस्था मानी जाती है, जो अखबार, टीवी या वेब मीडिया में प्रकाशित/ प्र…

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मीडिया अब बताएगी कि इनका चेन कहाँ तक है?

समझना आसान है, सरकार और भारतीय मीडिया को मुस्लिम विरोधी एजेंडा कितना रास आता है!

हेमनाथ मिश्रा। मरकज़ के अलावा और कितने चेन को सामने लाया गया? म…

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मीडिया कर्मियों से ये कैसा सलूक?

प्रवीण बागी। यह एक अजीब विडंबना है। कोरोना से लड़ने के लिए मेडिकलकर्मियों, पुलिसकर्मियों और सफाईकर्मियों को सम्मानित किया जा रहा है। पूरा देश उनके लिए ताली बजाता है। दीया जलाता है। वायुसेना के हेलीकॉप्टर पुष्पवर्षा करते हैं। प्रधानमंत्री उन्हें कोरोना वारियर्स का नाम दे रहे हैं।…

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मीडिया लिटरेसी कैंपेन चलाने की जरूरत

जागरूक समाज आगे आए

संतोष सारंग/ सामाजिक संस्थाओं, नागरिक संगठनों के लिए अनाज बांटने से अधिक आमलोगों के बीच मीडिया लिटरेसी कैंपेन चलाने की जरूरत है। वर्तमान परिस्थिति के लिए अगर सबसे अधिक जिम्मेदार है, तो वह मनुवादी मीडिया है। लोकतंत्र को मजबूत बना…

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'रेडलाइट मीडिया' के 'डॉग एंकर' और 'गिद्ध

संतोष सारंग /तुमने तब किसानों के आंदोलन को भी साजिश बोला था। छात्रों के आंदोलन को भी देश के साथ गद्दारी करार दिया था। और आज भूख व बेबसी के मारे हजारों बेकाबू प्रवासी मजदूरों की भीड़ में भी तुम्हें साजिश की बू दिखती है सता के भूखे भेड़िये। राजनीति की लाश पर बैठनेवाले गिद्धों, भुखमर…

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भारतीय मीडिया ने कोरोना को घृणित बना दिया

गिरीश मालवीय/ भारतीय मीडिया ने कोरोना को घृणित बना दिया, पूरी दुनिया के मीडिया को देखे और आप भारत के मीडिया को देखे तो आप को यह फर्क स्पष्ट दिखाई देगा।  …

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सरकार से लूट का बड़ा हिस्सा मीडिया मालिक डकार जाते हैं

रजनीश कुमार झा/ जो पत्रकार संगठन कभी पत्रकारों के लिए खड़ा नहीं हुआ, वो जैसे ही सोनिया ने मीडिया मे सरकारी विज्ञापनों मे कटौती का सुझाव दिया मीडिया मालिकों के लिए एकत्रित हो गए।…

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