मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "फेसबुक से "

शर्म मगर तुम को नहीं आती

डॉ. भूरे लाल/  अब से कुछ दिन पहले कैलाश दहिया का एक लेख "आपहुदरी और इसके अय्यार : इतिहास के हवाले" शीर्षक से कोलकाता से प्रकाशित "सदीनामा" पत्रिका के मई 2019 में छपा था। इस लेख में "आपहुदरी" यानि रमणिका गुप्ता की "जार क्रांति" से गहरी सहानुभूति रखने वाले कुछ दलित-पिछड़े विचारकों, …

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भारतीय मीडिया का मानसिक दिवालियापन

प्रेमेंद्र। किसी ने कह दिया कि यूपी के सोनभद्र में सोना मिला है बस यार लोग कैमरा कलम लेकर टूट पड़े । किसी को 3000 टन सोना मिल गया,  किसी ने लिखा ट्रेन की बोगी के साइज की सोने की चट्टाने, किसी को वहां जहरीले नाग दिखने लगे, किसी ने कहा कि खजाने की रक्षा करने के लिए  यह जहरीले सां…

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न्यूज सप्लायर

अम्बरीष कुमार/ कल जनसत्ता के एक स्ट्रिंगर का फोन आया बोला ,आपके जाने के बाद समूचे यूपी बिहार मध्य प्रदेश जैसे ज्यादातर राज्यों में कोई वेज बोर्ड वाला तो छोड़िए बिना बोर्ड वाला भी रिपोर्टर नही है ।समूचे पूर्वी भारत में एक रिपोर्टर जो थे उन्होंने इस्तीफा दे दिया दो महीने पहले । …

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अब याद बनकर रह गई

हीरालाल प्रसाद/ बीबीसी शाँर्टवेव रेडियो का प्रसारण 31जनवरी 2020 से बंद होने से राष्ट्र के बीबीसी के श्रोता काफी भावुक एवं दुखी हैं।…

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वक्त है संभल जाएं...

अम्बरीष कुमार/ मीडिया के लिए यह काला दिन है !

ये पत्रकार कवरेज करना चाहते हैं ,बात करना चाहते हैं ।संपादक भी खड़े हैं पुलिस के घेरे में पर जनता नही चाहती ।यह पहली बार दिख रहा है ,वैसे कोई आंदोलन पत्रकारों को बुलाये तो वे आते नही औ…

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'छप्पाक' की छप्प में 'तानाजी' का भगवा ध्वज

मीडिया कमाई के बहाने  ये साबित करना चाहता है कि 'भगवे ' ने ' एसिड 'को पटखनी दे दी!

राजेश कुमार/ गत सप्ताह शुक्रवार को दोनों फिल्में एक साथ रिलीज हुई। मामला तूल …

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बिहार की बेशर्म पत्रकारिता

प्रेमकुमार मणि/  बिहार में पत्रकारिता के पतन की पराकाष्ठा है कि आज हिंदी दैनिक 'हिंदुस्तान ' में मुजफ्फरपुर शेल्टर होम से सम्बंधित खबर सोलहवें पृष्ठ पर नीचे कोने में दुबकी -सी प्रकाशित है . दूसरे अख़बार मैंने नहीं देखे हैं कि बता सकूँ वहां क्या हाल है . हिंदुस्तान में मुख्य …

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आस्था में डूबी पत्रकारिता !

इन भक्तिविभोर तस्वीरों ने पीड़ित मानवता की कितनी कहानियों को छपने से रोक दिया, इसका हिसाब कौन लेगा?

दिनेश कुमार/ पटना…

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35 साल पहले ...

यह इंदिरा जी की हत्या की खबर थी, जिसे धीरे-धीरे रिलीज किया जा रहा था

नागेन्द्र प्रताप/  1984 में वह आज ही की तारीख थी जब लखनऊ से पटना जाना तय हुआ था... पाटलिपुत…

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ज्ञानी संवाददाता !

उन्हें बिना सुने लिखने का लम्बा अनुभव है

सुभाष राय/ आजकल अखबारों में बड़े ज्ञानी संवाददाता भर गये हैं। वे कहीं रिपोर्टिंग के लिए नहीं जाते। विज्ञप्ति मंगवा लेते हैं। कार्यक्रम करने वाले तमाम लोग अब उनके ज्ञान से परि…

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अख़बार में अब पेड रिव्यूज भी !

पत्रकारिता का हाल

अब अपने ही अख़बार में किसी किताब की समीक्षा के लिए फीचर डेस्क इंचार्ज पैसे माँगने लगे। अभी फेसबुक पर एक प्रसिद्ध समाचार पत्र की आईडी से फ्रेंड रिक्वेस्ट आयी तो उसे मैंने स्वीकार कर लिया और समीक्षार्थ पुस्तकें भिजवाने के लिए उनसे पोस्टल अड्रेस चाहा। …

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अखबारी नूरा कुश्ती

रजनीश कुमार झा/ अखबारों में नम्बर वन के होड़ में छीछालेदर राजस्थान से शुरू हुआ जहां बाकायदा राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर संपादकीय पन्ना में आरोप प्रत्यारोप के साथ एक दूसरे पर जम कर कीचड़ उछाला। बाद में दिल्ली में टाईम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाईम्स ने भी इस कड़ी को बरकर…

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मीडिया के लिए भ्रष्टाचार मुद्दा कब था?

वीरेंद्र यादव/पटना / मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मीडिया के ‘दोहरे’ स्टैंडर्ड से आहत हैं। एक साल 5 महीना पहले मीडिया के लिए भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा था। लेकिन एक साल पांच महीना प‍हले जब भाजपा जदयू के साथ सत्ता में आ गयी तो मीडिया ने भ्रष्टाचार का मुद्दा छोड़ दिया है। एक…

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शोषण और पतन के दो पाटों के बीच फंसी-बची पत्रकारिता

कुमार दिनेश/ हर पेशे में अनुभव की कद्र है, विशेष कर वकालत, चिकित्सा और पत्रकारिता में, लेकिन अखबार मालिक कम पैसे में ज्यादा लोगों से काम लेने की शोषणकारी मानसिकता के कारण दोहरी नीति अपनाते हैं। …

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सरकार और पत्रकार

अम्बरीश कुमार/ राजस्थान पत्रिका ने छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के खिलाफ स्टोरी लिखने पर रायपुर के ब्यूरो चीफ राजकुमार सोनी को दक्षिण भारत के कोयम्बतूर में भेज दिया था .पर वे सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ लिखते रहे .चुनाव के दौरान 'चाउर वाले बाबा ... वाला मशहूर गीत लाखों लो…

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तो सरकार प्रेस क्लब को अपने अधीन ही कर ले!

संजय वर्मा/ पटना प्रेस क्लब की सदस्यता प्राप्त करना है, वो कहेंगे ज्ञानेश्वर जी बो कहेंगे सुभाष पांडे जी, बो कहेंगे अरुण अशेष जी से मिल लीजिये। मतलब जो सदस्य बनना चाहते उन्हें फुटबॉल की तरह पासिंग थ्रो का सामना करना पड़ रहा. पत्रकार ही पत्रकार को औकात बता दे रहे है जो प्रेस क्लब पर …

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कौन तय करेगा कि मीडिया में असल अजेंडा क्या है

हिंदी का "खान मार्केट क्लब" !

नरेंद्र नाथ/ आजकल सोशल मीडिया पर कुछ एलीट-हिंदीभाषी हिंदी को गाली देकर अपने लिए हिंदी का "खान मार्केट क्लब" बनाने के अभियान में हैं। उनके लिए अब जर्नल में लंबी-लंबी लैटिन शब्दों में छपी रिपोर्ट ही असली मीड…

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तब विरोधस्वरूप एक्रेडिटेशन कार्ड भी सरकार को लौटा देते थे पत्रकार

सुरेन्द्र किशोर/ हम पत्रकार गण अपने बारे में कम ही लिखते हैं। बल्कि न के बराबर। आज थोडा़ अपनी बिरादरी के बारे में भी लिख देता हूं। इस बहाने कुछ बड़े व सम्मानित पत्रकारों की हमें याद भी आ जाएगी। इनमें से कई अब इस दुनिया में नहीं रहे।…

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बिहार की पत्रकारिता को सम्पादक नहीं चलाता, सरकार चलाती है

संजीव चंदन। दो-तीन दिन से बिहार में अखबार देख रहा हूँ। एक दिन दैनिक जागरण ने हेडिंग बनायी कि पीएम की हत्या की साजिश के आरोप में पांच गिरफ्तार। हिन्दुस्तान की आज की हेडिंग है 'कोरेगांव के आरोपित रहेंगे नजरबंद। ऐसे ही जनता का ज्ञानवर्धन किया जाता है अखबारों से। …

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पत्रकारिता की दिशाहीनता

राकेश प्रवीर। क्या हमारी पत्रकारिता वाकई दिशाहीन हो गयी है? क्या मीडिया के वजूद पर उठ रहे सवाल वाजिब है? इस तरह के अनेक ऐसे सवाल हैं जो हमें सोचने के लिए मजबूर करते हैं। एक बार फिर देश में ‘होप एंड हैप्पीनेस’ की जुगाली शुरू हो गयी है। एक ओर जहां जन सामान्य की समस्याएं विकराल …

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