मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "फेसबुक से "

दो पत्र- आलेख एक, लेखक अलग-अलग

August 2, 2017

पटना/ संजय कुमार ने अपने फेसबुक पर यह जानकारी दी है-

*मीडिया का देखिये खेल, बिहार पटना से प्रकाशित "स्वराज" और सासाराम से "मीडिया दर्शन", ने छापा एक लेख, एक ही शीर्षक और शब्द क्या अक्षर भी सेम "जवानों को राखी रूपी मिस…

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जिम्मेदार खुद पत्रकार बंधु !

July 21, 2017

निखिल आनंद/ उत्तर प्रदेश विधानसभा का यह पूरा मामला क्या है मुझे नहीं पता, लेकिन इस स्थिति के जिम्मेदार खुद पत्रकार बंधु है। …

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.... से सावधान!

June 16, 2017

दिनेश चौधरी/ कथित पत्रकारों के साथ लालू यादव की क्या झड़प हुई है, मुझे नहीं मालूम। लालू बहुत डिप्लोमेटिक हैं और प्रेस से भागते भी नहीं। भागने वाले तो 3 साल से भाग रहे हैं। लालू मुलायम की तरह ढुलमुल भी नहीं रहे और उनका स्टैंड हमेशा बहुत साफ़ रहा। पर थोड़ी बात आज की पत्रकारिता पर करनी…

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दरअसल पत्रकार अपना काम भूल गए है!

June 15, 2017

प्रेमेन्द्र मिश्रा/ एक पत्रकार एक नेता को टीवी शो से खदेड़ता है, एक नेता पत्रकार को मुक्का मारने की धमकी देता है, एक पत्रकार नेता को टुच्चा कहता है, एक मौलाना टीवी एंकर को चड्ढी पहनने की सलाह देता है, एंकर मौलाना को गरियाती है ..... यहाँ तक तो आ गए , अब सुनेंगे की पत…

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एक सिलसिले का समापन

May 27, 2017

मेरी प्रस्तुति में ‘मीडिया मंथन’ के आखिरी एपिसोड का प्रसारण

उर्मिलेश/ सन् 2010 में राज्यसभा टीवी(RSTV)के कार्यकारी संपादक के रूप में काम शुरू करते हुए हमने संसदीय चैनल के संभावित का…

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उन्मादी लेखन करने वालों की एक श्रेणी वो, जिन्हें न्यूज चैनलों ने फर्जी खबरों से अज्ञान के आनंदलोक में डुबो रखा है

May 25, 2017

उर्मिलेश/ कश्मीर या समाज के किसी भी जटिल व संवेदनशील विषय पर अतिशय राष्ट्रवादी खुमार में डूबकर उन्मादी लेखन करने वालों में मुझे दो तरह के लोग नजर आते हैं। इनमें सारे लोग गलत नहीं हैं। एक श्रेणी उनकी है, जो सचमुच उन्मादी हैं और दूसरी श्रेणी उनकी है, जिन्हें हमारे ज्यादातर न्यूज चैनलों…

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क्या नाकामी ढकने के लिए लिया जा रहा मीडिया का सहारा?

May 23, 2017

संतोष सिंह/ सच में आज भी जनता मीडिया की खबरों पर इतना भरोसा करता है, मुझे तो ऐसा नही लगता है लेकिन हमारे राजनेताओं को ऐसा जरुर महसूस हो रहा है,,, क्योंकि आजकल सब कुछ मीडिया के सहारे ही नापने कि कोशिश चल रही है. हलाकि ऐसा पहले कभी नही देखा. नीतीश भी मीडिया पर पैनी जनर रखते थे. सरकार…

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तिजोरी के झरोखे से झांकती पत्रकारिता

May 28, 2016

रमेश प्रताप सिंह। भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी सरकार के दो साल का कार्यकाल क्या पूरा हुआ, तमाम अखबारों के तेवर-कलेवर तो बदले ही पत्रकारिता के जेवर को भी उतारने में कोई कोर-कसर नहीं बाकी रखी। कल तक जो पत्रकारिता को लेकर बड़े-बड़े दावे करते थे, अपनी निष्पक्ष और …

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मीडिया का ज्यादातर हिस्सा खास पूर्वाग्रह से ग्रस्त

April 3, 2016


अरविंद शे। पहले रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या और फिर कॉलेज में ही डेल्टा मेघवाल के बलात्कार और हत्या, इन दोनों मामलों में सो कॉल्ड मेनस्ट्रीम मीडिया का जो रुख रहा है, वह बिल्कुल हैरान नहीं करता। बल्कि वह ठीक ही कर रहा है। हाल के दिनों में इस सो कॉल्ड मेनस्ट्रीम मीडिया की विश्…

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अलग अलग बिन्दुओं पर बयान, मीडिया ने बताया मतभेद !

January 9, 2016

हेमंत कुमार। 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नज़र में एक अच्छा क़दम हैं.एक लोकतांत्रिक मुल्क के पीएम का दूसरे मुल्क की लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी हुई सरकार के मुखिया से मिलने में ग़लत कुछ भी नहीं है.'…

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क्या सवर्णवादी-जातिवादी मीडिया से भी कैफ़ियत तलब की जा सकती है?

December 29, 2015

हेमन्त कुमार। संतोष झा और मुकेश पाठक! नाम के साथ चस्पा सरनेम से किसी को जानने में परेशानी नहीं होगी कि दोनों की जाति ब्राह्मण है! दोनों के नाम दरभंगा में सड़क निर्माण कार्य में लगी कंपनी चड्ढा एंड चड्ढा के दो इंजीनियरों की हत्या करने के कारण सुर्खियों में है. …

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क्या ऐसा ही होना चाहिए मीडिया का रवैया?

December 28, 2015

इर्शादुल हक। मैं बिहार के प्रति मीडिया की इसी बेशर्मी के इंतजार में था. इंतजार जरा लम्बा चला. दो महीने. आखिरकार मीडिया ने इसकी शुरूआत दरभंगा के दो इंजीनियरों की हत्या के साथ कर ही दी. कह रहे हैं 'रिटर्न्स ऑफ जंगल राज पार्ट-2'. इन दोनों इंजीनियरों को कथित रूप से संतोष झा गैंग के म…

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यह है देश के दैनिक समाचार पत्रों का असली चेहरा

December 7, 2015

के पी मौर्य।भारत सरकार के डीएवीपी द्वारा 6 दिसम्बर बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर दो दिन पूरे पृष्ठ का रंगीन विज्ञापन लगभग सभी दैनिक समाचार पत्रों को जारी किया, जिनमें से एक भी समाचार पत्र दलित व्यक्ति द्वारा संचालित नहीं हैं। लेकिन आज जब जनसत्ता समाचार पत्र को द…

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मीडिया भी अपने अपने एजेंडे के तहत चुनावी समर में?

October 24, 2015

संजय कुमार / बिहार चुनाव कवर करने आयी मीडिया की फ़ौज़ ....अलग अलग पोशाक में है। गन( लोगोयुक्त माइक) भी अलग अलग किसी को जंगलराज दिख रहा है तो किसी को रामराज। किसी को गरीबी भुखमरी अराजकता और न जाने क्या क्या। दलो की तरह मीडिया भी अपने अपने एजेंडे के तहत चुनावी समर में है। यहाँ भी स…

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मुद्राराक्षस अस्वस्थ

October 14, 2015

आज मुद्राराक्षस का जन सम्मान होना था . सारी तैयारिया पूरी हो चुकी थी. तभी पता चला कि उनकी तबीयत ख़राब हो गई है. हम भागते हुए हॉल के बहार आयें . मुद्रा जी गाड़ी में अचेत से पड़े थे. साँस लेने में उन्हें परेशानी हो रही थी . उन्हें तत्काल मेडिकल सहायता की जरूरत थी . उसी गाडी में उन्हें बलरामपुर अस्पता…

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बाहुबली' और 'बजरंगी भाईजान ' का ब्राह्मणवादी नजरिया

August 8, 2015

राजेश कुमार/ आजकल इन दोनों फिल्मो ने भारतीय दर्शको के बीच ग़दर काट रखा है। ये लोगो के जेब और दिमाग दोनों पर जमकर हाथ साफ़ कर रहे है।  मुन्नी के गोरे रंग को देखकर करिश्मा का पिता कहता है कि जरूर यह लड़की किसी ब्राह्मण की होगी और जब मुन्नी को गोश्त खाते देखता है तो कहता है कि यह ल…

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पत्रकारिता का अपराधीकरण

June 25, 2015

हेमंत कुमार। राजनीति का अपराधीकरण और अपराध का राजनीतिकरण इस देश में विमर्श का बड़ा मुद्दा रहा है. लेकिन पत्रकारिता के अपराधीकरण पर कभी कोई चर्चा नहीं होती. हां,शोर तब मचता है जब कोई पत्रकार वसूली या भयादोहन करते, अपराधियों या पुलिस के साथ मिलकर अपहरण,फिरौती या रंगदारी जैसे सं…

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शहीद पत्रकार जगेंद्र सिंह के बहाने

June 10, 2015

एम अफसर खान/ लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला मीडिया आज बेचैन है, मौन है! लोकतंत्र का पहरुवा आज खुद की पहरेदारी करने में असमर्थ नजर आ रहा है! आजादी के 60 साल से ज्यादा का अरसा बीत गया मगर असली आजादी मृग मरीचिका जैसी है। शाहजहाँपुर के स्वतंत्र (सोशल मीडिया) पत्रकार जगेंद्र सिंह…

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मेरी आत्मा रो उठी !

April 2, 2015

नवेन्दु / पहले नेता- मंत्री पत्रकारों से मिलने का समय मांगते थे। अब पत्रकार नेता मंत्री के आगे पीछे करते हैं।...

बड़ी फज़ीहत…

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क्या इंटरव्यू देने के पैसे मुझे लोकमत समाचार देगा?

March 1, 2015

स्वतंत्र मिश्रलगभग नौ-दस साल पुरानी बात है. मैं फ्रीलांसर था.लोकमत समाचार के लिए इयर-इंडर (साल की घटनाओं का लेखा जोखा ) के लिए कला-साहित्य पर टिपण्णी के लिए मैंने प्रयाग शुक्ल जी को फ़ोन किया. उन्होंने चार-पांच बार अपनी व्यस्तता बताई फिर बहुत कुछ फ़ोन पर पुछा. मतलब न-नुकु…

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