मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "साहित्य "

हिंदी के श्राद्ध पर्व पर हिंदी पत्रकारिता का पिंडदान

September 13, 2017

राम प्रकाश वरमा/ हिन्दी और हिन्दी पत्रकारिता के कर्मकांडी श्राद्धपर्व के माहौल में हिन्दी बोलने पर जुर्माने की सजा! हिन्दी का पिण्डदान करने सरकारी अय्याशों के साथ ‘कामसू़त्र’ की नई विधा तलाशने का सपना संजोए हिंदी पुत्रों के विदेश जाने का शुल्क बस पांच हजार! देश में रोमन लिप…

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पत्रकाऱ

February 2, 2017

अमलेंदु कुमार अस्थाना //

हम नहीं लौट पाते,

जैसे शाम ढले पंछी लौटते हैं घोंसलों में,

अंधेरी रात जब दौड़ती है मुंह उठाए हमारी ओर…

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पत्रकार है पत्रकार ?

October 8, 2016

मनोज कुमार/

दर्जनों डिग्री लेकर जब मैं बेरोजगार बना, सम्पादक की मेहरबानी से बिन तनख्वाह पत्रकार बना। 

जेब में कैमरा, गाड़ी में PRE…

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कौन निकालेगा जनता का अख़बार ?

August 26, 2016

मनोज कुमार झा //

विज्ञापन ख़बरों की तरह
और ख़बरें विज्ञापनों की तरह
अख़बार में देश-दुनिया का हाल
कुछ इसी तरह

नँगाझोर बाज़ारवाद …

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परसाई का मूल्यांकन क्यों नहीं?

August 22, 2016

एम् एम् चन्द्रा / ‘जब बदलाव करना सम्भव था

मैं आया नहीं: जब यह जरूरी था

कि मैं, एक मामूली सा शख़्स, मदद करूँ,

तो मैं हाशिये पर रहा।’…

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गाँव में खबरों का कुँआ हैं

August 12, 2016

अर्पण जैन "अविचल"/  ये उँची-लंबी, विशालकाय बहुमंज़िला इमारते, सरपट दौड़ती-भागती गाड़ीयाँ, सुंदरता का दुशाला औड़े चकमक सड़के, बेवजह तनाव से जकड़ी जिंदगी, चौपालों से ज़्यादा क्लबों की भर्ती, पान टपरी की बजाए मोबाइल से सनसनाती सभ्यता, धोती-कुर्ते पर शरमाती और जींस पर इठलाती जव…

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उपरवाले के घर से

May 25, 2016

(मैं, राजदेव रंजन)

ग़ुलाम कुन्दनम//

उपरवाले के घर से मैं,
राजदेव रंजन बोल रहा हूँ।
मेरे साथ चतरा के इंद्रदेव,
चंदौली के हेमंत,…

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और फिर से जिंदा हो जाओ

November 16, 2015

अतुल गर्ग //

आज कलम का कागज से ""

मै दंगा करने वाला हूँ,""

मीडिया की सच्चाई को मै ""

नंगा करने वाला हूँ ""

मीडिया जिसको लोकतंत्र का ""…

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बापू को भेंट !

October 2, 2015

इस बार चरखा नहीं, वालमार्ट

मनोज कुमार / बापू इस बार आपको जन्मदिन में हम चरखा नहीं, वालमार्ट भेंट कर रहे हैं. गरीबी तो खतम नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये गरीबों का खत्म करने का अचूक नुस्खा हम इजाद कर लिया है. खुदरा बाजार में हम विदेशी पूंजी न…

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हिंदी की फुल स्पीड...!!

September 2, 2015

तारकेश कुमार ओझा/ जब मैने होश संभाला तो देश में हिंदी – विरोध और समर्थन दोनों का मिला – जुला माहौल था। बड़ी संख्या में लोग हिंदी प्रेमी थे, जो लोगों से हिंदी अपनाने की अपील किया करते थे। वहीं दक्षिण भारत के राज्यों खास कर तामिलनाडु में इसके हिंसक विरोध की खबरें भी जब …

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भावनाओं का ज्वार, रोए जार- जार...

August 3, 2015

भावनाओं का ऐसा ज्वार उन्हीं मामलों पर हिलोरे मारता है जो मीडिया की सुर्खियों में हो

तारकेश कुमार ओझा/ मेरे मोहल्ले के एक बिगड़ैल युवक…

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व्यापक... व्यापमं....!!

July 13, 2015

तारकेश कुमार ओझा /  व्यापमं....। पहली बार जब यह शब्द सुना तो न मुझे इसका मतलब समझ में  आया और न मैने इसकी कोई  जरूरत ही समझी। लेकिन मुझे यह अंदाजा बखूबी लग गया कि इसका ताल्लुक जरूर किसी व्यापक दायरे वाली चीज से होगा। मौत पर मौतें होती रही, लेकिन तब भी मैं उदासीन बना …

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इन "ललितों" का तो ऐसा ही है !!

June 22, 2015

तारकेश कुमार ओझा / उन दिनों किसी अखबार में पत्रकार होना आइएएस – आइपीएस होने से किसी मायने में कम महत्वपूर्ण नहीं था। तब किसी भी पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी के कार्यालय के सामने मुलाकातियों में शामिल करोड़पति से लेकर अरबपति तक को भले ही अपनी बारी के लिए लंबी प्रतीक्षा कर…

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सोशल साइट्स : चर्चित रहने का एक अच्छा जरिया

May 20, 2015

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ समीक्षक का काम टिप्पणी करना होता है। उसकी समझ से वह जो भी कर रहा है, ठीक ही है। मैं यह कतई नहीं मान सकता, क्योंकि टिप्पणियाँ कई तरह की होती हैं। कुछेक लोग उसे पसन्द करते हैं, बहुतेरे नकार देते हैं। पसन्द और नापसन्द करना यह सम…

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प्याऊ का उद्घाटन उत्सव

April 13, 2015

मनोज कुमार/ अखबार रोज एक न एक रोचक खबर अपने साथ लाती है. यह खबर जितनी रोचक होती है, उससे कहीं ज्यादा सोचने पर विवश करती है और लगता है कि हम कहां जा रहे हैं? आज एक ऐसी ही खबर पर नजर पड़ी. खबर में लिखा था कि राज्य के एक बड़े मंत्री प्याऊ का उद्घाटन करेंगे. खबर पढक़र चेहरे पर बरबस मुस्…

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चर्चित रहने के लिए गालियाँ पाना जरूरी!

April 8, 2015

जो लोग मनुवादी व्यवस्था के विरोध में हैं उन्हें भी चाहिए कि वे वंचित समाज के लोगों को स्वार्थी/सत्तालोलुपों के चंगुल में जाने से बचाएँ, तभी सही मायने में उनके लेखन की सार्थकता सकारात्मक कही जाएगी…

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बोली पर ब्रेक...!!

April 6, 2015

यदि सचमुच नेताओं की जुबान पर स्पीड ब्रेकर या ब्रेक लग गया तो कैसे चलेगा चैनलों का चकल्लस

तारकेश कुमार ओझा/ चैनलों पर चल रही खबर…

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न आलू न गोभी, हम सब हैं यार ‘धोबी’

April 5, 2015

क्या वर्ल्ड वाइड वेब पोर्टल दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई से ही ऑपरेट करने पर लेखक/रिपोर्टर्स विश्वस्तरीय हो सकते हैं ?…

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बुढ़ौती में तीरथ...

March 31, 2015

काश पुरस्कार तब मिलता जब वे इसकी महत्ता को महसूस कर पाने में सक्षम होते

तारकेश कुमार ओझा/ कहते हैं कि अंग्रेजों ने जब रेलवे लाइनें बिछा कर उस पर ट्रेनें …

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मौत पर भारी मैच ...

March 23, 2015

खबरों की दुनिया के लिहाज से हादसों में मौत और सैनिकों पर आतंकवादी हमला सबसे ज्यादा नेगलेक्टेड और ओवरलुक की जाने वाली खबरे हैं…

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