मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

Print Friendly and PDF

Blog posts : "साहित्य "

क्या है हमारी खबरों में

रश्मि रंजन//

 

सोचती हूँ.......

क्या है हमारे विचारों में

क्या है हमारे शब्दों में

क्या है हमारी खबरों में

धर्म/ जाति/ पैसा....…

Read more

कोविड से किताबों को खतरा

प्रमोद रंजन / कोविड : 19 ने  किताबों के बाजार को गहरा धक्का पहुंचाया है। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि  वैश्विक स्तर पर 2019 में किताबों का बाजार $ 92.8 बिलियन डालर का था | 2020 में इसके घटकर $ 75.9 बिलियन  डालर रह जाने की उम्मीद है।…

Read more

सच जानने के हमारे अधिकार को किस एक्ट के तहत बाधित किया गया है?

.... ये वही मीडिया संस्थान थे, जिन्होंने डब्लूएचओ द्वारा दी गई मानवाधिकारों का ख्याल रखने की सलाह को प्रकाशित करने से परहेज किया था...…

Read more

मक्खलि गोसाल और उन का आजीवक चिंतन

कैलाश दहिया/ दलितों में आज महान मक्खलि गोसाल को ले कर जिज्ञासा पैदा हो गई है। ये जानना चाहते हैं मक्खलि गोसाल कौन थे? क्या वे सही में दलित चिंतक थे? उन का आजीवक धर्म क्या था और उस के सिद्धांत क्या थे? कुछ दलित तो गोसाल के दलित होने पर ही सवाल उठाते हैं। उधर, गोसाल पर लिखने वाले प…

Read more

साहित्यकार कोश हो रहा तैयार

मातृभाषा ने उठाया हिंदी का सबसे बड़ा साहित्यकार कोश  बनाने का बीड़ा, भारत में रहने वाले रचनाकार अपना या अपने शहर के साहित्यकारों, कवियों, लेखकों आदि का परिचय प्रेषित कर सकते हैं…

Read more

जनता बेख़बर है

हिंदी के सभी प्रमुख दैनिक अख़बारों के मुख पृष्ठ ढके हैं ....... 

चंद्रेश्वर //

बीत रही जो तिथि वो तेईस जनवरी है

दो हज़ार बीस की …

Read more

रिश्तों का अजायबघर है हिन्दी फिल्म 'दे दे प्यार दे'

संतोष कुमार / भारतीय परंपरा से इतर ब्राह्मण की परंपरा में रिश्तों के कोई मायने नहीं होते, यह हमें कामसूत्र और वेद-पुराण के अध्ययन से ज्ञात होता है। इसी भावना से प्रेरित हो ब्राह्मण लेखक अपनी कहानी गढ़ता है। कामसूत्री परंपरा(जारमय) के कड़ी के रूप में 'दे दे प्यार दे' फिल्म तिरोहित…

Read more

आधुनिक मीडिया

अविनाश कुमार// 

वक्तव्यों की स्वातंत्र मीडिया
जब कर्तव्यों पर कुभलांती है,
आपातकाल और सेंसरशीप में
इसकी गरिमा धुंधलाती है,…

Read more

एक बार फिर नए सिरे से सुर्खियां

मी टू की होली...!!

तारकेश कुमार ओझा/ अरसे बाद अभिनेता नाना पाटेकर बनाम गुमनाम सी हो चुकी अभिनेत्री तनुश्री दत्ता प्रकरण को एक बार फिर नए सिरे से सुर्खियां बनते देख मैं हैरान था। क्योंकि भोजन के समय रोज टेलीविजन के सामने बैठने पर आज की मी टू से जुड़ी…

Read more

पत्रकार

अविनाश कुमार //

ये कौन पत्रकार है, ये कौन पत्रकार

जिसका पथ है त्याग का ,

सत्य का परमार्थ का,

पीर परमहंस सा,                                             …

Read more

"संतो, बोले तो जग मारै'

कैलाश दहिया / प्रेम कुमार मणि के प्रक्षिप्त लेखन से शुरू हुई बात इनके द्वारा धमकी के रूप में सामने आई है। खैर, आगे बात की जाए। …

Read more

क्योंकि पेशे से हम पत्रकार हैं!!

मनिष कुमार//

समय के अभाव से गुस्साते परिवार-रिश्तेदार हैं

साथ ही ना अच्छा घर ना कार है

क्योंकि पेशे से हम पत्रकार हैं!…

Read more

सोशल मिडिया वाले देश को बचा लें

गुलाम कुन्दनम//

मुज्जफरनगर फिर धधक उठा,
काशगंज मुज्जफरनगर बन रहा,
जो बीज सत्ता के खातिर बोए गये थे
आज वही रक्तबीज बन रहा।…

Read more

पत्रकारिता कैसे करूँ?

पूजा प्रांजला //

पत्रकार तो बन रही,

पत्रकारिता कैसे करूँ?

अच्छाइयां मिलती नहीं,

बुराइयाँ कितनी लिखूं ?

ये देश है जितनी बड़ी…

Read more

हिंदी के श्राद्ध पर्व पर हिंदी पत्रकारिता का पिंडदान

राम प्रकाश वरमा/ हिन्दी और हिन्दी पत्रकारिता के कर्मकांडी श्राद्धपर्व के माहौल में हिन्दी बोलने पर जुर्माने की सजा! हिन्दी का पिण्डदान करने सरकारी अय्याशों के साथ ‘कामसू़त्र’ की नई विधा तलाशने का सपना संजोए हिंदी पुत्रों के विदेश जाने का शुल्क बस पांच हजार! देश में रोमन लिप…

Read more

पत्रकाऱ

अमलेंदु कुमार अस्थाना //

हम नहीं लौट पाते,

जैसे शाम ढले पंछी लौटते हैं घोंसलों में,

अंधेरी रात जब दौड़ती है मुंह उठाए हमारी ओर…

Read more

पत्रकार है पत्रकार ?

मनोज कुमार/

दर्जनों डिग्री लेकर जब मैं बेरोजगार बना, सम्पादक की मेहरबानी से बिन तनख्वाह पत्रकार बना। 

जेब में कैमरा, गाड़ी में PRE…

Read more

कौन निकालेगा जनता का अख़बार ?

मनोज कुमार झा //

विज्ञापन ख़बरों की तरह
और ख़बरें विज्ञापनों की तरह
अख़बार में देश-दुनिया का हाल
कुछ इसी तरह

नँगाझोर बाज़ारवाद …

Read more

परसाई का मूल्यांकन क्यों नहीं?

एम् एम् चन्द्रा / ‘जब बदलाव करना सम्भव था

मैं आया नहीं: जब यह जरूरी था

कि मैं, एक मामूली सा शख़्स, मदद करूँ,

तो मैं हाशिये पर रहा।’…

Read more

गाँव में खबरों का कुँआ हैं

अर्पण जैन "अविचल"/  ये उँची-लंबी, विशालकाय बहुमंज़िला इमारते, सरपट दौड़ती-भागती गाड़ीयाँ, सुंदरता का दुशाला औड़े चकमक सड़के, बेवजह तनाव से जकड़ी जिंदगी, चौपालों से ज़्यादा क्लबों की भर्ती, पान टपरी की बजाए मोबाइल से सनसनाती सभ्यता, धोती-कुर्ते पर शरमाती और जींस पर इठलाती जव…

Read more

20 blog posts