मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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समाज से सवाल करता ‘बीमार मानस का गेह’

 संजय कुमार/ अपने तेवर को लेकर चर्चित कवि-आलोचक मुसाफिर बैठा अपनी सद्यः प्रकाशित काव्य संग्रह ‘बीमार मानस का गेह’ से चर्चे में है। रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित ‘बीमार मानस का गेह’ में 38 बेहतरीन कविताओं को चार खंडों में बांटा गया है। प्रसिद्ध हिंदी आलोचक खगेन्द्र ठाकुर ने भूमिका में मुसाफिर बैठा की कविताओं को जीवन के अनुभवों से अनुप्रेरित और मुसाफिर बैठा को संभावनाओं से भरे पूरे ताजा कवि बताया है। प्रसिद्ध कथाकार प्रेमकुमार मणि ने भी दलित कवि-आलोचक मुसाफिर बैठा की कविताओं प…

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साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता के एक सूर्य का अस्त होना

 मनोज कुमार/ मन आज व्याकुल है। ऐसा लग रहा है कि एक बुर्जुग का साया मेरे सिर से उठ गया है। मेरे जीवन में दो लोग हैं। एक दादा बैरागी और एक मेरे घर से जिनका नाम इस वक्त नहीं लेना चाहूंगा। दोनों की विशेषता यह है कि उनसे म…

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"संतो, बोले तो जग मारै'

कैलाश दहिया / प्रेम कुमार मणि के प्रक्षिप्त लेखन से शुरू हुई बात इनके द्वारा धमकी के रूप में सामने आई है। खैर, आगे बात की जाए। 

असल में हुआ क्या है, महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर की आलोचना की किताब 'कबीर के आलोचक' (1997) से शुरू हुई बहस से हिंदी साहित्य में तूफान खड़ा हो गया था। जो आज तक थमने का नाम …

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पत्रकारिता के दार्शनिक आयाम का आधार है 'आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन'

लोकेन्द्र सिंह। भारत में प्रत्येक विधा का कोई न कोई एक अधिष्ठाता है। प्रत्येक विधा का कल्याणकारी दर्शन है। पत्रकारिता या कहें संपूर्ण संचार विधा के संबंध में भी भारतीय दर्शन उपलब्ध है। देवर्षि नारद का संचार दर्शन हमारे आख्यानों में भरा पड़ा है। हाँ, यह और बात है कि वर्तमान में संचार के क्षेत्र में 'भारतीय दर्शन' की उपस्थिति दिखाई नहीं देती है। उसका एक कारण तो यह है कि लंबे समय तक संचार माध्यमों पर कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों को दबदबा रहा है। यह उजागर तथ्य है कि कम्य…

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राष्ट्रवाद से जुड़े विमर्शों को रेखांकित करती एक किताब

पुस्तक के संपादक हैं पत्रकार प्रो. संजय द्विवेदी

लोकेन्द्र सिंह/ देश में राष्ट्रवाद से जुड़ी बहस इन दिनों चरम पर है। राष्ट्रवाद की स्वीकार्यता बढ़ी है। उसके प्रति लोगों की समझ बढ़ी है। राष्ट्रवाद के प्रति बनाई गई नकारात्मक धारणा टूट रही है। भारत में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग ऐसा है, जो हर विषय को पश्चिम के चश्मे से देखते है और वहीं की कसौटियों पर कस कर उसका परीक्षण करता है। राष्ट्रवाद के स…

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क्योंकि पेशे से हम पत्रकार हैं!!

मनिष कुमार//

समय के अभाव से गुस्साते परिवार-रिश्तेदार हैं

साथ ही ना अच्छा घर ना कार है

क्योंकि पेशे से हम पत्रकार हैं!

 

नेता-मंत्री हो या पुलिस-अधिकारी

सारे करते घपले-घोटाले और भ्रष्टाचार हैं…

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भूख का इतिहास-भूगोल और रिपोर्टिंग !

तारकेश कुमार ओझा/ क्या पता जब न्यूज चैनल नहीं थे तब हमारे सेलिब्रिटीज जेल जाते थे या नहीं... लेकिन हाल - फिलहाल उनसे जुड़ी तमाम अपडेट सूचनाएं लगातार मिलती रहती है। जब भी कोई सेलेब्रिटीज जेल जाता है तो मेरी निगाह उस पहले समाचार पर टिक जाती है जिसमें बताया जाता है कि फलां अब कैदी नंबर इतना बन गया है... जेल की देहरी लांघते ही मेनू में उनके सामने फलां – फलां चीजों की थाली परोसी गई, लेकिन जनाब ने उसे खाने से इन्कार कर दिया। हालांकि इसके बाद की खबर नहीं आने से मैं समझ जाता …

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