मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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लोकसंस्कृति विशेषांक है साहित्य अमृत का नया अंक

August 4, 2017

नयी दिल्ली/ हिन्दी साहित्य की प्रख्यात पत्रिका ‘साहित्य अमृत’ के इस माह लोकसंस्कृति विशेषांक में देश में करीब 36 क्षेत्रों की लोकसंस्कृतियों को अनूठे ढंग से संग्रहीत किया गया है तथा इसके साथ एक-डेढ़ सदी पहले प्रवासियों के साथ विश्व के अनेक भागों में फैली भारतीय संस्कृति और 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश में हुए सांस्कृतिक परिवर्तन पर भी विहगम दृष्टि डाली गयी है। …

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सजग पत्रकार की दृष्टि में मोदी-युग

June 24, 2017

रमेश नैयर/ पुस्तक ‘मोदी युग’ का शीर्षक देखकर प्रथम दृष्टया लगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्तुति में धड़ाधड़ प्रकाशित हो रही पुस्तकों में एक कड़ी और जुड़ गई। अल्पजीवी पत्र-पत्रिकाओं के लेखों के साथ ही एक के बाद एक सामने आ रही पुस्तकों में मोदी सरकार की जो अखंड वंदना चल रही है, वो अब उबाऊ लगने लगी है। परंतु पुस्तक को जब ध्यान से पढ़ना शुरू किया तो मेरा भ्रम बिखरता गया कि ये पुस्तक भी मोदी वंदना में एक और पुष्प का अर्पण है। वैसे भी संजय द्विवेदी की पत्रकारिता की तासीर से परिचित होन…

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समागम’ का जून अंक नर्मदा नदी पर केन्द्रित

May 14, 2017

शोध पत्र एवं आलेख आमंत्रित

भोपाल/ शोध एवं संदर्भ की मासिक पत्रिका ‘समागम’ जून-2017 का अंक पर्यावरण की दृष्टि से नर्मदा नदी पर केन्द्रित है. मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 144 दिनों की नमामी नर्मदे सेवा यात्रा के विभिन्न आयामों एवं पर्यावरणीय संदर्भों पर शोध पत्र एवं शोध आलेख आमंत्रित हैं. नर्मदा नदी के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सुझाव भी आमंत्रित हैं. अपनी रचनाएं शोध पत्रिका ‘समागम’ के ईमेल …

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‘समागम’ का विशेष अंक चम्पारण सत्याग्रह पर

April 12, 2017

100 साल पहले एक व्यक्ति ने चम्पारण में अलख जगायी थी. ना हाथ में लाठी-बंदूक थी और न जुबान पर कड़ुवी बोली. एक अहिंसक सत्याग्रह ने अंग्रेजी शासन को झकझोर कर रख दिया. आज इसी आंदोलन को पूरी दुनिया चम्पारण सत्याग्रह के नाम से जानती है. यह हमारी पीढ़ी के लिए गौरव की बात है कि हमें अवसर मिला है कि संसार को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले आंदोलन के हम साक्षी बन रहे हैं. शोध पत्रिका ‘समागम’ चम्पारण सत्याग्रह पर यहां-वहां बिखरी पठनीय सामग्री को दस्तावेज के रूप में अप्रेल 2017 के अंक में संग्रहित किया है. शोध एवं…

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सुबह लाठी, शाम चपाती ...!!

April 11, 2017

तारकेश कुमार ओझा/ न्यूज चैनलों पर चलने वाले खबरों के ज्वार - भाटे से अक्सर ऐसी - ऐसी जानकारी ज्ञान के मोती की तरह किनारे लगते रहती हैं जिससे कम समझ वालों का नॉलेज बैंक लगातार मजबूत होता जाता है। अभी हाल में एक महत्वपूर्ण सूचना से अवगत होने का अवसर मिला कि देश के एक बड़े राजनेता का केस लड़ रहे वकील ने उन्हें मात्र चार करोड़ रुपए की फीस का बिल भेजा है। इस बिल पर हंगामा ही खड़ा हो गया। इसलिए नहीं कि बिल बहुत ज्यादा है, बल्कि इसलिए कि बिल का पेमेंट राजनेता करें या वह सरका…

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सामाजिक प्रतिबद्धताओं से सजा व्यंग्य संग्रह: शोरूम में जननायक

March 11, 2017

एम. एम. चन्द्रा/ अनूप मणि त्रिपाठी का पहला व्यंग्य संग्रह “शोरूम में जननायक” में लगभग तीन दर्जन व्यंग्य है. व्यंग्य संग्रह में भूमिका नहीं है, सुधी पाठक इससे अंदाज लगा सकते है कि नव लेखन के सामने आने वाली चुनौतियां कम नहीं होती. पुस्तक में भूमिका का न होना एक तरह अच्छा ही हुआ है. अब पाठक अपनी स्वतंत्र सोच से पुस्तक पढ़ने का साहस जुटा सकते हैं. क्योंकि देखा जाता है यदि पुस्तक में किसी बड़े लेखक की भूमिका हो तो पुस्तक पर नये सिरे से सोचना किसी वैचारिक संघर्ष से कम नहीं होता है.…

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यह मैने नहीं मेरी कलम ने लिखा ...!!

March 7, 2017

किसी ने बेसिरपैर की बातें कर दी और शुरू हो गया ट्वीट पर ट्वीट का खेल।

तारकेश कुमार ओझा/  मैं एक बेचारे ऐसे अभागे जो जानता हूं जिसे गरीबी व भूखमरी के चलते उसके बड़े भाई ने पास के शहर में रहने वाले रिश्तेदार के यहां भेज दिया। जिससे वह मेहनत - मजदूरी कर अपना पेट पाल सके। बेचारा जितने दिनों तक उसे काम ढूंढने में लगे, उतने दिन मेजबान की रोटी तोड़ना उसकी मजबूरी रह…

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