मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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ढाई हजार वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध ने पर्यावरण सुरक्षा का मर्म समझा

लेखक-पत्रकार डॉ ध्रुव कुमार की पुस्तक "बौद्ध धर्म और पर्यावरण "

संजय कुमार/ वर्तमान दौर में पर्यावरण के समक्ष संकट और  ग्लोबल वार्मिंग से पूरी दुनिया चिंतित है । अनेक देशों में बढ़ते औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और जनसंख्या विस्फोट के कारण भूमंडलीय तापमान में वृद्धि हो रही है। रही सही कसर मानव की आधुनिक जीवन शैली ने पूरी कर दी है। नतीजा सबके सामने है- कहीं जलवायु परिवर्तन का संकट है,…

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एक पत्रकार के रिपोर्ताजों का कोलाज

जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती है डॉ. दीनानाथ साहनी की पुस्तक  ‘तीसरी बस्ती’ 

संजय कुमार/ पुस्तक समीक्षा/ डॉ. दीनानाथ साहनी लम्बे समय से पत्रकारिता से जुड़े है। पत्रकारिता के साथ साथ साहित्य के विभिन्न विद्याओं पर कलम चलायी है। कविता, कहानी, उपन्यास पर खूब लिखा है। उनकी पुस्तक तीसरी बस्ती उनके पत्रकारिता जीवन को रेखांकित करती है। तीसरी बस्ती रिपोर्ताजओं का…

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यह सुधार समझौतों वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली

पं. माखनलाल चतुर्वेदी की जयंती (4 अप्रैल,1889) पर विशेष

प्रो. संजय द्विवेदी/ पं.माखनलाल चतुर्वेदी हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसा नाम हैं, जिसे छोड़कर हम पूरे नहीं हो सकते। उनकी संपूर्ण जीवनयात्रा, आत्मसमर्पण के खिलाफ लड़ने वाले की यात्रा है। रचना और संघर्ष की भावभूमि पर समृद्ध हुयी उनकी लेखनी में अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध का जज्बा न चुका, न कम हुआ। वस्तुतः वे एक साथ कई…

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दलित साहित्य आंदोलन का दस्तावेज

कैलाश दहिया / पुस्तक समीक्षा /  'समकालीन हिंदी दलित साहित्य : एक विचार-विमर्श' नाम से वरिष्ठ लेखक सूरजपाल चौहान के समय- समय पर पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों- आलेखों का संग्रह है। किताब की भूमिका में लेखक ने लिखा है, 'इनका महत्त्व मुझे तब ज्ञात हुआ जब देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से दलित लेखन पर शोध कर रहे छात्र-छात्राओं से समय-समय पर इन विषयों पर जानकारी प्राप्त करने की बात कही गयी। मैं आखिर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से खोज - खोज कर कब तक फोटो प्रतियां…

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‘आरटीआई से पत्रकारिता' की विधि सिखाती एक पुस्तक

लोकेन्द्र सिंह/ भारत में सूचना का अधिकार, अधिनियम-2005 (आरटीआई) लंबे संघर्ष के बाद जरूर लागू हुआ है, किंतु आज यह अधिकार शासन-प्रशासन व्यवस्था को पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जहाँ सूचनाओं को फाइल पर लालफीता बांध कर दबाने की प्रवृत्ति रही हो, वहाँ अब साधारण नागरिक भी सामान्य प्रक्रिया का पालन कर आसानी से सूचनाएं प्राप्त कर सकता है। सूचनाओं तक पहुँच की सुविधा से सबसे अधिक लाभ पत्रकारों को हुआ है। यद्यपि अभी भी पत्रकार सूचना के अधिकार का प्रभावी ढंग से …

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आधुनिक मीडिया

अविनाश कुमार// 

वक्तव्यों की स्वातंत्र मीडिया
जब कर्तव्यों पर कुभलांती है,
आपातकाल और सेंसरशीप में
इसकी गरिमा धुंधलाती है,
“अंधे की लाठी है“
जब इसको बतलाया जाता है,
अखिल समाज का दर्पण है
ये बोध…

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उनकी आंखों में था एक समृद्ध लोकजीवन का स्वप्न


नहीं रहे पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार पं. श्यामलाल चतुर्वेदी

प्रो. संजय द्विवेदी/ भरोसा नहीं होता कि पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार- साहित्यकार पं.श्यामलाल चतुर्वेदी नहीं रहे। शुक्रवार सुबह ( 7 दिसंबर,2018) उनके निधन की सूचना ने बहुत सारे चित्र और स्मृतियां सामने ला दीं। छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष रहे श्री चतुर्वेदी सही मायनों में छत्त…

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मीडिया साहित्य की और रचनायेँ--

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