डॉ. प्रदीप डहेरिया/ कोई भी व्याख्यान समय की रेत पर मिट जाने वाली आवाज़ हो सकते हैं, लेकिन जब वे लिपिबद्ध होकर पुस्तक का आकार लेते हैं, तो वे इतिहास के अमर दस्तावेज़ बन जाते हैं। किसी भी समाज, राष्ट्र या संगठन को सही दिशा देने में उसके नेतृत्वकर्ता के विचारों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब उन सशक्त विचारों को केवल सुना ही नहीं, बल्कि 'भाषण संग्रह' के रूप में सहेजकर एक पुस्तक का रूप दे दिया जाता है, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शिका बन जाती है। हाल ही में प्रकाशित 'संजय उवाच' नामक यह …
शब्दों का सामर्थ्य और विचारों की धरोहर है 'संजय उवाच'
कैमरे में दर्ज एक दौर की जीवंत गाथा
रोहित कांत द्वारा संपादित 'द फोटो जर्नलिस्ट: अ मेमॉयर ऑफ लेट राजीव कांत' तथा 'बिहार के छायाकार : स्व. राजीव कांत की छाया स्मृति' बिहार की दृश्य-संस्कृति और पत्रकारिता के इतिहास को संरक्षित करने का गंभीर और दीर्घकालिक प्रयास
कुमार कृष्णन/ इतिहास केवल सरकारी अभिलेखों, पुस्तकों और संस्मरणों में ही सुरक्षित नहीं रहता; वह कैमरे की आँख में भी दर्ज होता है। कई बार एक सशक्त छायाचित्र वह सच कह देता है, जिसे हजारों शब्द भी पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते। यही कारण है कि फोटो पत्रकारिता को इतिहास की सबसे व…
अमरनाथ झा : पत्रकारिता से नदी-पानी के जनसरोकार तक की अविस्मरणीय यात्रा
कुमार कृष्णन/ कुछ लोग चले जाने के बाद भी अनुपस्थित नहीं होते। वे अपने शब्दों, अपने सरोकारों और अपने स्पर्श से हमारे भीतर जीवित रहते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा, जिन्हें पूरा पत्रकारिता जगत केवल 'अमरनाथ' के नाम से जानता था, ऐसे ही व्यक्तित्व थे। 17 जून 2026 को पटना में उनके निधन का समाचार मिला तो भीतर कुछ टूट-सा गया। ऐसा लगा मानो किसी नदी का प्रवाह अचानक थम गया हो। लेकिन सच तो यह है कि नदियाँ कभी मरती नहीं, वे केवल अपना रास्ता बदलती हैं। अमरनाथ भी अपने पीछे ऐसी ही एक वैचारिक धारा छोड़ गए हैं, …
अपने समय से संवाद का नाम है ‘संजय उवाच’
डॉ. लोकेन्द्र सिंह/ मीडिया प्राध्यापक एवं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक ‘संजय उवाच’ उनके चुनिंदा और सारगर्भित भाषणों का उत्कृष्ट संग्रह है। अकादमिक जगत से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनको पाठकों के लिए संपादित कर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। ज्यादातर व्याख्यान मीडिया, भाषा और शिक्षा के मुद्दों पर केंद्रित हैं। इसलिए यह पुस्तक मीडिया के विद्यार्थियों एवं इस क्षेत्र में रुचि रखनेवालों को अवश्य ही पढ़नी चाहिए। जिस दौर में मीडिया को लेकर अनेक प्रकार की बहस…
भारतीय विचार के मजबूत स्तंभ ‘11 महानायक’
डॉ. लोकेन्द्र सिंह / भारत में महापुरुषों की एक लंबी शृंखला है। भारत के सुदीर्घ इतिहास के प्रत्येक कालखंड में हमें ऐसे नायक दिखाई देते हैं, जिन्होंने भारतीय समाज का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे में कुछ नायकों को चुनना और उनके व्यक्तित्व पर लिखना, अत्यंत कठिन कार्य है। अपने लेखन के दौरान प्रो. संजय द्विवेदी समय-समय पर भारत के नायकों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर लिखते रहे हैं। उनमें से ही 11 नायकों का चयन करके उन्होंने एक पुस्तक तैयार की है, जिसका नाम है- ‘11 महानायक’। ‘संस्मय प्रकाशन’ से प्रकाशित पुस्त…
नवलकिशोर स्मृति आलोचना सम्मान के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित
30 मार्च 2026 तक प्रविष्टियां भेजी जा सकेंगी
दिल्ली। हिन्दी साहित्य और संस्कृति की पत्रिका बनास जन ने विख्यात आलोचक प्रो नवलकिशोर की स्मृति में आलोचना सम्मान के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित की हैं। बनास जन द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि यह सम्मान प्रतिवर्ष गद्य साहित्य पर आलोचना अथवा वैचारिक आलोचना के लिए दिया जाएगा। इस सम्मान में प्रविष्टि के लिए आलोचक को लगभग 40000 (चालीस हजार शब्दों) का एतद विषयक आलेख भेजना होगा। आलेख मौलिक और अप्रकाशित अप्रसारित होना चाहिए। प्रविष्टि भेज रहे आवेदक की…
भाषा जोड़ती है, तोड़ती नहीं
11 दिसंबर भारतीय भाषा दिवस पर विशेष
डॉ. लोकेन्द्र सिंह/ जब कहीं से यह समाचार पढ़ने/ सुनने को मिलता है कि मराठी, तमिल, तेलगू या अन्य कोई भाषा नहीं बोलने के कारण व्यक्ति के साथ मारपीट कर दी गई, तो दु:ख होता है कि संकीर्ण राजनीति हमें किस दिशा में लेकर जा रही है। हम अपनी ही भाषाओं का सम्मान क्यों नहीं कर रहे हैं? जो भाषाएं आपस में जुड़ी हैं, उनके नाम पर हम एक-दूसरे से दूर क्यों हो रहे हैं? भारत की सभी भाषाओं के शब्द भंडार एक-दूसरे के शब्दों से समृद्ध हैं। हमें तो भाषायी विविधता का उत्सव मनाना चाहि…
मीडिया साहित्य की और रचनायेँ--
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सुख मंगल सिंहJuly 4, 2026
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कैलाश दहियाJuly 3, 2026
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Kailash DahiyaJuly 3, 2026
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Omprakash KashyapJune 30, 2026
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foo barMarch 2, 2025
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रवि अहिरवारJanuary 6, 2025
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पंकज चौधरीDecember 17, 2024
सम्पादक
डॉ. लीना
