मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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विलक्षण था बा और बापू का साथ

समागम पत्रिका का अक्टूबर 2019 अंक महात्मा गांधी को समर्पित

संजय कुमार / महात्मा गांधी के 150वीं जयंती वर्ष समारोह की धूम हर और सुनाई पड़ रही है. सरकारी और गैरसरकारी संगठनें बापू की 150वीं जयंती को समारोह पूर्वक मनाने में लगी हुई है. आयोजनों का दौर हर ओर गूंजमान है तो वही मीडिया भी महात्मा गांधी पर सामग्री प्रकाशित कर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है. पिछले 19 वर्षों से भोपाल स…

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संभावना और चुनौतियों के बीच मूल्यानुगत मीडिया का आग्रह

लोकेंद्र सिंह/ सक्रिय पत्रकारिता और उसके शिक्षण-प्रशिक्षण के सशक्त हस्ताक्षर प्रो. कमल दीक्षित की नयी पुस्तक ‘मूल्यानुगत मीडिया : संभावना और चुनौतियां’ ऐसे समय में आई है, जब मीडिया में मूल्यहीनता दिखाई पड़ रही है। मीडिया में मूल्यों और सिद्धांतों की बात तो सब कर रहे हैं, लेकिन उस तरह का व्यवहार मीडिया का दिखाई नहीं दे रहा है। मीडिया के जरिये कर्ता-धर्ता मालिक/पत्रकार अपने व्यावसायिक और वैचारिक हित साधने में लगे हुए हैं। उन्होंने अपने नये मूल्य गढ़ लिये हैं। मूल्यहीनता के …

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"पैसा ही पैसा" जीवन की सच्चाई के करीब

संजय कुमार /पुस्तक चर्चा/ पैसा ही पैसा माधुरी सिन्हा की सद्यः प्रकाशित पुस्तक है जिसे पटना के प्रकाशक नोवेल्टी एंड कंपनी में प्रकाशित किया है. जैसा कि पुस्तक का शीर्षक है ‘पैसा ही पैसा’ तो यह एक ऐसे गरीब बच्चे की कहानी है इसका जीवन गरीबी में व्यतीत हुआ. माधुरी सिन्हा ने अब तक कई उपन्यास लिखे हैं थाम लिया बांहे और पायल इनकी चर्चित उपन्यासों में से एक है थाम लिया बांहे एवं पायल के अलावा भोजपुरी में कई कहानियां भी इन्होंने लिखी है.…

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रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का अक्टूबर अंक गांधी साद्र्धशती पर

आलेख भेजने का आग्रह

भोपाल / महात्मा गांधी के जन्म के डेढ़ सौ वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर भोपाल से प्रकाशित रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का अक्टूबर अंक ‘गांधी साद्र्धशती’ पर केन्द्रित होगा. लगभग 100 पृष्ठों का यह विशेष अंक महात्मा के विविध आयामों पर केन्द्रित होगा. इस अंक में देश के सुपरिचित लेखकों के साथ शोधार्थियों एवं शिक्षकों का लेखकीय सहयोग मिल रहा है. इस बारे में सम्पादक मनोज कुमार ने बताया कि बीते अक्टूबर 2018 में भी रिसर्च जर्नल ‘समागम’ ने सौ पृष्ठों के…

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अच्छी तरह से जानते हैं हत्यारे

अरविंद भारती की किताब “वे लुटेरे हैं

शहंशाह आलम/  यह विदा कहने का वक़्त है।

     इसलिए हे राजन, आप चौंके अथवा चीहुँकें अथवा विस्मय में न पड़ें।

     इसलिए हे राजन, यह वक़्त कवि अरविंद भारती को विदा कहने का वक़्त नहीं है। न इनकी कविता की विदाई की घोषणा अभी की जानी है। व…

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ढाई हजार वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध ने पर्यावरण सुरक्षा का मर्म समझा

लेखक-पत्रकार डॉ ध्रुव कुमार की पुस्तक "बौद्ध धर्म और पर्यावरण "

संजय कुमार/ वर्तमान दौर में पर्यावरण के समक्ष संकट और  ग्लोबल वार्मिंग से पूरी दुनिया चिंतित है । अनेक देशों में बढ़ते औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और जनसंख्या विस्फोट के कारण भूमंडलीय तापमान में वृद्धि हो रही है। रही सही कसर मानव की आधुनिक जीवन शैली ने पूरी कर दी है। नतीजा सबके सामने है- कहीं जलवायु परिवर्तन का संकट है,…

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एक पत्रकार के रिपोर्ताजों का कोलाज

जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती है डॉ. दीनानाथ साहनी की पुस्तक  ‘तीसरी बस्ती’ 

संजय कुमार/ पुस्तक समीक्षा/ डॉ. दीनानाथ साहनी लम्बे समय से पत्रकारिता से जुड़े है। पत्रकारिता के साथ साथ साहित्य के विभिन्न विद्याओं पर कलम चलायी है। कविता, कहानी, उपन्यास पर खूब लिखा है। उनकी पुस्तक तीसरी बस्ती उनके पत्रकारिता जीवन को रेखांकित करती है। तीसरी बस्ती रिपोर्ताजओं का…

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मीडिया साहित्य की और रचनायेँ--

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