मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "मुद्दा "

पत्रकारिता का ‘पत्थरकारिता’ काल?

December 10, 2017

तनवीर जाफरी/   न स्याही के हैं दुश्मन न सफेदी के हैं दोस्त।

                       हमको  आईना दिखाना  है दिखा  देते हैं।।

पत्रकार…

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बहुजन आरक्षण की वकालत नहीं करती मीडिया

November 30, 2017

संजय कुमार/ आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है जो देश  और समाज में  हासिये पर सदियों से रहे अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जाति यानी  बुहजन को मुख्यधारा में लाने की पहल है। इस पहल को दिव्ज समाज ने आज तक स्वीकार नहीं किया है। वह इसे समाज में खटास उत्पन्न का दोषी मानता है और आरक्षण के …

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खतरनाक है टीवी एंकर्स की गैर जि़म्मेदाराना भूमिका

November 30, 2017

कई एंकर कभी-कभी ऐसी बात कर बैठते हैं जिससे उनके भीतर की मानसिकता दिखाई देने लगती है

निर्मल रानी/ इसमें कोई शक नहीं कि गंभीर समाचारों के गंभीर …

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बंटता मीडिया, घटता कद

November 18, 2017

डा.शशि तिवारी/ स्वतंत्रता सभी को प्यारी होती है कोई भी परतंत्र रहना नहीं चाहता! एक लम्बे समय तक गुलाम रहे भारत को जब आजादी मिली तब उसने अपने देश एवं नागरिकों के लिए संविधान का निर्माण किया। इसी संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रत्येक भारतीय नागरिक को वाक स्वतंत्रता प्रदान की गई। ले…

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एक ओर विरोध तो, दूसरी ओर आयोजन भी

November 17, 2017

संजय कुमार/ राजस्थान पत्रिका ने राज्य सरकार द्वारा बनाए गए ‘काले कानून’ को प्रेस की आजादी को खतरा बताते हुए राष्ट्रीय प्रेस दिवस के दिन संपादकीय खाली छोड़कर जो कदम उठाया,उस पर अन्य राज्य या देश की मीडिया स्वर में स्वर मिलती नजर नहीं आयी। शायद इन्हें इंतजार है अपने ऊपर हमले की। जबकि…

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सोशल मीडिया ताकतवर है और खतरनाक भी: नग़मा सहर

October 28, 2017

सोशल मीडिया के लिए नियम और प्रतिबंध बेहद जरूरी है। एनडीटीवी की एसोसिएट प्रोड्यूसर और वरिष्ठ पत्रकार एंकर नग़मा सहर…

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पत्रकारों को तीसमार होने का भ्रम

September 24, 2017

रिजवान चंचल / देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में आये दिन हो रही पत्रकारों की हत्याओं से जाहिर है की पत्रकार अब सुरक्षित नही है.पत्रकारों की हत्या और जान लेवा हमलों की घटनाएं कम होने के बजाय  बढ़ती जा रहीं हैं कहना न होगा सच्चाई लिखने और सच्चाई दिखाने व…

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चैनल खोये हैं हनीप्रीत में, देश परेशान है मन के मीत से

September 20, 2017

तो क्या ... मीडिया की जरुरत बदल चुकी है या फिर वह भी डि-रेल है 

पुण्य प्रसून बाजपेयी/ एक तरफ हनीप्रीत का जादू तो दूसरी तरफ मोदी सरकार की चकाचौंध। एक तरफ बिना जानकारी किस्सा…

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टीआरपी पत्रकारिता वाला साहस !

September 11, 2017

साकिब ज़िया / पटना। राम-रहीम पर लगे आरोप डेढ़ दशक पुराने हैं, लेकिन मीडिया तब जागा, जब दो बहादुर बेटियों और एक जांबाज़ पत्रकार ने जान की बाज़ी लगाकर न्याय की लड़ाई जीत ली। राम रहीम के ‘कुकर्मों का खुलासा’ कर रहा मीडिया अब तक क्यों उनकी गोद में बैठा था ? क्यों मीडिया की …

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सच को सच कह दोगे अगर तो फांसी पर चढ़ जाओगे

September 6, 2017

पत्रकार और समाजसेविका गौरी लंकेश की हत्या के बाद निर्मल रानी का लिखा आलेख

निर्मल रानी/ कट्टरपंथ के विरोध तथा धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में निरंतर उठने वाली एक औ…

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हिन्दी चैनलों पर सुबह की प्राइट टाइम ज्योतिष के इन्हीं एंकरों से गुलज़ार होती है

August 29, 2017

न्यूज़ चैनलों के बाबाओं का अध्ययन कीजिए। गुरमीत सिंह सिरसा में ही राम रहीम नहीं बनते हैं, वो कहीं भी बन जाते हैं

रवीश क…

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पत्रकारिता का संकट पत्रकारों को खा रहा है

July 20, 2017

रवीश कुमार/ उस दोपहर बहस इस बात को लेकर हो गई कि अगर किसी नीतिगत या अन्य कारणों से पांच लाख छात्रों की ज़िंदगी प्रभावित है तो यह संख्या इतनी भी कम नहीं है कि सरकार का ध्यान न खींच सके। छात्र कहते रहे कि पांच लाख छात्र हैं, मैं अड़ा रहा कि तो फिर वे कहां हैं। पांच लाख छात्र जब अपनी …

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जो ‘उनको’ है पसंद वही बात करेंगे?

June 25, 2017

आज मीडिया पूरी तरह विकलांग दिखाई दे रहा है

तनवीर जाफरी / आपातकाल के 1975-77 के दिनों को जहां कांग्रेस विरोधी दल लोकतंत्र की हत्या के दौर के रूप में याद करते हैं वहीं उन दिनों को मीडिया अथवा प्रेस का गला घोंटने…

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चैनलों ने जनता का गला घोंट दिया है

June 22, 2017

ख़बरें न कर पाने की व्यथा और अच्छी ख़बरों को साझा करने की खुशी

रवीश कुमार/ टीवी में तो ग्राउंड रिपोर्टिंग खत्म ही हो गई है। इक्का दुक्का संवाददाताओं को ही जाने का मौका मिलता है और द…

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जनवादी पत्रकारिता की बात करें

June 10, 2017

फ़िरदौस ख़ान/ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले…

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खबरों के खजाने का सूखाग्रस्त क्षेत्र ...!!

May 27, 2017

क्या देश व समाज के कुछ हिस्से खबरों के खजाने से सदा दूर ही रहेंगे?

तारकेश कुमार ओझा/ ब्रेकिंग न्यूज... बड़ी खबर...। चैनलों पर इस तरह की झिलमिलाहट होते ही पता नहीं क्यो…

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ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म

May 26, 2017

हिंदी पत्रकारिता दिवस (30 मई) पर विशेष  

मनोज कुमार/ ‘ठोंक दो’ पत्रकारिता का ध्येय वाक्य रहा है और आज मीडिया के दौर में ‘काम लगा दो’ ध्येय वाक्य बन चुका है। ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म का यह बदला हुआ स्वरूप…

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आप देख रहे हैं दर्शकों की हत्या का सीधा प्रसारण

May 15, 2017

आज न्यूज़ रूप में रिपोर्टरों का ढांचा ढह गया है

रवीश कुमार/ दो दिन से सोचता रहा कि चीन ने जो सम्मेलन बुलाया है, वो क्या है, क्यों भारत का जाना या न जाना ठीक है, उस पर पढ़ाई करूंगा। लेकिन जाने कहां वक्त ध…

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आतंकवादः जरूरी है खबरों की गेटकीपिंग

May 9, 2017

संजय द्विवेदी/ वैश्विक आतंकवाद से जूझ रही दुनिया के सामने जिस तरह की लाचारगी आज दिख रही है वैसी कभी देखी नहीं गयी। जाति, धर्म के नाम होते आए उपद्रवों और मारकाट को इससे जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है क्योंकि आतंकवादी ताकतें मानवता के सामने इतने संगठित रूप में कभी नहीं देखी गयीं।…

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भारत का वरिष्ठ पत्रकार- चालाकियों से कब बाज आएगा

April 26, 2017

संजीव खुदशाह/ करीब पांच साल पहले रायपुर में छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी हॉस्पिटल जिसका नाम भारत रत्न डॉ भीम राव अंबेडकर हॉस्पिटल है मे अंडकोष के इलाज के लिए एक मशीन खराब हो गई थी उसे रिपेयर कर लिया गया तो छत्तीसगढ़ के एक प्रसिद्ध अखबार में इस समाचार के लिए शीर्षक लिखा अंबेडकर…

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