मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "मुद्दा "

बिहार डायरी 2019 में हटाये गए लगभग सभी न्यूज पोर्टल के प्रतिनिधियों के नाम

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग बिहार सरकार न्यू मीडिया के पत्रकारों को पत्रकार नहीं मानता

डॉ. लीना /पटना। बिहार सरकार का सूचना एवं जनसंपर्क व…

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क्या आपका हिन्दी अख़बार या चैनल मामले की ख़ुद से पड़ताल कर रहा है?

आलोक वर्मा के घर किसी सिफ़ारिश करने गए थे केंद्रीय सतर्कता आयुक्त चौधरी ?

रवीश कुमार/ हिन्दी अख़बारों के संपादकों ने अपने पाठकों की हत्या का प्लान बना लिया है। अ…

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इलेक्ट्रानिक मीडिया ने निर्वाचन में बढ़ाया कोलाहल

मूल सवालों को किया नजरअंदाज

संजय कुमार / इलेक्ट्रानिक मीडिया आज एक मस्त हाथी की तरह हो चुका है। वह अपनी ताकत के आगे किसी को कुछ नहीं समझता है। नेता, अफसर, शासन-प्रशासन, खास एवं आम जनता सब इसके प्रभाव में आ चुके हैं। समाज और लोकत…

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युवा पत्रकारों से निवेदन

 लिखना तो पड़ेगा। ये रोज़ का अभ्यास है।

रवीश कुमार / चुनाव आते ही कुछ युवा पत्रकार व्हाट्स एप करने लगते हैं कि मुझे चुनाव यात्रा पर ले चलिए। आपसे सीखना है। लड़का और लड़की दोनों। दोनों को मेरा जवाब ना है। यह संभव नही…

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ठीकरा मीडिया के ऊपर फोड़ दीजिए!

गिरीराज सिंह ने  एंकर  को कहा, आप लोगों ने पार्टी के एजेंडे को लोगों तक पहुंचाने में काफी खराब भूमिका निभाई है

साकिब जिया /…

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क्या राजनीतिक सत्ता ने वर्चस्व के लिये मीडिया को ही खत्म करना शुरू कर दिया है?

जरा सोचिये जब मेनस्ट्रीम मीडिया को कोई देखने-सुनने पढ़ने वाला नहीं होगा !

पुण्य प्रसून बाजपेयी / क्या पत्रकारिता की धार भोथरी हो चली है । क्या मीड…

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ख़बरें मैनेज होती हैं, मरती नहीं हैं

अमित शाह का पीछा करती फ़र्ज़ी एनकाउंटर की ख़बरें और ख़बरों से भागता मीडिया

रवीश कुमार/ नहीं छपने से ख़बर मर नहीं जाती है। छप जाने से अमर भी नहीं हो जाती है। …

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वीआईपी कवरेज के दौरान पत्रकारों के मोबाइल प्रयोग पर रोक?

(राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर विशेष)

संजय कुमार/ राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर पत्रकार मित्रों को बधाई! लेकिन कहीं सम्मान तो कहीं बेरूखी का समाना करना पड़ता है। खासकर वीआईपी एवं वीवीआईपी कवरेज में। …

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यौन अपराध पर चुप रहने की सलाह देने वालों के मुंह पर करारा तमाचा है #MeToo

 कैलाश दहिया /आजकल #MeToo कैंपेन की चर्चा मीडिया में जोरों शोरों पर है। यह कैंपेन हॉलीवुड से शुरू होकर भारत में भी फैल रहा है।…

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बिकाऊ टी वी चैनल्स की भडक़ाऊ बहस

तनवीर जाफरी/ पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी के मध्य बर्लिन में 1961 में बनाई गई विशाल दीवार को मात्र तीस वर्षों के भीतर जून 1990 में दोनों देशों की जनता ने मिलकर ढहा दिया। ज़ाहिर है जर्मनी के दोनों हिस्सों में रहने वाले लोग यह समझ चुके थे कि एक बड़े राजनैतिक षड्यंत्र के तहत जर्मनी को दो…

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2019 के चुनावी साल में मीडिया की लाश आपके घर आने वाली है

आपकी क्या तैयारी है?

रवीश कुमार / 2019 के चुनाव में अब 9 महीने रह गए हैं। अभी से लेकर आख़िरी मतदान तक मीडिया के श्राद्ध का भोज चलेगा। पांच साल में आपकी आंखों के सामने इस मीडिया को लाश में बदल दिया गया। मीडिया की लाश पर सत्ता के गिद्ध मंडराने लगे …

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मीडिया का पतन लोकतंत्र पर आघात

तनवीर जाफऱी/ विश्व के 165 स्वतंत्र देशों में हुए शोध के अनुसार पांच विभिन्न मापदंडों के आधार पर तैयार की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतवर्ष वैश्विक लोकतंत्र सूचकांक में दस पायदान नीचे चला गया है। 2017 में यह 42वें स्थान पर था। ब्राऊन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेएफ हालगोन द्वारा कि…

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लेखन को स्थायित्व और वैधता देती निजी वेबसाइट

डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'/ इंटरनेट की इस दुनिया ने पाठकों की पहुँच और पठन की आदत दोनों ही बदल दी है, इसी के चलते प्रकाशन और लेखकों का नज़रिया भी बदलने लगा है। भारत में लगभग हर अच्छे-बुरे का आंकलन उसके सोशल मीडिया / इंटरनेट पर उपस्थिति के रिपोर्टकार्ड के चश्में से देखकर तय कि…

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अब मीडिया सरकार के कामकाज पर नजर नहीं रखती, बल्कि सरकार मीडिया पर नजर रखती है

मॉनिटरिंग की कोई बात मॉनिटरिंग करने वाला बाहर न भेज दें, इस पर नज़र रखी जा रही है

पुण्य प्रसून वाजपेयी/ दिल्ली में सीबीआई हेडक्वार्टर क…

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भयानक है यह चुप्पी !

मीडिया की नाक में नकेल डाले जाने का सिलसिला पिछले कुछ सालों से नियोजित रूप से चलता आ रहा है

क़मर वाहिद नक़वी। एबीपीन्यूज़ में पि…

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​“हिंदी अखबारों का ये कैसा दौर”

आइए देखें हिन्दी के कुछ अखबारों ने कल के अविश्वास प्रस्ताव को कैसा ट्रीटमेंट दिया है...

संजय कुमार सिंह/ मैं कोलकाता के अंग्रेजी दैनि…

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खबरों का मुंह विज्ञापन से ढका है ....

रामजी तिवारी/ समाचार पत्रों को सुबह हाथ में लेते समय हमारे मन में क्या चल रहा होता है ....? रात को टी वी समाचार चैनलों के सामने बैठकर हमारे जेहन में किस बात की उत्सुकता बनी रहती है ...? सोशल मीडिया को स्क्रॉल करते समय देश दुनिया को लेकर हम क्या सोच रहे होते हैं ....? …

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सस्ता डाटा, सोशल मीडिया और हमारा संकट

संजीव परसाई/ आग फैलेगी तो आएंगे कई घर जद में, यहाँ सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है...आग लगाने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि वे या उनका कोई इस समाज में शामिल है। आप समाज को जाहिल और जहरीला बनाएंगे तो सुरक्षित भविष्य की कल्पना कैसे की जा सकती है। आज मंदसौर में  हुए भयानकतम अत्याचार को लगभग 1…

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‘उदन्त मार्तण्ड’ की परम्परा निभाता हिन्दी पत्रकारिता

30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष 

मनोज कुमार/ कथाकार अशोक गुजराती की लिखी चार पंक्तियां सहज ही स्मरण हो आती हैं कि …

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क्या दुनियाभर में टीवी की बहस में भी संभव है- फिक्सिंग?

प्रदीप द्विवेदी/ टीवी पर खबरों को लेकर प्रसिद्ध पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के हवाले से जो कुछ कहा गया है, यदि वह अर्धसत्य है तो भी एक बड़ा सवाल फिर गहरा रहा है कि... क्या दुनियाभर में टीवी की बहस में भी संभव है- फिक्सिंग?…

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