मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "मुद्दा "

लेखन को स्थायित्व और वैधता देती निजी वेबसाइट

डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'/ इंटरनेट की इस दुनिया ने पाठकों की पहुँच और पठन की आदत दोनों ही बदल दी है, इसी के चलते प्रकाशन और लेखकों का नज़रिया भी बदलने लगा है। भारत में लगभग हर अच्छे-बुरे का आंकलन उसके सोशल मीडिया / इंटरनेट पर उपस्थिति के रिपोर्टकार्ड के चश्में से देखकर तय कि…

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अब मीडिया सरकार के कामकाज पर नजर नहीं रखती, बल्कि सरकार मीडिया पर नजर रखती है

मॉनिटरिंग की कोई बात मॉनिटरिंग करने वाला बाहर न भेज दें, इस पर नज़र रखी जा रही है

पुण्य प्रसून वाजपेयी/ दिल्ली में सीबीआई हेडक्वार्टर क…

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भयानक है यह चुप्पी !

मीडिया की नाक में नकेल डाले जाने का सिलसिला पिछले कुछ सालों से नियोजित रूप से चलता आ रहा है

क़मर वाहिद नक़वी। एबीपीन्यूज़ में पि…

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​“हिंदी अखबारों का ये कैसा दौर”

आइए देखें हिन्दी के कुछ अखबारों ने कल के अविश्वास प्रस्ताव को कैसा ट्रीटमेंट दिया है...

संजय कुमार सिंह/ मैं कोलकाता के अंग्रेजी दैनि…

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खबरों का मुंह विज्ञापन से ढका है ....

रामजी तिवारी/ समाचार पत्रों को सुबह हाथ में लेते समय हमारे मन में क्या चल रहा होता है ....? रात को टी वी समाचार चैनलों के सामने बैठकर हमारे जेहन में किस बात की उत्सुकता बनी रहती है ...? सोशल मीडिया को स्क्रॉल करते समय देश दुनिया को लेकर हम क्या सोच रहे होते हैं ....? …

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सस्ता डाटा, सोशल मीडिया और हमारा संकट

संजीव परसाई/ आग फैलेगी तो आएंगे कई घर जद में, यहाँ सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है...आग लगाने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि वे या उनका कोई इस समाज में शामिल है। आप समाज को जाहिल और जहरीला बनाएंगे तो सुरक्षित भविष्य की कल्पना कैसे की जा सकती है। आज मंदसौर में  हुए भयानकतम अत्याचार को लगभग 1…

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‘उदन्त मार्तण्ड’ की परम्परा निभाता हिन्दी पत्रकारिता

30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष 

मनोज कुमार/ कथाकार अशोक गुजराती की लिखी चार पंक्तियां सहज ही स्मरण हो आती हैं कि …

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क्या दुनियाभर में टीवी की बहस में भी संभव है- फिक्सिंग?

प्रदीप द्विवेदी/ टीवी पर खबरों को लेकर प्रसिद्ध पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के हवाले से जो कुछ कहा गया है, यदि वह अर्धसत्य है तो भी एक बड़ा सवाल फिर गहरा रहा है कि... क्या दुनियाभर में टीवी की बहस में भी संभव है- फिक्सिंग?…

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क्या सोशल मीडिया पर नियंत्रण की है जरूरत ?

हालिया दो भारत बंद से उपजे कई सवाल

नई दिल्ली/कुमोद कुमार/ दलित आंदोलन फिर उसके बाद आरक्षण विरोधी आंदोलन में ये रोज-रोज के भारत बंद आंदोलन कहां से पैदा हो रहे हैं? इसमें शामिल होने वाले लोग कहां से आ रहे हैं…

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क्या सिर्फ अभिव्यक्ति की आज़ादी का मामला या पत्रकारिता की आड़ में राजनीति

नवीन पटनायक सरकार का ओ टीवी चैनल का बहिष्कार…ग़लत या सही..

रवीश कुमार/ ओ टी वी ओडिशा का पहला प्राइवेट टीवी चैनल है। इसकी किसी स्टोरी से नाराज़ बीजेडी सरकार ने सार्वजनिक रूप से कहा कि इस ट…

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मुख्यधारा की मीडिया ने क्या दिखाया?

किसान आंदोलन और मीडिया की भूमिका

तनवीर जाफरी / किसानों, खेतीहर मज़दूरों तथा आदिवासियों द्वारा पिछले दिनों नासिक से शुरु हुआ पैदल किसान मार्च लगभग 180 किलोमीटर की यात्रा तय कर 12 मार्च को मुंबई पहुंचा। सूत्रों के अनुसार इस म…

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गोरखपुर के नतीजे से 2019 का रिज़ल्ट निकाल दे रहे हैं!

राजनीतिक पत्रकार 

रवीश कुमार/ राजनीतिक पत्रकारों को कभी ठीक से समझ नहीं पाया। गोरखपुर में योगी की हार बड़ी घटना तो है लेकिन इस घटना में क्या इतना कुछ है कि चार चार दिनों तक सैंकड़ों पत्रकार लोग लिखने में लगे हैं। राजनीतिक पत्रकारों को ही सिस्टम को …

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मोबाइल मीडिया : प्रिंट मीडिया के लिए सवालिया निशान?

अभिमनोज/ प्रिंट मीडिया के हाथ से मीडिया की सत्ता की डोर छुटती जा रही है... पीएम नरेन्द्र मोदी की मोबाइल को लेकर भाजपाइयों को दी गई सलाह का भावार्थ तलाशेंगे तो यह बात साफ हो जाएगी कि मोबाइल मीडिया सारे मीडिया पर लगातार भारी पड़ता जा रहा है!…

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मौत के बहाने टीआरपी की चाहत

साकिब ज़िया/पटना/ भारतीय सिनेमा की अभिनेत्री श्रीदेवी को नमन।सबसे पहले चर्चा श्रीदेवी की, जी हाँ यह हकीकत है कि श्रीदेवी ने लगभग 4 साल की उम्र से लेकर 54 सालों तक सिल्वर स्क्रीन पर कई किरदारों को जीवंत किया।बॉलिवुड के अलावा तमिल, तेलुगू, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों में भी श्…

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श्रीदेवी की मौत पर डूब मरी ‘पत्रकारिता’

निर्मल रानी/ प्रसिद्ध भारतीय सिने अभिनेत्री पद्मश्री श्रीदेवी की पिछले दिनों दुबई के एमीरेटस टॉवर के कमरा नंबर 2201 में रहस्यमयी तरीके से मौत हो गई है। खबरों के अनुसार चूंकि उनकी लाश उनके कमरे में बाथटब में पाई गई इसलिए मौत के कारण निश्चित रूप से संदिग्ध हैं। परंतु जैसे ही श्रीदे…

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सोचिये जब अच्छे पत्रकार – जज – नौकरशाह – प्रोफ़ेसर ना होंगे?

सवाल इतना भर नहीं है कि मीडिया संस्थानों को कैसे जकडा जा रहा है या जकड़ा गया है....

पुण्य प्रसून बाजपेयी/ जो हालात मीडिया के हैं, जिस तरह…

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हिंदी अखबारों की भ्रष्ट भाषा

डॉ. वेदप्रताप वैदिक/ आजकल मैं मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के कई शहरों और गांवों में घूम रहा हूं। जहां भी रहता हूं, सारे अखबार मंगवाता हूं। मराठी के अखबारों में बहुत कम ऐसे हैं, जो अपनी भाषा में अंग्रेजी का प्रयोग धड़ल्ले से करते हों। उनके वाक्यों में कहीं-कहीं अंग्रेजी के…

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दलाली व चाटुकारिता के बाद अब चोरी का भी तडक़ा?

भारतीय मीडिया को तरह-तरह के नामों से नवाज़ा जा रहा 

तनवीर जाफरी/ निश्चित रूप से दुनिया के अधिकांश देश ऐसे हैं जो न केवल दिन-प्रतिदिन तरक्की कर रहे हैं बल्कि ऐसे देशों का सामाजिक ढांचा भी परिवर्तित…

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हम अपने आपको अविश्वसनीय बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं

टीआरपी की ख़बरों का मिडिया

मनोज कुमार/ जब समाज की तरफ से आवाज आती है कि मीडिया से विश्वास कम हो रहा है या कि मीडिया अविश्वसनीय हो चली है तो सच मानिए ऐसा लगता कि किसी ने नश्तर  चुभो दिया है. एक प्रतिबद्ध पत्रकार के नाते मीडिया की विश्वसनीय…

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सोशल मीडिया पर अश्लीलता

शरद खरे (साईं)/ लगभग एक दशक से सोशल मीडिया का जादू लोगों के सिर चढकर बोल रहा है। सबसे पहले आरकुट के जरिये लोग संवादों का आदान-प्रदान करते थे। उस दौर में मोबाईल पर एसएमएस ही विकल्प हुआ करता था। मोबाईल पर सोशल मीडिया ने दस्तक नहीं दी थी।…

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