तनवीर जाफ़री /अन्य करोड़ों लोगों की तरह मैं भी फ़िल्म जगत में 'ही मैन' के नाम से प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता धर्मेंद्र का बचपन से ही प्रशंसक हूँ। 1985-87 के मध्य इलाहाबाद में अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का अवसर मिला। उसी दौर में मुंबई आना जाना रहा। उन दिनों मुझे संजय ख़ान, दारा सिंह, रणजीत, देव कुमार उनकी स…
Blog posts : "मुद्दा "
सबसे 'तेज़' बनने के चक्कर में 'श्रद्धांजलि' का पात्र बना मीडिया
जो बिका नही वो बचा नही: हत्याओं के बन रहे नए रिकॉर्ड
केरल, मणिपुर और त्रिपुरा में पत्रकारों पर हुए हमलों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने लिया संज्ञान, विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का आदेश
निमिषा सिंह/ पत्रकारिता एक ऐसा पेशा जो अंततः निर्भर करता है इस एक सवाल पर... हम आपके लिए क्या कर सकते हैं ? हम पत्रकार उन लोगों की आवाज़ बनते है जिनके अधिकारों का उल…
प्रधानमंत्री का जन्मदिन इवेंट में तब्दील
गोदी मीडिया मोर्चे पर
मुकेश कुमार/ आख़िर वही हुआ, जिसकी संभावना थी। प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन को एक इवेंट में तब्दील कर दिया गया। मोदी की छवि को चमकाने और उन्हें विराट रूप देने के लिए तमाम तरह के प्रपंच किए गए, प्रचार के हथकंडे आज़माए गए। एक टूल किट बँटा और क्या, कैसे करना है इसे सुनिश्चित किय…
माखनलाल का समाचारपत्र ‘कर्मवीर’ बना अनूठा शिलालेख
समाचारपत्र का ‘फ्रंट पेज’ है माखनलाल चतुर्वेदी की प्रतिमा का ‘शिलालेख’
लोकेन्द्र सिंह/ स्मारक, भवन, परिसर इत्यादि के भूमिपूजन या उद्घाटन प्रसंग पर पत्थर लगाने (शिलालेख) की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। यह इस बात का दस्तावेज होता है कि वास्तु का भूमिपूजन/ उद्घाटन / लोकार्पण कब और किसके द्वारा सम…
लोकतंत्र की लूट में मीडिया की बेशर्म भूमिका
निर्मल रानी/ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा चुनाव के दौरान होने वाली व्यापक धांधलियों को लेकर चुनाव आयोग पर ज़ोरदार हमला बोला गया है। उन्होंने इस तरह के अनेक प्रमाण पेश किये जिससे यह साफ़तौर पर साबित होता है कि देश में बड़े स्तर पर वोटों की चोरी की जा रही है। राहुल गांधी द्वारा 7 अगस्त 20…
व्यंग्य की जगह छीजती जा रही है
ओम थानवी / अख़बारों और पत्रिकाओं में व्यंग्य की जगह छीजती जा रही है। व्यंग्यचित्रों की भी। जितनी जगह बची है, वहाँ धार कुंद होती दिखाई देती है।
कोई ज़माना था जब अख़बारों में नियमित व्यंग्य छपते थे। अनेक में रोज़ ही। संपादकीय पन्ने पर। रविवारी परिशिष्टों में भी।
जब मैं स्कूल में पढ़ता था, दैनिक …
घोषणाओं का आईना, हकीकत की धूल
पत्रकार पेंशन योजना
मिथिलेश कुमार/ बिहार सरकार द्वारा पत्रकारों के लिए चलाई जा रही पेंशन योजना को लेकर हाल ही में एक बड़ी घोषणा की गई। अब तक दी जा रही ₹6000 की मासिक पेंशन को बढ़ाकर ₹15000 कर दिया गया है। इसके अलावा, यदि किसी पत्रकार का निधन हो जाए तो उसके आश्रित को ₹10000 प्रति माह दिए जाने की भ…
परियों की कहानी जैसी है पत्रकार सम्मान पेंशन योजना
डॉ अशोक प्रियदर्शी/ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जरिए पत्रकारों की पेंशन राशि बढ़ाए जाने की घोषणा की गई है। वास्तव में पत्रकार सम्मान पेंशन योजना श्रमजीवी पत्रकारों के लिए बड़ी खुशी की खबर है। चूकिं यह योजना पत्रकारों के जीवन के आखिरी पड़ाव में उम्मीद की किरण जैसी है। लेकिन ज्यादातर खासकर मुफलिस…
पत्रकारिता की नाक कटाने पर तुला 'गोदी मीडिया'
निर्मल रानी/ यदि आप गोदी मीडिया से जुड़े भोंपू टी वी चैनल्स पर टी आर पी केंद्रित चोंच लड़ाने व उत्तेजना पैदा करने वाली डिबेट देखें तो शायद ही कोई दिन ऐसा गुज़रता हो जिसदिन गोदी मीडिया के इन टी वी एंकर्स को किसी न किसी डिबेट के सहभागी या दर्शकगण के बीच बैठे किसे जागरूक व्यक्ति के हाथों घोर अपमान न सहना …
संवाद और संचार की दुनिया में बज रहा हिंदी का डंका
हिंदी पत्रकारिता के 200 साल
प्रो.संजय द्विवेदी/ कोलकाता से 200 साल पहले जब पं.युगुलकिशोर शुक्ल ने हिंदी का पहला पत्र 30 मई,1826 को प्रारंभ किया होगा, तो उन्होंने यह सोचा भी न होगा कि हिंदी पत्रकारिता देश की आवाज बन जाएगी। वह इस महान देश के सपनों, आकांक्षाओं, संघर्षों, आंदोलनों,दुखों और आर्तनाद क…
हिंदी पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां और संभावनाएं
खबर को रोचक बनाने के सकारात्मक उपाय आजमाये जाने चाहिए, वैल्यू एडिशन हों
अभिषेक दास/ उदंत मार्तण्ड के साथ शुरू हुई हिंदी पत्रकारिता के समक्ष वर्तमान समय में अनेक प्रकार की चुनौतियां खड़ी हैं। यह चुनौतियां पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों से डिगने के कारण उत्पन्न हुई हैं। स्थापित सिद्धांत और मूल्य को …
मूल्यबोध और राष्ट्रहित बने मीडिया का आधार
कोई भी मीडिया सत्यान्वेषण की अपनी भूख से ही सार्थक बनता है.. हिंदी पत्रकारिता के 200 साल (30 मई हिंदी पत्रकारिता दिवस) पर विशेष
प्रो. संजय द्विवेदी/ हिंदी पत्रकारिता दिवस हम 30 मई को मनाते हैं। इसी दिन 1826 को कोलकाता से पं.युगुल किशोर शुक्ल ने हिंदी भाषा के पहले पत्र 'उदंत मार्तण्ड' की शुरुआत की…
‘देशहित’ से ही बचेगी पत्रकारिता की साख
हिंदी पत्रकारिता दिवस, 30 मई पर विशेष
लोकेन्द्र सिंह/ ‘हिंदुस्थानियों के हित के हेत’ इस उद्देश्य के साथ 30 मई, 1826 को भारत में हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी जाती है। पत्रकारिता के अधिष्ठाता देवर्षि नारद के जयंती प्रसंग (वैशाख कृष्ण पक्ष द्वितीया) पर हिंदी के पहले समाचार-पत्र ‘उदंत मार्तंड’ का प्र…
झूठ और पाखंड को बेनकाब करने के लिए ईमानदार पत्रकारिता जरुरी
निर्मल रानी/ हरियाणा महिला आयोग की अध्यक्ष रेनू भाटिया ने पिछले दिनों अशोका यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर अली ख़ान के विरुद्ध एक शिकायत दर्ज की थी। जिसमें उन पर 'ऑपरेशन सिंदूर' और भारतीय सेना की महिला अधिकारियों के बारे में सोशल मीडिया पर कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया…
क्या जरूरत है हर विषय पर लिखने की?
खतरनाक है विशेषज्ञता झाडऩे का चक्कर
मनोज कुमार/ एक दौर था जब जवानी इश्क में डूबी होती थी लेकिन एक यह दौर है जहाँ जवानी लेखन में डूबी हुई है. विषय की समझ हो या ना हो, लिखने का सऊर हो या ना हो लेकिन लिखना है, वह भी बिना तथ्य और तर्क के. ऐसे लेखकों की बड़ी फौज तैयार हो गई है जिसे हर विषय पर लिखना शग…
टी आर पी की ख़ातिर कुछ भी करेगा
निर्मल रानी/ अभी गत 28 मार्च 2025 की ही बात है जबकि ज़ी न्यूज़ टी वी चैनल के स्वामी सुभाष चंद्रा को ज़ी न्यूज़ की ओर से अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर रिया चक्रवर्ती को टारगेट करने से सम्बंधित ख़बरों को उनके चैनल ज़ी न्यूज़ द्वारा ग़लत तरीक़े से पेश करने के लिए मुआफ़ी मांगनी पड़ी थी। सुभाष …
झूठ फैलाकर उन्माद को हवा देता 'गोदी मीडिया'
तनवीर जाफ़री/ भारत और पाकिस्तान में बढ़ते तनाव के बीच दोनों देशों में 'तत्काल और पूर्ण संघर्षविराम' अर्थात फ़ायरिंग और सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से 'भारत और पाकिस्तान के बीच तत्काल और पूर्ण संघर्षविराम पर सहमति बनने' की जानकारी दी गई थी। डोनाल्ड ट्…
एक चैनल के भीतर ही दो दुनिया!
एक इनके स्टार एंकर्स और एक ये जिनके पास रिपोर्टिंग के लिए ढंग से बुनियादी चीज़ें भी नहीं हैं
विनीत कुमार/ अंजनाऽऽ..अंजनाऽऽऽऽ.. यहां धमाके की आवाज़ सुनाई दे रही है..
फुसफुसाते हुए, बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में आजतक का रिपोर्टर जब हमारी स्क्रीन पर होते हैं तो हमारे भीतर यह भाव पैदा ही नहीं होता कि …
शब्द हिंसा का बेलगाम समय!
वस्तुनिष्ठता से किनारा करती मीडिया बहुत खौफनाक हो जाती है
प्रो. संजय द्विवेदी/ यह 'शब्द हिंसा' का समय है। बहुत आक्रमक, बहुत बेलगाम। ऐसा लगता है कि टीवी न्यूज मीडिया ने यह मान लिया है कि शब्द हिंसा में ही उसकी मुक्ति है। चीखते-चिल्लाते और दलों के प्रवक्ताओं को मुर्गो की तरह लड़ाते हमारे एंकर सब कु…
मीठा मीठा मीडिया, कुनैन है पत्रकारिता
मनोज कुमार/ मैं किस्म किस्म के गीत बेचता हूं, बोलो जी कौन सा खरीदोगे, गीत की यह पंक्तियां जब पढ़ते थे तो हंसा करते थे। तब मालूम ना था कि यह गीत की यह दो पंक्तियां भविष्य की मीडिया की कहानी का सच बन कर सामने खड़ा कर दिया जाएगा। आज यही सच है कि मीडिया का कारोबार बढ़ रहा है और सरोकार की पत्रकारिता हाशि…
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Manjeet SinghJune 23, 2023
सम्पादक
डॉ. लीना
