मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "मुद्दा "

एक ओर विरोध तो, दूसरी ओर आयोजन भी

संजय कुमार/ राजस्थान पत्रिका ने राज्य सरकार द्वारा बनाए गए ‘काले कानून’ को प्रेस की आजादी को खतरा बताते हुए राष्ट्रीय प्रेस दिवस के दिन संपादकीय खाली छोड़कर जो कदम उठाया,उस पर अन्य राज्य या देश की मीडिया स्वर में स्वर मिलती नजर नहीं आयी। शायद इन्हें इंतजार है अपने ऊपर हमले की। जबकि…

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सोशल मीडिया ताकतवर है और खतरनाक भी: नग़मा सहर

सोशल मीडिया के लिए नियम और प्रतिबंध बेहद जरूरी है। एनडीटीवी की एसोसिएट प्रोड्यूसर और वरिष्ठ पत्रकार एंकर नग़मा सहर…

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पत्रकारों को तीसमार होने का भ्रम

रिजवान चंचल / देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में आये दिन हो रही पत्रकारों की हत्याओं से जाहिर है की पत्रकार अब सुरक्षित नही है.पत्रकारों की हत्या और जान लेवा हमलों की घटनाएं कम होने के बजाय  बढ़ती जा रहीं हैं कहना न होगा सच्चाई लिखने और सच्चाई दिखाने व…

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चैनल खोये हैं हनीप्रीत में, देश परेशान है मन के मीत से

तो क्या ... मीडिया की जरुरत बदल चुकी है या फिर वह भी डि-रेल है 

पुण्य प्रसून बाजपेयी/ एक तरफ हनीप्रीत का जादू तो दूसरी तरफ मोदी सरकार की चकाचौंध। एक तरफ बिना जानकारी किस्सा…

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टीआरपी पत्रकारिता वाला साहस !

साकिब ज़िया / पटना। राम-रहीम पर लगे आरोप डेढ़ दशक पुराने हैं, लेकिन मीडिया तब जागा, जब दो बहादुर बेटियों और एक जांबाज़ पत्रकार ने जान की बाज़ी लगाकर न्याय की लड़ाई जीत ली। राम रहीम के ‘कुकर्मों का खुलासा’ कर रहा मीडिया अब तक क्यों उनकी गोद में बैठा था ? क्यों मीडिया की …

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सच को सच कह दोगे अगर तो फांसी पर चढ़ जाओगे

पत्रकार और समाजसेविका गौरी लंकेश की हत्या के बाद निर्मल रानी का लिखा आलेख

निर्मल रानी/ कट्टरपंथ के विरोध तथा धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में निरंतर उठने वाली एक औ…

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हिन्दी चैनलों पर सुबह की प्राइट टाइम ज्योतिष के इन्हीं एंकरों से गुलज़ार होती है

न्यूज़ चैनलों के बाबाओं का अध्ययन कीजिए। गुरमीत सिंह सिरसा में ही राम रहीम नहीं बनते हैं, वो कहीं भी बन जाते हैं

रवीश क…

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पत्रकारिता का संकट पत्रकारों को खा रहा है

रवीश कुमार/ उस दोपहर बहस इस बात को लेकर हो गई कि अगर किसी नीतिगत या अन्य कारणों से पांच लाख छात्रों की ज़िंदगी प्रभावित है तो यह संख्या इतनी भी कम नहीं है कि सरकार का ध्यान न खींच सके। छात्र कहते रहे कि पांच लाख छात्र हैं, मैं अड़ा रहा कि तो फिर वे कहां हैं। पांच लाख छात्र जब अपनी …

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जो ‘उनको’ है पसंद वही बात करेंगे?

आज मीडिया पूरी तरह विकलांग दिखाई दे रहा है

तनवीर जाफरी / आपातकाल के 1975-77 के दिनों को जहां कांग्रेस विरोधी दल लोकतंत्र की हत्या के दौर के रूप में याद करते हैं वहीं उन दिनों को मीडिया अथवा प्रेस का गला घोंटने…

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चैनलों ने जनता का गला घोंट दिया है

ख़बरें न कर पाने की व्यथा और अच्छी ख़बरों को साझा करने की खुशी

रवीश कुमार/ टीवी में तो ग्राउंड रिपोर्टिंग खत्म ही हो गई है। इक्का दुक्का संवाददाताओं को ही जाने का मौका मिलता है और द…

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जनवादी पत्रकारिता की बात करें

फ़िरदौस ख़ान/ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना ही पत्रकारिता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले…

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खबरों के खजाने का सूखाग्रस्त क्षेत्र ...!!

क्या देश व समाज के कुछ हिस्से खबरों के खजाने से सदा दूर ही रहेंगे?

तारकेश कुमार ओझा/ ब्रेकिंग न्यूज... बड़ी खबर...। चैनलों पर इस तरह की झिलमिलाहट होते ही पता नहीं क्यो…

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ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म

हिंदी पत्रकारिता दिवस (30 मई) पर विशेष  

मनोज कुमार/ ‘ठोंक दो’ पत्रकारिता का ध्येय वाक्य रहा है और आज मीडिया के दौर में ‘काम लगा दो’ ध्येय वाक्य बन चुका है। ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म का यह बदला हुआ स्वरूप…

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आप देख रहे हैं दर्शकों की हत्या का सीधा प्रसारण

आज न्यूज़ रूप में रिपोर्टरों का ढांचा ढह गया है

रवीश कुमार/ दो दिन से सोचता रहा कि चीन ने जो सम्मेलन बुलाया है, वो क्या है, क्यों भारत का जाना या न जाना ठीक है, उस पर पढ़ाई करूंगा। लेकिन जाने कहां वक्त ध…

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आतंकवादः जरूरी है खबरों की गेटकीपिंग

संजय द्विवेदी/ वैश्विक आतंकवाद से जूझ रही दुनिया के सामने जिस तरह की लाचारगी आज दिख रही है वैसी कभी देखी नहीं गयी। जाति, धर्म के नाम होते आए उपद्रवों और मारकाट को इससे जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है क्योंकि आतंकवादी ताकतें मानवता के सामने इतने संगठित रूप में कभी नहीं देखी गयीं।…

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भारत का वरिष्ठ पत्रकार- चालाकियों से कब बाज आएगा

संजीव खुदशाह/ करीब पांच साल पहले रायपुर में छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी हॉस्पिटल जिसका नाम भारत रत्न डॉ भीम राव अंबेडकर हॉस्पिटल है मे अंडकोष के इलाज के लिए एक मशीन खराब हो गई थी उसे रिपेयर कर लिया गया तो छत्तीसगढ़ के एक प्रसिद्ध अखबार में इस समाचार के लिए शीर्षक लिखा अंबेडकर…

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हेडलाइन्स के ज़रिये काले धन से लड़ाई

बुरी ख़बर या साधारण ख़बर को भी अच्छी ख़बर के रूप में पेश किया जा रहा है ताकि लगे कि बहुत कुछ हो रहा है

रवीश कुमार/ राजनीतिक…

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खतरे सोशल मीडिया के

निर्मल रानी/ पूरे विश्व के साथ-साथ भारत में भी कंप्यूटर-इंटरनेट क्रांति का युग चल रहा है। और इस युग में इंटरनेट के माध्यम से सोशल मीडिया आम लोगों की आवाज़ बुलंद करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि इसी सोशल मीडिया के माध्यम से ही पूरे विश्व में दशकों …

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खतरे में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ

ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण हो रहा जो सुनने व देखने में एकपक्षीय प्रतीत होते हैं

तनवीर जाफरी/ मीडिया, जिसे भारत में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप मे…

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केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में 89 फीसदी की कमी, टीवी चैनल मंदिर निर्माण में मस्त

रवीश कुमार/  जब न्यूज़ चैनल और अख़बार आपको किसी हिन्दू राष्ट्रवाद का मर्म समझाने में लगे थे, आपके लिए राम मंदिर बनवाने के लिए तीन चार फटीचर किस्म के मौलाना बुलाकर बहस करा रहे थे तभी संसद में कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह लिखित जवाब के तौर पर रोज़गार के संबंधित कुछ आंकड़े रख रह…

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