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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "मुद्दा "

तो क्यों न मैन पावर ही घटा लें?

अखबारों में छंटनी क्या कम कमाई के कारण है? 

पुष्य मित्र। अखबारों में कर्मियों की छटनी जरूर हो रही है, मगर यह कहना गलत है कि कोरोना काल में अखबारों की आय घटी है। अखबारों की प्रसार संख्या जरूर घटी है, मगर अखबार…

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ये टीवी चैनल हैं या ‘मूरख-बक्से’ ?

हमारे टीवी चैनल लगभग पगला गए हैं

डॉ. वेदप्रताप वैदिक/ जब मैं अपने पीएच.डी. शोधकार्य के लिए कोलंबिया युनिवर्सिटी गया तो पहली बार न्यूयार्क में मैंने टीवी देखा। मैंने मेरे पास बैठी अमेरिकी महिला से पूछा कि यह क्या ह…

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सुशांत के केस पर औसतन 500 स्टोरी!

सुशान्त बनाम किसानों की आत्महत्या/हत्या पर मीडिया कवरेज

अपूर्व भारद्वाज। सुशान्त की आत्महत्या/हत्या औऱ किसानों की आत्महत्या पर किये गए मीडिया कवरेज का जब मैंने तुलनात्मक डाट…

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आधारहीन है पुलिस उप महानिरीक्षक (मानवाधिकार) का पत्र

बिना आरएनआई या पीआईबी के पोर्टल अवैध कैसे, जब इनके द्वारा किसी साइट को मान्यता देने का अब तक कोई प्रावधान ही नहीं है ?…

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भारतीय लोकतंत्र के ढहते स्तंभ !

कहीं नहीं लग रहा है कि इस लोकतंत्र में पत्रकारिता और उसके कर्णधार किसी भी दृष्टिकोण से लोकतंत्र के 'कथित चौथे स्तंभ ' अब रह गये हैं !  …

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सहकर्मी की मौत पर पत्रकार बिरादरी की चुप्पी

अभिमन्यु कुमार/ पटना की पत्रकार बिरादरी को खुद को मुर्दा घोषित कर देना चाहिए. उनकी चुप्पी यह दर्शाती है कि वो अपना जमीर बेच चुके हैं. उनके सहकर्मी की मौत संस्थान की प्रताड़ना की वजह से हो जाती है और उनके मुंह से एक शब्द तक नहीं निकलता. रोज हज़ारों शब्द लिखने वाले पत्रकारों …

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पीटीआई को सरकारी धमकी

डॉ. वेदप्रताप वैदिक/ प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) देश की सबसे पुरानी और सबसे प्रामाणिक समाचार समिति है। मैं दस वर्ष तक इसकी हिंदी शाखा ‘पीटीआई—भाषा’ का संस्थापक संपादक रहा हूं। उस दौरान चार प्रधानमंत्री रहे लेकिन किसी नेता या अफसर की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह फोन क…

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यही तो है टी वी चैनल्स की 'गिद्ध पत्रकारिता'

निर्मल रानी/ हालांकि गत 28 मई को सुप्रीम कोर्ट में लॉकडाउन के कारण देशभर में फंसे मज़दूरों की दुर्दशा पर सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा था कि कुछ ‘क़यामत के पैग़ंबर’ हैं जो नकारात्मकता फैलाते रहते हैं. उन्होंने ये भी कहा था कि “सोफ़े में…

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भारत में लॉकडाउन और पत्रकारिता

प्रमोद रंजन/  लॉकडाउन में नागरिकों के दमन की ख़बरें सबसे ज्यादा केन्या व अन्य अफ्रीकी देशों से आई थीं। उस समय ऐसा लगा था कि भारत का हाल बुरा अवश्य है लेकिन उन गरीब देशों की तुलना में हमारे लोकतंत्र की जड़ें गहरी हैं। हमें उम्मीद थी कि हमारी सिविल सोसाइटी, जो कम से कम हमारे शहरों…

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मीडिया भी इसी परसंतापी समाज का हिस्सा

कृष्ण कांत/ मीडिया यह तो छापता है कि फलाने कोरंटाइन सेंटर में कौन लोग मटन मांग रहे थे, कौन बिरयानी मांग रहे थे, लेकिन उसी उत्साह और सनसनी के साथ यह नहीं छापता कि कोरंटाइन में अखबार पर खाना परोसा गया और दाल बह गई, क्योंकि इसमें उन्माद नहीं है. मीडिया उन्माद बेचता है. …

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कसौटी पर है मीडिया की नैतिकता और समझदारी

प्रो.संजय द्विवेदी/ भारतीय मीडिया अपने पारंपरिक अधिष्ठान में भले ही राष्ट्रभक्ति,जनसेवा और लोकमंगल के मूल्यों से अनुप्राणित होती रही हो, किंतु ताजा समय में उस पर सवालिया निशान बहुत हैं। ‘एजेंडा आधारित पत्रकारिता’ के चलते समूची मीडिया की नैतिकता और समझदारी कसौटी पर है।…

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गुजरात में समाचार पोर्टल के संपादक पर राजद्रोह का मामला

सारे देश में पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज़ को ऐसे ही दबाया जा रहा हैं

पंकज चतुर्वेदी / नई दिल्ली/ गुजरात में एक समाचार पोर्टल के संपादक के खिलाफ राजद्र…

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भारतीय मीडियाः गरिमा बहाली की चुनौती

प्रो. संजय द्विवेदी/ भारतीय मीडिया का यह सबसे त्रासद समय है। छीजते भरोसे के बीच उम्मीद की लौ फिर भी टिमटिमा रही है। उम्मीद है कि भारतीय मीडिया आजादी के आंदोलन में छिपी अपनी गर्भनाल से एक बार फिर वह रिश्ता जोड़ेगा और उन आवाजों का उत्तर बनेगा जो उसे कभी पेस्टीट्यूट, कभी…

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अखबार मरेंगे तो लोकतंत्र बचेगा?

अरुण कुमार त्रिपाठी/ हम गाजियाबाद की पत्रकारों की एक सोसायटी में रहते हैं. वहां कई बड़े संपादकों और पत्रकारों(अपन के अलावा) के आवास हैं. इस सोसायटी में एक बड़े पत्र प्रतिष्ठान के ही पूर्व कर्मचारी अखबार सप्लाई करते हैं. वे बताते हैं कि कोरोना से पहले लोग तीन- तीन अख…

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सामाजिक क्रांति के महानायक पत्रकार डॉ. अम्बेडकर

अंबेडकर जयंती, 14 अप्रैल पर विशेष

संजय कुमार/ संविधान निर्माता और बहुजनों के मसीहा डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर महान एवं जुझारू पत्रकार भी थे। डॉ. अम्बेडकर ने ‘मूकनायक’ पाक्षिक अखबार के जरिये 31 जनवरी 1920 को सामाजिक क्रांति का जो ब…

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‘मूक’ समाज को आवाज देकर बने ‘नायक’

अंबेडकर जयंती, 14 अप्रैल पर विशेष,  बाबा साहेब की पत्रकारिता  

लोकेन्द्र सिंह/ भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने समाज में व्याप्त जातिभेद, ऊंच-नीच और छुआछ…

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कौन सज़ा देगा इन झूठों व अफ़वाह बाज़ों को ?

कई आग लगाऊ चैनल्स का समाज को विभाजित करने का एजेंडा इस महामारी के दौर में भी बेशर्मी के साथ जारी

तनवीर जाफ़री/ वैसे तो समूची प…

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फर्जी खबरों से हमारा मानस तैयार हो रहा है

कृष्ण कान्त/ फर्जी खबरों का दुश्चक्र भारत को कोरोना से बड़ा नुकसान पहुंचाने जा रहा है. समाज का ​अपने ही लोगों के प्रति अविश्वास से भर जाना किसी महामारी में नहीं होता. कोरोना के बहाने भारत के नफरत के कारोबारियों ने अपना कारोबार आपात स्तर पर तेज कर दिया है.…

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प्रिंट मीडिया पर कोविड-19 का कहर

सरकार आर्थिक मदद करे 

आदित्य कुमार दूबे/ अभी देशव्यापी लाक-डाउन के दो ही दिन हुए हैं कि प्रिंट मीडिया पर कोविड-19 का कहर साफ नजर आने लगा है। अखबारों के पन्ने कम हुए हैं, उनका वितरण बाधित हुआ है और विज्ञापन नदारद हो गए हैं।  जो अखबा…

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सामाजिक क्रांति के महानायक पत्रकार : डॉ. अम्बेडकर

(‘मूकनायक’ के 100 साल- 31 जनवरी, 2020 पर विशेष)

संजय कुमार/ डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर किसी परिचय के मोहताज नहीं है, संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा के तौर विख्यात हैं। डॉ. अम्बेडकर के परिचय में एक सफल पत्रकार एवं संपादक शब्…

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सम्पादक

डॉ. लीना