मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "मुद्दा "

केंद्र सरकार की सीधी भर्तियों में 89 फीसदी की कमी, टीवी चैनल मंदिर निर्माण में मस्त

March 31, 2017

रवीश कुमार/  जब न्यूज़ चैनल और अख़बार आपको किसी हिन्दू राष्ट्रवाद का मर्म समझाने में लगे थे, आपके लिए राम मंदिर बनवाने के लिए तीन चार फटीचर किस्म के मौलाना बुलाकर बहस करा रहे थे तभी संसद में कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह लिखित जवाब के तौर पर रोज़गार के संबंधित कुछ आंकड़े रख रह…

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हर चैनल पर एक ही फार्मेट है

March 14, 2017

मैं यूपी चुनावी रिपोर्टिंग के लिए क्यों नहीं गया

रवीश कुमार/  मैं उत्तर प्रदेश चुनाव कवर करने नहीं गया। यह पहला चुनाव था जिसे मैंने छोड़ दिया। चुनाव शुरू होने के दो तीन महीने पहले से पूरे प्रदेश की …

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जब प्रेतात्माओं से मीडिया का काम चल सकता है, तो मनुष्यों की मीडिया को कोई जरुरत नहीं

February 19, 2017

मीडियाकर्मियों के लिए एबीपी समूह में व्यापक छंटनी भयंकर दुःसमय की सबसे बड़ी चेतावनी!

पलाश विश्वास/ मीडियाकर्मी इसे अच्छी तरह समझ लें क…

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रिलायंस देश में मीडिया भी रिलायंस हवाले!

February 14, 2017

अगर यह खबर सच होती है तो, अब पत्रकारिता भी तेल, गैस, संचार, निर्माण विनिर्माण कारोबार की तर्ज पर!

पलाश विश्वास/ ऐम्बेसैडर ब्रां…

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कवि सम्मेलनों-मुशायरों और मुर्गो-मीही की दावतों से ही उर्दू विकास संभव ?

January 31, 2017

डॉ.तारिक फातमी / बिहार में उर्दू के विकास और प्रचार-व-प्रसार के नाम पर सरकारी संस्थाओं द्वारा आयोजित मुशायरों (कवि सम्मेलनों) के आयोजन से क्या उर्दू का विकास हो रहा है ? यह सवाल भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद्, नई दिल्ली और बिहार…

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पाठक समझे तो कैसे समझे

January 13, 2017

इकोनोमी तू ही बता तू कैसी है, रोती है या हंसती है

एक पन्ने में बिजनेस घट रहा होता है तो दूसरे पन्ने पर उछालें मार रहा होता…

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भारत में विचार खत्म, बुद्धि मंद, क्या करें!

January 3, 2017

मीडिया के कोठाकरण की वजह क्या है?

हरि शंकर व्यास (साई फीचर्स) / लाख टके का सवाल है कि मीडिया के कोठाकरण की वजह क्या है? पहली वजह अंग्रेजीदां, सेकुलर-लेफ्ट के तुर्रम खां मीडियाकर्मियों का बिना रीढ़ के निक…

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विज्ञापनों के भ्रमजाल का शिकार मासूम जनता

January 1, 2017

इस समय देश के अधिकांश टीवी चैनल्स पर सबसे अधिक व सबसे खर्चीले विज्ञापन बाबा रामदेव के पतंजलि उद्योग द्वारा प्रसारित कराए जा रहे हैं…

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साल 2016 में मीडिया बन गया कोठा!

December 31, 2016

हरि शंकर व्यास (साई फीचर्स)/ निःसंदेह, वेश्याओं का कोठा भारी जुमला है। पर 40 साल की पत्रकारिता के अनुभव में 2016 में सुने वाक्यों का निचोड़ यहीं बनता है। लोगों से बात करें, मीडिया पर चर्चा करें तो डायलॉग सुनाई देगा- मीडिया बिका हुआ है! जनता के सामान्य चेहरे भ…

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मीडिया को ख़ौफ़ से मुक्ति मिली है

December 22, 2016

वो न के बराबर छापने, न छापने, न के बराबर दिखाने या न दिखाने के ख़ौफ़ से मुक्त हो गया

रवीश कुमार/ प्रधानमंत्री गंगा जैसी पवित्र नहीं हैं। गंगा भी गंगा जैस…

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पत्रकारों को जो ताकतें डराती हैं दरअसल वो जनता को डराती हैं

December 11, 2016

हम फ़कीर नहीं हैं कि झोला लेकर चल देंगे..

रवीश कुमार/ मेरे हमसफ़र दोस्तों….

किसी को मेरे ईमेल और फोन में क्या दिलचस्पी हो सकती है वो हैक करने की योजना बनाएगा। शनिवार की मध्यरात्र…

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तीसरे दर्जे की बिजनेस पत्रकारिता और नोटबंदी से जुड़े कुछ सवाल

November 29, 2016

रवीश कुमार/ सितंबर माह में बैंकों की जमाराशि में भयंकर उछाल आया था। यह उछाल 17 दिनों की नोटबंदी के दौरान बैंकों में जमा रकम के बराबर ही है या उसके आस पास है। अख़बारों ने लिखा है कि किसी एक महीने में अभी तक इतना उछाल नहीं आया था। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि क्या 8 नवंबर की नोटबंदी की…

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अखबारों पर फंदा!

November 8, 2016

अखबारों को ऐसे नए नियमों-कायदों-फंदो में फांसा है कि वे घुट कर अपने आप दम तोड़ेंगेनई व्यवस्था में हर अखबार, हर प्रकाशक-संपादक को सरकार के आगे नाक रगड़ना है…

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पत्रकार को तो विशेषज्ञ से भी ज़्यादा मालूम होना चाहिए

November 6, 2016

मीडिया को चुनिंदा विषयों पर परिणाममूलक, तथ्यपरक और ज़िन्दा बहसों की बहुत आवश्यकता है

साकिब ज़िया/पटना। पता नहीं पत्रकारिता पर होने…

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एनडीटीवी पर रोक का विरोध क्यों जरुरी है?

November 6, 2016

यह मामला सिर्फ किसी एनडीटीवी पर रोक का नहीं है

पलाश विश्वास / हम किसी चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने के पक्ष में नहीं है। लेकिन हम फासिज्म के राजकाज के खिलाफ हैं। हम नस्ली नरसंहार संस्कृति के इस मुक्तबा…

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पत्रकारिता : मानक नहीं मान्यता बदलनी होगी

October 16, 2016

अर्पण जैन "अविचल"/ तेज गति से चलने वाले जनजीवन में पत्रकारों और पत्रकारिता का महत्व क्षण -क्षण कमतर होता जा रहा है, जनसामान्य ना जाने क्यू वर्तमान में पत्रकारों को हेय दृष्टि से देखने की आदत डाल रहा है? ना जाने किस भय से आक्रांतित है जनमानस, या ना जाने पत्रकारों ने कौन सी भ…

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क्या है डिज़ाइनर पत्रकार चौधरी साहब??

October 13, 2016

ज़ी न्यूज़ के एक न्यूज़ प्रोग्राम डीएनए में सुधीर चौधरी द्वारा डिज़ाइनर पत्रकार और सच्ची पत्रकारिता का बार- बार लगातार जिक्र हो रहा है, तो एशियन क्रोनिकल के संपादक कर्मवीर कमल ने ये सवाल उठाया है…

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अब मीडिया के लिए भी क्यों न हो "केवल वयस्कों के लिए" जैसी श्रेणी

October 9, 2016

संजीव शर्मा (साई फीचर्स) / क्यों न अब मीडिया अर्थात् मौजूदा दौर के न्यूज़ चैनलों, अख़बारों और समाचार पत्र- पत्रिकाओं और वेबसाइटों पर उनकी विषय-वस्तु के मुताबिक केवल वयस्कों के लिए जैसा कोई टैग लगाना चाहिए? हो सकता है यह सवाल सुनकर आपको आश्चर्य हो और आप प्रारंभिक …

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भांड पत्रकारिता के दौर में देश का मनोबल बढ़ा हुआ है

October 8, 2016

रवीश कुमार/ बलों में बल मनोबल ही है। बिन मनोबल सबल दुर्बल। संग मनोबल दुर्बल सबल। मनोबल बग़ैर किसी पारंपरिक और ग़ैर पारंपरिक ऊर्जा के संचालित होता है। मनोबल वह बल है जो मन से बलित होता है। मनोबल व्यक्ति विशेष हो सकता है और परिस्थिति विशेष हो सकता है। बल न भी रहे और मनोबल हो तो आप क्…

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प्रोचै: जल्द आना चाहिए एक नया चैनल

October 6, 2016

रवीश कुमार/ आवश्यकता है एक प्रोपेगैंडा चैनल की। भारत में माडिया प्रोपेगैंडा का हथियार बन गया है। शेयर बाज़ार के विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि प्रोपेगैंडा का बहुत बड़ा बाज़ार है। बड़ी संख्या में चैनलों को प्रोपेगैंडा मशीन में बदलने के बाद भी बाज़ार का पेट नहीं भरा है। इसलिए यु…

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