मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "मुद्दा "

सोचिये जब अच्छे पत्रकार – जज – नौकरशाह – प्रोफ़ेसर ना होंगे?

February 22, 2018

सवाल इतना भर नहीं है कि मीडिया संस्थानों को कैसे जकडा जा रहा है या जकड़ा गया है....

पुण्य प्रसून बाजपेयी/ जो हालात मीडिया के हैं, जिस तरह…

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हिंदी अखबारों की भ्रष्ट भाषा

January 26, 2018

डॉ. वेदप्रताप वैदिक/ आजकल मैं मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के कई शहरों और गांवों में घूम रहा हूं। जहां भी रहता हूं, सारे अखबार मंगवाता हूं। मराठी के अखबारों में बहुत कम ऐसे हैं, जो अपनी भाषा में अंग्रेजी का प्रयोग धड़ल्ले से करते हों। उनके वाक्यों में कहीं-कहीं अंग्रेजी के…

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दलाली व चाटुकारिता के बाद अब चोरी का भी तडक़ा?

January 21, 2018

भारतीय मीडिया को तरह-तरह के नामों से नवाज़ा जा रहा 

तनवीर जाफरी/ निश्चित रूप से दुनिया के अधिकांश देश ऐसे हैं जो न केवल दिन-प्रतिदिन तरक्की कर रहे हैं बल्कि ऐसे देशों का सामाजिक ढांचा भी परिवर्तित…

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हम अपने आपको अविश्वसनीय बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं

January 20, 2018

टीआरपी की ख़बरों का मिडिया

मनोज कुमार/ जब समाज की तरफ से आवाज आती है कि मीडिया से विश्वास कम हो रहा है या कि मीडिया अविश्वसनीय हो चली है तो सच मानिए ऐसा लगता कि किसी ने नश्तर  चुभो दिया है. एक प्रतिबद्ध पत्रकार के नाते मीडिया की विश्वसनीय…

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सोशल मीडिया पर अश्लीलता

January 19, 2018

शरद खरे (साईं)/ लगभग एक दशक से सोशल मीडिया का जादू लोगों के सिर चढकर बोल रहा है। सबसे पहले आरकुट के जरिये लोग संवादों का आदान-प्रदान करते थे। उस दौर में मोबाईल पर एसएमएस ही विकल्प हुआ करता था। मोबाईल पर सोशल मीडिया ने दस्तक नहीं दी थी।…

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मैं न्यूज़ एंकर नहीं रहा, न्यूज़ क्यूरेटर बन गया हूं

January 12, 2018

अब पाठक को भी पत्रकारिता करनी होगी 

रवीश कुमार/ अख़बार पढ़ लेने से अख़बार पढ़ना नहीं आ जाता है। मैं आपके विवेक पर सवाल नहीं कर रहा। ख़ुद का अनुभव ऐसा रहा है। कई साल तक अख़बार पढ़ने के बाद समझा कि विचारों से पहले सूचनाओं की…

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इसे समझिए, कम तकलीफ होगी

January 10, 2018

क्या बिना चाटुकारिता, दलाली और चापलूसी के मुख्यधारा की पत्रकारिता संभव रह गयी है?

उपेन्द्र कश्यप/ जब मीडिया व्यवसायी है तो उसमें व्यवसाय स…

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ठिठुरती हुई पत्रकारिता

December 23, 2017

अविनाश कुमार/ राष्ट्र के कोने-कोने में जागरण, नवस्फूर्ति और नवनिर्माण के मंत्र को फूंकना ही पत्रकारिता का पावन लक्ष्य है। यह वह रचनाशील विद्या है जिससे समाज का आमूल-चूल परिवर्तन संभव है। पत्रकारिता जो व्याकुल विचार-दृष्टि, मर कर जीने की कला, वैचारिक चेतना तथा काल-धर्म की तीसरी …

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पत्रकारिता का ‘पत्थरकारिता’ काल?

December 10, 2017

तनवीर जाफरी/   न स्याही के हैं दुश्मन न सफेदी के हैं दोस्त।

                       हमको  आईना दिखाना  है दिखा  देते हैं।।

पत्रकार…

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बहुजन आरक्षण की वकालत नहीं करती मीडिया

November 30, 2017

संजय कुमार/ आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है जो देश  और समाज में  हासिये पर सदियों से रहे अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जाति यानी  बुहजन को मुख्यधारा में लाने की पहल है। इस पहल को दिव्ज समाज ने आज तक स्वीकार नहीं किया है। वह इसे समाज में खटास उत्पन्न का दोषी मानता है और आरक्षण के …

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खतरनाक है टीवी एंकर्स की गैर जि़म्मेदाराना भूमिका

November 30, 2017

कई एंकर कभी-कभी ऐसी बात कर बैठते हैं जिससे उनके भीतर की मानसिकता दिखाई देने लगती है

निर्मल रानी/ इसमें कोई शक नहीं कि गंभीर समाचारों के गंभीर …

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बंटता मीडिया, घटता कद

November 18, 2017

डा.शशि तिवारी/ स्वतंत्रता सभी को प्यारी होती है कोई भी परतंत्र रहना नहीं चाहता! एक लम्बे समय तक गुलाम रहे भारत को जब आजादी मिली तब उसने अपने देश एवं नागरिकों के लिए संविधान का निर्माण किया। इसी संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रत्येक भारतीय नागरिक को वाक स्वतंत्रता प्रदान की गई। ले…

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एक ओर विरोध तो, दूसरी ओर आयोजन भी

November 17, 2017

संजय कुमार/ राजस्थान पत्रिका ने राज्य सरकार द्वारा बनाए गए ‘काले कानून’ को प्रेस की आजादी को खतरा बताते हुए राष्ट्रीय प्रेस दिवस के दिन संपादकीय खाली छोड़कर जो कदम उठाया,उस पर अन्य राज्य या देश की मीडिया स्वर में स्वर मिलती नजर नहीं आयी। शायद इन्हें इंतजार है अपने ऊपर हमले की। जबकि…

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सोशल मीडिया ताकतवर है और खतरनाक भी: नग़मा सहर

October 28, 2017

सोशल मीडिया के लिए नियम और प्रतिबंध बेहद जरूरी है। एनडीटीवी की एसोसिएट प्रोड्यूसर और वरिष्ठ पत्रकार एंकर नग़मा सहर…

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पत्रकारों को तीसमार होने का भ्रम

September 24, 2017

रिजवान चंचल / देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में आये दिन हो रही पत्रकारों की हत्याओं से जाहिर है की पत्रकार अब सुरक्षित नही है.पत्रकारों की हत्या और जान लेवा हमलों की घटनाएं कम होने के बजाय  बढ़ती जा रहीं हैं कहना न होगा सच्चाई लिखने और सच्चाई दिखाने व…

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चैनल खोये हैं हनीप्रीत में, देश परेशान है मन के मीत से

September 20, 2017

तो क्या ... मीडिया की जरुरत बदल चुकी है या फिर वह भी डि-रेल है 

पुण्य प्रसून बाजपेयी/ एक तरफ हनीप्रीत का जादू तो दूसरी तरफ मोदी सरकार की चकाचौंध। एक तरफ बिना जानकारी किस्सा…

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टीआरपी पत्रकारिता वाला साहस !

September 11, 2017

साकिब ज़िया / पटना। राम-रहीम पर लगे आरोप डेढ़ दशक पुराने हैं, लेकिन मीडिया तब जागा, जब दो बहादुर बेटियों और एक जांबाज़ पत्रकार ने जान की बाज़ी लगाकर न्याय की लड़ाई जीत ली। राम रहीम के ‘कुकर्मों का खुलासा’ कर रहा मीडिया अब तक क्यों उनकी गोद में बैठा था ? क्यों मीडिया की …

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सच को सच कह दोगे अगर तो फांसी पर चढ़ जाओगे

September 6, 2017

पत्रकार और समाजसेविका गौरी लंकेश की हत्या के बाद निर्मल रानी का लिखा आलेख

निर्मल रानी/ कट्टरपंथ के विरोध तथा धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में निरंतर उठने वाली एक औ…

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हिन्दी चैनलों पर सुबह की प्राइट टाइम ज्योतिष के इन्हीं एंकरों से गुलज़ार होती है

August 29, 2017

न्यूज़ चैनलों के बाबाओं का अध्ययन कीजिए। गुरमीत सिंह सिरसा में ही राम रहीम नहीं बनते हैं, वो कहीं भी बन जाते हैं

रवीश क…

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पत्रकारिता का संकट पत्रकारों को खा रहा है

July 20, 2017

रवीश कुमार/ उस दोपहर बहस इस बात को लेकर हो गई कि अगर किसी नीतिगत या अन्य कारणों से पांच लाख छात्रों की ज़िंदगी प्रभावित है तो यह संख्या इतनी भी कम नहीं है कि सरकार का ध्यान न खींच सके। छात्र कहते रहे कि पांच लाख छात्र हैं, मैं अड़ा रहा कि तो फिर वे कहां हैं। पांच लाख छात्र जब अपनी …

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