कैलाश दहिया/ आजीवक चिंतन के आने के साथ सोशल मीडिया पर विचार-विमर्श की दिशा ही बदल चुकी है। अब आप किसी दलित को रोते और स्यापा करते नहीं देखेंगे। दलितों की रोती-बिलखती हुई आत्मकथाओं का दौर लगभग समाप्तप्राय है। अब तो दलितों के वर्णवादी- जातिवादियों से संघर्ष को दर्शाती आत्मकथाओं के दौर की आहट सुनाई द…
Blog posts : "बहस "
डॉ. अंबेडकर का बौद्ध धर्मांतरण एक प्रयोग था जो फेल हो गया
लालूजी को खलनायक बनाते तैयार हुई है सवर्ण पत्रकारों की एक पीढ़ी
जंगलराज का नैरेटिव गढ़ने में सवर्णपरस्ती को दिया प्रश्रय
वीरेंद्र यादव / बिहार का मीडिया राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण प्रभाव का रहा है। 1980-90 का वह दौर था, जब कांग्रेस अवसान की ओर थी और समाजवादी विचारधारा ताकतवर हो रही थी। गैरकांग्रेसवाद मजबूत हो रहा था। इसी दौर में पिछड़ी जाति के नेताओं की एक बड़…
डॉ. अंबेडकर और 'अलेस'
कैलाश दहिया / बात कुछ यूं उठी, 'अंबेडकरवादी लेखक संघ' यानी अलेस के कर्ताधर्ता डॉ. सूरज बड़त्या ने अपने इस लेखक संघ के बैनर तले किए जाने वाले 'चतुर्थ दलित लिटरेचर फेस्टिवल' को लेकर व्हाट्सएप पर एक ग्रुप बनाया। इस '4th Dalit Lit Fest DU' नाम से बनाए ग्रुप में इन्होंने मुझे भी शामिल किया। इस ग्रुप में …
सतरुद्र प्रकरण-भाग II
कैलाश दहिया / कुछ लोग अपने आप को विद्वान समझते हुए अपनी वाचालता में इस हद तक आगे बढ़ जाते हैं कि उन्हें सही और गलत का अहसास तक नहीं रहता। डॉ. सतरुद्र प्रकाश ऐसे ही व्यक्ति का नाम है। इस जेएनयू से पी-एच.डी. धारी ने रैदास-कबीर साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. भूरेलाल जी से संवाद के नाम पर उन्हें गालिया…
'या देव सर्व भूतेषू पितृ रूपेण संस्थिता'
दलित चिंतन का निचोड़ है 'आजीवक'
कैलाश दहिया/ बात 1997 की है, डॉ. धर्मवीर की पुस्तक 'कबीर के आलोचक' आई। इस किताब के आते ही हिंदी साहित्य में जलजला पैदा हो गया। अभी तक कबीर के नाम पर विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साथ-साथ परशुराम चतुर्वेदी, अयोध…
लिव-इन रिलेशनशिप- अर्थात् जारकर्म की खुली छूट
कैलाश दहिया / पिछले दिनों 'व्हाट्सएप' पर वरिष्ठ पत्रकार नासिरुद्दीन का एक लेख प्राप्त हुआ, जिस का शीर्षक था 'प्रेम में डूबी बहादुर लड़कियो, हिंसक रिश्ते से बाहर निकलना जरूरी है।'(1) यह लेख लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही लड़की की उस के लिव-इन पार्टनर द्वारा की गई हत्या को केंद्र में रख कर लिखा गया है।
…प्रक्षिप्तकार अग्रवाल का दलित विरोधी चेहरा
कैलाश दहिया/ 'हंस' पत्रिका के सितंबर, 2022 अंक में द्विज आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल का 'नेहरू से ऐसा डर क्यों' शीर्षक से लेख छपा है। इस लेख में इन्होंने एक बार फिर अपना दलित विरोधी चेहरा दिखा दिया है। ये लिखते हैं, 'वैसे यह इन दिनों परम लोकप्रिय अस्मिता-परक सोच का ही तो एक रूप है जिसके अनुसार आप केवल …
ब्राह्मण की सीख में पुराण पाथते पिछड़े
कैलाश दहिया/ ब्राह्मणी प्रभाव में पिछड़े वर्ग के कथित साहित्यकारों का दिमाग कैसे काम कर रहा है, इसे अश्विनी कुमार पंकज की लिखत से समझा जा सकता है। इन्होंने अपनी दिनांक 04 जुलाई, 2022 की फेसबुक पोस्ट में लिखा है- "आ रहा है आजीवक मक्खलि गोसाल के दर्शन और संघर्ष पर केंद्रित हमारा तीसरा उपन्यास जो न नि…
नामवर की मानसिकता और पिछड़ों के नामवर
कैलाश दहिया/ हिंदी साहित्य में आजकल एक चलन हो गया है, अगर कोई पुरस्कार लेना हो या नाम कमाना हो तो डॉ. धर्मवीर का विरोध करना शुरू कर दो। दलितों के साथ-साथ पिछड़ों में भी यह प्रथा पिछले एक-डेढ़ दशक से देखी जा रही है। द्विज तो हैं ही दलित विरोधी।
डॉ. राजेश चौहान ने अपनी दिनांक 15 जुलाई, 2021 की फेस…
समाजवाद की आड़ में जारकर्म समर्थक का चेहरा
कैलाश दहिया/ आर.डी. आनंद ने दिनांक 25 मार्च, 2021को अपनी फेसबुक वॉल पर 'आम्बेडकरवादी और आजीवक' शीर्षक से अपना लेख लगाया है। सर्वप्रथम तो, इन के लेख का शीर्षक ही गलत है। आजीवक एक कंप्लीट धर्म है, जो अपने पर्सनल कानूनों के साथ दलितों की समस्याओं को हल करता आया है। इस के विपरीत अंबेडकरवाद का अर्थ है धर…
दलित आंंदोलन के विरोधियों को आजीवक चिंतकों का डर होना ही चाहिए!
अरुण आजीवक/ बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने कहा था 'समाज की प्रगति उस समाज के महिलाओं की प्रगति से मापना चाहिए।' इसी तर्ज पर यह भी कहा जा सकता है कि समाज की मजबूती उस समाज के साहित्य से भी तय होती है।
साहित्य का सीधा सम्बन्ध साहित्यकारों से होता है। दलित कौम में साहित्यकारों की आज कमी नहीं। पर ये क्या…
जारकर्म की डाइवर्सिटी मांगते दुसाध
कैलाश दहिया/ यह अच्छी बात है कि सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों के दिमाग पकड़ में आ रहे हैं। मैंने 02 फरवरी, 2021 को फेसबुक पर अपनी निम्नलिखित पोस्ट डाली थी...
"'दलित साहित्य आंदोलन' को समझने के तत्व :
1. महान मक्खलि गोसाल को महावीर और बुद्ध ने क्यों कोसा?
2. सद्गुरु रैदास के छाती चीर कर जने…
जार चिंतन शिरोमणि- अर्थात्, प्रेम कुमार मणि
कैलाश दहिया/ पिछड़ों के विचारक प्रेम कुमार मणि ने 4 सितंबर, 2020 को अपनी फेसबुक वॉल पर 'यह जार चिंतन क्या है?' शीर्षक से अपना लेख लगाया है। बताया जाए, सर्वप्रथम तो इन का यह शीर्षक ही गलत है। यह होना चाहिए था 'यह दलित चिंतन या मोरल चिंतन क्या है?' यह भी बताया जा सकता है कि इस मोरल चिंतन का पर्यायवाची…
दलित साहित्य में अड़ंगे लगाते द्विज
भारतीय मीडिया में विदेशी एजेंट
यह तथ्य कमोवेश सबको ज्ञात हैं कि भारतीय मीडिया का एक बडा तबका अपनी आजीविका विदेशियों की ऐजेंटी से चलाता है। हर एक समाचार पत्र का पाठक या टेलीविजन का जागरूक दर्शक यह जानता है कि मीडिया में एक तबका है जो अमेरिका की भारत से ज्यादा चिंता करता है तथा उसके लिये मर मिटने के लिये खडा …
लो, ब्राह्मणों की बुधिया तो पकड़ी गई
कैलाश दहिया / 12 सितम्बर 2005,
प्रखर आजीवक (दलित) चिन्तक डा. धर्मवीर की आलोचना की किताब ‘प्रेमचंद: सामंत का मुंशी’ का लोकार्पण कार्यक्रम चल रहा था। यह कार्यक्रम राजेन्द्र भवन, नई दिल्ली में हो रहा था। नामवर सिंह जी के इंकार करने के बाद वरिष्ठ दलित साहित्यकार मोहन दास नैमिशराय जी इस कार्यक्रम की अ…
आखिर क्यों पढ़ें डा. धर्मवीर का साहित्य
कैलाश
दहिया / डा. धर्मवीर का साहित्य क्यों
पढ़ें? यह कोई छोटा सवाल नहीं, बल्कि हिन्दी साहित्य का केन्द्रीय प्रश्न है। हिन्दी साहित्य या किसी भी
भाषा के साहित्य का मूलभूत प्रश्न क्या है?
या,
साहित्य
क्यों लिखा और पढ़ा जाता है? ऐसे ही सवालों के बीच डा. धर्मवीर के
साहित्य की परख की जा सकती है। सर्…
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टिप्पणी--
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सुख मंगल सिंहJuly 4, 2026
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कैलाश दहियाJuly 3, 2026
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Kailash DahiyaJuly 3, 2026
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Omprakash KashyapJune 30, 2026
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रवि अहिरवारJanuary 6, 2025
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पंकज चौधरीDecember 17, 2024
सम्पादक
डॉ. लीना

राजेश शुक्ला