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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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लो, ब्राह्मणों की बुधिया तो पकड़ी गई

 कैलाश दहिया12 सितम्बर 2005, प्रखर आजीवक (दलित) चिन्तक डा. धर्मवीर की आलोचना की किताब प्रेमचंद: सामंत का मुंशीका लोकार्पण कार्यक्रम चल रहा था। यह कार्यक्रम राजेन्द्र भवन, नई दिल्ली में हो रहा था। नामवर सिंह जी के इंकार करने के बाद वरिष्ठ दलित साहित्यकार मोहन दास नैमिशराय जी इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। इस साहित्यिक कार्यक्रम में जिस कु-कृत्य को अंजाम दिया गया, आज उसे सारी दुनिया जानती है। अब वह इतिहास बन चुका है। तथाकथित तीन दलित स्त्रिायों विमल थोराट, रजनी तिलक और अनिता भारती ने इस कार्यक्रम में बाधा पहुंचाने की कोशिशें ही नहीं कीं बल्कि इन्होंने डा. साहब पर जूते-चप्पल भी फेंके। इतना ही नहीं, इन्होंने डा. साहब को शारीरिक क्षति भी पहुंचाने की कोशिश की। कार्यक्रम के दौरान ये चीखतीं-चिल्लातीं रहीं। ये महिलाएं ऐसा अभद्र व्यवहार क्यों कर रहीं थीं ?

डा. धर्मवीर ने प्रेमचंद: सामंत का मुंशीमें प्रतिस्थापित किया है कि मुंशी प्रेमचन्द लिखित कफनकहानी की पात्रा बुधियाके साथ गांव के जमींदार के बेटे ने बलात्कार किया था। उससे वह गर्भवती हो गई थी। अब ऐसे गर्भ को घीसू-माधवक्यों प्रसव कराते भला? इसीलिए प्रसव के दौरान उन्होंने सामंत के मुंशी के कहे अनुसार उसे अकेला छोड़ दिया। उस जारज या अवैध बच्चे को जन्म देने के प्रकारान्तर में बुधिया मर गई। 

प्रेमचंद जिस बात को छुपा कर यह कहानी लिख गए थे, द्विज आलोचक पचासियों साल से उस पर इधर-उधर की हांक कर अपनी पीठ ठोक रहे थे। डा. धर्मवीर ने जब बुधिया के सच को सामने ला दिया था, उससे द्विज आलोचक बौखला गए थे। डा. साहब ने बुधिया से बलात्कार की बात कह कर उसे बचाया ही था, अन्यथा तो बुधिया जारकर्म में थी। डा. साहब के इस सत्य को उजागर करने से ही ये तीनों तथाकथित दलित स्त्रिायां भी बौखला गई थीं। इसीलिए द्विजों के उकसाने पर इन्होंने इस कार्यक्रम में जूते-चप्पल चलाए और डा. साहब को चोट पहुंचाने की कोशिश की। इस प्रकरण पर वरिष्ठ कवि और दर्शनशास्त्री रवीन्द्र दास जी ने दर्ज किया है- ‘‘गैर दलित प्रगतिशीलों ने दलित विमर्श का भी झंडा हड़पने की बड़ी और लंबी कोशिश की और क्योंकि बौद्धिकता का लगाम उन्हीं गैर दलित प्रगतिशीलों के हाथ में था इसलिए स्वीकृति की कुटिल राजनीति के जरिए कम और नाजुक बुद्धि वाले दलित लेखकों को अनावश्यक महत्व देकर दलित विमर्श की मुख्य धारा को कमजोर करने की अद्भुत कोशिश की। डा. धर्मवीर इस कुटिलता से प्रारंभिक दिनों से वाकिफ और होशियार रहे। उनकी ऐसी सावधानी को देखकर, गैर दलित बुद्धिजीवियों ने कुछ पालतू दलित प्रगतिशीलों से उन पर शारीरिक आघात का भी प्रयास करवाया था।’’ (देखें, डा. धर्मवीर: एकमात्रा दलित चिन्तक, रवीन्द्र दास, http://kavita-samay.blogspot.in/2010/2)

दलित (आजीवक) साहित्य में यह कु-कृत्य बुधिया चप्पल प्रकरणसे याद रखा जाएगा। अभी इस प्रकरण की लौ तक मंदी नहीं हुई है कि नारायण दत्त तिवारी-उज्ज्वला शर्माके मामले का सच सामने आ गया है। इनके जारकर्म से पैदा रोहित शेखर शर्मा नाम के युवक ने खून की डीएनए जांच में तिवारी का बेटा होने का पक्का सबूत न्यायालय के समक्ष पा लिया है। इस असली कहानी की बुधिया उज्ज्वला शर्मा बच्चे को जन्म दे पाई। यह संभव हुआ है हिन्दू पर्सनल कानूनकी वजह से। असल में हिन्दू विवाह में ना तलाककी व्यवस्था से ब्राह्मणों में ऐसी बुधियाएं भरी पड़ी हैं। सामंत के मुंशी ने तो दलित बुधिया को प्रसव में मरवा दिया था, इधर ब्राह्मणों की इस बुधिया ने खुद को बचा लिया है। 

ताजा बुधिया प्रकरण में हद तो तब हो गई जब उज्ज्वला शर्मा ने इस प्रकरण को अपने मान की लड़ाईबताया (देखें, बाप बनकर बेटे से हारे तिवारी, हिन्दुस्तान, 28 जुलाई 2012, पृ.1) बताया। अपने पति के सम्बंध में उन्होंने कहा 1970 से मेरा उनसे कोई संवाद नहीं रहा। एक बड़ा बेटा जरूर है, बड़ा बेटा भी मेरे पास ही रहता है। 2006 में मेरा डाइवोर्स हुआ। उज्ज्वला शर्मा का अपने पति से 2006 में डाइवोर्स होता है। इस बीच वह कानूनतः उन्हीं की विवाहिता हैं, लेकिन वे सम्बंध रख रही हैं तिवारी से। महान आजीवक चिन्तक डा. धर्मवीर इस संबंध को ही जारकर्म कहते हैं। यानी उज्ज्वला शर्मा जारकर्म में लिप्त रहीं। कौन पति ऐसी स्त्री से सम्बंध रखना चाहेगा? फिर जिसे आज ये मान की लड़ाईबता रही हैं, इसके लिए उन्होंने पहले दिन से ही नारायण दत्त तिवारी से लड़ाई क्यों नहीं लड़ी? ध्यान रहे, जिस समय ये तिवारी से जारकर्म में लिप्त थीं, उस समय तिवारी की अपनी पत्नी थी। होना यह चाहिए था कि तिवारी और उज्ज्वला शर्मा को क्रमशः अपनी पत्नी और पति से तलाक ले कर एक-दूसरे से पुनर्विवाह करना चाहिए था। तब यह संबंध कानूनी तौर पर जायज होता। लेकिन द्विजों को जार संबंधों में जीने की आदत पड़ी हुई है। यही इनकी महान संस्कृति है। ये ढाई-तीन हजार वर्षों से ऐसे ही रहते आए हैं। तभी तो उज्ज्वला शर्मा इसे अपने मान की लड़ाई कह गईं और तिवारी इसे व्यक्तिगत मामला बता रहे हैं। उज्ज्वला शर्मा को 2006 में कानूनतः तलाक मिला है। कानूनतः जब तक तलाक नहीं मिल जाता, तब तक कोई स्त्राी-पुरुष किसी गैर से संबंध बनाना तो दूर विवाह भी नहीं कर सकता। ऐसे में उज्जवला शर्मा अपनी वही प्रक्षिप्त भाषा बोल रही हैं जिसके लिए द्विज जाने जाते हैं।  

अगर हम तिवारी जी के विवाहित जीवन के बारे में बात नहीं करेंगे तो बात अधूरी ही रहेगी। काश इनकी पत्नी ने इनके जार सम्बन्धों पर इन्हें तलाक दे दिया होता? वे तिवारी के उज्ज्वला शर्मा से जार सम्बन्धों को जानकर भी उनसे सम्बंध बनाए रहीं, ऐसा सम्बंध वेश्यावृति की श्रेणी में आता है। वे भरण पोषण के लिए ही तो तिवारी से सम्बन्ध रख रहीं थी। अगर वे तिवारी को तलाक दे देतीं, वह दिन भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता। वह स्त्राी विमर्श का महान दिन होता, तब तिवारी जैसों को सबक मिलना निश्चित था। अब द्विज परम्परा के झंडाबरदार प्रभाष जोशी और उनके समर्थक बताएं कि इन दोनों ब्राह्मणियों में सती कौन है?

उधर, उज्ज्वला शर्मा ने डीएनए टेस्ट रिपोर्ट आने के बाद कहा, ‘‘जो सच्चाई केवल वह जानती थीं, आज वह सच्चाई पूरी दुनिया के सामने आ गई है। यह सच की जीत है और उनके बेटे के मां के प्रति प्रेम की जीत है।’’ (देखें, एनडी तिवारी ही हैं रोहित के पिता, दैनिक जागरण, 28 जुलाई 2012, पृ. 1-4) बताइए, जारकर्म का सच सामने आने को ये सच की जीत बता रही हैं? जबकि इस केस में सच केवल यह है कि तिवारी और उज्ज्वला शर्मा दोनों जारकर्म में लिप्त थे। जारिणी द्वारा अधिकार मांगने पर द्विज उसकी हत्या तक कर देते हैं। और हां, किसी को गलत-फहमी में नहीं रहना चाहिए कि यह मां के प्रति प्रेम की जीत है। यह रोहित शेखर द्वारा खुद पर अपनी मां की वजह से मिले अवैध संतान के ठप्पे के हट जाने की आंशिक जीत मानी जा सकती है। उज्ज्वला शर्मा का दावा हास्यास्पद के सिवाए कुछ नहीं है। रंगनायकम्मा जी ने बिलकुल सही लिखा है, ‘‘यहां जो भी हुआ है, वह सब इस स्त्राी की सहमति से और उसके किसी व्यूह के अनुरूप ही हुआ है।’’ (देखें, संबंधों को लेकर कुछ सवाल, रंगनायकम्मा, जनसत्ता, (रविवारी) 12 अगस्त, 2012, पृ. 3) रंगनायकम्मा जी ने तो साफ बता दिया है कि उज्ज्वला शर्मा ने यह सब सोच-समझ कर किया है। यानी, जारिणी ने पूरी व्यूह-रचना रची है, डा. धर्मवीर जिसकी ओर पहले  ही इशारा कर चुके हैं।

उधर, उज्ज्वला शर्मा का पक्ष लेते हुए स्तंभकारा मनीषा ने रोहित शेखर को उनके पुराने प्रेम की निशानीबताया है, वे लिखती हैं- ‘‘उज्ज्वला ने स्त्राीत्व की जंग लड़ी है और जाने-अनजाने उन तमाम औरतों को हिम्मत दी है।’’ (देखें, नाजायज सांड, मनीषा, राष्ट्रीय सहारा, आधी दुनिया, 01 अगस्त, 2012, पृ. 1-2) मनीषा जी जिसे प्रेम की निशानी बता रही हैं, वह जारकर्म की पैदाइश है। ऐसी स्त्रिायों के पति इन जार सम्बंधों को बर्दाश्त नहीं कर पाते, जिसके कारण उन्हें मातमी जीवन जीना पड़ता है। मनीषा ऐसी जारिणी स्त्रिायों का पक्ष ले रही हैं। वे ऐसे पुरुषों को कोस रही हैं, जो जार संबंधों पर मातम मनाते हैं। और यही वह जगह है जहां आ कर द्विज घर छोड़ मारे-मारे फिरते हैं। वे संन्यास, निर्वाण और कैवल्य के नाम पर इस समस्या से पीठ दिखा कर भाग खड़े होते हैं। आज दलितों में इस समस्या के समाधान के लिए डा. धर्मवीर ने युद्ध का बिगुल फूंक रखा है। अपनी जारिणीपत्नी से चले तलाक के मुकदमें पर डा. धर्मवीर की घर कथा मेरी पत्नी और भेड़ियाआज की सबसे चर्चित और समस्या का समाधान मांगती किताब है। डा. साहब ने पहली बार भारतीय न्याय व्यवस्था के समक्ष अपने बच्चों के डीएनए टेस्ट की मांग रखी हुई है। मनीषा जी को मेरी पत्नी और भेड़ियापढ़ लेनी चाहिए, तब वे उज्ज्वलाओं का समर्थन नहीं कर पाएंगी।

डीएनए रिपोर्ट का विरोध करते हुए मनीषा लिखती हैं, ‘‘एक डीएनए रिपोर्ट कई परिवारों को तबाह करने के लिए काफी है।...शंकालु टाइप के पुरुष अपनी संतान का परीक्षण कराने के लिए काफी उत्सुक रहते हैं।’’ (देखें, नाजायज सांड, वही) यहां, इन्हें बताया जाए कि डीएनए टेस्ट के बगैर क्या ऐसे परिवार और देश तबाह नहीं हो रहा। डीएनए टेस्ट से स्थिति स्पष्ट हो जाती है, इससे परिवार तबाह होने से बच जाता है। अगर किसी शंकालु (?) पुरुष को अपनी संतान का डीएनए परीक्षण करवाना भी है तो उसमें गलत क्या है? या तो उसकी शंका दूर हो जाएगी, अन्यथा जारिणी जिस से गर्भा हुई है, उसे अपने जारकर्म की पैदाइश को पालना पड़ेगा। मनीषा जी को बताया जाए, मामला बच्चे के पालन-पोषण से भी जुड़ा है। जार की औलाद को निरीह पति क्यों पाले? वह अपनी मेहनत की कमाई उस पर क्यों लुटाए?

इन्होंने यह भी लिखा है- ‘‘मां का नाम काफी है पर परंपराएं ढोने वाली ममतालू माएं छटपटा रही हैं। पुरुषों के नाम का सहारा लेने को आतुर हैं।’’ (देखें, नाजायज सांड, वही) अब ये ही जानें कि क्या कहना चाहती हैं? इन उज्ज्वलाओं को तो किसी का भी नाम नहीं चाहिए, इन्हें सांड की तरह अबाध सैक्स चाहिए। लेकिन पैदा हुआ बच्चा तो अपने बाप को पूछेगा ही। जिसके भ्रूण से वह आया है वह उस से प्यार जताना चाहता है, इसमें गलत भी क्या है? अगर वह बाप का नाम अपने नाम के साथ जोड़ना चाहता है तो मनीषा जी को क्या तकलीफ है? बगैर बाप के नाम के बच्चे भडुए ही कहलाते हैं, जो थोड़े बड़े हो कर अपनी मां के लिए दलाली करते हैं। महान चिंतक डाॅ. धर्मवीर सही कहते हैं कि वन्दे मातरमके साथ वन्दे फादरमका गीत गाना ही  चाहिए। इसमें क्या बुराई है कि बच्चे को मां और बाप दोनों का नाम पता हो? वन्दे मातरम ने ही पिछले ढाई-तीन हजार सालों से देश को गुलाम बनवाया हुआ है। लगे हाथ यह भी बताया जाए कि केरल सरकार ने राज्य में अविवाहित आदिवासी मांओं की तकलीफों की समीक्षा के लिए एक कैबिनेट पैनल का गठन किया है।’ (देखें, केरल सरकार लेगी अविवाहित मांओं की समस्याओं का जायजा, जनसत्ता, 10 अगस्त, 2012, पृ. 9) अब जब पता ही नहीं कि पैदा होने वालों का बाप कौन है तो सरकार पर दबाव आ गया है। क्या सरकार इन जारज बच्चों को पालेगी? डीएनए टेस्ट ने अब इस पहेली को हल कर दिया है। अब रामशरण जोशी को आदिवासी स्त्राी को गर्भा किए बच्चे का भरण-पोषण करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। निश्चित ही डीएनए टेस्ट का कानून बन जाने के बाद स्त्रिायों को मदद ही मिलने जा रही है। जारों ने इसीलिए अभी से इसका विरोध करना शुरू कर दिया है और इनकी समर्थकों ने जारकर्म के समर्थन में लेख लिखने शुरू कर दिए हैं।

उधर, रोहित शेखर ने कहा है- ‘‘मैं एनडी तिवारी की नाजायज औलाद नहीं, वह मेरे नाजायज पिता हैं।’’ (देखें, बाप बनकर बेटे से हारे तिवारी, हिन्दुस्तान, 28 जुलाई 2012, पृ.1) बताइए, रोहित शेखर ने तिवारी को तो नाजायज बाप बता दिया लेकिन जिस बात के लिए वे तिवारी को कोस रहे हैं, वही बात उनकी मां पर भी लागू होती है। चूंकि उज्ज्वला शर्मा जिसकी विवाहिता थीं, उस से तो उन्होंने रोहित शेखर को पैदा किया नहीं। तिवारी और शर्मा का कभी विवाह हुआ नहीं, इसलिए रोहित शेखर जारज संतान ही माने जाएंगे। रोहित शेखर को अगर अपने ऊपर से जारज का ठप्पा हटवाना है तो इन्हें अपनी मां और एनडी तिवारी का विवाह करवाने की लड़ाई भी लड़नी ही पड़ेगी। हां, 32 साल से उनको नाजायज या जारज कहे जाने की पीड़ा में दलित-विमर्शको उन से पूरी सहानुभूति है। वैसे रोहित शेखर ने तो आधी लड़ाई जीत ली है, लेकिन कुंती पुत्रों का क्या करें? उनके बाप कहां से लाएं?

रोहित शेखर ने यह भी कहा है, ‘‘तिवारी 30 साल तक झूठ बोलते रहे। वे हर बात को तोड़-मरोड़ कर पेश करते रहे। इससे उन्हें और उनकी मां को काफी मानसिक यातनाओं का सामना करना पड़ा।’’ (देखें, रिपोर्ट आने के बाद तिवारी से कन्नी काटने लगे समर्थक, सुनील दत्त पांडेय, जनसत्ता, 28 जुलाई 2012, पृ. 8) सच में, जारकर्म से पैदा हुई संतान को असहनीय पीड़ाओं का सामना करना ही पड़ता है। लेकिन उज्ज्वला शर्मा की मानसिक यातना की बात समझ से परे है। उधर तिवारी इस मामले में बेहद दुखी हैं।’ (देखें, रिपोर्ट आने के बाद कन्नी काटने लगे समर्थक, वही) तो, उज्ज्वला शर्मा और तिवारी दोनों ही दुखी हैं? फिर तिवारी तो कल तक रोहित शेखर और उज्ज्वला शर्मा को झूठा ही कह रहे थे। यह तो भला हो विज्ञान का जिसने डीएनएकी खोज करके ब्राह्मण के ऐतिहासिक झूठ पर पूरी तरह रोक लगा दी है। अब बुधिया का प्रसव करा के उसका गांव के जमींदार से डीएनए टेस्ट का मिलान किया जाना है। प्रेमचंद जिस सामंत के मुंशी बन कर लिख रहे थे, वे भी तिवारी की तरह उदारता और दयालुता का ढांेग रच ही रहे थे। हां, ‘दलित-विमर्शको बुधिया की मानसिक यातनाओं से यही मतलब है कि अब बुधिया को जमींदार के दरवाजे पर गुहार लगानी ही पड़ेगी।

इधर, आज की दलितों की बुधिया भंवरी देवी के बच्चों का भी डीएनए टेस्ट कराना है, ताकि माधव बना अमरचंद जिन सामंतों की औलाद को पाल रहा है, उनसे उसका मुआवजा लिया जा सके। असल में यह दुनिया में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा केस बनता है। निरीह माधव को सामंत जमींदार की जारज औलाद को पालना पड़ता है। उस पर दिन प्रतिदिन खर्च करना पड़ता है। बुधिया भंवरी देवी के पति ने भी उज्ज्वला शर्मा की तरह मलखान सिंह पर अपनी बेटी का बाप होने की बात सरे आम कही ही है। (देखें, indiatoday.intoday.in/story/bhanwari-devi-husband-malkhan-singh...) भंवरी देवी और उज्ज्वला शर्मा दोनों जारकर्म में लिप्त थीं। इस जारकर्म को ही द्विज राधा-कृष्णसाहित्य के नाम से रचते हैं। वह इनके गीत गाते हैं। वर्तमान में पुरुषोतम अग्रवाल अकथ कहानी प्रेम कीलिख कर इन जार संबंधों को सही ठहराने की कोशिश में लगे हैं। ये जान लें कि इस अकथ कहानी प्रेम कीसे रोहित शेखर नाम का जारज बालक ही पैदा होना है। दलितों (आजीवकों) ने अपने महान सद्गुरुओं मक्खलि गोसाल, रैदास, कबीर, स्वामी अछूतानंद, बाबा मंगू राम, डा. भीमराव अम्बेडकर और इस सदी के महानतम चिन्तक डा. धर्मवीर से सीख ली है कि निसंतान चले जाएंगे, लेकिन दूसरों की औलाद को नहीं पालेंगे।

उधर कुछ लोगों ने भावावेश में और बगैर सोचे-समझे कहना शुरू कर दिया है, ‘कोर्ट का निर्णय ऐतिहासिक है। इसने ऐसी ही पीड़ा से गुजर रही हजारों महिलाओं और अवैध होने का अपमान सह रहे बच्चों के लिए न्याय का रास्ता खोल दिया है।’’ (देखें, पूरी तरह मान्य है डीएनए रिपोर्ट, हिन्दुस्तान, 28 जुलाई 2012, पृ. 18) जहां तक कोर्ट के निर्णय की बात है तो यह सही में ऐतिहासिक है। लेकिन यहां किन महिलाओं का पक्ष लिया जा रहा है? वे जो जारकर्म में लिप्त रहती हैं? ऐसी बुधियाओं का समर्थन हरगिज नहीं किया जा सकता। उज्ज्वलाओं की द्विज जानें। हां, जारज बच्चों के लिए निश्चित तौर पर न्याय का रास्ता खुला है, जिन्हें अब जार से भरण-पोषण मिलने के रास्ते खुल गए हैं।

डीएनए की जांच के लिए न्यायालय द्वारा जब तिवारी, उज्ज्वला शर्मा और रोहित शेखर के खून की जांच का निर्णय लिया गया, तब तिवारी ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि उनकी मर्जी के खिलाफ उनके खून का नमूना नहीं लिया जा सकता। उनकी एक प्रतिष्ठा है और वह स्वतंत्राता सेनानी रह चुके हैं।’ (देखें, एनडी ही रोहित के जैविक पिता, राष्ट्रीय सहारा, 28 जुलाई 2012, पृ. 1-2) देखा जाए तो, तिवारी के इस वक्तव्य में हम भारत की गुलामी के कारणों की खोज कर सकते हैं। डाॅ. धर्मवीर ने तो जारकर्म को भारत की गुलामी का एकमात्रा कारण बताया है। द्विजों ने अपने जारकर्म की कीमत पर देश को विदेशियों को सौंपने में किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं दिखाई। वैसे भी, कोई जार और जारकर्म की पैदाइश देश के लिए क्या लड़ेगी। जार के तो लड़ने का सवाल ही नहीं उठता। जहां तक जारकर्म से पैदा संतान की बात है, वह तो अपनी पहचान को लेकर ही मरा रहता है। दाहिर से युद्ध में बाप का नाम ही पूछा गया होगा।

सही में यही है अकथ कहानी प्रेम कीऔर द्विजों की महान जार संस्कृति, जिसमें परकीया प्रेम के गीत गाए जाते हैं और राधा-कृष्ण के जार संबंधों की रस ले-ले कर चर्चा की जाती है। आज भी कीर्तनों-सत्संगों में हाथ उठा-उठा कर ये राधे-राधेही गाते हैं। तिवारी-शर्माकेस में डीएनए जांच के बाद अब इन राधावादियों के डीएनए जांच करवाए ही जाने हैं। और इस क्रम में सब से पहले बुधिया से जन्मे बच्चे और इसके समर्थकोंकी डीएनए जांच कराई जाएगी। इस केस के बाद अब उन लोगों को भी अच्छी खामी मदद मिलेगी, जो अपने जैविक पूर्वजों की खोज करना चाहते हैं, जिन्हें लगता है कि जहां उनका जन्म हुआ है, वे तो खानदानी मूर्ख हैं। वे उन के पूर्वज नहीं हो सकते। अच्छा होगा कि वे अब डीएनए टेस्ट का सहारा लेकर अपनी मूर्खता की विरासत को दूर कर लें। जब रोहित शेखर को जैविक पिता मिल गए हैं, तो उन जैसों को भी जैविक पूर्वज मिल जाएंगे।

डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद कई तरह की बातें कही गई हैं। महिला समाजशास्त्राी डा. रीना जी ने कहा है- ‘‘उज्ज्वला शर्मा के जज्बात और संघर्षपूर्ण जीवन की यह गाथा महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है।’’ (देखें, रिपोर्ट आने के बाद तिवारी से कन्नी काटने लगे समर्थक, जनसत्ता, 28 जुलाई 2012, पृ. 8) ऊपर से देखने में तो समाजशास्त्राी महोदया का कथन बेहद क्रांतिकारी दिखाई पड़ता है, लेकिन यह महिलाओं को गहरी खाई में धकेलने वाला वक्तव्य है। जारिणी का जीवन महिलाओं के लिए कैसे संघर्षपूर्ण हो सकता है? यहां किन जज्बातों की बात की जा रही है? एक शादी-शुदा स्त्राी किसी दूसरे शादी-शुदा आदमी से गर्भवती हो रही है फिर उस जारज बच्चे के नाम पर अधिकार भी मांगे जा रहे हैं? यह सच है कि बालक के साथ किसी तरह का अन्याय नहीं होना चाहिए, लेकिन उज्ज्वला शर्मा या अन्य ऐसी किसी महिला का किसी भी तरह पक्ष नहीं लिया जा सकता। इस तरह का कथन स्त्राी की गरिमा पर हमला है। यह जारिणी के पक्ष में दिया गया बयान है। किसी भी समाजशास्त्राी से इतनी तो उम्मीद की ही जाती है कि उन्हें दाम्पत्य-जीवन और परिवार की प्राथमिक परिभाषा का पता होगा। असल में यह बयान द्विज जार परम्परा में आया है।

तिवारी-शर्मा के जार संबंधों को तथाकथित लिव-इन-रिलेशनशिपभी नहीं माना जा सकता, क्योंकि दोनों शादी-शुदा हैं। तब इनके संबंध केवल और केवल जार संबंध ही हैं, और इनके संबंधों से पैदा हुई संतान जारजही होगी। असल में, यह कफनकहानी का अगला भाग है, जिसे नामवर सिंह और राजेन्द्र यादव  जी देख ही रहे होंगे। ये किसी भ्रम में ना रहें, इसलिए बता दिया जाए कि तिवारी को अपनी मृत पत्नी से तलाक लेकर उज्ज्वला शर्मा से विवाह करना पड़ेगा। फिर तिवारी और शर्मा के बेटों की खींचतान की अगली कहानी शुरू होगी। वैसे, जानने की बात यह भी है कि उज्ज्वला का अपने पति से किस बात को लेकर तलाक का केस चला था? कहीं वह तिवारी से जार संबंधों की वजह से तो नहीं था?

तिवारी-शर्मा के जार संबंधों को लिव इन रिलेशनशिपके रूप में कहने वालों ने रोहित शेखर की लड़ाई को पलीता लगाने की कोशिश की है। ये वो लोग हैं, जो जारकर्म को सही ठहराते हैं। इनसे पूछा जाए कि अगर तिवारी-शर्मा के ये जार संबंध जायज थे, तो तिवारी क्यों रोहित शेखर को अपना बेटा नहीं मान रहे? क्यों डीएनए टेस्ट से भाग रहे थे? अब क्यों इसे व्यक्तित्व या निजी मामला बता रहे हैं? क्यों उज्ज्वला शर्मा से तलाक लिया गया, बेशक इसमें 36 साल लग गए। लिव-इन-रिलेशनशिप के पैरोकारों से पूछा जाए कि इन संबंधों से पैदा होने वाले बच्चे का बाप कौन बनेगा। वह एक क्षण में उसे किसी दूसरे का बता देगा, क्योंकि यह संबंध कानूनी तो होता नहीं। कल को अगर इस पर कोई कानून बनता भी है तो वह विवाह-कानूनकी श्रेणी का ही होना है, अर्थात लिव-इन-रिलेशन विवाह कानून।तब हजारों सालों में विकसित हुए विवाह कानून में क्या गलत है? हां, अगर कुछ गलत है तो वह है जारकर्म, जिस पर तलाक के लिए प्रखर आजीवक चिन्तक डाॅ. धर्मवीर ने महासंग्राम छेड़ा हुआ है। लगे हाथ लिव-इन-रिलेशनशिप के पक्षकारों को बताया जाए कि इस संबंध (?) में रह रही स्त्राी पर लोग गिद्ध की नजर रखते हैं। फिर इन कथित लिव-इन-रिलेशनशिप में हो रही हत्याओं से सभी वाकिफ हैं ही। असल में लिव-इन-रिलेशनशिप जार समर्थकों का नया शगल है। यह जारों का बदला हुआ रूप है। स्त्रिायां इन से सावधान रहें। हां, जारिणी के लिए क्या लिव-इन-रिलेशनशिप और क्या विवाह? वह तो अबाध सैक्स चाहती है। ऐसे ही जार भी। सभ्य समाज में जार संबंध या लिव-इन- रिलेशनशिप की कोई मान्यता नहीं। हमारे यहां द्विजों ने जार-संबंधों के पक्ष में ढोल पीट रखा है। तभी तो तिवारी और शर्मा जैसे जार-जारिणी पैदा होते हैं। इस पूरे मामले में केवल रोहित शेखर के आत्मबल की प्रशंसा की जा सकती है, जिसने दलित साहित्यकार शरण कुमार लिम्बाले से प्ररेणा पा कर खुद से अवैध का ठप्पा छुड़वाने की लड़ाई लड़ी है। भारतीय समाज-व्यवस्था और साहित्य में लिम्बाले पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने खुद पर लगे अवैध संतान के ठप्पे के विरुद्ध जंग लड़ी और जीती। यहां तक की उनकी आत्मकथा का नाम ही अक्करमाशीयानी हरामजादा है। शरण कुमार लिम्बाले और रोहित शेखर जैसी हिम्मत तो फलोंसे पैदा हुए और पांडव तक नहीं जुटा पाए थे। इनकी असली जीत तो उस दिन होगी, जब देश इस पर स्पष्ट कानून बनाएगा।

12 सितम्बर 2005 के कु-कृत्य को लगभग सात साल होने को हैं। ब्राह्मणों की बुधिया तो पकड़ में आ गई है, अब बारी दलित बुधिया की है। सामंत के मुंशी ने तो चालाकी खेल कर बुधिया को मरवा कर उसे बचा लिया था लेकिन, डाॅ. धर्मवीर ने उनके जाल को तार-तार कर दिया। अब जब तिवारी का जारकर्म सामने आ गया है, तो ‘‘यह बहस जोर पकड़ रही है कि अब कितने युवक अपने को तिवारी का बेटा साबित करने के लिए न्यायालय की शरण लेंगे।’’ (देखें, रिपोर्ट आने के बाद तिवारी से कन्नी काटने लगे समर्थक, जनसत्ता, 28 अप्रैल 2012, पृ. 8) अखबार में छपे इस कयास से इंकार नहीं किया जा सकता। लगे हाथ यहां बताया जाए कि माधवअब बुधिया और जमींदार के जारकर्म पर डीएनए की मांग कर पाएंगे। अब बुधियाओं का बचना मुश्किल है। अब दलित अपनी संतान को ही पालेगा। उसे बलात्कार और जारकर्म की पैदाइश को पालने की जरूरत नहीं। अब वे द्विज परम्परा की जारकर्म की गुलामीसे मुक्त होने की कगार पर हैं। अब द्विजों को अपनी जारकर्म की पैदाइश का भरण-पोषण करना ही पड़ेगा। अगली मांग दलितों की जारकर्म पर तलाक की है, ताकि कोई बुधिया जारकर्म में गिरने से पहले हजार बार सोचे। अगर किसी को फिर भी जारकर्म में डूबना है तो डूबे, कम से कम माधव के पास तलाक का विकल्प तो रहेगा।

कुछ लोगों को मलाल है कि डा. धर्मवीर ने बगैर किसी प्रमाण के बुधिया के पेट में ठाकुर का गर्भ बताया है। वे इसे डा. साहब का कयास भरबताते हैं। वे कहते हैं कि प्रेमचंद ने अपनी कहानी में ऐसा कोई संकेत नहीं किया। तो, ऐसे आंख के अंधों को बताया जाए, उज्ज्वला शर्मा और भंवरी देवी सप्रमाण उनके सामने मौजूद हैं। अब वे बताएं कि उनका क्या कहना है? इन लेखकों को आंखें खोलकर उज्ज्वला शर्मा और भंवरी देवी के केसों का ठीक से अध्ययन कर लेना चाहिए। तब वे अपनी सभी शिकायतों का जवाब खुद-ब-खुद पा लेंगे। लगे हाथ, संकेत मांगने वाले यह तो बता ही दें कि वे अपनी पत्नी से किसी गैर मर्द के भ्रूण को पैदा करने के लिए तैयार हैं? जो इसके लिए तैयार हैं तो पालें वह जमींदार की औलाद को। आजीवक (दलित) तो अपनी परम्परा में जारकर्म पर तलाक ले लेते हैं। प्रेमचंद ने अपनी परम्परा में बुधिया को मरवाया है। इससे बड़ा संकेत इन्हें और क्या चाहिए भला?

डा. धर्मवीर अपनी प्रतिस्थापना में शत-प्रतिशत सही सिद्ध हुए हैं। देखना अब यह है कि नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, मुद्राराक्षस और कंवल भारती क्या कहेंगे? क्या ये अपनी गलत सोच के लिए खेद प्रकट करेंगे? उन दलित और गैर दलित कुकुरमुत्तों की यहां बात नहीं की जा रही जो व्यक्तिगत फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। और, जूते-चप्पल चलाने वाली दलित स्त्रिायां तो इतिहास की अभिशप्त पात्रा बन ही गई हैं। इन्होंने बुधिया के समर्थन में अपने कु-कृत्य को अंजाम दिया था। अब ये क्या कहेंगी? अच्छी बात है, ये उज्ज्वला शर्मा पर जूते-चप्पल चलाने नहीं जा रही हैं पर ये उसके खिलाफ तो बोलें, लिखें।

भारतीय इतिहास में 12 सितम्बर 2005 और 27 जुलाई 2012 के दिन को एक साथ जोड़कर देखना होगा। इससे इतिहास पर पड़ी धूल साफ  हो जाएगी। अब द्विजों के शास्त्रा-पुराणों का विलुप्त होना तय है। दलित आंदोलन गुलामी से मुक्ति की ओर बढ़ गया है। हां, अब किसी बुधिया को प्रसव में जान नहीं देनी पड़ेगी। घीसू-माधव तो अब सही में नाचेंगे और गाएंगे - ‘‘ठगिनी, क्यूं नैना झमकावै।’’( ये लेखक के अपने विचार है )

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लेखक युवा कवि, आलोचक और कला समीक्षक हैं


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