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मक्खलि गोसाल और उन का आजीवक चिंतन

कैलाश दहिया/ दलितों में आज महान मक्खलि गोसाल को ले कर जिज्ञासा पैदा हो गई है। ये जानना चाहते हैं मक्खलि गोसाल कौन थे? क्या वे सही में दलित चिंतक थे? उन का आजीवक धर्म क्या था और उस के सिद्धांत क्या थे? कुछ दलित तो गोसाल के दलित होने पर ही सवाल उठाते हैं। उधर, गोसाल पर लिखने वाले प्रक्षिप्तकार भी पैदा हो गए हैं। इन में दलित और गैर दलित दोनों ही हैं। ब्राह्मण का तो काम ही है प्रक्षिप्त और पुराण गढ़ना, इस लिए इस की बात करना बेमानी है। 

कुछ दलित खासतौर पर खुद को रविदासिया कहने वाले चमार गोसाल को कुम्हार कह कर नकारने की कोशिश भी करते हैं। ऐसे में सवाल तो बनता ही है कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर भी चमार नहीं महार थे, क्या रविदासी डॉ. अंबेडकर को भी नकारेंगे? एक रविदासी डॉ. मनोज दहिया के गुरु प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन हैं, जिन के लेखन और वाचन का केंद्र डॉ. अंबेडकर ही रहते हैं, अब मनोज दहिया क्या कहेंगे? बताया जाए, मक्खलि गोसाल ने कुम्हारी हालाहला से विवाह किया था, फिर उन के बारे में जो सूचनाएं उपलब्ध हैं, वे इस प्रकार हैं :

1. 'मक्खलि के पिता मंख थे जिसका (जिनका) नाम मंखली था।... जिसका अर्थ भाट या चारण है।' (१)

2. 'मक्खलि की माता का नाम भद्दा था।'(२)

3. 'मक्खलि जब उसके गर्भ में था तो वह अपने पति के साथ सरावन नामक स्थान पर आई। (सरावन का शाब्दिक अर्थ है सरकंडों का झुरमुट)। वहां गोबहुल (शाब्दिक अर्थ बहुत सी गायों को रखने वाला) नामक एक संपन्न व्यक्ति रहता था। भद्दा का पति गांव में रहने के लिए कोई स्थान खोजने के लिए जाने से पहले गोबहुल में 'गोसाल' (गोशाला) में अपनी पत्नी को छोड़ गया। किंतु है रहने के लिए कोई स्थान नहीं ढूंढ पाया। ये दंपत्ति उसी गोशाला के एक कोने में रहते रहे और भद्दा ने वहीं पर मक्खलि को जन्म दिया।'(३)

4. 'मंखली नामक मंख का पुत्र होने के कारण इस बालक का नाम मक्खलि पड़ गया और गौशाला में पैदा होने के कारण उसे (उन्हें) गोसाल कहा गया।'(४)

उपरोक्त संदर्भ डॉ. धर्मवीर ने अपनी किताब 'महान आजीवक : कबीर रैदास और गोसाल' में जैन ग्रंथ 'भगवती सूत्र से लिए हैं। भगवती सूत्र में यह बात खुद भगवान महावीर के मुंह से कहलवाई गई है। एक अन्य बौद्ध ग्रंथ 'सामज्ज फल सुत्त' में बताया गया है - "गोसाल एक दास था जिसने अपने स्वामी से भागने का प्रयत्न किया। एक दिन वह तेल से भरा हुआ मटका उठाकर कीचड़ वाले स्थान से जा रहा था। उसके स्वामी ने जोर से आवाज देकर कहा कि 'अरे भाई, फिसल मत जाना' (तत माखल इति)  लेकिन गोसाल लापरवाह था और उसने तेल गिरा दिया। स्वामी के क्रोध के डर से उसने भागना शुरू कर दिया।' (५) इस माखल से मक्खलि और गौशाल में पैदा होने के कारण भी गोसाल का नाम मक्खलि गोसाल हो सकता है।

अब अगर आज की जाति व्यवस्था के हिसाब से देखें तो मक्खलि गोसाल पिता के कर्म या पेशे से भाट या चारण ठहरते हैं। अब रविदासिए क्या कहेंगे?

बात यह है, 'मक्खलि गोसाल कुम्हार (या भाट जिस भी) जाति से थे और दास थे।'(६) दास का अर्थ गुलाम ही माना जाता है। आज उसी अर्थ में सभी दलित जातियां दास हैं। दासों पर अत्याचार की खबरों से अखबार पटे पड़े रहते हैं। दलितों की स्त्रियों से बलात्कार तो मानो कोई अपराध ही नहीं है। दासों की बस्तियां की बस्तियां जला कर खाक कर दी जाती हैं। इसी दासता के खिलाफ महासंग्राम करते हुए मक्खलि गोसाल ने 'आजीवक धर्म' की स्थापना की। तब यह होना ही था कि तत्कालीन सामंतों के विचारकों द्वारा गोसाल और इन के धर्म का विरोध किया जाता। यह महावीर, बुद्ध और ब्राह्मण के रूप में किया भी गया। लेकिन, इन्हें मक्खलि गोसाल का चिंतन समझ नहीं आया। इन्होंने उन के चिंतन को तोड़- मरोड़ कर प्रक्षिप्त ही नहीं किया बल्कि 'आजीवक चिंतन' से शब्द उठा कर  उन के अर्थ अपने हिसाब से बता दिए। नियति, संगति, सम्यक आजीव, अनात्मवाद  ऐसे ही शब्द हैं। इसे यूं भी समझ सकते हैं, मध्यकाल में महान आजीवक कबीर साहेब की वाणी को भी ऐसे ही प्रक्षिप्त किया गया था।

आगे बढ़ने से पहले मक्खलि गोसाल के जीवन पर नजर डाली जा सकती है। पता लगता है कि गोसाल महावीर से आयु में सात साल बड़े थे। महावीर 599 ईसा पूर्व में पैदा हुए थे। इससे गोसाल का जन्म 606 ई.पू. तय होता है। उधर, बुद्ध 563 ई.पू. में पैदा होते हैं, इस तरह गोसाल बुद्ध से 43 साल बड़े थे। तत्कालीन समय में यह दो पीढ़ियों का अंतर होता है।

दूसरे, बुद्ध की कथित ज्ञान प्राप्ति के समय 35 वर्ष की आयु थी। उस समय गोसाल 78 वर्ष के होते यानी इनके पड़दादा की उम्र के। तब, बुद्ध के पास आजीवक चिंतन की चोरी और प्रक्षिप्त करने का समय ही समय था। अभी गोसाल के मृत्यु का साल निश्चित नहीं है, फिर भी 'जैन परंपरा पर विश्वास किया जाए तो गोसाल का मृत्यु वर्ष 543 ई. पू. ठहरता है।' (७) इससे गोसाल की कुल आयु 63 साल ही ठहरती है। इस से यह निष्कर्ष निकलता है कि जब बुद्ध को कथित ज्ञान मिला उस से 15 साल पहले गोसाल की मृत्यु हो चुकी थी। लेकिन, ए. एफ. आर.  हार्नले ने  'दूसरे स्रोतों  के आधार पर अनुमान लगाया था कि गोसाल की मृत्यु संभवतः 500 ई. पू. के आसपास हुई थी।'(८) यह वह समय था जब गोसाल के चिंतन से चोरी कर के लोग चिंतक बन रहे थे। इस बात को ऐसे समझा जाए, जिस समय बुद्ध 'धर्म चक्र - प्रवर्तन करने के लिए सारनाथ झा रहे थे, उस समय उन्हें बोधगया और गया के बीच के रास्ते में'(९) आजीवक  उपक मिले थे, जिन्हें बुद्ध ने अपना कथित ज्ञान देना चाहा, लेकिन वे बुद्ध की बात सुन कर हंसते हुए अपने रास्ते बढ़ गए। नवबौद्ध जिसे बुद्धकाल- बुद्धकाल बता कर दलितों को भ्रमित करते फिरते हैं वह असल में "गोसाल युग" था। जिनके चिंतन से द्वेष मारे मारे फिर रहे थे। आने वाले समय में आजीवक  इतिहासकार सारे रहस्यों से पर्दा उठा देंगे।

मक्खलि गोसाल ने आजीवक धर्म की स्थापना की। उन्होंने जिन मूल्यों और परंपराओं को अपने धर्म का आधार बनाया, ऐसा नहीं है कि वे दलितों में पहले से नहीं थे। यह गोसाल के पहले से चली  आ रही परंपरा थी। दलित पहले से ही इन मूल्यों और परंपराओं को मानते चले आ रहे थे। दलितों में वर्ण की अस्वीकृति तभी से है जब से वर्णवादी विचार आया है। गोसाल ने इस वर्ण नकार की मानवीय परंपरा को व्यवस्थित किया है। वर्णवाद  की परंपरा इस देश में आर्यों अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के साथ आती है। जिसका सिंधु घाटी की सभ्यता के समय ही विरोध शुरू हो जाता है।

फिर, आजीवक चिंतन में बार-बार बताया गया है और जो अकाट्य तथ्य है,  आक्रमणकारी अपने साथ स्त्रियों को ले कर नहीं आते। वह बलात्कार और जारकर्म के साथ स्थानीय स्त्री से विवाह करने को मजबूर होते हैं। विवाह के माध्यम से भी वे स्त्री को गुलाम बनाते हैं। ब्राह्मणी साहित्य में इसे ढूंढने की जरूरत नहीं है। इस का विरोध भी मूलनिवासी दलितों द्वारा किया जाता है। यूं, इस तरह मूलनिवासियों और आक्रमणकारी/घुसपैठियों का चिंतन समानांतर चलता है। जो आज भी दलित साहित्य और द्विज साहित्य के अंतर के साथ मौजूद है। तभी बार- बार बताया जाता है कि कोई गैर दलित दलित साहित्य की एक लाइन भी नहीं लिख सकता। तो, इन आर्यों के समानांतर यहां के मूलनिवासी दलितों का जो चिंतन चलता है उसे मक्खलि गोसाल 575 ईसा पूर्व के आसपास व्यवस्थित कर देते हैं। इसे कुछ यूं भी समझा जा सकता है, जारकर्म इस देश में पसरा पड़ा है। दलित हमेशा से इसका विरोध करते रहे हैं, लेकिन पहली बार डॉ. धर्मवीर ने जारकर्म को इस की नाभि नाल से पकड़ कर इसे ध्वस्त करता हुआ पूरा चिंतन खड़ा कर दिया है। डॉ. धर्मवीर मानवता को जारकर्म के विरुद्ध मोरलिटी का दर्शन देने वाले पहले व्यक्ति हैं। यह ऐसे ही है जैसे आइंस्टीन ने सापेक्षता का सिद्धांत दुनिया को दिया है‌।

असल में, जारकर्म कोरोना वायरस की तरह है। यह पूरी मानवता को चपेट में लेता रहा है। इस वायरस का इलाज डॉ. धर्मवीर ने खोजा है तभी वे महान आजीवक चिंतक कहे जा रहे हैं। तो, वर्णवाद के विरोध की जिस परंपरा को मक्खलि गोसाल व्यवस्थित रूप देते हैं वह चिंतन के रूप में निम्नलिखित सिद्धांतों के साथ सामने आती है :

1. अवण्णवाद या अवर्णवाद अर्थात कोई वर्ण नहीं होता। सभी मनुष्य समान और सम्मानीय हैं।

2. स्त्री का सम्मान और उसे हाथ जोड़कर प्रणाम अर्थात अंजलि कम्म।

3. 'नो धम्मो ति', 'नो तवो ति' अर्थात ऐसा कोई धर्म या तप नहीं है जो किसी को पुनर्जन्म दिलवा सके।

4. नत्थि पुरिस्कारे- अर्थात नियति, संगति और भाव। इसमें द्विजों के पुनर्जन्म के सिद्धांत को ध्वस्त कर दिया गया है।

5. संसार शुद्धि; 'इस का अर्थ है, 'समाज के कानूनों को ठीक करना.., किसी पक्ष पर अभी कानून न बने हों तो उन्हें (नए) बनाना; यदि वे कानून अधूरे और गलत कानून बन गए हों तो उन्हें पूरे और सही करना।'(१०) इसे आज के संदर्भ में यूं समझें, आजीवक जारकर्म पर तलाक का कानून चाहते हैं और बलात्कारी को निश्चित समय में फांसी।'

6. 'मंडल मोक्ष' का अर्थ खुलता है कि मनुष्यों की हर तरह की गुलामी को मिटाया जाना है। फिर यह गुलामी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे 'मंडल' की है। और, जिस शब्द से आजीवक धर्म का स्वरूप सामने आता है, वह है अजीव। क्या है यह अजीव?

7. 'अजीव' का सीधा सा अर्थ है मरने के बाद 'अब कोई जीव या आत्मा नहीं है।'(११) कोई आत्मा नहीं है का सीधा सा अर्थ है 'अनात्मवाद।' इस से नवबौद्धों की अनात्मवाद को प्रक्षिप्त करने की बात सामने आ जाती है। यहां इन्होंने अनात्मवाद शब्द तो ले लिया लेकिन अनआत्म का ही पुनर्जन्म करवा दिया और उसे पुनर्भव का नाम दे दिया। बता दिया जाए, पुनर्जन्म को मानने वाला कोई धर्म अनात्मवादी नहीं हो सकता।

8. अजीव का विकास 'नियति' में होता है - अर्थात हमारा जन्म और माता-पिता नियत हैं। इस पर किसी का कोई जोर नहीं है। इस में अगली बात यह आती है कि इस 'नियति' को हम नहीं जानते। मध्यकाल में 'रैदास कबीर' के रूप में 'बहुरि नहिं आवना' इसी नियति का विस्तार है। ज्यादा ही कोई हठ करता है तो कबीर साहेब कह उठते हैं, 'जहवां से आयो अमर वह देसवा।' 

बताया जाए, इसी नियति से विज्ञान का विकास होता है। भौतिकवाद इसी का अंग है। गोसाल के समय जो दूसरे भौतिकवादी विचारक थे वे गोसाल की नियति को समझ उन के सम्मुख नतमस्तक हो गए थे। और, अपने संप्रदाय का आजीवक में विलय कर लिया था। आज दलितों - पिछड़ों की क्या स्थिति है, ये आजीवक नाम भर सुन कर डा. धर्मवीर से होड़ लेने की फेर में लगे हैं। ऐसा नहीं की अपने चिंतक के सम्मुख सिर झुकाए और चिंतन का विस्तार करें। इसे आजीवकों की एक कमी के रूप में देखा जाना चाहिए।

तो, गोसाल ने अपने पुरखों की अवण्णवाद और पुनर्जन्म विरोध की परंपरा पर अपना धर्म स्थापित किया। महावीर के साथ रहते हुए गोसाल ने इन के कैवल्य को भी नकार दिया। उन्होंने हालाहला से विवाह किया। इस का अर्थ है गोसाल ने संन्यास को इंकार कर दिया।  यानी मक्खलि गोसाल ने वर्णवाद, पुनर्जन्म और संन्यास को परले सिरे से खारिज कर दिया था। इसी विचारक्रम में बाकी के सिद्धांत विकसित होते चले गए। असल में द्विजों  का चिंतन जीवन से भागे हुए लोगों का चिंतन है, जबकि गोसाल जीवन में जो बुराइयां पैदा हो जाती हैं, उसके रण में समस्याओं को सुलझाने के लिए उतरे हुए हैं। महान मक्खली गोसाल का 'आजीवक धर्म' समाज व्यवस्था में दासता को मिटाने के लिए लड़ रहा था। यह कोई छोटी लड़ाई नहीं है। इस में हार इसी रूप में मायने रखती है कि यह युद्ध अभी तक जारी है।'(१२)

 

अक्सर लोग सवाल उठाते हैं, तत्कालीन समय में आजीवक  बड़ा और प्रभावशाली धर्म था, तब यह कहां खो गया? प्रसिद्ध इतिहासकार ए. एल. बाशम ने तो इसे 'एक विलुप्त धर्म' तक कह दिया। क्या सही में आजीवक विलुप्त हो गया था, क्या हुआ था? इन सवालों के जवाब इतने सीधे नहीं हैं कि हिसाब के सवाल की तरह दो गुणा दो चार बता दिया जाए। इसका एक बाहरी और बड़ा कारण तो यह था कि ब्राह्मण और बौद्ध  विदेशी कबीलों  को इस देश पर आक्रमण के लिए आमंत्रित कर रहे थे। ये इन खूंखार कबीलों के सरदारों के राजतिलक और बुद्धम शरणम गच्छामि करवा रहे थे। ये देश और समाज के साथ भितरघात ही नहीं कर रहे थे बल्कि आम लोगों को अपनी वर्ण व्यवस्था का शिकार बना रहे थे। दो बड़े कारण, जिन पर विस्तार से फिर कभी, इन में पहला है 'जारकर्म' और दूसरा है 'कौटिल्य का आजीवकों पर भारी धार्मिक कर या टैक्स।'

इन के साथ-साथ एक बड़ा लेकिन दिखाई न देने वाला कारण था, आजीवक चिंतन की चोरी और उसे प्रक्षिप्त करना। इस काम में ब्राह्मण माहिर रहा है। इसे यूं समझिए, ब्राह्मण का विवाह और विवाह व्यवस्था से कुछ भी लेना - देना नहीं। इस ने आजीवकों की विवाह व्यवस्था में अपने श्लोक घुसेड़ कर पद्धति कमोवेश वैसी की वैसी ही रखी। यानी, ब्राह्मण आजीवकों के रीति-रिवाजों का कर्ताधर्ता बन बैठा। एक बड़ा कारण यह भी रहा कि आजीवक महान मक्खली गोसाल के धर्मग्रंथ 'दिशाचार' को संभाल नहीं पाए। कुछ आजीवक इन द्विजों के हाथों बिक गए। फिर, सम्राट अशोक जैसे शासक अवण्णवाद को समझ नहीं सके और बौद्ध धर्म की तरफ झुक गए। यह आजीवक धर्म को हुआ बड़े से बड़ा नुकसान था। इसे आज के संदर्भ में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के धर्मांतरण से भी समझा जा सकता है। और, तत्कालीन समय के कंवल भारतियों और ईश  कुमार गंगानियों ने तो आजीवक चिंतन को बेच ही खाया।

अब हम आते हैं बेहद आंतरिक कारणों की तरफ। इसे हम आज की घटनाओं से बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

कभी-कभी वर्तमान को समझने के लिए इतिहास की घटनाओं को खंगालना पड़ता है। इस से वर्तमान को जानने- समझने में मदद मिलती है। बताया जाए, 'पोलासपुर में सकडालपुत्र नामक कुम्हार था जो आजीविका- सिद्धांत या गोशालक मत का अनुयायी था‌।' (१३) हुआ यूं कि उसे भगवान महावीर ने अपने पक्ष में तोड़ लिया। निश्चित ही इस से गोसाल को दुख होना ही था, और हुआ भी। हुआ क्या था? हुआ यह था, 'श्रमण भगवान महावीर ने आजीविकोपासक सकडालपुत्र से कहा - सकडालपुत्र यदि कोई पुरुष... तुम्हारी पत्नी अग्निमित्रा के साथ विपुल भोग भोगे, तो उस पुरुष को तुम क्या दंड दोगे? सकडालपुत्र बोला - भगवान मैं... असमय में ही उसके प्राण ले लूंगा।' (१४) पूछा जाए, सकडालपुत्र क्या गलत कह रहे हैं? फिर वह सच और सही बात जानते हुए भी महावीर के साथ जा रहे हैं, क्यों? सकडालपुत्र का यह कदम आजीवक धर्म पर आंतरिक नुकसान था। लेकिन, अपनी सोच में वह आजीवक ही मरा। बावजूद इसके, इस से आजीवक धर्म को बहुत नुकसान हुआ।

इस घटना का आज के आजीवक चिंतन से क्या संबंध है और इसे क्यों बताया जा रहा है? बताया जाए, आज ऐसे ही जारिणी रमणिका गुप्ता ने डॉ. धर्मवीर के साथ लगभग 25 -26 साल तक रहने का दावा करने वाले डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन को अपने पक्ष में तोड़ लिया। यह टूटना भी हुआ रमणिका गुप्ता की मैगजीन में छपने और उसके यहां 'कहानी पाठ' के नाम पर। जबकि, डॉ. साहब दलितों को लगातार चेताते रहे कि यह औरत गृहस्थ लोगों के साथ बैठने लायक नहीं है और ना ही  घरवालों को इस को अपने पास  बिठाना चाहिए। डॉ. साहब सही कह रहे थे, क्योंकि जारिणी के साथ बैठने पर दलित कौम के पास सही संदेश नहीं जाना। तो बेचैन जी का टूटना निश्चित ही दलित आंदोलन का आंतरिक और घना नुकसान है। यह तो गनीमत है कि आज आजीवकों की अगली पीढ़ी परिपक्व होकर सामने आ गई है अन्यथा तो आजीवक आंदोलन पुनः इतिहास की भूल भुलैय्या में खो सकता था।

 इस प्रकरण में हद तो तब हो गई कि अब हमें ही 'कहानी पाठ' का मतलब समझाया जा रहा है! सुरेश कुमार ने कोलकाता से प्रकाशित 'लहक' पत्रिका के जनवरी-मार्च 2020 अंक में लिखा है- "रजतरानी मीनू अकादमिक जगत से ताल्लुक रखती हैं। इस नाते उन्हें तमाम सेमिनारों और कहानी पाठ के लिए बुलाया जाता है... रजतरानी मीनू को लेकर कैलाश दहिया का मन अपार कुंठा से भरा हुआ है। इसके कारण जो हो, लेकिन एक कारण यह भी कि रजतरानी मीनू ने दलित साहित्य में उनसे कई गुना रचनात्मक योगदान किया है।" (१५) अब इस पर क्या कहा जा सकता है, अगर कलम घसीटना ही लिखना होता है तब मेरठ वाले ओमप्रकाश शर्मा का कोई कैसे मुकाबला कर सकता है?

 

 इसी क्रम में बताया जाना है, जैसे जारिणी रमणिका गुप्ता घर-बारियों के साथ बैठने लायक नहीं ऐसे ही किसी भिक्षुक, मुनि और संन्यासी को भी घर नहीं बुलाया जा सकता। यूं समझिए, रमणिका गुप्ता, भिक्षुक, मुनि और संन्यासी घर परिवार वालों के किसी काम के नहीं।ये घर को तोड़ने और मिटाने की ही शिक्षा देंगे। बेचैन जी के रूप में सकडालपुत्र की पुनरावृत्ति ही हुई है। इसमें मक्खलि गोसाल की क्या गलती है या  धर्मवीर क्या कर सकते थे? यह आजीवक धर्म को हुआ बड़ा और भीतरी नुकसान है।

इसी क्रम में एक अन्य बात और बताने लायक है। गोसाल अकेले नहीं थे। दार्शनिक और धार्मिक स्तर पर उन की एक टीम थी। इस टीम के छह सदस्य थे।(१६) जिन के नाम क्रमशः,  'शान,‌ कलंद, कर्णिकार, अच्छिद,  अग्नि वैश्यायन और अर्जुन गोमायुपुत्र थे।' (१७) इन्हीं के द्वारा आजीवकों का धर्म ग्रंथ तैयार हुआ था।' (१८) प्रसंगवश, यहां बताया जा सकता है कि शान, जिन्हें शोण भी कहा जाता है, उन के नाम पर ही बिहार की प्रसिद्ध नदी का नाम है, जिसे आज सोन कहा जाता है।

उधर डॉ. दिनेश राम ने अपनी पुस्तक 'डॉ. अंबेडकर बुद्ध से बड़े थे' की भूमिका में लिखा है - "मैं प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन और उन की पत्नी रजत रानी 'मीनू' का आभारी हूं जिन का प्रोत्साहन और सहयोग मुझे बराबर मिला है।... मुझे खुशी है कि इस पुस्तक के प्रूफ को मित्र कैलाश दहिया जी ने देखा है।... हम लोगों की एक टीम थी जो डॉ. धर्मवीर के साथ और उन के नेतृत्व में काम कर रही थी। उन के सहयोग से ही डॉ. धर्मवीर ने आजीवक धर्म और दर्शन को पूर्णता प्रदान की और एक आंदोलन खड़ा हुआ।"(१९) अब दिनेश जी से पूछा जाए, ये ऐसे कैसे लिख सकते हैं? प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन  को रमणिका गुप्ता के यहां 'कहानी पाठ' कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाए जाने के बाद, 11जुलाई, 2015 से ही डॉ. साहब बेचैन जी से संवाद खत्म कर चुके थे, और खुद इन से अन्य कारणों से इसी समय डॉ. साहब ने बातचीत बंद कर दी थी। जहां तक रजत रानी मीनू की बात है,  वह कभी भी न तीन में थी न तेरह में।

 

यह हम लोगों का सौभाग्य रहा कि हम तीनों से डॉ. साहब संवाद कर रहे थे और हमें आजीवक  चिंतन से परिचित करवा - समझा रहे थे। हम तीनों में से कोई भी कैसे दावा कर सकता है कि हमारे सहयोग से डॉ. धर्मवीर ने आजीवक धर्म और दर्शन को पूर्णता प्रदान की? असल में, डॉ. धर्मवीर अकेले ही महासंग्राम में लड़ते हुए आजीवक धर्म को सामने लाए हैं। दिनेश जी का कथन आपत्तिजनक है। हां, अगर ये कुछ करना चाहते हैं तो ये आजीवक को विस्तार दे सकते हैं। अन्य कोई दावा स्वीकार नहीं किया जाना।

कुछ इसी तरह की कमियां और कमजोरियां इन दोनों प्रसंगों से समझी जा सकती हैं। उम्मीद है दलित यानी आजीवक इस तरह की कमजोरी अपने भीतर पैदा नहीं होने देंगे। यही किसी आंदोलन की सफलता की गारंटी होती है। आशा की जा सकती है आजीवक चिंतन नित नई ऊंचाइयों को छुएगा और इस देश के मेहनतकश दलितों, पिछड़ों (जो खुद को क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र कहते हैं वे नहीं ) और आटविकों को द्विजों की गुलामी से मुक्त करवाएगा। यही महान मक्खली गोसाल की चाह थी।

 

संदर्भ : 

१ से ८, १० से १४ और १६ से १८ तक 'महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल', डॉ धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, ४६९५, २१-ए, दरिया गंज, नई दिल्ली- ११० ००२, प्रथम संस्करण : २०१७.

९ थेरीगाथा की स्त्रियां और डॉ. अंबेडकर, डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, वही, प्रथम संस्करण : २००५.

१५ स्त्री विरोधी बोल, सुरेश कुमार, लहक, जनवरी-मार्च, २०२०,  बी-३, बांदीपुर रोड, मिस्त्री पाड़ा, बांसद्रोणी, थाना- रिजेन्ट पार्क, कोलकाता- ७०००७०, पृष्ठ १२९-३०

१९ डॉ. अंबेडकर बुद्ध से बड़े थे, डॉ. दिनेश राम, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर (प्रा.) लिमिटेड ४६९७/३, २१-ए, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली- ११० ००२, पृष्ठ-११.

 

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