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विस्मृत संत की खोज

September 6, 2013

एम.अफसर  खान सागर / विनय कुमार वर्मा द्वारा लिखित पुस्तक ‘संत नरहरिदास ’ एक महान अज्ञात संत पर शोध कार्य करके बड़ी बारीकी से लिखा गया ग्रंथ है।

संत नरहरिदास को तुलसीदास के किशोरावस्था का गुरू माना जाता है। लेकिन दुःखद आश्चर्य है कि अपने को तुलसी का सच्चा पाठक साबित करने व उनकी कृतियों को अपना आदर्श मानने वाले धर्मभीरू लोगों ने तुलसीदास के सृजक को उपेक्षित कर रखा है। प्रस्तुत पुस्तक में विनय कुमार वर्मा ने गोस्वामी तुलसीदास के गुरूदेव संत नरहरिदास के जीवन, कृतित्व व दर्शन को व्यख्यायित करने के लिए जनश्रुतियों को मुख्य आधार बनाया है, जो कि तथ्यात्मक ढ़ंग से ग्रहण की गयी हैं। कुल 18 भागों में लेखक ने संत नरहरिदास के जन्म से लेकर महानिर्वाण तक की सचित्र कथा को कलमबद्ध किया है। पुस्तक में संत नरहरिदास के जीवन की अनेक चर्चित घटनाओं को समाहित किया गया है।

लेखक ने संत नरहरिदास से तुलसी के मिलन के बारे में लिखा है कि किशोरावस्था में बालक रामबोला इधर-उधर भटकते रहते थे। एक दिन राजापुर के अंजनी मन्दिर में नरहरिदास का श्रीरामकथा प्रवचन हो रहा था। प्रवचन के दौरान बालक रामबोला अगली पंक्ति में बैठकर बहुत ही ध्यान से प्रवचन सुनता और सबसे आखिर में प्रसाद ग्रहण कर जाता। प्रवचन के दौरान स्वामी नरहरिदास का ध्यान बार-बार बालक पर जाता। वह उससे काफी प्रभावित हुए और उसका नाम पूछा तो बालक ने अपना नाम तुकाराम बताया। नरहरिदास ने तुकाराम के बारे में सब कुछ जानकर उसे अपने साथ आश्रम ले आए। आश्रम में तुकाराम को अपना शिष्य बनाकर नरहरिदास ने उनका नामकरण तुलसीदास किया।

अगर कहा जाए कि गोस्वामी तुलसीदास के निर्माण में संत नरहरिदास का वही स्थान है जो श्री रामचन्द्र जी के निर्माण में महर्षि श्री विश्वामित्र का, अर्जुन के निर्माण में श्री कृष्णचन्द्र जी का तो गलत न होगा। अगर तुलसी भारतीय संस्कृत रूपी मन्दिर के प्रतिष्ठित देव है तो नरहरि उस मन्दिर के नींव हैं। संत नरहरि पारसमणि थे जो रामबोला रूपी लोहा को स्पर्श कर स्वर्ण बना दिया।

संत नरहरिदास की सम्भवतः यह पहली प्रकाशित जीवनी है जिसमें व्यापक रूप से इतनी सामग्री उपलब्ध है। संत नरहरिदास के अनुयायियों व उनकी अभंग रचनाओं के प्रेमियों के लिए यह कृति महत्वपूर्ण है। संत परम्परा में भूली-बिसरी कड़ीयों को जोड़ने के लिए पुस्तक प्रेरणा का काम करेगी।

पुस्तक- संत नरहरिदास    

लेखक- विनय कुमार वर्मा

प्रकाशक- पुस्तक पथ, दिल्ली

मूल्य- 200 रुपये (पेपर बैक संस्करण)

समीक्षक- चन्दौली (उत्तर प्रदेश) के निवासी एम.अफसर  खान सागर समाजशास्त्र में परास्नातक हैं। पत्रकार व युवा साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं । पिछले दस सालों से पत्रकारिता में है। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लेखन के साथ ही राष्ट्रीय जनहित मीडिया (हिन्दी मासिक पत्रिका) के सह-संपादक व जनहित भारतीय पत्रकार एसोसिएशन के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।

 

 

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