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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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पत्रकारिता सबसे बुरे दौर में

जब जब पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना की जाएगी, न जाने कितने अर्बन गोस्वामी जेल में डाले जाएंगे

रमेश कुमार रिपु/ पत्रकारिता की आड़ में धौंस दिखाने वालों ने पत्रकारिता का पतन कर दिया है। इतना ही नहीं कुछ लोगों ने पत्रकारिता को भी कलंकित किया है। खासकर चैनल वालों ने। जबरिया माइक लोगों के सामने डाल देते हैं कि आप को बोलना ही पड़ेगा। किसी डीएम ने बाइट नहीं दी तो उससे बदतमीजी पर उतर आए। हाथरस मामले की रिपोर्टिंग इसका प्रमाण है। टीआरपी ने प्रोटोकॉल को तमाशा बना दिया। अखबार में काम कर रहे हैं या चैनल में, कुछ पत्रकार कानून से अपने को ऊपर मान लेते हैं। आज तक की एक एंकर कहती हैं, मैं अंजना ओम कश्यप मोदी। सुशांत मामले में ये पत्रकार कम वकील ज्यादा लगी। फिर बाद में पलटी मार ली। अर्बन ने अपने चैनल के जरिये पत्रकारिता के मापदंड और शैली पर कालिख पोत दी।

ऐसा नहीं है कि सभी पत्रकार एक जैसे हैं। पुण्य प्रसून वाजपेयी हों या रवीश कुमार हर समय मोदी के खिलाफ बोलते हैं। जाहिर सी बात है वामपंथी के चोले में कांग्रेसी हैं। अब अपने को थोड़ा बदल लिए हैं। पत्रकारिता के साथ अपने मेयार को गिराने वाले कुछ और पत्रकार गिरफ्तार कर जेल भेज दिए जाएं तो हैरानी नहीं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की कल तक तरफदारी करने वाले पत्रकारों को पुलिस ने पीटा। जेल भी भेजे गए।

यह दौर ना तो गणेश शंकर विद्यार्थी का है और ना ही प्रभात जोशी का है ।आज की पत्रकारिता पतित हो गई है। यदि सरकार के खिलाफ लिखो तो विपक्ष वालों को लगता है पत्रकार और उसका चैनल बिक गया है । और यदि पत्रकार विपक्ष की भाषा बोलता है ,तो सत्ता पक्ष को लगता है पत्रकार बिका हुआ है। दरअसल पत्रकारों ने खुद को विपक्ष और सत्ता पक्ष की परिधि में खड़ा कर लिया है। जबकि उसे तटस्थ होना चाहिए । जब जब पत्रकारिता के मापदंडों की अवहेलना की जाएगी, न जाने कितने अर्बन गोस्वामी जेल में डाले जाएंगे। सच तो यह है कि पत्रकार के लिए हर दिन आपातकाल है।

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