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इलेक्ट्रानिक मीडिया ने निर्वाचन में बढ़ाया कोलाहल

मूल सवालों को किया नजरअंदाज

संजय कुमार / इलेक्ट्रानिक मीडिया आज एक मस्त हाथी की तरह हो चुका है। वह अपनी ताकत के आगे किसी को कुछ नहीं समझता है। नेता, अफसर, शासन-प्रशासन, खास एवं आम जनता सब इसके प्रभाव में आ चुके हैं। समाज और लोकतंत्र का प्रहरी मीडिया का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। कलम और कागज से आगे कैमरा, लोगो और टी.वी. स्क्रीन निकल चुके हैं। सब कुछ इसके ध्वनि प्रदूषण से सांसे फूला रहे हैं और जो मूल समाज के या फिर निवार्चन के सही सवाल है वह दबता जा रहा है।

जैसे-जैसे इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपने पांव फैलाने शुरू किये वैसे-वैसे इसका अधिकार एवं प्रभाव क्षेत्र भी तेजी से बढ़ता चला गया। हर क्षेत्र को इसने अपने दायरे में ले लिया है। आम हो या खास या फिर अमीर- गरीब या फिर अंदर हो या बाहर, हर जगह इसने अपना पांव रख दिया है। कई अहम खुलासे किये, तो कईयों के निजी जिंदगी में तांक झांक कर ऐसा कोलाहल पैदा किया किया कि लोग इससे भय खाने लगे, तो कोई इसे देवता मान बैठा।

 इलेक्ट्रानिक मीडिया ने खूब खुलासे किये। ऐसा कोलाहल पैदा किया कि हर ओर यही दिखने लगा। आज हजारों छोटे-बड़े चैनल खबरों की पोटली लेकर तैर रहे हैं। वैसे शुरूआती दौर में इलेक्ट्रानिक मीडिया थोड़ा संयम रहा था, लेकिन आज तस्वीर कुछ और है। राज-पाट, शासन-प्रशासन व नेता-अफसर यों कहे हर को अपने घेरे में ले लिया है। अक्सर यह मीडिया ट्रायल तक करता रहता है। बात निर्वाचन की करें तो यह भी इलेक्ट्रानिक मीडिया के शोर के दायरे में आये है।

देखा जाये तो इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपनी परिभाषा खुद गढ़ा है। चुनाव के दौरान अपनी ताकत के आगे सत्ता और इसके पोषकों को झुका कर रखे दिखाता रहता है। यह अलग बात है कि सत्ता पर काबिज पार्टी की जब-जब सरकारें बनी तो इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या प्रिंट उस पर दबाव बनाया जाता रहा है। यह काम अमूमन हर सरकारें करती रही हंै। जो मीडिया नहीं झुंकता उस पर सरकारी मार विज्ञापन आदि रोक कर किया जाता है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया 90 के दशक में अवतरित होता है। अपने दायरे में इसने सभी को लिया। जहंा तक निवार्चन में मीडिया के हस्तक्षेप की बात है तो शुरू से रहा है। देश की आजाद के बाद 1952 में पहला आम चुनाव हुआ था। उस वक्त इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का कोलाहल नहीं था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नाम पर आकाशवाणी का जलवा था। भले ही सरकारी ठप्पा, इस पर लगा था लेकिन आखबर से भी विश्वसनीय था। आपातकाल के दौर में यह पूरी तरह से सरकारी भोंपू ही बना रहा। सरकारी भोंपू के ठप्पा से यह बाहर निकल नहीं पाया है लेकिन निवार्चन की  खबरों में यह निरपेक्ष रहा है।

वर्ष 1952 से लेकर अब तक की स्थितियों में चुनाव और प्रेस की भूमिका व्यापक रूप से बदली है। शुरूआती दौर में मीडिया की भूमिका अहम रही, जो कई सालों तक निरपेक्ष रही। धीरे-धीरे यों कहें 90 के दशक में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दखल ने तस्वीर बदल दी। समाज के प्रति मीडिया को नजरियां बदलने लगा और फिर राजनीतिक नजरियां में यह गोते लगाने लगा। बात निवार्चन की तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका निरपेक्ष न हो कर अनिरपेक्ष होने लगी। मस्त हाथी की छवि में सत्ता के दलाल के आरोप से घिरी। निवार्चन के दौरान आरोपों के घेरे  में रहा। राजनीतिक दल ने इसका इस्तेमाल किया तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने चुनाव में खास दल के लिए चुनावी माहौल बनाया और उनसे फायदा उठाया। दलाल का ठप्पा से शर्मसार भी हुआ। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आकर्षण में इतना तेज है कि नेता एवं मतदाता इसके महाजाल में फंसता गया।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के शोर के आगे नतमस्तक इसे अपना भगवान मांनते हैं। समाज में कुछ भी घटित होता है तो सीधे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के शरण में चले जाते हंै। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी खूब इसका फायदा उठाता है। हांलाकि शुरू में यह संतुलित था। लेकिन बाद में यह सब कुछ बाजार और अपने फायदे के मद्देनजर के तहत देखता करता है।

खबरों के शोर के बीच इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पेडन्यूज का खेल शुरू किया। इसमें इसे मजा आने लगा। हर कुछ मैनेज करने की भूख बढ़ती चली गयी। नेता, राजनीतिक और चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खास दिलचस्पी ने उसके हौसले मजबूत किये। पैसे लेकर खबरों को चलाना और निवार्चन के सही खबरों को नजरअंदाज कर देना एक सोचे समझे साजिश के तहत चैनलों ने किया। यह आज भी परिपाटी जारी है। कौन सी खबर जानी है और कौन सी नहीं यह सब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने फायदे के तहत करता रहा है। नीति एवं एथिक्स सब भोथरे होते चले गये। इसने इस क्षेत्र में इतना कोहलाहल मचाया कि निवार्चन आयोग को आगे आना पड़ा। ऐसा नहीं कि पेड न्यूज का कोलाहल 90 के दशक के बाद से आया। खबरों को मैनेज करने का खेल हमेशा से होता रहा है। पक्ष या विपक्ष खबरांे के संपे्रषण के लिए पहंुच या पावर का प्रयोग करते रहे हैं। यह अलग बात है कि आज यह कण-कण में समा चुका है। चुनावों में पेडन्यूज खेल होता रहा है कुछ ने नैतिकता के साथ किया तो कुछ ने नैतिकता को तार- तार करके किया।

इस समस्या से निपटने के लिए आयोग ने खास तौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से अपील करता रहा है कि ‘पेड न्यूज’ में शामिल लोगों की पोल खोले ताकि पर नकेल कसी जाए। कानूनी सीमाओं की वजह से निवार्चन आयोग दायरे में रहा हैं। इसलिए यह पहल मीडिया की तरफ किये जाने की अपील होती रहती है। कुछ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने समस्या पर प्रभावी तरीके से लगाम लगाये जाने के पक्षधर दिखे तो कुछ ने अपना खेल जारी रखा और तरीका अलग से निकाला लिया। तभी तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कुछ के समर्थन में खबर देते हैं तो कुछ के खिलाफ जाकर। राजनीतिक दलों के विचारधारा को अपनाते हुए अपने चैनल का गाइड लाइन ही बना देते हैं। खबरों को साफ देखने से पता चल जाता है कि उनकी दिशा क्या है। पत्रकारिता के मापदंडों को वे दरकिनार कर देते है। कई चैनलों में तो एक दूसरे दलों के नेताओं को दिखाना तक प्रतिबंधित हो जाता है। चुनाव आयोग द्वारा आर्दश चुनाव संहिता लागू करने के बाद मजबूरन दिखाते हैं। हांलांकि सरकारी चैनलों पर दलों को अपनी बात रखने के लिए दल के कद के हिसाब से समय निर्धारित कर दिया जाता है।

देखा जाये तो सबसे ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का कोलाहल चुनावी सर्वे, ओपिनियन पोल, एक्जिट पोल, जनता की पंसद आदि-आदि में दिखता रहा है। जब से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पहंुच व्यापक हुई और यह अपने को ताकतबर बना लिया जब से इसने अपने आगे किसी की चलने नहीं दी। आम चुनाव हो या विधानसभा, अपने मस्तमौलेपन में सरकार बनाने और गिराने का खेल भी करता रहा। इसके किंग मेकर बनने के उदाहरण पड़े हुए है।

निवार्चन में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बढ़ते दखल से चुनाव आयोग को आगे आना पड़ा। प्रेस पर नियंत्रण पाने के लिये कई स्तर पर प्रयास हुए। इस प्रयास में पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का नाम लिया जाता है। चुनाव आयोग ने चुनावी खर्चों पर लगाम और  मीडिया को विज्ञापनों के जरिये लुभाने की कोशिश पर आंखें दिखायी। चुनाव के दौरान आयोग ने चुनावी सर्वे पर कई बार प्रतिबंध लगाया। लेकिन, जो मूल सवाल है यह है निर्वाचन के आगे मूल सवालों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने नजरअंदाज किया। सत्ता के आगे पीछे रहने से अपनी ताकत को इसने बहुत मजबूत बना लिया है, उनके इशारे पर समाज की मूल समस्या पर फोकस नहीं करता। मुद्दे को भटकाने के लिए वैसी खबरों और विषयों पर चर्चा करवाता रहता है जिसका सामाजिक महत्व रहता ही नहीं। उदाहरणों को देखते कहने में कोई परहेज नहीं कि नेता,राजनीति,सत्ता और निवार्चन के कोलाहल में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपना वजूद खोता जा रहा है,बल्कि खो चुका है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।

(साभार-मीडिया विमर्श)

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