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पत्रकारिता का 'पेड' पक्ष

December 17, 2012

अजय प्रकाश की रिपोर्ट

विदेशी निवेश के पक्ष में सेमिनार, गोष्ठियां, अखबारों में लेख, चैनलों पर प्राइम टाइम में बहस आदि के जरिये निवेश चाहने वाली कंपनियों ने कई सौ करोड़ रुपये खर्चे हैं. सन्‌ 2008 के बाद से वॉलमार्ट कंपनी ने भारतीय राजनीति, नेता, बुद्धिजीवियों और मीडिया को अपने पक्ष में करने के लिए विभिन्न तरीकों से 125 करोड़ रुपये खर्च किये...

हमारे देश में "पेड न्यूज सिंड्रोम' मुक्त और सच्ची पत्रकारिता का गला घोंट देगा, जो लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डालने जैसा होगा. प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और चुनाव आयोग को इस मामले में गंभीर प्रयास करने होंगे.' एक मलयालम्‌ दैनिक के 125 वर्ष पूरे होने के मौके पर पूर्व सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी द्वारा दिया गया यह बयान मीडिया में माफिया की पैठ को रेखांकित करता है.

हमारे देश में पेड न्यूज एक भयानक सच्चाई बन चुका है और चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता को संदिग्ध बना चुका है. राहत बस इतनी है कि नये सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने पहली चिंता पेड न्यूज को लेकर ही जाहिर की है. उन्होंने पद संभालते ही अपने पहले प्रेस वार्ता में कहा, "पेड न्यूज पर रोक लगाना मेरी पहली प्राथमिकता है.'

"हकीकत जैसी, खबर वैसी' की पंचलाइन वाले ज़ी न्यूज चैनल के दो संपादकों की 100 करोड़ की वसूली के आरोप में गिरफ्तारी का मामला अभी सुलझा नहीं है. भारतीय मीडिया के इतिहास में यह पहली इतनी बड़ी रकम की मांग है, जब समाचार चैनल के बड़े अधिकारियों को पैसे की मांग करते हुए तथाकथित वीडियो में देखा गया है. चैनल के आरोपी संपादक सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया जेल में हैं. जी न्यूज के मालिक सुभाष चंद्रा का कहना है कि वे आरोप लगाने वाले पूंजीपति और कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करेंगे. नवीन जिंदल ने एक वीडियो जारी कर देश-दुनिया के मीडिया में सनसनी मचा दी थी, जिसमें गिरफ्तार दोनों संपादक जिंदल ग्रुप की कंपनियों के खिलाफ खबर न दिखाने के बदले सौ करोड़ मांगते दिखाये गये हैं.

पेड न्यूज की परिभाषा के मुताबिक, "जो भी खबर या विश्लेषण प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक में पैसा लेकर या किसी और तरह के लाभ पहुंचाकर प्रकाशित-प्रसारित हो, वह पेड न्यूज है.' इस दृष्टि से देखें तो जी न्यूज के संपादकों की गिरफ्तारी के बाद दूसरा बड़ा खुलासा छत्तीसगढ़ से प्रसारित होने वाले चैनलों के बारे में है, जो सरकार के पक्ष में खबर दिखाने के लिए साल भर का पैकेज बनाते हैं.

एक अंग्रेजी दैनिक ने मुख्यमंत्री कार्यालय से मिले कागजातों के आधार पर दावा किया है कि हर चैनल को सरकार अपने पक्ष में खबर दिखाने के लिए चैनल की टीआरपी के मुताबिक भुगतान करती है, जो चार लाख से एक करोड़ रुपये तक है. माओवाद प्रभावित राज्य होने के कारण माओवादियों के खिलाफ झूठी खबरें प्रसारित करने के लिए सरकार चैनलों को विशेष भुगतान करती है. इसमें अपना सब कुछ बेच चुके चैनल के तौर पर सहारा समय को चिह्नित किया गया है, जबकि ज़ी 24 का रेट सबसे महंगा है. इसके अलावा ईटीवी और साधना न्यूज भी इस खेल के कुछ प्रमुख महारथियों में से हैं. आदिवासियों के कल्याण के लिए बस्तर में काम कर चुके समाजकर्मी हिमांशु कुमार कहते हैं, "छत्तीसगढ़ का नब्बे फीसद मीडिया नेताओं, उद्योगों और माफिया के लिए काम करता है. यह हाल करीब सभी खनन वाले राज्यों का है.'

इनसे पहले मीडिया दलाल नीरा राडिया के टेप-खुलासों की सनसनी ने आदर्शों की दुहाई देने वाले मीडिया का रंग-रोगन धो दिया था. टेप कांड में नेताओं, पूंजीपतियों और दलालों से खबरों के लिए तोलमोल करते कई वरिष्ठ पत्रकारों को ऑडियो टेप में सुना गया. नीरा राडिया दलाली गैंग में जिन पत्रकारों के नाम प्रमुखता से उभरे थे, उनमें एनडीटीवी की संपादक बरखा दत्त, हिंदुस्तान टाइम्स के समूह संपादक रहे वीर सांघवी और "आजतक' समूह संपादक रहे प्रभु चावला थे. इसी कडी में नवंबर के अंत में कानपुर प्रेस क्लब के महामंत्री समेत तीन पत्रकार हत्या, अपहरण और ब्लैकमेल के अरोप में गिरफ्‌तार किये गये हैं.

खुलासे के मुताबिक इन पत्रकारों का एक भूमाफिया से गठजोड था. मीडिया विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं, "हर खुलासे में सिर्फ पत्रकार ही संदेहास्पद बनता है. वह इस खेल का एक मोहरा मात्र होता है. मीडिया उद्योगपति ही असल अपराधी है.' लेकिन सवाल यह है कि जब तमाम पत्रकार ही मालिक बन गये हैं, तो आखिर दलाली में सिर्फ पूंजीपतियों को ही कैसे असल अपराधी माना जाये. वरिष्ठ पत्रकार पीसी लोहमी कहते हैं, "पेड न्यूज का बड़ा कारण पत्रकारों को दी जाने वाली कम तनख्वाह और ठेके की नौकरी है. दो-चार सौ रुपये लेकर खबर छापने वाले ये पत्रकार मीडिया की बढ़ती ताकत के कारण अब माफिया बन गये हैं.'

मीडिया से माफिया तक के सफर का पहला एहसास देश को तब हुआ, जब सन्‌ 2004 से 2009 के बीच पेड न्यूज को लेकर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने एक रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट में प्रमुखता से कहा गया कि चुनावों के समय अखबार पैसा लेकर पार्टियों और उनके नेताओं के पक्ष में खबरें छापते और माहौल बनाते हैं. प्रिंट मीडिया में पेड न्यूज के सर्वाधिक बदनाम नामों में वैसे तो सभी शामिल हैं, लेकिन जिन राज्यों में जिस अखबार की पहुंच ज्यादा है, वह उतना ही बड़ा वसूली अभियान को अंजाम देता है.

पिछले बिहार विधानसभा चुनावों में "दैनिक हिंदुस्तान', "प्रभात खबर' और "दैनिक जागरण' का नाम प्रमुखता से उभरा था तो उत्तराखंड में "अमर उजाला' बदनाम रहा है. पेड न्यूज पर पहला बड़ा खुलासा पिछले महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के दौरान "दैनिक लोकमत' के बारे में हुआ था. यह खुलासा प्रसिद्ध पत्रकार पी साईंनाथ ने किया था. "पंजाब केसरी' ने हरियाणा-पंजाब में, "दैनिक भास्कर' ने अपनी पहुंच वाले करीब सात राज्यों में भी यही किया.

पूर्व सांसद गौरीशंकर राजहंस कहते हैं, "पेड न्यूज की बीमारी नयी नहीं, अस्सी के दशक की है. उस समय विज्ञापन के रूप में उन नेताओं ने खबर छपवानी शुरू की, जिनका कोई जनाधार नहीं था और हालत यह हुई कि 2000 आते-आते आधारविहीन नेता अखबारों के सूरमा बनने लगे और जमीनी नेता हाशिये पर पहुंचने लगे. अब तो नेता बनने की शर्त ही हो गयी है कि आप पेड न्यूज का सहारा लें.' मीडिया विश्लेषक प्रंजय गुहा ठाकुरता की राय में, "पेड न्यूज के कारण मीडिया में पैसे की भूख और सड़ांध दोनों पैदा हुई और मैनेजर ही असल पत्रकार बनकर उभरे हैं.'

हाल ही में खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मिली सरकार द्वारा 51 फीसद मंजूरी के पीछे भी पेड न्यूज का खेल रहा है. विदेशी निवेश के पक्ष में सेमिनार, गोष्ठियां, अखबारों में लेख, चैनलों पर प्राइम टाइम में बहस आदि के जरिये निवेश चाहने वाली कंपनियों ने कई सौ करोड़ रुपये खर्चे हैं. सन्‌ 2008 के बाद से वॉलमार्ट कंपनी ने भारतीय राजनीति, नेता, बुद्धिजीवियों और मीडिया को अपने पक्ष में करने के लिए विभिन्न तरीकों से 125 करोड़ रुपये खर्च किये. खुदरा में विदेशी निवेश के लिए सरकारी मंजूरी दिलवाने में लगी अमेरिकी कंपनी वॉलमॉर्ट ने यह स्वीकारोक्ति अमेरिकी सीनेट में दाखिल अपनी रिपोर्ट में की है.

इस खबर के प्रसारित होने के बाद भाजपा प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा था कि "यह फ्‌लोर मैनेजमेंट नहीं, फंड मैनेजमेंट था.' एफडीआइ के सख्त विरोधी माने जाने वाले कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं, "देश में एफडीआई को लेकर मीडिया एक विरोधी माहौल बना सकता था, लेकिन उसकी खबरों से लगता रहा कि वह खुद भी एक भागीदार है. वॉलमार्ट के 125 करोड़ रुपये में मीडिया की हिस्सेदारी न हो, यह असंभव है.' (http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-00-20/25-politics/3464-paid-patrakarita-india-journalism  से साभार )।

ajay.prakash@janjwar.com

 

 

 

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