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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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पत्रकारों को नहीं लेना चाहिए सरकारी योजना के तहत लैपटॉप ?

September 18, 2013

मालिक व प्रबंधक खुद क्यों लेते हैं केन्द्र व राज्य सरकार के विज्ञापन

श्याम नारायण रंगा। एक बड़े समाचार पत्र समूह ने अपने यहां कार्य करने वाले अधिस्वीकृत पत्रकार बंधुओं को यह कहकर सरकारी योजना के अंतर्गत लैपटॉप लेने से मना कर दिया है कि उनको सरकारी खैरात नहीं लेनी चाहिए और ना ही सरकारी टुकड़ों पर पलने की आदत डालनी चाहिए। मैं ऐसे समाचार पत्र का मालिकों व प्रबंधकों से पूछना चाहता हूं कि अगर ऐसा ही है तो वे खुद क्यूं केन्द्र व राज्य सरकार के विज्ञापनों को अपने अखबार में छाप कर पैसा कमाते हैं। क्यूं वे सरकारी विज्ञापनों के लिए भागमभाग करते हैं और अगर कोई सरकारी अधिकारी व राजनेता विज्ञापन देने से इंकार करे तो अपना अखबारी डंडा चलाकर क्यूं धाक जमाते हैं।

प्रबंधकों व मालिकों के लिए तो ऐसा करना सही है क्योंकि इससे उनकी खुद की जेबें भरती है और योग्यता से बहुत कम कीमत पर काम करने वाले पत्रकार भाइयों के लिए ऐसा करना गलत है, मित्रों क्या ऐसी दोहरी नीति ठीक है और यहां यह भी गौर करने की बात है कि अगर कोई पत्रकार भाई अपने मालिकों के इस आदेश के विपरीत जाकर अपने हक के अनुसार लैपटॉप ले लेता है तो उसको नौकरी से निकाल दिया जाएगा। इस समाचार पत्र ने एक समय पर अपने पत्रकारों पर प्रेस कांफ्रेस के दौरान दिए जाने वाले उपहारों व नाश्तों तक पर रोक लगा रखी थी जबकि इनके मालिक खुद बड़े बड़े नेताओं उद्योगपतियों से उपहार लेते है और काफी मौकों पर उनको उपहार पहुचाते भी है। 

एक और तथ्य सामने आया है कि कई बड़े समाचार पत्र समूह ऐसे हैं जो अपने यहां लम्बे समय से कार्यरत पत्रकारों को अधीस्कृकरण करवाने से भी मना कर रहे हैं और काफी सम्पादक व सीनियर पत्रकार अपने अधीनस्थ साथियों को अधिस्वीकृण होने नहीं दे रहे हैं। यह भी एक गलत बात है क्योंकि सीनियर सम्पादकों को यह लगता है कि कहीं मेरा गौरव कम न हो जाए और मेरे अधीनस्थ कार्य करने वाला पत्रकार मेरे बराबर का न हो जाए। 

मित्रों मैं बताना चाहूंगा कि विभिन्न मुद्दों पर आवाज उठाने वाले व समाज की विभिन्न कमजोरियों पर बेबाक टिप्पणी रखने वाले साथ ही जुल्म के खिलाफ व शोषण के खिलाफ एवं कम मजदूरी के खिलाफ बोलने वाले पत्रकार बंधुओं के साथ कईं मामलों में शोषण होता है पर बेरोजगारी के इस दौर में यह मजबूरी है कि पत्रकार बंधु अपने ही खिलाफ होने वाले इस जुल्म के खिलाफ बोल नहीं पाते हैं। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि महज तीन हजार से पांच हजार रूपये में भी पत्रकार मित्र काम कर रहे हैं और काफी ऐसे भी मिल जाएंगे जिनको इतना मेहनताना भी महीने भर में मिल नहीं पाता है। अगर हम पांच हजार महीने की तनख्वाह भी मानें तो प्रतिदिन का 167 रूपया बनता है जबकि इस प्रदेश में न्यूनतम मजदूरी की दर अकुशल मजदूर की 166 रूपये अर्धकुशल की 176 रूपये व कुशल मजदूर की 186 रूपये तय की गई है और इस हिसाब से देखा जाए तो पत्रकार को अकुशल मजदूर माना जा रहा है और जहां पांच हजार से कम का वेतन मिल रहा है वहां तो हालात और भी खराब है। इसके साथ साथ यह भी बात गौर करने की है कि पत्रकार अपने समाचार पत्र के लिए सिर्फ पत्रकारिता ही नहीं करता वरन् विज्ञापन संग्रहण का कार्य भी उसके जिम्मे ही होता है जिसमें से उसको कुछ कमीशन दे दिया जाता है। साथ साथ समाचार पत्र के प्रबंधक व मालिक अपने इस पत्रकार नौकर से किसी भी तरह का दूसरा कार्यालयी कार्य भी करवा सकते हैं जिसको करने के लिए वह बाध्य है। ऐसी स्थिति में प्रबंधकों व मालिकों द्वारा सिद्धांतों के नाम पर पत्रकारों को अपने हक से वंचित करना कहां तक न्यायसंगत है। सरकार की कोई योजना अगर सिर्फ पत्रकारों के लिए बनी है तो निःसंदेह उसका फायदा पत्रकार ही उठाएंगे दूसरा कोई नहीं जैसे सरकारी विज्ञापन का फायदा सिर्फ अखबारों को ही मिलता है। ऐसी स्थिति में अखबार के मालिकों को सोचना चाहिए कि उनका यह कदम कितना हितकारी है। 

श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’

पुष्करणा स्टेडियम के पास

बीकानेर

मोबाईल 9950050079

 

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bhaut achaa likha hai aapne aur mai bhi ish baat se sahmat hun ki journalist k liye jo niyam banaye gaye hein ya jayenge ush ka hak ushe hi milna chahiye."daro mat doston aage aao ayr apne kaam ,aur subhidha k liye lado"



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