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राजनीतिक खेमे में पटना के पत्रकार ?

August 24, 2013

फेंकूडॉटकॉम को लेकर खींचतान

पटना। लांचिग के साथ ही विवादों में आ गया है फेंकूडॉटकॉम। कल धूमधाम से लांचिग के बाद शहर के दूसरे कई पत्रकारों ने कहा कि गुजरात के मुख्यमंत्री के विरोध में यह सनसनी फैलाकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश है। उनका कहना है कि ऐसा कर मीडिया में ‘फूंक-फांक डाट काम’ सनसनी न फैलाये।

गौरतलब है कि कल ही डबल्यूडबल्यूडबल्यूफेंकूडॉटकॉम बेवसाइट को लांच किया गया। पटना से प्रकाशित एक प्रमुख अखबार ने नरेंद्र मोदी विरोधी इस खबर को प्रमुखता से जगह दी है। राज्य के वारिष्ठ साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों के हाथों की गई लांचिग की खबर सचित्र प्रकाशित की गई है। अखबार की खबर से यह बात सामने आती है कि यह वेबसाइट कथित तौर पर गुजरात मॉडल की उन सच्चाइयों को जनता के बीच लाने के लिए लाई गई है, जिनसे जिससे लोग वाकिफ नहीं हैं।

इसके बाद आज बिहार के कई पत्रकारों की ओर से ज्ञानवर्द्धन मिश्र द्वारा हस्ताक्षरित एक बयान जारी किया गया है, जिसमें बेवसाइट की आलोचना की गई है।  

देखिए जारी बयान

बिहार के कई पत्रकारों ने कहा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध में जो शक्तियां लगी हैं वे चुकी हुई हैं। फूंक-फांक काम जैसी वेबसाईट अनावश्यक रूप से मीडिया मे सनसनी फैलाकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश में है।

वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन आफ बिहार के संरक्षक और वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानवर्द्धन मिश्र, अशोक विचार मंच के अध्यक्ष रंजन सिंह और वरिष्ठ पत्रकार राकेश प्रवीर ने आज यहां जारी एक संयुक्त बयान मे कहा कि ‘‘      नरेन्द्र मोदी का सच लाएगी फेंकू.काम’’ पढ़कर कहा जा सकता है कि देश की राजनीति आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां से दो रास्ते जाते हैं - एक नरेन्द्र मोदी की ओर और दूसरा नरेन्द्र मोदी से दूर। कहने की जरूरत नहीं कि राजनीति का सन्दर्भ आज सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी हैं, दूसरा कोई नहीं। उनको लेकर विरोध की धारा जितनी प्रबल है, उससे कहीं अधिक वेगवान है उनके समर्थन की धारा। नरेन्द्र मोदी अपनी संकल्प-शक्ति और कार्य प्रणाली से देश के युवाओं का दिल जीतते चले जा रहे हैं, उनकी इस लोकप्रियात से घबराकर उनके विरोधी अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं।

पत्रकारों ने संयुक्त बयान में कहा है कि फेंकू. काम जैसी वेबसाइट के प्रवर्तकों को बखूबी पता है कि आज जनता की मांग क्या है। सर्च इंजिनों पर सबसे ज्यादा खोज नरेन्द्र मोदी के नाम की होती है, इसके बाद ही किसी और राजनेता का नाम आता है। इसी बात का लाभ उठाकर कुछ लोग अपने वेबसाईट पर हिट बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं जो लोग इंटरनेट से वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि कोई वेबसाईट सिर्फ एक जगह से ही लांच हो सकती हैं, इसके साथ ही उसकी पहुंच विश्व भर में हो जाती है, जबकि इस साईट के करता-धरता इसे 19 शहरों से लांच हुआ बात रहे है। बात को बढ़ा-चढ़ा कर कौन रख रहा है, यह इसी से समझा जा सकता है। फेंकू वे हैं या कोई और।

साहित्यकार समाज के लिये होता है सियासत के लिए नहीं। राजनीति का लबादा ओढ़ लोग जिस प्रकार से साहित्य और साहित्यकार का प्रर्वतक होने का स्वांग भरकर राजनीति में शिरकत कर रहे हैं यह लोकतंत्र के लिए एक अशुभ संकेत है।

 

 

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जहां तक मुझे पता है ये राकेश प्रवीर और ग्यान्वर्धन मिश्र दोनो भाजपा के दो बड़े नेताओं क्रमश: मंगल पांडे और नंदकिशोर यादव के मीडिया सलाह्कार है अत: इन दोनो ने अपने –अपने आकाओं से के पेड आदमी की तरह नरेंद्र मोदी के गुण गाना शुरु कर दिया. चलिये भाई पैसा के निये क्या नहीं किया ज सकता. वैसे एक बात नहीं समझ नहीं आती कि एक अंतराष्ट्रीय ह्त्यारे के लिये, जिसके काले और नृशंस कारनामों के कारण दुनिया के कई बड़े देशों में जाने की भी इज़ाजत नहीं है, उसकी वकालत पत्रकार कहने का दवा क्रने वाले लोग पैसा लेकर कर रहे हैं ये कितनी शर्म की बात है. इन दोनो महानुभावों के कच्चे चिट्ठे नहीं खोलना चाह्ता वरना ……. वैसे इसमे से एक पत्रकार को उसकी दलाली के लिये आज अखबार से उसका फ़ोटो छापकर निशःकासित किया गया था. क्या किया जाये अभी नरेंद्र मोदी को बिहार में ऐसे ही लोग भाड़े पर मिल रहे हैं कुछ दिनो पहले बिहार के राजनीतिक जीवन में जो कुछ भी बुरा और काला है उसके प्रतीक साधू यादव से नरेंद्र मोदी ने 45 मिनट तक बातें की, उसकी आवभगत की इससे उस आदमी के बारे में समझा जा सकता है. जाहिर हैं ये दोनो भी (वैसे हमको लगता था कि राकेश प्रवीर कुछ अलग हैं) साधू यादव के पत्रकारीय संस्करण है. शर्म है एक अंतराष्ट्रीय अपराधी के भाड़े के पत्रकारों!

रमेश जी लगता है आपने ठीक से इसे नहीं पढ़ा । ज्ञान बाबू हो या कोई और। अगर यह कहा जाए की इसके लोंचिग के समय कई पत्रकार-लेखक मौजूद थे जो किसी न किसी पार्टी से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जुड़े है ....आप को तो पता ही होगा ....सवाल यह है कि चाहे ज्ञान बाबू हो या कोई और पत्रकार। उसे अपनी भूमिका तटस्थ रखनी चाहिए जो एथिक्स कहता है ।

मीडिया मोरचा के संपादक जी
आपको पता होगा कि ज्ञान बाबू भाजपा में सक्रिय हो गये हैं। उनका मूल कार्यक्षेत्र अब भाजपा की राजनीति और उसकी गतिविधियों को प्रचारित-प्रसारित करना है। मोरचा को यह बात पता होनी चाहिए कि ज्ञान जी अब पत्रकारिता में रहते तो ऐसा काम नहीं करते जिसे आप उदृत कर पत्रकारों के चार खंड में बंटने की बात कर रहे हैं। पत्रकारों की प्रतिबद्धता अच्छी बात है।
रमेष



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