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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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सामाजिक क्रांति के महानायक पत्रकार डॉ. अम्बेडकर

अंबेडकर जयंती, 14 अप्रैल पर विशेष

संजय कुमार/ संविधान निर्माता और बहुजनों के मसीहा डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर महान एवं जुझारू पत्रकार भी थे। डॉ. अम्बेडकर ने ‘मूकनायक’ पाक्षिक अखबार के जरिये 31 जनवरी 1920 को सामाजिक क्रांति का जो बीज, पत्रकारिता की दुनिया में बोया था वह अम्बेडकरी पत्रकारिता़ के रूप में 100 साल का सफर पूरा करने जा रहा है। मुख्यधारा की मीडिया में गांधी, तिलक, राजेन्द्र प्रसाद, आदि की पत्रकारिता की चर्चा तो खूब होती है, लेकिन डॉ.अंबेडकर ने जो और जिस तरह की पत्रकारिता की थी उसकी चर्चा नहीं के बराबर दिखती है। जितना आसान गांधी, तिलक, राजेन्द्र प्रसाद आदि की पत्रकारिता थी उतनी डॉ.अंबेडकर की नहीं। डॉ. अंबेडकर की पत्रकारिता खास और अलग थी। समाज और देश को आइना दिखाने वाली वंचित समाज की पत्रकारिता थी।

डॉ. अंबेडकर के सामने उद्देश्य के साथ-साथ मिशन और एक लड़ाई की तरह पत्रकारिता थी। जो, जाति के सवाल को लेकर, अछूत और पिछड़ों के हक को लेकर थी। कह सकते है कि समाज में व्याप्त गैर-बराबरी के सवाल को लेकर एक ऐसा वैचारिक युद्ध, जो समाज में सभी जाति को बराबरी देने को लेकर था। जहाँ  एक ओर पत्रकारिता एक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए खड़ी थी, वहीं उसमें वंचितों की समस्याओं और सवालों को जगह नहीं दी जाती थी। वंचित वर्ग पत्रकारिता की छाया से दूर ही नहीं रहा बल्कि, उनकी ओर ताका तक नहीं जाता था। ऐसे में डॉ. अंबेडकर ने बेजुबानों का नायक बन ‘मूकनायक’ के प्रकाशन की घोषणा की और विज्ञापन पूरी षुल्क के साथ तिलक के समाचार पत्र ‘केसरी’ में दिया। तिलक ने विज्ञापन को छापने से साफ इंकार कर दिया था। डॉ.अंबेडकर एक पत्रकार की भूमिका में आये, उन्हें लग गया था कि मीडिया एक सशक्त माध्यम है, जो बहुजनों को गोलबंद कर सकता है। बाबा साहब का मानना था कि दलितों को जागरूक बनाने और उन्हें संगठित करने के लिए उनका अपना स्वयं का मीडिया का होना बहुत जरूरी है। इसी मकसद के लिए उन्होंने 31 जनवरी, 1920 को मराठी पाक्षिक ‘मूकनायक’ का प्रकाशन प्रारंभ कर, पहल शुरू की। डॉ. अंबेडकर ने कलम को थामा और उसे सिपाही बनाया। स्वयं ही अपने सीमित साधनों से समाचार पत्र का प्रकाशन किया। हालांकि, कई तरह की दिक्कतें आयी। डॉ.अंबेडकर हारने वालों में से नहीं थे, लड़ाई लड़ते रहे। समाचार पत्र वंचित समाज में बदलाव लायेगा, इस बात का उन्हें भरोसा था। वे जानते थे कि सामाजिक आन्दोलन या क्रांति में समाचार पत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हैं। ज्यादा पढ़ी लिखी जनता नहीं थी, केवल मराठी ही समझ पाती थी। ऐसे में उन्होंने मराठी पत्रों का प्रकाशन एवं सम्पादन किया। ’मूकनायक’ (31जनवरी,1920), ‘बहिष्कृत भारत’ 3 अप्रैल,1927), ‘समता’ (29 जनवरी, 1928), ‘जनता’ (24नवंबर,1930) एवं ‘प्रबुद्ध भारत’ (14अक्टूबर,1956) पत्रों का प्रकाशन शुरू कर डॉ.अम्बेडकर ने देश की सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक सहित अन्य मुद्दों पर अपनी धरदार लेखनी से पत्रकारिता की शुरूआत की।

दलित पत्रकारिता के आधार स्तम्भ डॉ. अम्बेडकर दलित पत्रकारिता के पहले संपादक, संस्थापक एवं प्रकाशक बने। उन्होंने जिस तरह, ‘मूकनायक’ से सामाजिक पत्रकारिता की शुरूआत कर ‘प्रबुद्ध भारत’ तक की पत्रकारिता यात्रा की और शानदार सामाजिक एवं जनपक्षीय पत्रकारिता करते रहे वह अपने आप में खास थी। जो, बाबा साहब को एक महान पत्रकार-संपादक के रूप में स्थापित करता है।

बाबा साहब ने मूकनायक, बहिष्कृत भारत, समता, जनता और प्रबुद्ध भारत समाचार पत्रों के माध्यम से अपने विचारों से स्पृश्य यानी अछूतों को जागृत करने का काम किया। समाचार पत्रों ने दलितों की सोच एवं जीवन में परिवर्तन लाने का काम किया। डॉ. अंबेडकर ने 1945 में कहा था कि और दलितों के पास अपना कोई प्रेस नहीं है। और जो प्रेस है, उसका दरवाजा दलितों लिए बंद है। अछूतों का अपना प्रेस हो ही नहीं सकता। कारण बिल्कुल साफ है। कोई भी प्रेस विज्ञापन की आय के बिना जिंदा नहीं रह सकता है।

31 जनवरी, 2020 को ‘मूकनायक’ पाक्षिक पत्र का शताब्दी वर्ष है। यह ऐतिहासिक मौका है। ‘मूकनायक’ के जरिये बाबा साहब उनकी आवाज बने थे जो समाज में दबे कुचले थे। जिनमें अपनी आवाज उठाने की ताकत तक नहीं थी। ‘मूकनायक’ पाक्षिक पत्र को निकाल कर अम्बेडकर ने दलित मीडिया की एक ऐेसी आधारशिला रखी जिसने उस वक्त के हिन्दूवादी मीडिया के मुंह पर तमाचा मारते हुए उनकी बोलती बंद कर दी थी।

इतिहास के पन्ने गवाह है कि भारतीय मीडिया ने बहिष्कृत लोगों की आवाज बनने की बात तो दूर उनकी ओर ताका तक नहीं। हालात आज भी वैसा ही है। आज का जो मीडिया है वह भी बहुजन समाज को तरजही नहीं देता। डॉ.अंबेडकर ने जिस दौर में दलित पत्रकारिता की शुरूआत की थी, इन बातों को डॉ.अंबेडकर समझते थे और मीडिया के पक्षपात पूर्ण रवैया से लोहा लेने के लिए मीडिया में प्रवेश किये। बाबा साहब ने 1943 में भारतीय मीडिया को हिंदू और कांग्रेसी मीडिया कह कर संबोधित किया था। भारतीय मीडिया पर डॉ.अंबेडकर को कतई भरोसा नहीं था।

डॉ.अंबेडकर ने 36 वर्षों तक पत्रकारिता की। एक संपादक एवं पत्रकार की भूमिका में निष्पक्ष रहते हुए काम किया। समाज के ठेकेदारों, राजनीतिक दलों एवं नेताओं के साथ-साथ मीडिया के खिलाफ भी लंबी लड़ाई लड़ी। डॉ. अंबेडकर द्वारा प्रकाशित पत्रों में मूकनायक, बहिष्कृत भारत, समता, जनता और प्रबुद्ध भारत का आकलन करें तो तस्वीर साफ दिखती है। डॉ.अंबेडकर की पत्रकारिता के खास मकसद थे। समाचार पत्रों के नामों को ध्यान से देखें तो सभी नामों में एक खास मकसद छुपा हैं। एक घार है, जो संदेश देता है। बाबा साहब अपने पत्रों के नाम के जरिये वंचित समाज को निश्चित दिशा में ले जाने के लिए संधर्ष करते रहे।

’मूकनायक’ को ही लीजिये। नायक का शाब्दिक अर्थ होता एक दिशा देने वाला। डॉ. अंबेडकर पूरे ‘बहिष्कृत भारत’ की बात करते हैं। वैसा भारत जहाँ एक ओर समाज में ऐसे लोग है जिन्हें सब कुछ करने की आजादी है जबकि दूसरी ओर समाज में दूसरे यानी अछूत लोगों पर प्रतिबंध है। वे बहिष्कृत है। डॉ.अंबेडकर ने ‘बहिष्कृत भारत’ के लोगों की आवाज को, इस पत्र में जगह देते हुए  आवाज बुलंद कर ‘समता’ समाज की वकालत ही नहीं बल्कि अधिकार की लड़ाई ‘समता’ पत्र से लड़़ी। फिर ‘जनता’ को लेते हुए भारत को प्रबुद्ध भारत बनाने के लिए ‘प्रबुद्ध भारत’ पत्र निकालते हैं। जहां बाबा साहब के समाचार पत्रों में प्रगतिशीलता के साथ-साथ सामाजिक परिर्वतन की बात थी। वहीं, उस दौर के अखबारों के नामों में और आज के अखबारों में भी ठहराव नजर आता है। बाबा साहब ने जितने भी समाचार पत्र निकालें उसमें बहुजन आंदोलन की जड़ें थी। हासिये के लोगों थे। एक समाज था।

मूकनायक, बहिष्कृत भारत, समता, जनता और प्रबुद्ध भारत केवल समाचार पत्र ही नहीं थे, बल्कि अपने आप में एक हथियार थे। एक ऐसा हथियार जो आजादी व मुक्तिगाथा के शब्दों से पिरोया हुआ था। तभी तो अंबेडकर भी मीडियानुमा हथियार की ताकत को जान कर सामाजिक क्रांति के अग्रदूत बहुजन आंदोलन में मीडिया की आवश्यकता पर जोर देते हुए अपनी राजनीतिक पार्टी की राज्यों को भी अपना पत्र निकालने के लिए प्रोत्साहित किया था। सिर्फ खुद ही पत्र नहीं निकालते थे बल्कि अपने समाज के लोगों एवं संगठन के लोगों को भी कहते थे कि वह पत्रिका  के माध्यम से लोगों को गोलबंद करें। ‘मूकनायक’ के कुल 19 अंक निकले थे। अंक 12 तक मुख्य पत्रिका लेखन पूरी तरह से बाबा साहब ने किया 5 जुलाई 1920 को बाबा साहब लंदन चले गए। उसके बाद उनकी जिम्मेदारी ज्ञानदेव रुवनाथ घोलप जी ने उठाई और अंक13 से 19 कुल 7 अंक निकाले थे ।

‘मूकनायक’ के प्रवेशांक के संपादकीय में डॉ.अंबेडकर ने इसके प्रकाशन के औचित्य पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए लिखा था, खासकर समाज में व्याप्त जाति के सवाल को लेकर। बाबा साहब ने अपने पहले संपादकीय में हिंदू धर्म में व्याप्त भेदभाव को सवालों के घेरे में लिया। वे लिखते हैं, मैं हिंदू हूं कहने मात्र से समाधान नहीं होगा, उसे उसकी जाति क्या है यह बताना जरूरी होता है। मतलब यही होता है कि हिंदू को उसकी मानवीय पहचान दिखाने के लिए प्रत्येक हिंदू को जातिगत भेदभाव दिखाना पड़ता है। संपादकीय में हिंदू धर्म की आलोचना करते हैं। वे लिखते हैं कि भेदभाव जितना अनुपम है उतना ही निंदनीय भी। क्योंकि भेदभाव पूर्ण आचरण में से हिंदू धर्म का जो स्वरूप बनता है वह हिंदू धर्म की पवित्रता को शोभा नहीं देता। हिंदू धर्म में जो जातियां है ऊंच-नीच की भावना से प्रेरित होती है। हिंदू समाज का स्वरूप एक मीनार की तरह है जहां हरेक जाति उस मीनार की मंजिल के रूप में है। लेकिन यहां एक बात याद रखनी चाहिए कि इस मीनार की मंजिलों के बीच कोई सीढ़ी नहीं होती है। इसलिए एक मंजिल से दूसरी मंजिल पर जाने का कोई मार्ग नहीं मिलता है। जो जिस मंजिल में जन्मा है उसी में उसे मरना होता है। नीचे की मंजिल का मनुष्य कितना लायक क्यों ना हो उसके लिए उसे ऊपर की मंजिल पर प्रवेश नहीं मिल सकता तथा ऊपर की मंजिल का मनुष्य कितना भी नालायक क्यों न हो उसे नीचे की मंजिल में भेजने की ताकत किसी में नहीं है। बाबा साहब लिखते हैं कि सीधे तौर पर कहा जा सकता है कि जाति-जाति के बीचए ऊंच-नीच की भावना मनुष्य के गुण-अवगुण की नीवं पर नहीं रखी गई है, ऊंची जाति में जन्मा व्यक्ति कितना भी अवगुणी क्यों ना हो, उसे उच्च जाति का ही कहना पड़ता है। उसी तरह नीची जाति में जन्मा व्यक्ति कितना भी गुणवान क्यों ना हो उसे नीच ही कहा जाता है। दूसरे, उन लोगों में एक दूसरे के बीच रोटी बेटी का व्यवहार भी नहीं होता। इसके हर एक जाति में भाईचारे के संबंध जातिगत है। निकट संबंध को नजरअंदाज भी कर लें, फिर भी एक दूसरे से बाहरी आचरण खुला नहीं है। अछूत जाति का अर्थ होता है ऐसा मनुष्य जिसे छू लेने मात्र से दूसरी जाति के लोग अपवित्र हो जाते हैं। भ्रष्ट हो जाते हैं। अपने पहले संपादकीय में बाबा साहब ने पिछड़ों पर भी कलम चलाई है उन्होंने लिखा है कि सत्ता और ज्ञान के अभाव में ब्राह्मणेत्तर (मुख्य रूप से ओबीसी) पिछड़े रह गए यही कारण है कि उनकी प्रगति नहीं हो सकी, यह बात स्पष्ट है। परंतु उनके दुख में दरिद्रता शामिल नहीं थी, क्योंकि उनके लिए खेती, व्यापार उद्योग और नौकरी करके जीवनयापन करना कठिन नहीं था। लेकिन सामाजिक भेदभाव के कारण अछूत, बहिष्कृत समाज पर जो प्रभाव पड़ा, वह बड़ा ही भयानक है। वे संपादकीय में आज हो रहे और भविष्य में होने वाले अन्याय को दूर करने की चिंता व्यक्त करते हैं। यही नहीं, उस दौर के समाचार पत्रों पर भी हमला करते हुए बाबा साहब लिखते हैं कि मुंबई से निकलने वाले समाचार पत्रों को बारीकी से देखा जाए तो पता चलता है उनमें से ज्यादातर पत्र किसी खास जाति हित को संरक्षित करते हैं। वे दूसरी जातियों की परवाह नहीं करते।

दर्जनों संपादकीय टिप्पणियों को मिलाकर डॉ.अंबेडकर के 40 लेख ‘मूकनायक’ में छपी। जो अपने आप में वह दस्तावेज हैI ये लेख जाति के नाम पर समाज के आंखों पर लगी काली पट्टी को खोलने को लेकर काफी है। डॉ.अंबेडकर ‘जाति का विनाश’ चाहते थे। मीडिया के साथ ही सभी क्षेत्रों में दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित किए जाने के प्रबल पक्षधर थे। बाबा साहब डॉ.अंबेडकर केवल वंचितों के महानायक ही नहीं थे बल्कि पत्रकारिता जगत के भी महानायक थे क्योंकि पत्रकारिता में जो सामाजिक क्रांति का बीच उन्होंने बोया था आज वह ‘अंबेडकरी पत्रकारिता’ के तौर पर जाना जाता है।

(लेखक-वरिष्ठ पत्रकार है)

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