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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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सामाजिक क्रांति के योद्धाओं, पेरियार से लेकर बाबा साहब तक को नजरअंदाज करती रही है मीडिया

पेरियार रामास्वामी की जयंती (17 सितम्बर ) पर विशेष 

संजय कुमार / दलितों की कोई नयी मांग नहीं है कि उनका अपना मीडिया हो।  व्यवसायिकता और व्यापकता के साथ भारतीय मीडिया पर द्विज काबिज है और हाशिये पर हैं दलित एवं दलित मीडिया। दलितों के ऊपर उत्पीड़न शोषण और उनकी खबरों को हिन्दुवादी मीडिया द्वारा अपने तरीके से परोसे जाने को लेकर दलितों के बीच प्रतिरोध है। शुरू से ही भारतीय हिन्दू मीडिया दलितों की खबरों को अपने तरीके से संजोती परोसती और दिखाती रही है। खासकर सामाजिक क्रांति के अजेय योद्धायों को नजरअंदाज करती रही है। हमेशा से दलित, पिछड़े हिन्दुवादी मीडिया के बीच उपेक्षित रहे हैं।

कुछ खबरों को दिखा देने पर यह कतई नहीं माना जा सकता कि हिन्दुवादी मीडिया के दिलों दिमाग पर दलितों को लेकर कुछ जज्बा है। अगर खबरें आ भी जाती है तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानों कोई एहसान कर रहे हों। और यह कोई हाल फिलहाल की बात नहीं है। 1873 में छपी एक किताब में ज्योतिराव फुले के कथन को देखें स्थितियां ज्योंकि त्यों है। ज्योतिराव फुले. “अरे सभी मराठी अखबारों के संपादक ब्राह्मण हैं, इसलिए अपनी जाति के लोगों के विरुद्ध लिखने के लिए उनका हाथ नहीं चलता।“ ;स्रोत.1 गुलामगीरी,  लेखक. ज्योतिबा फुले, मराठी से हिंदी अनुवाद. डॉ. विमलकीर्ती, सम्यक प्रकाशन 2009,ISBN- 81-88794-81-3,  पेज.85.  पहली बार यह किताब 1873 में छपी।  सालों बाद भी भारतीय मीडिया में दलित मुद्दे ठहराव की स्थिति में हैं। वक्त अभी भी ठहरा हुआ है पेरियार ई. वी रामास्वामी से लेकर बाबा साहब आंबेडकर ने  इस ठहरे समय को हटाने का प्रयास किया । 

भारतीय मीडिया बहुजनों का हितैषी हैं ही नहीं बल्कि विरोधी है। यह वर्षो से साबित वह सच है जो आज भी मौजूद है। रैदास, ज्योति बा फूले, शाहू जी महाराज, बाबा साहेब डॉ.अम्बेडकर और पेरियार रामास्वामी जैसे सामाजिक क्रांति के अजेय योद्धाओं ने बहुजन समाज को आर्य ब्राह्मणों द्वारा रचित ढ़ोंग पाखंड़ए झूठ और अंधविश्वास पर आधारित अन्याय और असमानताकारी व्यवस्था पर हमला बोला तो विरोध के स्वर आर्य ब्राह्मणों की ओर से सुनाई पड़ने लगे। इतना ही नहीं मीडिया पर काबिज आर्य ब्राह्मण, बहुजन महापुरूष और उनसे संबंधित खबर को अपने पत्रों में जगह नहीं देते थे बल्कि उनके खिलाफ विरोध के स्वर मीडिया में आये। 

पेरियार ई. वी रामास्वामी ने बहुजन समाज के लिए खूब काम किये। लेकिन द्विज मीडिया ने उनके कामों को नजर अंदाज किया। मद्रास के ईरोडु कस्बे में 17 सितंबर 1879 में जन्में पेरियार मूलनिवासी बहुजन समाज को आर्य ब्राह्मणों के चंगुल से मुक्त करने के लिए चिंतित रहते थे और मूलनिवासी बहुजन समाज को गोलबंद करने में अपने जीवन को लगा दिया। पेरियार के संघर्ष को मीडिया नजरअंदाज करती रही। जब उन्होंने देखा कि मीडिया उनके कार्यो को तरजीह न देकर उनके खिलाफ हो रही है तो पेरियार ने लोगों को बताया कि आर्य ब्राह्मणों के पत्र -पत्रिकाएं मूलनिवासी बहुजनों के हित की बात कभी नहीं करते बल्कि विरोध करते हैं। 17 सितंबर 1970 को पेरियार ने आर्य ब्राह्मणों. मीडिया की कड़ी आलोचना करते हुए हमला बोला और आरोप लगाया कि मीडिया मूलनिवासी बहुजन समाज को मानसिक गुलाम बनाने का कार्यक्रम चला रहे थे जो आज भी जारी है। पेरियार ने मूलनिवासी बहुजन समाज से अपील की कि उन्हें आर्य ब्राह्मणों के समाचार पत्र खरीदना बंद कर देना चाहिए। उन्होंने  आर्य ब्राह्मणों के समाचार पत्रों के बहिष्कार की शुरूआत की बात अपने लोगों से की।

पेरियार के “वायकोम संघर्ष” का आर्य ब्राह्मणों के समाचार पत्र -पत्रिकाओं ने जम कर विरोध किया और पेरियार के आंदोलन को दबाने की मीडिया ने खूब कोशिश की। साथ ही भ्रम भी फैलाया। पेरियार के दौर में 99 प्रतिशत पत्र -पत्रिकाओं के प्रकाशक, संपादक और मालिक आर्य ब्राह्मणों के वर्ग से ही थे। यही हाल पत्र-पत्रिकाओं में काम करने वालों का था यानी सब जगह द्विज का कब्जा था। आज भी देखा जाये तो देश की मीडिया द्विजों के कब्जे में ही है। आर्य ब्राह्मणों के समाचार पत्र-पत्रिकाओं के व्यवहार यों कहे बहुजन विराधी होने से पेरियार बहुत दुखी हुए और अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए ईरोडू से 2 मई 1925 को “कुडियरसु” साप्ताहिक पत्र प्रकाशित किया।

मूलनिवासी बहुजन समाज को गोलबंद करने और द्विज मीडिया द्वारा फैलाये जा रहे भ्रम को पर्दाफाश करने के लिए पेरियार ने कुडियरसु”  के अलावे कई पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित करवाये। पेरियार ने 1927 में “द्रविडियन” 1928 में “रिवोल्ट” 1933 में “पुराची” 1934 में पाहुथ थारीरू साप्ताहिक Patuth Thariru weekly साथ ही दैनिक विडुतले Viduthali 14 जनवरी1970 में ‘उण्मे’  पत्रिका की शुरूआत की। पेरियार द्वारा प्रकाशित पत्र.पत्रिकाओं का उद्ेश्य सामाजिक क्रांति को गति प्रदान करना था। इस कार्य में उनकी पत्नी ई ई.वी.आर. मनियम्मई और शिष्य वीरामणि ने भी आगे बढ़ाया और मार्डन रेशननिस्ट पत्र 8 जुलाई 1971 में निकाला।

दलित मुद्दों के विशेषज्ञ मानते हैं कि दलितों को हिन्दुवादी मीडिया से शिकायत नहीं करनी चाहिये कि वे उनकी बातों को मीडिया में नहीं रखते हैं बल्कि दलितों को सोचना चाहिये कि उनका अपना खुद का मीडिया हो। खुद अपना मंच तैयार करें और अपनी बातों को समाज, देश, व्यवस्था के समक्ष रखे। दलितों को अपनी हर बात को रखने के लिए अपने अखबार पत्रिकाएँ टीवी चैनल, अंतरजाल पत्रिका हो। मीडिया के हर माध्यम हो,  शर्त हो कि वह अपना हो किसी के भरोसे पर नहीं।

हालांकि दलितों का अपना मीडिया हो,  इस दिशा में दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों से प्रकाशित दलित पत्र और पत्रिकाओं को राष्ट्रीय फलक पर लाते हुए अपना मीडिया बनाने का प्रयास जारी है। इस दिशा में कई पत्र और पत्रिकाएं अपनी पहचान बनाने की दिशा में हैं।

आज जितने भी समाचार पत्र मौजूद हैं वे हिन्दू जाति के हितों की रक्षा करने में लगे हुए हैं। वे अन्य जातियों के हितों का संरक्षण नहीं करते हैं। हमारा देश विषमताओं का मायका है। सत्ता और ज्ञान के अभाव में अब्राह्मण तथा दलित वर्ग प्रगति से वंचित है”. डा. भीम राव अम्बेडकर ; 21 जनवरी 1920 के साप्ताहिक “मूकनायक” के प्रथम अंक के संपादकीय में प्रकाशित।

डा. भीम राव अम्बेडकर के ये विचार आज भी प्रासंगिक हैं। देश में सवर्ण पत्रकारिता या यों कहें कि हिन्दू पत्रकारिता की दिशा व दशा दोनों तो दिखती है लेकिन दलित पत्रकारिता की नहीं। दलित पत्रकारिता की दशा और दिशा को लेकर सवाल उठते रहते हैं। इन दिनों दलित पत्रकारिता को लेकर काफी विमर्श सुनने को मिलता है। हिन्दुवादी पत्रकारिता ने जो पकड़ बनायी है उसके समांनातर दलित पत्रकारिता  नहीं के बराबर है। ऐसा नहीं कि दलित पत्रों का प्रकाशन नहीं होता। बड़े पैमाने पर दलित पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन देश भर में हो रहा है ।

डॉ. आंबेडकर द्वारा सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में पत्रकार की भूमिका निभाई। सबसे पहले मूकनायक समाचार पत्र निकाला। यह मराठी भाषा में वर्ष 1920 में निकाला। इस समाचार पत्र के माध्यम से बाबा साहेब अपने लोगों को गोलबंद किया। इस समाचार पत्र से दलित जागृति हुए । डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने दूसरा समाचार बहिष्कृत भारत” साप्ताहिक पत्र 3 अप्रैल वर्ष 1927 में मराठी भाषा में ही निकाला। बहिष्कृत भारत का संपादन डॉ आम्बेडकर ने वर्ष 1919 से लेकर वर्ष 1942 तक किया।

डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने तीसरा समाचार पत्र माह दिसम्बर, वर्ष 1930 में जनता” निकाला। मूकनायक और  बहिष्कृत भारत दोनों ने डॉ. भीमराव आम्बेडकर के कलम की ताकत से काफी चर्चित हुए। इसके बाद आम्बेडकर ने पत्रिका 'इक्वैलिटी (समता) निकाला । इसने डॉण्भीमराव आम्बेडकर के समता आंदोलन की नीव रखी। इस पत्रिका का मूल उद्देश्य समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाना और समता, स्वतंत्रता और बन्धुता स्थापित करना था जिसमें बाबा साहेब सफल हुए। डॉ. आम्बेडकर ने 'प्रबुद्ध भारत समाचार पत्र का भी संपादन किया था। डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने समाचार पत्रों के माध्यम से भारत में सामाजिक परिवर्तन का सफर आरंभ किया। बाबा साहेब ने जो पत्र निकले उनके नामों से साफ था कि सभी सामाजिक न्याय और अधिकार की लड़ाई के लिए थी। द्विज मीडिया द्वारा नजरंदाज करने पर खुद पत्रों को निकाला और आवाज बुलंद की ।

मुद्दों को लेकर ज्योतिबा फूले, अम्बेडकर सहित अन्य दलित बुद्धिजीवियों ने दलित समाज को मुख्य धारा से जोड़ने का बीड़ा उठाया था वह जयंती समारोहों के अवसर पर ही क्यों दिखता है। दोष केवल हिन्दुवादी पत्रकारिता के ऊपर नहीं मढ़ा जा सकता। इसने तो दलितों की खबर को बाजार की तरह इस्तेमाल किया। लेकिन वहीं पर दलित पत्रकारिता से जुड़े सैकड़ों पत्र- पत्रिकाएं हैं, जो हिन्दुवादी पत्र-पत्रिकाओं के समक्ष अभी तक खड़े नहीं हो पाये हैं। दलित पत्रकारिता में वह व्यावसायिक नजरिया नहीं दिखता। 

दलितों का अपना मीडिया हो इसे लेकर दलितों के महानायक मान्यवर श्री कांशी राम ने अपनी बात जोरदार ढंग से उठायी थी और नागपुर से प्रकाशित ‘बहुजन नायक’ मराठी साप्ताहिक के बाईसवें स्थापना दिवस के अवसर पर तीस मार्च 2002 को एक भव्य समारोह में जनसमूह को संबोधित करते हुए महानायक के संपादक मान्यवर श्री कांशी राम ने दलितों का अपना मीडिया हो, इसे लेकर पूरजोर वकालत की थी।  (स्रोत-2, पुस्तक, ‘मीडिया और दलित’ संपादक- डा. श्यौराज सिंह  ‘बेचैन’  व  एस. एस. गौतम,  पृष्ट संख्या  75)

मान्यवर श्री कांशी राम जी ने अपने संबोधन में कहा था कि ‘बहुजन नायक’ को चलते हुए पूरे बाईस साल हो गए हैं, जिसके बारे में आप सब लोगों को जानकारी है। आप लोगों के सहयोग से बाईस साल यह पेपर चला है। इस पेपर को चलाने वाले लोग, इस पेपर में विचार रखने वाले लोग, इस पेपर को पढ़ने वाले लोग, इस पेपर को बगैर किसी विज्ञापन के चलाने वाले लोग, इन सबके सहयोग से ये काम आज तक हुआ है, इसलिए मैं इसकी सराहना करता हूं। जिस दिन यह पेपर शुरू हुआ था, मैं नागपुर में कई दिन, कई रात के लिए दिल्ली से चलकर आया था। किस किस्म की हमें मेहनत करनी पड़ी थी, उसकी जिक्र श्री भालेराव ने कुछ इधर किया है और उस वक्त के हमारे साथी अच्छी तरह से जानते हैं। उस दिन से लेकर आज तक जो हम लोगों ने मेहनत की है, उसके बारे में भी बहुत कुछ कहा जा चुका है .लेकिन समय अभाव के कारण मैं उसकी ज्यादा चर्चा नहीं करूँगा। मैं इतना जानता हूँ कि मुझे हिंदी भाषा भी अच्छी नहीं आती है पढ़ने और लिखने के लिए मराठी का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, इसलिए मैं इंग्लिश  भाषा में ही आज तक सोचता रहा हूं,  सोच बनाकर उसको आगे बढाने का प्रबंध करता हूं और मैं लिखता रहा हूं.  जब हमारे पास साधन नहीं होते थे, थोड़े-थोड़े साधन इकट्ठे करके मैं बुलेटिन निकाला करता था। पहले उन्नीस बुलेटिन जो मैंने निकाले हैं, उनमें क्या लिखा हुआ था,  वो आज हमारे पास उपलब्ध नहीं है उसके बाद के कुछ बुलेटिन आज हम लोगों ने सुरक्षित किए हैं। उसके बाद एक पाक्षिक भी मैंने शुरू किया ‘आप्रेस्ड इंडियन’ नाम का स्पोक्समैन ऑफ दी आप्रेस्ड एण्ड एक्सप्लायटेड दलित. शोषित समाज का मुखपत्र । मैं इसे काफी लंबे अरसे तक खुद एडिट करता रहा हूँ.  खुद उसके लिए सारा प्रबंध करता रहा हूँ  और उसको इस्तेमाल करके मूवमेंट को आगे बढ़ाता रहा हूँ। उसी वक्त से मैं सोचता रहा हूँ कि इंग्लिश जानने वाले लोग बाबा साहेब अंबेडकर की मेहरबानी से एक नई क्लास इस देश मैं पैदा हुई है। पढ़.लिखकर नौजवान साथी कुछ अंबेडकर से प्रभावित हुए है, जैसे मैं प्रभावित हुआ। मुझे लगा कि अगर मैंने प्रभावित होकर अपने आपको इस काम के लिए डेडिकेट किया है, तो समाज में दूसरे लोग भी जरूर मिलेंगे, जो मेरे जितना नहीं तो कुछ न कुछ योगदान देने के लिए जरूर मिल सकेंगें। इस बात को सोचकर पढ़े.लिखे कर्मचारियों को ढूँढ़कर, अपनी बात कहकर, उनकी बात सुनकर, उनको बाबा साहेब अंबेडकर की मूवमेंट पर चलाने के लिए प्रभावित करने का काम मैंने शुरू किया। बामसेफ नाम का एक संगठन बनाया बामसेफ के नाम पर एक छोटी सी किताब लिखकर उसका उदेश्य क्या है उस उदेश्य  को हम कैसे पूरा कर सकते हैं, यह बताया। पढ़े.लिखे कर्मचारी होने जिनके बारे में बाबा साहेब डा. अंबेडकर ने अठारह मार्च उन्नीस सौ छप्पन को आगरा में कहा था कि इन्होंने (पढे़ लिखे कर्मचारियों) ने मुझे धोखा दिया है, ऐसे धोखा देने वाले समाज के अंग को समाज के हित में संगठित करने का काम मैनें शुरू किया। बामसेफ का जन्म होने के बाद समाज में पढ़े लिखे कर्मचारी बहुत कुछ कर सकते हैं, अतः उनके लिए मैंने स्क्वैड्स बनाई। मुझे मालूम है कि मैंने बीस स्क्वार्ड्स बनाए .बामसेफ ब्रदरहुडए बामसेफ अडॅप्श्न, बामसेफ को. आपरेशन इत्यादि। इस किस्म के बीस स्क्वार्ड्स बनाकर मैंने पढ़े.लिखे कर्मचारियों को संगठित करके फूले.शाह.अंबेडकर की विचारधारा को आगे बढ़ाने काम शुरू किया। ये जानते हुए भी कि पढे़.लिखे कर्मचारियों के लिए लिमिट मर्यादा है सिविल सर्विस कंडक्ट रूल की लिमिट है ये लोग समाज को अपने पैरों पर खड़ा कर सकते हैं समाज को मूवमेंट को आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन वो भी सिविल सर्विस कंडक्ट रूल को ध्यान में रखकर। इसलिए मैंने सारी योजना बनाई, सारा प्रोग्राम बनाया लेकिन उसकी लिमिटेषन को ध्यान में रखकर। बाद में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डी.एस.-4  ) बनाई। बगैर संघर्ष के मूवमेंट आगे नहीं बढ़ सकती। दलित शोषित समाज का संघर्ष अपने पैरों पर खड़ा होकर अपने समाज की बात को आगे बढ़ाने का प्रबंध डी.एस.-4  के माध्यम से शुरू किया। इस सारे समय में सोच.विचार करके कि बाबा साहेब अंबेडकर की मूवमेंट आगे क्यों नहीं बढ़ सकी, उससे सबक सीखकर मैंनें एक सेमिनार, दस सिवोजियम, आप्रेस्ड इंडियन में एक लेख लिखकर, उसके बारे में चर्चा शुरू की। लोगों के दिमाग में उथल.पुथल हो सके, वह सोचने के लिए समाज मजबूर हो मैंने वो आर्टिकल ;लेख लिखा था क्योंकि अंबेडकरवाद को हमें रिवाइव करना है,  जो उस वक्त तक लगभग खत्म हो चुका था। अगर उसको रिवाईव करना है, तो जिन लोगों ने उसको रिवाइव करना है, उनकी जिम्मेदारी है कि उसको सरवाईव भी करें, लंबे अरसे तक चलाने का प्रबंध भी करें। क्या ये हो सकता है। ऐसा लोगों के सामने मैंने विचार रखा। इस प्रकार मैंने मीडिया की जरूरत हो समझा। चाहे बुलेटिन के माध्यम से होए ऑॅप्रेस्ड इडिंयन के माध्यम से हो  जो हमारे समाज के पढे.लिखे कर्मचारियों का एक क्लास पैदा हुआ था उनके लिए एक साधन पैदा किया। लेकिन मुझे यह मालूम था कि ये साधन तो पढ़े.लिखे नौजवान कर्मचारियों के लिए तो ठीक हैं। वे इंग्लिष भाषा में इसे पढ़करए सीखकर कुछ समझ सकते हैं लेकिन हमारा समाज तो ज्यादा इंग्लिश नहीं जानता है। बहुत बड़े हिस्से में हिंदी जनता है। बहुत से प्रदेशों में जिसमें सिर्फ लोकल भाषा जानते हैं इसलिए इन सब भाषाओं  हमें अपना मीडिया बनाना चाहिए। अपने मीडिया का प्रबंध करना चाहिए। उसके लिए मैंने बहुत पहले शुरूआत की। बहुत सी भाषाओं में शुरूआत की। हिंदी का बहुजन संगठन सबसे पहले शुरू किया। वो आज तक चल रहा है। बाईस साल से ज्यादा समय हुआ अभी तक चल रहा है। बाईस साल पहले बहुजन नायक शुरू किया। खुशी  की बात है कि वो भी आज तक चल रहा है। लेकिन मुझे इस बात का ज्ञान था कि हमें डेली न्यूज पेपर (दैनिक पत्र) की जरूरत है। मूवमेंट को आगे बढ़ाने के लिए एक इंग्लिश  और हिंदी में दिल्ली से पढे़.लिखे कर्मचारियों को सगंठित करके मैंने इंग्लिश  और हिंदी में दैनिक पेपर की कोशिश शुरू की और नागपुर से मराठी पेपर की। लेकिन हम उस कोशिश में कामयाब नहीं हो सके। लेकिन जो शुरू कर सकेए उसे हम सर्वाइव नहीं कर सके।

मान्यवर श्री कांशी राम जी के संबोधन से साफ है कि उन्होंने दलितों के लिए  अपना मीडिया हो इसे लेकर वे चिंतित रहे। ऐसा नहीं कि यह चिंतन केवल मान्यवर श्री कांशी राम जी की है बल्कि इस दिशा में बयान के संपादक व चर्चित लेखक.पत्रकार श्री मोहनदास नैमिशराय जी ने पहल करते हुए “बयान” को राष्ट्रीय पटल पर लाया । हालाँकि फ़िलहाल यह बंद है। साथ ही बहुजनों का अपना मीडिया हो, इसे स्थापित करने की दिशा में काम जारी है लेकिन यह काम अभी भी नहीं के बराबर में है। कुछ ही  पत्र.पत्रिका.चैनल.अंतरजाल नजर आते हैं जो राष्ट्रीय पटल पर स्थान बनाते हुए दलितों के अपने  सिर्फ अपने मीडिया की वकालत करता दिख रहा है। दलित पत्र.पत्रिकाएं  निकलती तो हैं लेकिन एक.दो या कुछ अंक के निकलने के बाद बंद हो जाते हैं। दलितों का अपना मीडिया हो को लेकर मान्यवर श्री कांशी राम हो या श्री मोहनदास नैमिशराय या फिर डा. श्योराज सिंह बेचैन सभी ने हिन्दुवादी भारतीय मीडिया के चरित्र को समझ कर ही अपनी अलग मीडिया की वकालत करते हुए इसे खड़ा करने की बात कही है, जिस तरह से दलित मुद्दों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है ।

सबसे बड़ा सच यह है कि मीडिया निजी हाथों का खिलौना है और ऐसे में दलित प्रतिनिधित्व की उससे अपेक्षा करना उचित नहीं। मीडिया से उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह दलित मसले को सकारात्मक ढ़ग से उठाये। वह तो बाजार व अपनी हिन्दुवादी मानसिकता को तरजीह देता रहा है। जाने.माने लेखक डाण् सोनाली नरगुंदे इसे अहम प्रश्न मानते हैं .......सबसे अहम प्रश्न यह है कि दलित पत्रकारिता दलितों द्वारा या फिर दलितों के लिए ? इसके पूर्व का एक प्रश्न और है कि दलितों के लिए किस प्रकार का विमर्श?  क्योंकि दलितों के लिए पत्रकारिता का प्रश्न सबसे बाद में उठने वाला प्रश्न रहा है...... पत्रकारिता पर सदा से उच्च बौद्धिकवादियों का वर्चस्व रहा है। इसके लिए उच्च जाति के लोगों को लेने की परंपरा का निर्वहन किसी न किसी रूप में आज भी जारी है। ऐसे में दलितों का पत्रकारिता में आना और अपने समाज के लिए कुछ करना तो कठिन कार्य है, उस पर सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाओं के कारण वो और भी कटघरे में खड़े हो गए हैं। सामान्य समाज तो भीमनायकों को यह कह कर अलग रखाता है कि तुम्हारे पास सुविधाओं की कमी है क्या ? आरक्षण तो मिल ही गया अब कुछ तो हम लोगों के लिए रहने दो। ऐसे में पत्रकारिता की मुख्यधारा में आने के लिए पत्रकारिता को दलितों की दुनिया को सकारात्मक रूप से देखना होगा (स्त्रोत 3 समागम, अक्टूबर 2011  पत्रकारिता दलितों की या दलितों के लिए ? डा सोनाली नरगुंदे ।

 

संदर्भ.

1     गुलामगीरी लेखक. ज्योतिबा फुलेए मराठी से हिंदी अनुवाद.डॉ. विमलकीर्ती  सम्यक प्रकाशन ।

2 पुस्तक ष्मीडिया और दलित संपादक . डा श्यौराज सिंह  ‘बेचैन’ व एस.एस.गौतम पृष्ट संख्या 75 ।

3 समागम अक्टूबर2011 पत्रकारिता दलितों की या दलितों के लिए ?’-डा. सोनाली नरगुंदे।

4 पुस्तक. पेरियार ई वी रामासामी सामाजिक क्रांति का एक अजेय योद्धा, विनोद कुमार बर्मन)

 

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संजय कुमार

303,दिगम्बर प्लेस लोहियानगर, कंकडबाग

पटना .800020, बिहार

मो.9934293148

 

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