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तकनीक के अनुरूप साहित्य की भी गति होनी चाहिए

October 24, 2013

साहित्य अकादेमी का ‘मैथिली प्रबंध काव्यक विकास ओ परम्परा’ विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न
मधेपुरा/ साहित्य अकादेमी नई दिल्ली एवं पार्वती विज्ञान महाविधालय मधेपुरा के संयुक्त तत्वाधान में 21-22 अक्टूबर को ‘मैथिली प्रबंध काव्यक विकास ओ परम्परा’ विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का उद्घाटन करते हुए भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविधालय के कुलपति आर. एन मिश्र ने कहा कि मैथिली भाषा एवं साहित्य अपने माधुर्य एवं साहित्यिक विशिष्ठता के साथ लोक जीवन की भाषा के रूप में स्थापित है। इसकी समृद्ध ऐतिहासिक परम्परा है। इसकी दुर्दशा के लिए मैथिल भाषी ही जिम्मेवार हैं। कुलपति ने मैथिली के विकास के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने पर भी बल दिया।
इसके पूर्व साहित्य अकादेमी के उपसंपादक डा. देवेन्द्र कुमार देवेश ने अतिथियों का स्वागत करते हुए मैथिली के उत्थान व संवर्द्धन में साहित्य अकादेमी के अवदानों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अकादेमी युवा एवं बाल साहित्य लेखन पर  भी पुरस्कृत करती है।
मैथिली परामर्श मंडल, साहित्य अकादेमी की संयोजिका डा. वीणा ठाकुर ने विषय प्रवर्तन करते हुए ‘ साहित्य अकादेमी’ की साहित्यिक परंपरा एवं उदेश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रबंध काव्य की विकास यात्रा का विश्लेषण भी किया। उन्होंने वैदिक काल से अनुवाद की परम्परा के क्रमिक विकास यात्रा को रेखांकित करते हुए मैथिली साहित्य एवं काव्य प्रबन्ध को व्यवस्थित रूप देने में चंदा झा के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मैथिली आज महत्वपूर्ण भाषा की श्रेणी में स्थापित है इसका मुख्य कारण इसके समृद्ध प्रबन्ध काव्य है। श्रीमती ठाकुर ने कोसी इलाके में इस तरह की संगोष्ठी को सर्थक एवं उपयोगी बताया।
अपने बीज वक्तव्य में प्रतिष्ठित मैथिली लेखक श्री रामदेव झा ने कहा कि आज महाकाव्य खट्टे अंगूर माने जाते हैं। महाकाव्य की जगह प्रबन्ध काव्य कहे जाने की प्रक्रिंया का उन्होंने विश्लेषण किया। उन्होंने जयदेव के ‘गीत गोविन्द’ की चर्चा करते हुए कहा कि काव्यशास्त्र के अनुसार उसे महाकाव्य कहा जायेगा। महाकाव्य के रचयिता को यह अधिकार है कि वे मूल को बदल सकते हैं। कालिदास ने ‘अभिाज्ञान शाकुंतलम’ की रचना की। तब महाभारत की शकुन्तला उनके समक्ष थी लेकिन उन्होंने अपनी कृति में इसे परिवर्द्धित कर दिया...। उन्होंने कहा कि इन्साक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के लिट्रेचर भाग में मैथिली महाकाव्य को सम्पूर्ण विश्व की भाषाओं में सबसे समृद्ध भाषा माना गया है।
इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए श्री रमाकांत मिश्र ने कहा कि साहित्य रचना का मूल उदेश्य यह है कि एक मनुष्य दूसरे से कैसे संवाद स्थापित करे ? साहित्य के केन्द्र में मनुष्य है। उन्होंने अंग्रेजी और मैथिली भाषा साहित्य के प्रबन्ध काव्य का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए मैथिली प्रबन्ध काव्य की परंपरा को अधिक समृद्ध बताया।

पार्वती विज्ञान महाविधालय के प्राचार्य केपी यादव ने सत्र समापन पर धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि साहित्य अकादेमी ने अपनी स्वीकृत भाषाओं में मैथिली को विषिष्ट स्थान दिया है। इसलिए भी मै आभार प्रकट करता हूँ।
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र की अध्यक्षता महेन्द्र झा ने की तथा प्रतिभागियों में सर्व श्री रमण झा ने शब्दालंकार के अन्तर्गत आनेवाले अनुप्रास एवं मैथिली साहित्यक व्याकरण के कई उदाहरण प्रस्तुत किये। देवनारायण साह ने - मैथिली की पौराणिक प्रबंध काव्य विषय पर आलेख पाठ किया। हरिवंश झा ने मैथिली की रामकथा पर आधारित प्रबंध काव्य विषय पर आलेख पाठ किया। रंजित कुमार सिंह ने ‘मैथिली में कृष्ण महाकाव्य’। रविन्द्र कुमार चौधरी ने ‘इतिहास कथा पर आधारित प्रबन्ध काव्य’ विषयक आलेख पाठ किया। इस संयुक्त सत्र में माधुरी झा एवं महेन्द्र झा ने अपने अध्यक्षीय भाषण से प्रबंध काव्य की विशेषता को उजागर किया।

प्रथम दिवस के अंतिम सत्र में अभय कुमार ने - ‘मैथिली के प्रबंध काव्य में भाषा प्रयोग’। कुलानन्द झा ने ‘महाकाव्य और प्रबंध काव्य में अंतर’ पर अपनें-अपने आलेखों का पाठ किया तथा सत्र की अध्यक्षता जगदीश नारायण प्रसाद ने की।

इस संगोष्ठी के दूसरे दिन प्रथम सत्र की अध्यक्षता मैथिली के जानेमाने हस्ताक्षर व तिलका मांझी विश्वविधालय भागलपुर के मैथिली विभागाध्यक्ष केष्कर ठाकुर ने की तथा आलेख पाठ धीरेन्द्र कुमार- मैथिली प्रबंध में काव्य परियोजना। शिवप्रसाद यादव ने - प्रबंध काव्य शास्त्रीय विवेचन। ललिता झा ने मैथिली के प्रबंध काव्य में युग संदेश व वर्णन विन्यास। विश्वनाथ झा ने मैथिली के प्रबंध काव्य में युग चेतना। रामनरेश सिंह ने - मैथिली के प्रबंध काव्य में राष्ट्रीय चेतना एवं वीरेन्द्र झा ने मैथिली प्रबंध काव्य में नायिका विषयक आलेख का पाठ किया। केष्कर ठाकुर ने सत्र में पढ़े गये आलेखों पर अपने विचार व्यक्त किये।
इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम सत्र में अशोक सिंह तोमर ने -मैथिली राष्ट्रीय चेतना स्तर का प्रबंध काव्य ‘गत्यवती’। किशोर कुमार सिंह ने मैथिली में राष्ट्रीय स्तर के महाकाव्य ‘चाणक्य’। कमल मोहन चुन्नु ने ‘राधा विरह’ एवं शंकर देव झा ने ‘प्रतीज्ञा पांडव’ विषयक आलेख पाठ किया। इस सत्र की अध्यक्षता मैथिली के नामचीन साहित्यकार धीरेन्द्र ना. झा ‘धीर’ ने की।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि भू.ना. मंडल विश्वविधालय के कुलपति डा0 आरएन मिश्र ने अपने महत्वपूर्ण वक्तव्य में कहा कि तकनीकी गति के अनुरूप साहित्य की भी गति होनी चाहिए। भाषा बोलने एवं लिखने में हू-ब-हू रूप नहीं आ रही है। हमारी सोच और सॉफ्टवेयर डवलपमेंट में समन्वय होना चाहिए। मैथिली आमजनों की भाषा बन सके इसकी शुरूआत घर से होनी चाहिए। जब मैथिल क्षेत्र के लोग ही इसकी उपेक्षा करेंगे तो गैर मैथिली क्षेत्र के लोग इसका प्रयोग क्यों करेंगे ? भाषा के विकास मे आलोचक अपनी सकारात्मक भूमिका निभायें।
ललितेश मिश्र की अध्यक्षता में धीरेन्द्र नाथ मिश्र ने पर्यवेक्षीय रपट पेश की। समापन भाषण में पार्वती विज्ञान महाविधालय के प्राचार्य केपी यादव ने समस्त सुधि श्रोताओं एवं  प्रतिभागियों को साधुवाद दिया। प्राचार्य ने कार्यकर्ताओं एवं सहयोगियों सहित आयोजन की संयोजिका श्रीमती वीणा ठाकुर, साहित्य अकादमी के उपसंपादक देवन्द्र कुमार ‘देवेश’, साहित्यकार डा. भूपेून्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ एवं प्रो. श्यामलकिशोर यादव आदि की गरिमामय उपस्थिति पर विशेष आभार व्यक्त किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. कुलानन्द झा ने किया।             
द्विदिवसीय इस सहित्यिक समागम में कई आकर्षण भी दिखे जिसमें  ‘जय-जय भैरवि असुर भयावनि..’ गीत पर प्रो. बिजली प्रकाश द्वारा प्रशिक्षित राजनन्दनी एवं निहारिका नन्हीं के भाव नुत्य, केवी झा महाविधालय के प्राध्यापक प्रभु नारायण लाल दास द्वारा मिथिला की कला-संस्कृति पर आधारित समाचार पत्रों में प्रकाशित रपट की प्रदर्शनी आदि। मधेपुरा की धरती पर साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित इस महत्वपूर्ण साहित्यिक समारोह की गूंज वर्षों तक सुनाई देती रहेगी।
           
मधेपुरा, बिहार से अरविन्द श्रीवास्तव की रिपोर्ट

मोबाइल- 9431080862

 

 

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