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'दलित साहित्य' दलित विरोधियों का दिया हुआ नाम

August 26, 2016

बी. आर. विप्लवी की पुस्तक 'दलित दर्शन की वैचारिकी' का लोकार्पण व परिचर्चा

पटना/ 'दलित साहित्य' नाम दलितों का दिया हुआ नहीं है यह दलित विरोधियों का दिया हुआ है। उन लोगों को दिया हुआ है जिन्होंने अपने साहित्य से दलित प्रश्न को बहिष्कृत कर रखा है। ऐसे लोगों ने अपने साहित्य को ब्राह्मण-बनियों का साहित्य क्यों करार नहीं दिया? असली दलित साहित्य भुक्तभोगी का ही होगा भले ही दलित साहित्य पर गैरदलित भी कलम चला ले।'  ये बातें वरिष्ठ एवं ख्यात दलित साहित्यकार एवं पूर्व आइएएस बुद्धशरण हंस ने 25 अगस्त 2016 को अम्बेडकर भवन, पटना में बहुजन साहित्यकार बी. आर. विप्लवी की पुस्तक 'दलित दर्शन की वैचारिकी' के लोकार्पण और उनके एकल काव्य-पाठ समारोह की अध्यक्षता करते हुए कही। 

अम्बेडकर मिशन, चितकोहरा, पटना द्वारा आयोजित इस गोष्ठी में हंस साहब का साफ साफ मानना था कि भारत में अंग्रजी शासन के दौरान लार्ड मैकाले ने दलितों व वंचितों के लिए उस सार्वजनिक शिक्षा का द्वार खोला जो केवल उच्च जातियों तक सीमित थी। उन्होंने खरी और कड़ी लाइन लेते हुए दो टूक लहजे में कहा कि सदियों से सवर्णों ने दलितों को इतने दुःख दिए हैं कि उनपर विश्वास करना मुश्किल है।

अर्थशास्त्री ईश्वरी प्रसाद ने कहा कि दलितों वंचितों पर जुल्म जारी रहने की एक बड़ी वजह भारत की जड़ जातिव्यवस्था है। उन्होंने एक मार्के की बात यह कही कि चौधरी चरण सिंह ने नेहरू से जातिव्यवस्था को निरस्त करने का प्रस्ताव किया था जिसे नेहरू ने लागू करने की जरूरत नहीं समझी।

दलित कवि एवं चिंतक डा मुसाफिर बैठा ने कहा कि लेखक ने पुस्तक में जो दलित दर्शन रखा है वह वामपंथी एवं दक्षिणपंथी दर्शन के विकल्प में है और यही मुख्यधारा का दर्शन होना चाहिए, बहुजनों का दर्शन होना चाहिए। जबकि समाज में विविध तरीके के दक्षिणपंथी दर्शन/विचारधारा का घटाटोप है।

दलित कवि अरविन्द पासवान ने कहा कि पांच हजार वर्षों के दलित मुद्दों को विप्लवी ने बड़ी ही शिद्दत से महसूस कर ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व अन्य महत तथ्यों के साथ निरूपित किया।

'नई धारा' के सम्पादक एवं साहित्यकार डॉ शिवनारायण ने दलित आन्दोलन एवं साहित्य के अन्तर्विरोधों की ओर संकेत किया।

ग़ज़लकार संजय कुमार कुंदन ने लोकार्पित पुस्तक को दलित साहित्य और वैचारिकी के लिए अनिवार्य बताया।

कथाकार अवधेश प्रीत ने कहा कि साहित्य विमर्श में दलित चेतना की कहानियां मानवीय अस्मिता को आकर देती हैं।

कवयित्री रानी श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कहा कि स्त्रियों में दलित स्त्री की स्थिति और भी शोचनीय है।

कवि प्रत्यूष चन्द्र मिश्र का कहना था कि दलितों की मुक्ति का सवाल राजनीतिक से ज्यादा सामाजिक और सांस्कृतिक सत्ता पर अधिकार का प्रश्न है।

कार्यक्रम के दूसरे भाग में लोकार्पित पुस्तक के लेखक विप्लवी ने अपने वक्तव्य में लेखकीय कंसर्न एवं दलितों-वंचितों के प्रति अपनी अनुभवपूरित संलग्नता का बयान करते हुए अपनी ग़ज़लों का प्रभावी पाठ किया जिनका श्रोताओं ने ताली और मुख से मुखर दाद देकर लुत्फ़ उठाया।

प्रस्तुत ग़ज़लों से बानगी :

भूख लगे अमावस जैसा।
भरे पेट तो पूरनमासी।।
       × × ×
जब  होगी दोगली शिक्षा।
नस्लें होंगी सत्यानाशी।।
        ×××
सफर में साथ चलता हर कोई अपना नहीं होता
मुसाफ़िर यह समझ लेता तो फिर धोखा नहीं होता।

कार्यक्रम के दौरान बीच बीच में अपना उद्गार रखते मंच संचालन कवि राजकिशोर राजन ने किया। धन्यवाद ज्ञापन इन पंक्तियों के लेखक (मुसाफ़िर बैठा) ने किया।

समारोह में शहर के कुछ महत्वपूर्ण साहित्यकार-कवि-संस्कृतिकर्मी-सोशल एक्टिविस्ट उपस्थित रहे। 

उपस्थितों में कवि एवं सेवानिवृत्त प्रो सुरेन्द्र स्निग्ध, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक जीपी दोहरे, कथाकार एवं जगजीवन राम शोध संस्थान के निदेशक श्रीकांत, संस्कृतिकर्मी प्रो शंकर प्रसाद, गजलकार शंकर कैमूरी, रंगकर्मी अनीश अंकुर, कवि रामश्रेष्ठ दीवाना, मूलनिवासी एक्टिविस्ट उमेश रजक, श्रवण पासवान, मूलनिवासी कार्यकर्ता मनीष रंजन, समाजकर्मी पुष्पराज, कमल बौद्ध, समाजकर्मी डा विनोद पाल, सोशल एक्टिविस्ट संजय कबीर, सोशल एक्टिविस्ट युगेश्वर नन्दन, सबल हिन्द सेन, पावेल परवेज, मनोज कुमार मिश्र, रामपुकार सिंह शामिल थे।

कार्यक्रम को आकार देने एवं व्यवस्थित करने में धम्मस्वरूप सुरेश प्रियदर्शी एवं इंजीनियर योगेन्द्र चौधरी की बड़ी भूमिका रही।

 

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