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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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लानत ऐसे सम्पादक पर.....

मयंक सक्सेना। जिस जगह 500 लाशें सिर्फ गौरीकुंड में मिली हों...वहां के लिए एक अखबार छाप रहा है कि करिश्मा देखिए...मंदिर बच गया...देखिए दैनिक जागरण शर्मनाक ढंग से क्या छापता है...

" इसे बाबा का प्रताप ही कहेंगे कि सब कुछ तबाह होने के बावजूद ज्योतिर्लिग और उसे आच्छादित किए सदियों पुराना गुंबद सुरक्षित है।"

ज़रा सोचिए कि धर्मांधता की पराकाष्ठा है कि आप इतने असंवेदनशील हैं...कि एक जगह जहां मंदिर के अंदर बाहर सब जगह लाशें बिछी हों...वहां पर आप मंदिर की इमारत बचे रहने पर चमत्कृत हो रहे हैं...
कल ही मैंने अंध श्रद्धा पर एक पोस्ट लिखी थी...जिस भी मूर्ख ने जागरण की ये ख़बर लिखी है...उससे सिर्फ ये जानना है कि बाबा के प्रताप से बाबा का मंदिर और ज्योतिर्लिंग बच गया...तो बाबा ने निरीह लोगों की जान क्यों नहीं बचा ली...सिर्फ अपना मंदिर बचाया बाबा ने...ये तो बड़ा स्वार्थ हुआ....

थूकिए ऐसे अखबारों पर...और शर्म है ऐसे सम्पादक पर...लानत है...

( फेसबुक वाल से साभार )

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मयंक थूक भी क्यों खराब कर रहे हो।

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मयंक सक्सेना जी, कोई लेख किसी को अनुकूल तो किसी को प्रतिकूल लग सकता है, लेकिन जब खुद को बहुत समझदार समझने वाले लोग अपने लेख मे लिखते हो कि "थूकिए ऐसे अखबारों पर...और शर्म है ऐसे सम्पादक पर...लानत है..." उनका स्तर क्या है पत्रिकारिता के मामले मे इससे अनुमान लगाया जा सकता है।

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