मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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Blog posts : "पुस्तक समीक्षा"

समभाव के पुनर्जागरण हेतु

एम. अफसर खां सागर/ ‘प्राचीन संस्कृति में एकता के सूत्र’ पुस्तक में डा एस के मिश्रा ने सामाजिक सौहार्द के सूत्रों को प्राचीन संस्कृति के बीच से खोजने का प्रयास किया है।…

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लेखकों के संसार में

लेखकों और समकालीन लेखन परिदृश्य को समझें -पहचानने का अवसर

कनक जैन / हिन्दी में साक्षात्कार पुरानी किन्तु उपेक्षित विधा है। साक्षात्कार आम तौर पर राजनेताओं और फ़िल्मी अभिनेताओं के ही छपते हैं। …

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सोशल नेटवर्किंगः नए समय का संवाद

सोशल नेटवर्किंग पर केंद्रित संजय द्विवेदी  द्वारा संपादित एक नई किताब बाजार में आ गयी है। इसे दिल्ली के यश पब्लिकेशंस ने छापा है। …

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हृदय द्वार पर दस्तक देतीं कविताएं

एम. अफसर खान / ‘फूल, तितलियां, सपने और सीख’ एम. एन. सिन्हा ‘मुकुल’ की पहली कविता संग्रह है।

कुल छत्तीस कविताओं का यह संग्रह सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और पारिवारि…

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भोगे हुए यथार्थ का प्रस्फुटन

एम. अफसर खां सागर / ‘शब्द की हिमशिला अब पिघलने लगी’ अमरनाथ राय की तीसरी कविता संग्रह है। यह संग्रह सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और पारिवारिक समेत अन्य तमाम विद्रुपताओं के सरोकारों को परिलक्षित करता है। वक्त के बदलते मिजाज के साथ सब कुछ रेत की मानिन्द हाथ से फिसल जाता है अगर कु…

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प्रमुख चुनौतियां पर दृष्टिपात

पुस्तक “इक्कीसवीं सदी में भारत के सरोकार”

न्याय मूर्ति गोविन्द माथुर करेंगे विद्या भवन में विमोचन

नन्द किशोर शर्मा …

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रक्त बीज के वंशजः सच्ची घटनाओं का शिल्प

पुस्तक समीक्षा /एम. अफसर खां सागर /व्यंग्य विधा से कथा और उपन्यास के क्षेत्र में पदापर्ण करने वाले रामजी प्रसाद ‘भैरव’ अपनी पहली कृति ‘रक्त बीज के वंशज’  में औपन्यासिक मापदण्डों पर खरे उतरते हैं। उपन्यास की कथावस्तु पूर्वी उत्तर प्रदेश में चन्दौली …

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आधुनिक कहानी : स्लोवाकिया

पुस्तक चर्चा / दो देशों के मध्य सांस्कृतिक तथा साहित्यिक सम्बन्ध सुदृढ़ बनाने की दिशा में वाणी प्रकाशन प्रतिबद्ध दिखता है। आधुनिक कहानी श्रृंखला के अन्तर्गत  'आधुनिक कहानी : आस्ट्रिया, आधुनिक कहानी : स्विट्ज़रलैंड', अफगानिस्तान-ईरान, चीन, रूस, अरबिस्तान, जर्मनी,  इसी श्रृंखला क…

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कांशीराम ''चमचा युग'' के आईने से

जयंती 15 मार्च पर विशेष

संजीव खुदशाह / दलित सिख परिवार में 15 मार्च को जन्मे मान्यवर कांशीराम ने भारत के बहुजन समाज को जो नेयमते बक्शी है वह काबिले गौर है.  पूणे में सरकारी सेवा में रहते हुए उन्होने महसूस किया कि दलित बहुजन बिखरा हुआ और शोषित …

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