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____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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नए ज़माने की पत्रकारिता

July 22, 2013

पुस्‍तक में पत्रकारिता के अलग अलग पहलुओं को उजागर करने वाले सभी सवालों के जबाव

इस किताब का मकसद पत्रकारों की नई पौध को वो सारी बातें बताना और पुराने लोगों को याद दिलाना, जो करियर में उनके लिए बेहद ज़रूरी हैं. आज मीडिया एक ऐसा पेशा बन चुका है जिससे सबसे ज़्यादा ग्लैमर जुड़ा है और हर कोई इस ग्लैमर का साथी बनने की होड़ में लगा हुआ है. बहुतों को ये मौक़ा मिल जाता है और कई भाग दौड़ में लगे रहते हैं. लेकिन जिन्हें मौक़ा मिलता है वो अंदर आकर भौचक्के रह जाते हैं कि ये तो वो नहीं है जिसके सपने उन्होंने संजोए थे.

इस किताब के जरिए उन सारी किताबी और तकनीकी बातों का ज़िक्र होगा जो आज के पत्रकार के लिए बेहद जरूरी है. फिर चाहे वो प्रिंट के लिए काम करता हो...या ब्रॉडकास्ट के लिए या फिर क्यों ना वो वेब जर्नलिज़्म में हाथ आज़माना चाहता हो.

ये किताब एक  जर्नलिस्ट को उनके पेशे से जुड़ी किसी भी बात से अनभिज्ञ नहीं रखेगी. साथ ही उन पत्रकारों के लिए जो किताबी बातें भूल कर बस रोज ख़बर की रगड़ में मुरझाते जा रहे हैं, ये एक बेहतरीन रिफ्रेशमेंट साबित हो सकती है और वो इसे पढ़ कर अपने काम में निखार लाकर उसे और रोचक बना सकते हैं.

इस किताब का विशेष बात यह है कि पुस्‍तक में पत्रकारिता के अलग अलग पहलुओं को उजागर करने वाले सभी सवालों के जबाव दिये गये हैं। मसलन टीवी एंकर बनने के लिए क्या ख़ासियत होनी चाहिए...एक अच्छा रिपोर्टर कैसे बनें...प्रोड्यूसर बनने के लिए कितना ज्ञान चाहिए. और अगर कोई अपना करियर पॉलिटिकल जर्नलिज़्म में बनाना चाहता है तो उसे कितना ज्ञानी होना चाहिए. रेडियो में काम करने के लिए अच्छी आवाज़...साफ डिक्शन के साथ-साथ और क्या ज़रूरी है, इन सब पर चर्चा और इन सब सवालों का जवाब देने वाले भी उस मैदान के दिग्गज खिलाड़ी हैं. जैसे अमीन सयानी, राजदीप सरदेसाई, सलमा जैदी, रवीश कुमार, पुण्य प्रसून बाजपेयी, सुमित अवस्थी, अनिरुद्ध बहल, शम्‍स ताहिर खान, अल्‍का सक्‍सेना, अविनाश दास, वगैरह.

वैसे तो ये किताब एक तरह से हर उस शख़्स के लिए हो सकती है जिसकी ज़रा भी रुचि पत्रकारिता और उससे जुड़े विषयों में है. साथ ही बेहतरीन हिंदी पढ़ने के शौक़ीनों के लिए भी यहां काफ़ी कुछ अच्छा लिखा मिलेगा.

ख़ास तौर से पत्रकारों और पत्रकारिता के छात्रों को ये किताब ख़ूब भगाएगी...क्योंकि यहां वो सब कुछ एक ही जगह मिल जाएगा जिसके लिए उन्हें आम तौर पर कई किताबें छाननी पड़ती हैं.

ख़ास तौर से इस किताब में नुक़्तों का इस्तेमाल किया गया है जो कम ही किताबों में मिलता है. ये नए और पुराने दोनों दौर के पत्रकारों के लिए इसलिए भी काम की हो सकती है क्योंकि अक्सर लोगों से यहां ग़लतियां होती रहती हैं. लोग जलील साहब को ‘ज़लील’ किया करते हैं और ज़रूर को ‘जरूर’ पढ़ना तो हिंदी भाषियों में आम है.

नुक़्तों का इस्तेमाल आज इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि हिंदी जैसा कि सभी भाषाओं को अपने आप में समाहित करने के लिए जानी जाती रही है, यहां बोलचाल में उर्दू भाषा के शब्दों का चलन बढ़ गया है...और जो नई तरह की पत्रकारिता है वहां ऐसी भाषा के इस्तेमाल पर ज़ोर रहता है जो आम लोग बोलते हैं. क्योंकि समाचार देखने...पढ़ने...सुनने वाला, हर वर्ग...हर स्तर का है का है.

ऐसे में हम अगर साहित्यिक बाबा आदम के ज़माने की हिंदी आज कल के कॉलेज गोइंग स्टूडेंट्स को परोसेंगे तो वो दुलत्ती मार के भाग जाएंगे और अंग्रेजी को ही अपना साथी मानने लगेंगे...नतीजा हिंदी की दुकान बंद. इसलिए भाषा ऐसी होनी चाहिए जो शुद्ध...सही और ‘लोगप्रिय’ हो.

इस किताब में पत्रकारिता के हर पहलू की संक्षिप्त लेकिन बारीक से बारीक जानकारी दी जाएगी मिसाल के तौर पर ये कुछ चैप्टर्स होंगे जो “नए ज़माने की पत्रकारिता” की शान बढ़ाएंगे.

पुस्‍तक के लेखक सौरभ शुक्‍ला फिलहाल India TV से जुड़े हैं।

इनसे ईमेल- saaurabhshuklaa@gmail.com सम्पर्क किया जा सकता है। मोबाइल न है- +91-9833062101

पुस्‍तक- नए जमाने की पत्रकारिता

लेखक - सौरभ शुक्‍ला

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