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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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गदाई ही नहीं देते मेरे एस.एम.एस. की रिप्लाई

बच्चू वेबमैग्जीन इसलिए नहीं आपरेट कर रहा हूँ कि तुम्हारे जैसे लफूझन्ना ब्राण्ड उसके लेखकों की फेहरिश्त में आएँ

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ बेटा मै इतना नासमझ नही कि यह भी न समझ पाऊँ कि तुम ‘हाई प्रोफाइल‘ बौंकड़ी बाज हो। पैंतालिस साल पहले तुम्हारे जैसों की पैदाइश हमारे नखलऊ के गदाई टोले में हुई थी। जो गदाई तब बच्चा था अब वही एक हाई प्रोफाइल बौंकड़ीबाज बन गया है। तुम्हारे जैसे गदाइयों को मैं भली-भाँति जानता हूँ। लिखने-पढ़ने का सऊर नहीं ऊपर से दिखावा ऐसा कि मानो कालीदास, शेक्सपीयर, कवीन्द्र रविन्द्रनाथ ठाकुर, मुंशी प्रेमचन्द सरीखे हों।

बच्चू वेबमैग्जीन इसलिए नहीं आपरेट कर रहा हूँ कि तुम्हारे जैसे लफूझन्ना ब्राण्ड उसके लेखकों की फेहरिश्त में आएँ। अरे गदाई लोगों मैं एस.एम.एस. इसलिए नहीं भेजता कि तुम उसकी रिप्लाई न दो।। एस.एम.एस. लिखने की तमीज न हो तो एक काल करके बता दो मुझे तसल्ली हो जाएगी कि तुम्हें एस.एम.एस. लिखना नहीं आता। गदाई बच्चा मेरा एस.एम.एस. तुम्हारे अकेले के  पास नहंी जाता। एक साथ एक ही मैटर सैकड़ो लोगों को भेजा जाता है। तुम हो कि एस.एम.एस. पाते ही अपना भाव बढ़ा देते हो। यह तुम्हारी गलतफहमी है।

फेशबुक में अपनी लफ्फाजी लिखा करो क्योंकि इससे सस्ता और कोई मीडिया नहीं है। तुम्हारे वश का रोग स्तरीय लेखन नहीं है और न ही तुम उसकी पात्रता रखते हो क्योंकि तुम गदाई हो। जो लोग फेशबुक में अपनी अनापशनाप टिप्पणियाँ लिखते हैं उन्हें मैं गदाई समझता हूँ। भाई/बहन जी लिखना है तो आवो स्तरीय वेब मैगजीन में लिखो। कूबत हो तो फेशबुक में लिखना बन्द करो और स्तरीय आलेख हमें मेल करो हम उसका प्रकाशन करेंगे। देखो बच्चे गदाई परसाद इतराओ मत क्योंकि तुम्हारे जैसों की कमी नहीं है। देखना है तो हमारे नखलऊ के चारबाग स्टेशन पर चले आओ वहाँ अनगिनत गदाई मिल जाएँगे। जो भविष्य में तुम्हारे जैसे बौंकड़ीबाज ही बनेंगे।

तो क्या अब यह समझूँ कि मेरे एस.एम.एस. केवल तुम्हारे जैसे गदाइयों के लिए ही नहीं होते हैं। शरीफ लेखक/लेखिकाओं के लिए होते हैं। मुझे मेरे एस.एम.एस. के उत्तर न देने वाले लोग गदाई ही प्रतीत होते हैं, जिनके उत्तर मिलते हैं समझता हूँ कि यह गदाई कत्तई नहीं हो सकता। देश के कई प्रान्तों और मेट्रो में रहने वालों को एस.एम.एस. जाते हैं। गदाइयों को छोड़कर शेष सभी के उत्तर एस.एम.एस./काल के रूप में हमें मिलते हैं। गदाई लोग तो स्वयं अपने ही गुणगान में लगे दिखते हैं। ताज्जुब होता है कि इन गदाइयों के झाँसे में कई कथित प्रतिभाशाली लोग भी आकर उन्हीं के बीच नाचते गाते दिखाई पड़ते हैं।

नसीहत उसे दी जाती है जो अपरिपक्व हो। यहाँ तो मेच्योर लोग भी डिस्को डांसरों की पार्टी का एक हिस्सा बने मुझ जैसों के लिए हंसी का पात्र बने हुए हैं। इन मेच्योरों का मानना है कि यदि अमुक-अमुक गदाई न होते तो उन्हें हजारों गदाई बन्धु बांधव न जान पाते। इसे क्या कहा जाए? मैं तो यही कहूँगा कि ‘शोहरत‘ के लिए यह है इनका गदाई प्रेम।

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सम्पादक

डॉ. लीना